- वीरेंद्र शर्मा
किसी भी लोकतंत्र में सरकार के मुखिया के तौर पर सार्वजनिक पद पर पच्चीस साल बिताना एक बड़ी उपलब्धि है। भारत जैसे देश में, जहाँ राजनीतिक मुकाबला बहुत कड़ा होता है, चुनावों में जीत के लिए ज़बरदस्त संघर्ष होता है और जनता की राय तेज़ी से बदल सकती है, वहाँ इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहने पर विचार करना ज़रूरी है।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। तेरह साल बाद, मई 2014 में, वे भारत के प्रधानमंत्री बने। अब उन्होंने सरकार के मुखिया के तौर पर लगातार पच्चीस साल पूरे कर लिए हैं — पहले राज्य स्तर पर और फिर राष्ट्रीय स्तर पर।
भारतीय मूल का व्यक्ति होने के नाते, जिसने ब्रिटेन में जनसेवा और राजनीतिक गतिविधियों में अपना जीवन बिताया है, मैं इस उपलब्धि को न तो पार्टी की राजनीति के नज़रिए से देखता हूँ और न ही व्यक्तिगत निष्ठा के नज़रिए से। मैं इसे एक लोकतंत्र-प्रेमी के नज़रिए से देखता हूँ: पच्चीस साल का यह सफ़र हमें राजनीतिक लीडरशिप, जनता के भरोसे और चुने हुए नेता व जनता के बीच के रिश्ते के बारे में क्या बताता है?
मेरे अपने राजनीतिक सफ़र ने मुझे एक बुनियादी बात सिखाई है: राजनेता सार्वजनिक पद के अस्थायी संरक्षक होते हैं। असली ताकत जनता के पास होती है।
जनता का फ़ैसला
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ चुनाव जीतना नहीं है। इसका मतलब है लगातार नागरिकों का भरोसा जीतना।
श्री मोदी के राजनीतिक सफ़र में कई चुनाव हुए हैं और भारतीय मतदाताओं को बार-बार अपना फ़ैसला सुनाने का मौका मिला है। राष्ट्रीय चुनावों में उनकी लगातार तीन जीत — 2014, 2019 और 2024 में — यह दिखाती हैं कि उन्हें कितना ज़बरदस्त चुनावी समर्थन मिला है। जून 2026 में, वे लगातार सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले भारत के चुने हुए प्रधानमंत्री भी बन गए, और उन्होंने जवाहरलाल नेहरू का पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया।
लेकिन रिकॉर्ड जवाबदेही की जगह नहीं ले सकते।
एक लोकतांत्रिक नेता को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि कल मिला जनादेश अपने-आप कल का जनादेश नहीं बन जाता। मतदाताओं की हर पीढ़ी को नए सवाल पूछने, नए जवाब मांगने और सरकार से बदलती परिस्थितियों के अनुसार काम करने की उम्मीद करने का अधिकार है।
यही लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है — और कभी-कभी मुश्किल भी।
गुजरात से केन्द्र तक
श्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक पहचान काफी हद तक गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके तेरह साल के कार्यकाल से बनी। उन्होंने अक्टूबर 2001 में पद संभाला, जब राज्य मुश्किल दौर से गुज़र रहा था; उसी साल राज्य में एक भयानक भूकंप भी आया था। इसके बाद उन्होंने प्रशासन, इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और आर्थिक विकास के मामलों में अपनी राजनीतिक साख बनाई।
जब वे 2014 में नई दिल्ली आए, तो वे राज्य सरकार के कामकाज का अपना अनुभव भी साथ लाए।
इसके बाद उनकी सरकारों ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल टेक्नोलॉजी, फाइनेंशियल इन्क्लूजन (वित्तीय समावेश), मैन्युफैक्चरिंग, कल्याणकारी योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति को मज़बूत करने पर काफी ज़ोर दिया। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार जैसे कार्यक्रम उनके कार्यकाल की पहचान बन गए हैं।
समर्थक इसे बदलाव के सबूत के तौर पर देखते हैं। वहीं, आलोचकों के मन में असमानता, रोज़गार, संस्थागत संतुलन और राजनीतिक सत्ता के इस्तेमाल के तरीके को लेकर वाजिब सवाल हैं।
लोकतंत्र में इन दोनों ही नज़रियों की अपनी जगह है।
एक राजनेता को बिना बारीकी से जाँच-परख छोड़े उपलब्धियों को स्वीकार करना चाहिए, और असहमति रखने वालों को खारिज किए बिना आलोचना को भी मानना चाहिए।
नेतृत्व और ज़िम्मेदारी
सत्ता में पच्चीस साल रहने का एक और पहलू है: ज़िम्मेदारी।
कोई राजनीतिक नेता जितने लंबे समय तक पद पर रहता है, मज़बूत लोकतांत्रिक संस्थाओं को बनाए रखने, संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान करने और यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी उतनी ही बढ़ जाती है कि सरकार संसद, अदालतों, मीडिया और सबसे बढ़कर, जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
भारत का लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक नेता या राजनीतिक पार्टी से कहीं बड़ा है।
इसने बहुत अलग-अलग विचारधाराओं वाली सरकारों का दौर देखा है। इसने बड़े राजनीतिक बदलावों का सामना किया है। इसने अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों, क्षेत्रों और राजनीतिक आंदोलनों को अपनाया है।
