पुस्तक (उपन्यास) – स्टेलमेट, लेखक – दीपक गिरकर, प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, मूल्य – रु 299/-
समीक्षक – अनीता सक्सेना
प्रतिष्ठित साहित्यकार दीपक गिरकर समकालीन हिंदी साहित्य में एक ऐसे रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी को किसी एक विधा तक सीमित नहीं रखा। व्यंग्य, आलोचना, आलेख, उपन्यास तथा बैंकिंग जैसे जटिल और विशिष्ट विषयों पर भी उन्होंने समान अधिकार के साथ लेखन किया है। उनकी चर्चित पुस्तक “एनपीए एक लाइलाज बीमारी नहीं” यह प्रमाणित करती है कि वे केवल साहित्यिक कल्पना के लेखक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के भी सजग विश्लेषक हैं। उनका नवीनतम उपन्यास “स्टेलमेट” इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है कि यह जीवन, समाज, राजनीति, न्याय व्यवस्था और मानवीय संबंधों की जटिलताओं को एक साथ समेटता हुआ आगे बढ़ता है।
उपन्यास का शीर्षक पहली दृष्टि में पाठक को चौंकाता है। “स्टेलमेट” शतरंज का एक तकनीकी शब्द है, जिसका अर्थ है – ऐसी स्थिति जहाँ किसी खिलाड़ी के पास कोई वैध चाल शेष नहीं रहती, किंतु वह पराजित भी नहीं होता। खेल न जीत में समाप्त होता है और न हार में; परिणाम होता है – गतिरोध। यही स्थिति उपन्यास के कथ्य का सबसे बड़ा रूपक बन जाती है। लेखक ने शतरंज के इस सिद्धांत को केवल खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन-दर्शन का स्वरूप प्रदान किया है। अनेक अवसरों पर मनुष्य भी ऐसी परिस्थितियों में पहुँच जाता है जहाँ उसके सामने कोई सरल विकल्प नहीं बचता। वह न पूरी तरह विजयी होता है और न पराजित; केवल परिस्थितियों के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता रहता है।
उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आरंभिक संरचना है। कथा जेल की सलाखों के पीछे से प्रारंभ होती है। कैद में बैठी नायिका माधवी अपने अतीत के पन्ने पलटती है और अपनी जीवन-यात्रा स्वयं पाठक को सुनाती है। यह आत्मकथात्मक शैली कथा को अत्यंत विश्वसनीय बना देती है। कई स्थानों पर ऐसा अनुभव होता है मानो लेखक किसी काल्पनिक कहानी का निर्माण नहीं कर रहे, बल्कि किसी वास्तविक जीवन का दस्तावेज़ पाठकों के सामने रख रहे हों। यही कारण है कि पाठक आरंभ से अंत तक माधवी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है।
माधवी केवल उपन्यास की नायिका नहीं, बल्कि संघर्ष, संवेदना और आत्मबल का प्रतीक है। वह एक प्रतिभाशाली, शिक्षित और आत्मनिर्भर युवती है, जो अपने सहपाठी श्रीनिवासन से प्रेम करती है। दोनों का प्रेम सामाजिक रूढ़ियों, जातिगत सीमाओं और धार्मिक पूर्वाग्रहों को चुनौती देता है। परिवार का विरोध, समाज की संकीर्ण मानसिकता और परंपराओं का दबाव, इन सबके बीच वे विवाह का निर्णय लेते हैं। लेखक ने इस प्रसंग को किसी विद्रोही घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत किया है। विवाह के बाद माधवी अपने मायके से लगभग संबंध-विच्छेद की स्थिति में पहुँच जाती है, किंतु ससुराल का स्नेह उसे नए जीवन का आधार देता है। यह चित्रण भारतीय पारिवारिक संरचना के अनेक पक्षों को उजागर करता है।
