Wednesday, November 4, 2026
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‘हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’: परिदृश्य का पुनरावलोकन

डॉ. नितिन सेठी

डॉ. सुरेन्द्र विक्रम की प्रमुख कृतियों में हिंदी बाल साहित्य: विविध परिदृश्य, समकालीन बाल साहित्य: परख और पहचान, बाल साहित्य परंपरा प्रगति और प्रयोग, हिंदी बाल पत्रकारिता का इतिहास, हिंदी बाल साहित्य शोध का इतिहास, हिंदी बाल साहित्य: गति और प्रगति जैसी कृतियाँ सम्मिलित हैं। ‘बाल साहित्य पत्रकारिता का इतिहास’ और ‘बाल साहित्य शोध का इतिहास’ जैसी कृतियाँ भले ही बाल साहित्य के इतिहास की पुस्तकें नहीं हैं, परंतु इनका लेखन-आधार भी इतिहासपरक अध्ययन ही प्रस्तुत करता है। आपकी नवीनतम कृति ‘हिंदी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’ के. एल. पचौरी प्रकाशन, गाज़ियाबाद से प्रकाशित कृति है। ‘हिन्दी बाल साहित्य के संक्षिप्त इतिहास’ को कुल चार अध्यायों में प्रस्तुत पुस्तक में विभाजित किया गया है– अध्याय एक काल विभाजन और अध्याय दो बाल साहित्य का ऐतिहासिक परिदृश्य पर केंद्रित है। अध्याय तीन स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व का बाल साहित्य– बालगीत, बाल कहानी, बाल उपन्यास, बाल नाटक एवं रंगमंच, बाल जीवनी साहित्य के मूल्यांकन पर केंद्रित है। अध्याय चार स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी बाल साहित्य के विभिन्न सृजनात्मक पक्षों बाल काव्य, बाल कथा संसार, बाल नाटक मूल्यांकन पर बात करता है।

हिन्दी बाल साहित्य के इतिहास लेखन के सन्दर्भ में कुछ सार्थक प्रयास समय-समय पर हुए हैं। सन् 1966 में किताब महल प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित निरंकारदेव सेवक का ग्रंथ ‘बालगीत साहित्य’ इस दिशा में पहली पुस्तक थी। तब से अब तक अनेक ग्रंथ हिंदी बाल साहित्य के इतिहास से संबंधित रहे हैं परन्तु इनमें से अधिकांश ग्रंथ किसी एक विधा विशेष पर आधारित हैं जो इनकी सीमारेखा भी है। प्रख्यात् बाल साहित्यकार प्रकाश मनु द्वारा रचित ‘हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास’ प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ था जो बाल साहित्य के इतिहास लेखन की दृष्टि से एक गौरव ग्रंथ है। इससे पूर्व भी वर्ष 2003 में प्रकाश मनु का ‘हिन्दी बाल कविता का इतिहास’ प्रकाशित हुआ था। साहित्य सृजन और समालोचना के साथ ही इतिहास के सोपानों पर चलकर निरंतर आगे बढ़ता है। इन तीनों का ही महत्त्व अपनी-अपनी जगह पर निर्धारित है। इतिहास के सोपान इतिहासबोध का संधान करते हैं। प्रख्यात् समालोचक मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में,“अतीत, वर्तमान और भविष्य के अविभाज्य गतिशील सम्बंधों को समझना इतिहासबोध है। इससे वर्तमान के अंतर्विरोधों को समझने में मदद मिलती है और यह अंतर्विरोधों को हल करके आगे बढ़ने में सहायक होता है।” ‘हिन्दी बाल साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’ पुस्तक बाल साहित्य के संक्षिप्त इतिहास के साथ ही बाल साहित्य के इतिहासबोध को भी रेखाँकित करती चलती है। डॉ. विक्रम दर्शाते हैं,“हिंदी के पूर्व इतिहास में बाल साहित्य की चर्चा ही नहीं हुई चाहे आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास रहा हो या डॉक्टर नगेन्द्र का इतिहास ग्रंथ, इनमें कहीं भी बाल साहित्य का नामोनिशान नहीं है। बीसवीं शताब्दी के अंत और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में आने वाले इतिहास  में अवश्य बाल साहित्य की अनुगूंज सुनाई दी।”