यह विविधता कमज़ोरी नहीं है। यह भारत की ताक़त है।
इसलिए, नेतृत्व की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों का प्रतिनिधित्व करना नहीं है, जिन्होंने आपको वोट दिया है। बल्कि उन लोगों के लिए भी शासन करना है जिन्होंने आपको वोट नहीं दिया।
दुनिया के मंच पर भारत
मोदी के दौर की बात करते समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती पहचान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
आज भारत ग्लोबल डिप्लोमेसी, व्यापार, टेक्नोलॉजी, क्लाइमेट पॉलिसी और ‘ग्लोबल साउथ’ के मामलों में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। G20 की अध्यक्षता, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव और विकासशील देशों के साथ पार्टनरशिप पर बढ़ता ज़ोर – इन सबने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की मज़बूत पहचान बनाने में योगदान दिया है।
हम जैसे भारतीय मूल के लोगों के लिए यह बात मायने रखती है।
हम दो दुनियाओं के बीच रहे हैं — अपनी भारतीय विरासत पर गर्व करते हुए, साथ ही उन देशों के प्रति भी पूरी तरह समर्पित रहे हैं जिन्हें हमने अपना घर बनाया है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि भारतीय मूल के लोगों को ब्रिटेन और भारत के बीच एक पुल की तरह काम करना चाहिए, न कि बंटवारे की लकीर की तरह।
एक आत्मविश्वास से भरा भारत, सबको साथ लेकर चलने वाला भारत भी होना चाहिए।
जनमत का महत्व
मेरे अपने राजनीतिक अनुभव ने इस बात पर मेरा भरोसा और पक्का किया है कि जनमत ही लोकतंत्र की जान है।
नेता भाषण दे सकते हैं। सरकारें कानून ला सकती हैं। पार्टियां घोषणा-पत्र जारी कर सकती हैं। लेकिन आखिर में फैसला नागरिक ही करते हैं।
वे चुनाव में तो फैसला करते ही हैं, साथ ही सिविल सोसाइटी, मीडिया, कम्युनिटी ऑर्गनाइज़ेशन, प्रोफेशनल बॉडीज़, युवाओं और देश भर में होने वाली आम बातचीत के ज़रिए भी अपनी राय ज़ाहिर करते हैं।
एक परिपक्व लोकतंत्र तब भी बात सुनता है जब वह सहमत न हो।
यह सिद्धांत नरेंद्र मोदी के समर्थकों और विरोधियों, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
जो लोग उनके नेतृत्व की तारीफ़ करते हैं, उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि तारीफ़ करने से बारीकी से जांच-परख की ज़रूरत खत्म हो जाती है। जो लोग उनका विरोध करते हैं, उन्हें उन वजहों को कम करके नहीं आंकना चाहिए जिनकी वजह से लाखों भारतीयों ने बार-बार उनका समर्थन किया है।
राजनीतिक सफलता को समझने के लिए वोटरों को समझना ज़रूरी है।
पच्चीस साल — और अगला अध्याय
सरकार के मुखिया के तौर पर पच्चीस साल का समय सिर्फ़ एक निजी रिकॉर्ड नहीं है। यह आत्म-चिंतन का एक मौका भी है।
गुजरात से नई दिल्ली तक नरेंद्र मोदी का सफ़र आज के भारत की सबसे अहम राजनीतिक कहानियों में से एक है। उनके समर्थक विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं, टेक्नोलॉजी, देश के आत्मविश्वास और दुनिया में भारत की साख का ज़िक्र करेंगे। वहीं, उनके आलोचक सामाजिक एकता, राजनीतिक केंद्रीकरण, संस्थाओं की आज़ादी और असहमति के प्रति रवैये पर सवाल उठाते रहेंगे।
लोकतांत्रिक तरीका यह नहीं है कि किसी भी पक्ष की आवाज़ दबा दी जाए। सही तरीका यह है कि फ़ैसला जनता पर छोड़ दिया जाए।
भारतीय मूल के एक ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर, जिसने दशकों तक जन-सेवा में यकीन रखा है, मैंने कभी राजनीति को अपनी निजी संपत्ति नहीं माना। सरकारी पद नागरिकों द्वारा कुछ समय के लिए सौंपी गई एक ज़िम्मेदारी होती है।
इसीलिए मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी के पच्चीस सालों को देखने का सबसे सही तरीका न तो बिना सोचे-समझे उनकी तारीफ़ करना है और न ही बिना सोचे-समझे उनकी आलोचना करना। सही तरीका लोकतांत्रिक नज़रिए से इस पर विचार करना है।
पच्चीस साल का समय एक बड़ी उपलब्धि है। यह राजनीतिक मज़बूती, संगठन की क्षमता और सबसे बढ़कर, मतदाताओं के साथ लगातार बने रहे रिश्ते को दिखाता है। लेकिन किसी भी राजनीतिक करियर की असली परख सिर्फ़ लंबे समय तक बने रहने से नहीं होती।
असली परख इस बात से होती है कि क्या नेता अपने पीछे एक मज़बूत लोकतंत्र, मज़बूत संस्थाएँ, बेहतर अवसर और ऐसा समाज छोड़ता है जिसमें हर नागरिक को लगे कि वह उसका हिस्सा है।
भारत सभी भारतीयों का है। इसका लोकतंत्र सभी भारतीयों का है। और आख़िरकार, फ़ैसला हमेशा जनता का ही होना चाहिए।
मेरी नज़र में, नरेंद्र मोदी के पच्चीस साल के राजनीतिक नेतृत्व से यही अहम सीख मिलती है: नेता भले ही पद पर हों, लेकिन असली सत्ता जनता के हाथ में ही होती है।

वीरेंद्र शर्मा
पूर्व सांसद, यूके
