- डॉ विद्या सिंह
जब से भारत का संपर्क यूरोप से हुआ है, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव हमारे देश पर क्रमशः पड़ा है। राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों पर पश्चिम की छाप पड़ी है और समयानुसार यह प्रभाव बढ़ता ही गया है। आधुनिक सभ्यता का जनक यूरोप है। औद्योगिक क्रान्ति के साथ उसका सामाजिक ढाँचा परिवर्तित हुआ और देर सबेर पूरा विश्व उसके प्रभाव में आ गया। आज़ादी के पहले के भारत में आम आदमी के लिए पश्चिम मूलतः ब्रिटेन का ही पर्याय था किन्तु आज़ादी के बाद पश्चिम शब्द से अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ का भी बोध होने लगा। अध्ययन, नौकरी या व्यवसाय के लिए पश्चिम में जा कर बसे भारतीयों की जीवनशैली में अनेक परिवर्तन आए। इसका व्यापक प्रभाव हमारे देश के युवा वर्ग पर पड़ा। उन्नीसवीं सदी के तीस के दशक में हमारी शिक्षित युवतियाँ किस प्रकार पाश्चात्य जीवनशैली से प्रभावित हो रही थीं, इसका वर्णन कुमारी विमल विदुषी ने महादेवी द्वारा संपादित पत्रिका चाँद में किया है। उन्हीं के शब्दों में, ‘‘पर्दा प्रथा परित्याग, उच्चशिक्षा की ओर प्रवृत्ति, स्वतन्त्र रहने की भावना, अधिकार लिप्सा तथा विवाह सम्बन्धी आधुनिक विचार, सामाजिक कुरीतियों के प्रति स्वाभाविक घृणा, सभी शिक्षित स्त्रियों में दिखलाई देती है।‘‘¹ भारत में जहाँ आचरण सम्बन्धी बातों का विशेष महत्त्व है, पाश्चात्य जीवन पद्वति को आँख मूंद कर अपनाना श्रेयस्कर नहीं समझा गया। किन्तु पश्चिम की उन्मुक्त जीवनशैली का आकर्षण घटने की बजाय युवाओं में एक फैशन की तरह फैलता गया। विदेशी संस्कृति, विदेशी सभ्यता, विदेशी साहित्य आज हमारे देश पर हावी है। अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान इतना जरूरी हो गया है कि इसके बिना सारी विद्वता व्यर्थ है। रवीन्द्र नाथ ने कहा था, ‘अंग्रेजी भाषा में गलती होने पर हमारे देश में जितनी हँसी होती है उतनी किसी अन्य बात पर नहीं होती। यह हँसी बड़ी दुखपूर्ण है और इसमें हमारी विदेशियों की गुलामी की लज्जा मिली हुई है।‘
यूरोप तथा अमेरिका के निवासियों ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अन्य जातियों की अपेक्षा अधिक उन्नति कर ली है। उनके आविष्कारों से संसार के सुखों की वृद्वि हुई है, किन्तु अत्यधिक सुख की लालसा विलासिता को जन्म देती है। ग्लोबल मार्केट का केन्द्र बन रहे हमारे देश समाज में बदलती जीवनशैली में युवा अपनी ज़िंदगी को और भी आरामतलब बनाना चाहते हैं। अपना फ्लैट, बढ़िया फोर व्हीलर, होम थिएटर, मंहगे हाॅलीडे ट्रिप, ब्रांडेड कपड़े, मंहगे मोबाइल, त्योहारों की बंपर शॅापिंग और भी बहुत कुछ चाहिए हमारी आज की युवा पीढ़ी को। घर को सुख साधन का संग्रहालय बना कर वे आत्मतृप्ति का अनुभव करते हैं। बैंक अपने ग्राहकों की इस कमजोरी को समझता है इसीलिए पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड से पेमेंट जैसे प्रावधान से उन्हें खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करता है। आज़ादी से पहले इतनी ज्यादा वस्तुएँ नहीं थीं, पर भारतीय मानस मानवीय भावों और विचारों से भरा था। आज ‘वस्तुएँ‘ ही ‘वस्तुएँ‘ हैं पर दिमाग अब खुद सोचता नहीं है। हमारे युवा नित नई उपभोग की वस्तुओं को प्राप्त करना चाहते हैं, जिनका महत्त्व प्रतिष्ठा चिन्ह के रूप में अधिक और उनकी वास्तविक उपयोगिता की दृष्टि से कम होता है। बड़े- बड़े माॅल, कीमती कारें, विस्तृत मनोरंजन उद्योग सब ऋण के भरोसे फल फूल रहे हैं।