विवाह के पश्चात दंपति के जीवन में सुखद क्षण आते हैं। उनका पहला पुत्र स्वस्थ, मेधावी और उज्ज्वल भविष्य वाला बालक है। किंतु दूसरी संतान एक बेटी जन्म से ही गूँगी और बहरी होती है। यहीं लेखक की संवेदनशील दृष्टि सामने आती है। सामान्यतः ऐसे प्रसंगों में साहित्य करुणा का अतिरेक उत्पन्न करता है, किंतु यहाँ माता-पिता उसे दया का नहीं, अधिकार का पात्र मानते हैं। वे उसे समान अवसर, शिक्षा और संस्कार देते हैं। धीरे-धीरे वही बालिका अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर शतरंज की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बन जाती है। यह प्रसंग केवल प्रेरणादायी नहीं, बल्कि इस तथ्य की पुष्टि करता है कि दिव्यांगता मनुष्य की क्षमता का अंत नहीं होती; उचित वातावरण और विश्वास उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।
उपन्यास का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम राजनीति है। माधवी का सार्वजनिक जीवन उसकी निजी उपलब्धियों का स्वाभाविक विस्तार है। अपनी प्रतिभा, ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण वह चुनाव जीतकर शिक्षा मंत्री बनती है। लेखक ने इस प्रसंग में सत्ता का आकर्षण नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का पक्ष अधिक उभारा है। शिक्षा मंत्री के रूप में माधवी सरकारी विद्यालयों की जर्जर स्थिति सुधारने का अभियान चलाती है। वह विद्यालयों की मूलभूत सुविधाओं, शिक्षण की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य के प्रति गंभीर दिखाई देती है। साथ ही बाल श्रम के विरुद्ध उसका अभियान उपन्यास को व्यापक सामाजिक सरोकार प्रदान करता है। कारखानों और कार्यस्थलों पर काम कर रहे बच्चों को मुक्त कराकर उन्हें विद्यालयों तक पहुँचाने का प्रयास उसके व्यक्तित्व की मानवीय ऊँचाई को रेखांकित करता है।
लेखक राजनीति के यथार्थ से भी आँख नहीं चुराते। सत्ता परिवर्तन के साथ ही परिस्थितियाँ पलट जाती हैं। जो लोग कल तक सम्मान और प्रशंसा कर रहे थे, वही लोग दूरी बना लेते हैं। मंत्री पद, सुरक्षा, प्रभाव और प्रतिष्ठा सब कुछ क्षणभर में समाप्त हो जाता है। लेखक यहाँ राजनीति की निर्ममता और अवसरवादिता पर तीखा व्यंग्य भी करते हैं। यह संदेश अत्यंत प्रभावी है कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती; स्थायी होते हैं केवल मनुष्य के कर्म और उसके मूल्य।
राजनीतिक जीवन से लौटकर माधवी पुनः परिवार में रम जाती है। बेटे का विवाह, दादा-दादी बनने का सुख और पारिवारिक उल्लास जीवन में संतुलन लौटाते प्रतीत होते हैं। किंतु लेखक जीवन की अनिश्चितता को लगातार रेखांकित करते हैं। जिस श्रीनिवासन की सफलता के पीछे माधवी का समर्पण, त्याग और प्रेरणा रही, वही धीरे-धीरे उससे दूर होता जाता है। सफलता का अहंकार, गलत संगति और नैतिक विचलन उसके व्यक्तित्व को भीतर से खोखला करने लगते हैं। यह परिवर्तन अत्यंत स्वाभाविक ढंग से चित्रित किया गया है और पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि कभी-कभी सबसे बड़ी पराजय बाहर नहीं, भीतर घटित होती है।
