- पद्मा मिश्रा
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद और उनका साहित्य भारतीय संस्कृति की धरोहर है, पहचान है। जितनी कुशलता से उन्होंने समाज की अन्य समस्याओं पर लेखनी चलाई है उतनी ही सूक्ष्म दृष्टि नारी की व्यथा पर भी केंद्रित की। नारी के विविध रुपों और विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए अनगिनत संघर्षों से लड़कर भी हार नहीं मानने की दृढ़ता प्रेमचंद साहित्य की नारियों की विशेषता रही है। वह नारी को समाज और मानवीय संवेदनाओं की धुरी मानते हैं।संसार की समस्त कल्पनाओं और समस्याओं के मूल में स्त्री और पुरुष के संबंधों, उनके संघर्ष, विरोधाभासों का विमर्श ही शाश्वत रहा है यद्यपि समाज के निर्माण में दोनों ही अहम भूमिका निभाते रहे हैं परंतु उसी समाज में पुरुष को मान सम्मान दिया जाता है और स्त्री की उपेक्षा होती रही है। यह बात लेखक प्रेमचंद को सदैव व्यथित करती है,यही कारण था कि सामाजिक जागरण काल में *महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, राजा राममोहन राय महापुरुषों और प्रेमचंद जैसे साहित्यकार जिन्होंने राष्ट्रीय-आंदोलन के साथ-साथ भारत में नारी-आंदोलन, सती-प्रथा एवं नारी की समस्या की ओर लोगों का ध्यानाकर्षण किया और स्त्री को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। प्रेमचंद जी ने अपने उपन्यासों की महिला पात्रों को भी कमजोर, लाचार और असहाय नहीं होने दिया है चाहें वह गोदान की धनिया हो,गबन की जालपा,मालती,हो या प्रेमाश्रम की गायत्री,विद्या जैसे नारी पात्र हों। हमारे पुरुष प्रधान समाज में बरसों से पुरुषों का वर्चस्व रहा है । आज स्त्री के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उठे स्त्री के स्वर में स्वर मिलाने वाले पुरुषों का भी एक वर्ग हैं, जो उन्हें सम्मान देना चाहता है, उनका साथ देना चाहता है,अनेक लेखकों , साहित्यकारों और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े पुरुष वर्ग ने भी स्त्री विमर्श पर अपनीआवाज उठाई है । प्रेमचंद के नारी-दर्शन में इस प्रकार दोनों ही रूपों में नारी की यौन-शुचिता की रक्षा का कठोर आग्रह है – एक, पुरुष द्वारा नारी का धन-बल तथा छल-बल से उसका शील-हरण तथा दूसरा, नारी का स्वयं अपने सतीत्व को बाजार में बेचना। प्रेमचंद का युग नारी-उत्थान का युग था तथा एक नयी नारी का जन्म हो रहा था। यह आधुनिक नारी परम्परागत भारतीय नारी की बुनियाद पर ही निर्मित और विकसित हो रही थी। वह अपनी परम्परा में ही आधुनिक बन रही थी और इसी कारण घर, परिवार, पतिव्रत जैसे परम्परागत मूल्यों के प्रति समर्पित थी और साथ ही अपने अधिकार, स्वतन्त्रता और अस्तित्व का आग्रह कर रही थी। यह प्रेमचंद ही नहीं उस युग की नारी की मांग थी। हिन्दीप्रेमचंद ही नहीं उस युग की नारी की मांग थी,, एक ओर जहां*बड़े घर की बेटी*जैसी कहानियां प्रेमचंद के कथा साहित्य में परिवार को प्राथमिकता देना चाहती थीं, वैसे ही गोदान की मालती, मुनिया जैसी महिला पात्र आकाश की ऊंचाइयों तक अपने सपनों को छूना चाह रही थी।
इस संदर्भ में प्रेमाश्रम उपन्यास की महिलाएं भी स्वतंत्रता की गंध को महसूस कर तो रही थी लेकिन साथ ही नये बदलते परिवेश का स्वागत करने की भी ललक थी उनमें,उनके प्रसिद्ध उपन्यास प्रेमाश्रम का कथानक यद्यपि किसान वर्ग और पूंजीपतियों की मानसिकता, उनकी समस्याओं, और संघर्ष पर लिखा गया है, लेकिन उसी परिवेश में एक नई दुनिया की पहचान कराते हुए नारी पात्रों ने भी अपनी सशक्त भूमिका निभाई है।
प्रेमचंद जी ने इस उपन्यास में पात्रों के माध्यम से नैतिक अनैतिक, सामाजिक संबंधों की विद्रूपताओं और उसके कुपरिणामों पर अपनी सशक्त लेखनी चलाई है।समाज में पनप रहे सामाजिक, पारिवारिक मतभेदों के साथ साथ अनैतिक वर्जनाओं को अपने लेखन और चिन्तन का विषय बनाया है,
इस उपन्यास का अध्ययन करते समय विविध नारी चरित्रों ने अपने व्यक्तित्व में घुले मिले दूसरे पक्षों का भी परिचय दिया है।वह संवेदना जो नारी को नारी बनाती है,वही संवेदना कुपथगामी पति को भी आराध्य बना कर पूजित करने की विवशता बन जाती है। प्रेमचंद का नारी विमर्श सामाजिक चुनौतियों और जीवन की आपाधापी से जुड़े मुद्दों के सदैव केंद्र में रहा है, हर्ष,विषाद, सुख,दुख के पलों को भी अपने आंसुओं में धो पोंछ कर बहा देने की ताकत यदि स्त्री में है,तो कटूक्तियो और सामाजिक प्रतारणा तथा वर्जनाओं को चुनौती देने का साहस भी,, और प्रेमचंद जी ने उस द्वंद को बखूबी चित्रित भी किया है।

- पद्मा मिश्रा