जब से नव उदारवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार हुआ है, भारत का बड़ी तेजी से अमेरिकीकरण हुआ है। उपन्यासकार आर. के. नारायण ने आधी सदी पूर्व अमेरिकी यात्रा के बाद लिखा था, ‘अमेरिका और भारत दृष्टिकोण और दर्शन में एक दूसरे से काफ़ी भिन्न हैं। भारतीय दर्शन अपरिग्रह और उलझनहीन एवं जटिलता से परे, दैनिक जीवनचर्या पर ज़ोर देता है। उधर अमेरिका का ज़ोर अभिग्रहण तथा समृद्वि की असीमित प्राप्ति पर है।‘ किन्तु आज यह कथन पुराना पड़ चुका है। जिस उपभोक्तावाद के लिए अमेरिका जाना जाता है, हमारे युवा उसी के शिकार हो रहे हैं। अधिकाधिक धन एकत्र करने की लालसा में वे इतने डूब गए हैं कि नैतिकता- अनैतिकता की बातें पीछे छूट गई हैं। अपराधों के माध्यम से वंचित और गरीब रातों-रात अमीरों में शुमार होना चाहते हैं। सन् उन्नीस सौ नब्बे के बाद अरबपतियों की संख्या में बेतहाशा वृद्वि हुई है। आज सारा ज़ोर बाजार, कॅरियर और तकनीक पर है। कॅरियर के लिए लड़कियाँ अविवाहित रहने लगी हैं, लिव इन रिलेशनशिप, सरोगेसी बहुतायत में सुनने में आने लगा है। भारत में परिवार, सामाजिकता, आत्मनिर्भरता, सादगी, अहिंसा और त्याग जैसे सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा रही है जो आज के युग में बेमानी होे गए हैं। संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार बने, अब एकल परिवार भी टूट कर व्यक्ति-व्यक्ति अलग हो रहे हैं। पति-पत्नी के कमरे अलग अलग हैं, संबंध बस औपचारिक हैं।
उदारीकरण के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में तेजी से पूँजी निवेश कर रही हैं। यह निवेश खान-पान के क्षेत्र में भी आया है। स्टारबक्स, बरिस्ता, कोस्टाकाॅफी आदि काॅफीहाउस श्रृंखला ने हमारे देसी चायघरों और काॅफी हाउस संस्कृति को अपदस्थ कर दिया है। भारत में अल्प समय में फैलने वाले अमेरिकी भोजनालयों में मैक्डोनाल्ड सबसे ऊपर है। व्यस्त युवा लोग अत्यंत प्रसन्न हैं क्योंकि सर्विस अविलंब और काफ़ी कुशल होने के कारण उनका समय नष्ट नहीं होता। केएफसी, सबवे, टाकोबेल भी तेज़ी से फैल रहे हैं। हमारे ढाबे और मिठाई की दुकानें युवाओं को आकृष्ट नहीं करतीं, हैमबर्गर, पिज़्ज़ा तथा अन्य फास्टफूड उनकी पहली पसंद बन गए हैं। आनलाइन शाॅपिंग के अग्रदूत अमेज़न डाॅट काॅम युवाओं में खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। पूरे विश्व में एक सी उपभोक्ता संस्कृति का प्रसार बहुल सांस्कृतिकता के लिए खतरा बन गया है। यह एक प्रकार का नव साम्राज्यवाद है। ‘‘जिस तर्क से भूमंडलीकरण अमीर देशों की पूँजी, प्रौद्योगिकी एवं सेवा शर्तों का भूमंडलीकरण चाहता है, उसी तर्क से वह जीवनशैली और समाज के मान-मूल्यों, खान-पान, तौर-तरीकों, आदतों एवं बात विचारों का भूमंडलीकरण भी चाहता है।‘‘² टेरी इगल्टन ने इस संस्कृतिवाद को पश्चिम का चोर दरवाज़ा कहा है। यह भी एक प्रकार का साम्राज्यवाद है।
शंभुनाथ के शब्दों में, ‘‘भारत के लोगों के लिए नया साम्राज्यवाद कैसा है? पुराने साम्राज्यवाद के दौर में अंग्रेजी पढ़ कर भी लोगों में देशप्रेम घटता नहीं था, बल्कि देशप्रेम वस्तुतः राष्ट्रवाद, स्वाधीनता की चेतना, जातीय भाषा और जनता से प्रेम में विकसित हो जाता था। साम्राज्यवाद के नये दौर में भारत से अधिक पराया कुछ नहीं है, अमेरिका से अधिक अपना कुछ नहीं है। अमेरिका ‘फीलगुड‘ कराता है। वह भरोसा है, आदर्श है, पहला लक्ष्य है। आखिरकार भारत में रखा ही क्या है, यह एक असहनीय जगह है।