उपन्यास का सबसे मार्मिक और हृदयविदारक प्रसंग उनकी गूँगी-बहरी बेटी की हत्या है। यही वह क्षण है जहाँ कथा एक नए मोड़ पर पहुँचती है। अब यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि न्याय व्यवस्था, अपराध, धनबल, राजनीतिक संरक्षण और सामाजिक विडंबनाओं की कथा बन जाती है। लेखक अदालतों की लंबी प्रक्रिया, तारीख़ों के अंतहीन सिलसिले, प्रभावशाली अपराधियों की पहुँच और न्याय पाने की पीड़ादायक यात्रा का अत्यंत यथार्थ चित्रण करते हैं। पाठक महसूस करता है कि पीड़ित व्यक्ति केवल अपराध से नहीं, बल्कि व्यवस्था की जटिलताओं से भी लड़ता है।
उपन्यास का चरम बिंदु अत्यंत विचारोत्तेजक है। जब न्याय की सभी संस्थागत संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब माधवी स्वयं कानून अपने हाथ में लेने को विवश हो जाती है। लेखक इस घटना का महिमामंडन नहीं करते, बल्कि इसे व्यवस्था की विफलता से उपजी त्रासदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उपन्यास समाप्त होने के बाद भी अनेक प्रश्न पाठक के भीतर जीवित रहते हैं – क्या न्याय में अत्यधिक विलंब स्वयं अन्याय नहीं है? क्या व्यवस्था की असफलता किसी व्यक्ति को प्रतिशोध के मार्ग पर धकेल सकती है? क्या कानून की निष्क्रियता अंततः सामाजिक अराजकता को जन्म देती है?
उपन्यास का एक अत्यंत आकर्षक पक्ष शतरंज का विस्तृत और सार्थक प्रयोग है। खेल की चालें, रणनीतियाँ, मानसिक अनुशासन और “स्टेलमेट” जैसी अवधारणाएँ केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि कथा की संरचना का अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं। लेखक ने शतरंज को जीवन के रूपक में रूपांतरित कर दिया है। जैसे खेल में हर चाल का दूरगामी परिणाम होता है, वैसे ही जीवन में लिए गए निर्णय भी भविष्य की दिशा निर्धारित करते हैं। कहीं-कहीं पात्र स्वयं मोहरे बन जाते हैं और परिस्थितियाँ अदृश्य खिलाड़ी।
भाषा की दृष्टि से उपन्यास सहज, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय है। संवाद स्वाभाविक हैं और घटनाओं का क्रम पाठक की रुचि बनाए रखता है। लेखक ने अनावश्यक अलंकरणों से बचते हुए कथानक को गति दी है। सामाजिक यथार्थ, पारिवारिक संवेदनाएँ, राजनीतिक घटनाएँ, न्याय व्यवस्था और मानवीय मनोविज्ञान—इन सभी को संतुलित रूप से प्रस्तुत करना उनकी कथाकार-सुलभ दक्षता का परिचायक है।
समग्रतः “स्टेलमेट” केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज के अनेक चेहरों का दर्पण है। इसमें प्रेम है, संघर्ष है, मातृत्व है, राजनीति है, विश्वासघात है, न्याय की तलाश है और अंततः उस मनुष्य की पीड़ा है जो हर संभव प्रयास के बाद भी परिस्थितियों से घिर जाता है। उपन्यास यह स्थापित करता है कि जीवन सदैव जीत और हार के दो स्पष्ट ध्रुवों के बीच नहीं चलता। अनेक बार मनुष्य ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ कोई भी चाल उसे मुक्ति नहीं देती। वही स्थिति जीवन का वास्तविक “स्टेलमेट” है।
दीपक गिरकर का यह उपन्यास अपनी विषय-वस्तु, संरचना, प्रतीकात्मकता और सामाजिक सरोकारों के कारण समकालीन हिंदी उपन्यासों में विशिष्ट स्थान पाने की क्षमता रखता है। यह पाठक को केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसे सोचने, आत्ममंथन करने और व्यवस्था के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मुठभेड़ करने के लिए भी प्रेरित करता है। लेखक इस उल्लेखनीय कृति के लिए निश्चय ही हार्दिक बधाई और शुभकामनाओं के पात्र हैं।
अनीता सक्सेना
50 – स्नेह बंध, दीपक सोसाइटी, भोपाल