‘‘³ यह तल्ख टिप्पणी आधारहीन नहीं है। इस पीढ़ी को ज्यादा विलासिता, दौलत, उपभोक्ता सामान चाहिए। बाज़ार ने इनके सपनों को अन्तहीन विस्तार दिया है। बाज़ार को लक्ष्य कर आधारशिला के सम्पादक दिवाकर भट्ट की टिप्पण़ी ध्यान देने योग्य है। वह लिखते हैं, ‘‘दरअसल जनता के सपनों के इन सौदागरों के गोरखधन्धे ने युवापीढ़ी में राष्ट्रीय चरित्र विकसित होने से पहले ही उन्हें खालिस उपभोक्ता बना दिया है और उनका ब्रेनवाॅश कर उन्हें इक्कीसवीं सदी के उस जंगल में भटकाया जा रहा है, जिनके पैरों के नीचे हकीकत में जमीन ही नहीं, जिस पर वे अपने सपनों का महल खड़ा कर सकें। लगता है जैसे वे जमीन से डेढ़ इंच ऊपर हों। दर असल हम युवा पीढ़ी को जमीनी हकीकत से काट कर उसे एक खोखले स्वप्नलोक में भटका रहे हैं जो पश्चिम की उपभोक्तावादी, साम्राज्यवादी संस्कृति व अनप्रोडक्टिव पूँजी की देन है।‘‘⁴ अज़ीब अफ़रातफ़री और आपाधापी का माहौल है। सब दौड़ रहे हैं। आज काॅम्पिटीशन का ज़माना है। युवाओं में एक गलाकाट स्पर्धा छिड़ी है।
पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों में सूचना टेक्नाॅलाॅजी के क्षेत्र मे क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं। देश में विदेशी साॅफ्टवेयर और आउटसोर्सिंग कंपनियों के अपने कारोबार फैलाने के परिणामस्वरूप युवाओं में इन नौकरियों को लपकने की होड़ मची और बहुत से निजी संस्थानों ने इसे एक अवसर के रूप में भुनाया और सेवाओं के अनुरूप दक्षता प्रदान करने में जुट गए। यदि औद्योगिक समाज वस्तु उत्पादन पर केंद्रित था और उसके अनुसार सामाजिक संरचना विकसित हुई तो सूचना समाज में सेवा ज्ञान सम्बन्धी उत्पादन की प्रक्रिया सर्वप्रधान हो रही है। इसका प्रभाव समाज की संरचना, सत्ता के स्वरूप और सांस्कृतिक आदर्शाें व परम्पराओं आदि सभी पर पड़ रहा है। आज की तकनीकी वैज्ञानिक शिक्षा हमारे युवाओं को अधिकाधिक खु़दगर्ज़ बना रही है। वह आज न संवेदनशील रह पा रहा है न उसमें खुद कल्पना करने की शक्ति है। भारत के जितने भी शहर साॅफ्टवेयर हब के रूप में विकसित हुए हैं उनमें और शेष भारत के शहरों में कोई समानता नहीं रह गई है। चमचमाते काँच की ऊँची-ऊँची इमारतें गरीबी के दलदल में अमीरी के द्वीप सी दिखाई देती हैं। इन्हीं इमारतों में देसी-विदेशी कंपनियों के दफ़्तर हैं जिन्हें देख कर अमेरिका से लौटे आकाश कपूर को कैलिफोर्निया की याद हो आई थी।⁵
संचारक्रान्ति के वर्तमान युग में अपनी बात को दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचाना चुटकियों का खेल हो गया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स एक दूसरे से संपर्क के महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरे हैं। भारत में फेसबुक के पाँच करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता हैं। इसी प्रकार ट्विटर का उपयोग करने वाले भी एक करोड़ से अधिक हैं। यह संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। इनके उपभोक्ता अधिकतर युवा हैं। इन युवाओं का सामाजिक दायरा नगण्य है। ये अधिकाधिक आत्मकेंद्रित हो रहे हैं। दिन-रात लैपटाप, मोबाइल, इंटरनेट में व्यस्त युवा अपने पड़ोसी से अनजान है।
आधुनिकता और परंपरा का द्वंद्व समकालिक युवा वैचारिक परिदृश्य का एक ज्वलंत मुद्दा है। एक ओर आधुनिकता के नाम पर अनियंत्रित उपभोक्तावाद का अन्तर्राष्ट्रीय जाल है दूसरी ओर परंपरा की ऐसी व्याख्या हो रही है कि पुनरुत्थानवाद, कट्टरतावाद, पुरुषप्रधानता, अति राष्ट्रवाद और संकीर्ण स्थानीयता के दलदल में फँसना आज के युवाओं की नियति बनती जा रही है। अच्छे पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ अन्धविश्वास में इस कदर जकड़े हैं कि विज्ञान और प्रबंधन की उच्च शिक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