साहित्य के काल विभाजन पर मनीषियों ने अनेक प्रकार से मनन-चिंतन और विचार किया है। काल विभाजन के महत्त्व पर डॉ. सरोजनी पाण्डेय के शब्द उल्लेखनीय हैं,“काल विभाजन के अभाव में साहित्य का इतिहास लेखन संभव नहीं है, किन्तु साथ ही काल विभाजन के लिए किसी उपयुक्त आधार को ढूँढ निकालना भी अति कठिन कार्य है। यदि युग की सामान्य प्रवृत्ति को काल विभाजन का आधार बना लिया जाए तो काल विभाजन पर्याप्त अंशों में संतोषप्रद प्रतीत हो सकता है किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है। इस दिशा में गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि युग की सामान्य प्रवृत्ति को पकड़ पाना और उसे ही काल विभाजन का आधार बनाना खतरे से खाली नहीं है। सामान्य प्रवृत्ति का उचित चयन होने पर भी उस (सामान्य प्रवृत्ति) के वृत्त से बाहर पड़ने वाली रचनाओं की उपेक्षा या अवहेलना जाने अनजाने हो ही जाती है।” अध्याय एक काल विभाजन में बाल साहित्य के काल विभाजन पर विचार करते हुए डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, डॉ. मस्तराम कपूर, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, डॉ. विजयलक्ष्मी सिंह, डॉ. परशुराम शुक्ल, प्रकाश मनु जैसे बाल साहित्य सर्जकों और आलोचकों के काल विभाजन स्पष्ट किए गए हैं। इसके बाद डॉ. सुरेन्द्र विक्रम अपना मत काल विभाजन के सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। वे लिखते हैं,“कुल मिलाकर हिंदी बाल साहित्य की यह विकास-यात्रा मोटे तौर पर लगभग डेढ़ सौ वर्षों की मानी जा सकती है। कुछ ग्रंथों में कहीं-कहीं सन् 1850 से भी बाल साहित्य का उदय माना गया है। सारे ग्रंथों को खंगालने और व्यापक विचार-विमर्श के बाद मेरा मानना है कि हिंदी बाल साहित्य की विकास यात्रा को इस प्रकार देखा जा सकता है’’–

1- आरंभ से उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक (सन् 1882 से 1900 तक)

2- बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक (सन् 1901 से 1947) तक

3- स्वतंत्रता प्राप्ति से बीसवीं शताब्दी के अंत तक (सन् 1948 से 2000 तक)

4- इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ से आज तक (सन् 2001 से अद्यतन)

लेखक का कहना है,“चूँकि इतिहास तथ्यों पर आधारित होता है, इसलिए उसमें कल्पना की गुंजाइश लगभग न के बराबर होती है। मौलिक सृजन में तो कल्पना का सहारा लिया जा सकता है लेकिन इतिहास लेखन में पक्के सबूत देने ही पड़ते हैं अगर ऐसा नहीं होता तो उसकी प्रामाणिकता संदेह के घेरे में आ जाती है|” अध्याय दो ‘ऐतिहासिक परिदृश्य’ है जिसमें डॉ. सुरेन्द्र विक्रम बाल साहित्य के बीजवपन सूत्रों की पड़ताल करते हैं। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम बाल साहित्य के ऐतिहासिक परिदृश्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं,“ मौखिक रूप से बाल साहित्य की जड़ें बहुत गहरी हैं, मगर मोटे तौर पर बाल साहित्य का लिखित इतिहास लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुराना है। सन् 1882 में बच्चों की पहली पत्रिका ‘बाल दर्पण’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। पंचतंत्र, कथासरित्सागर, हितोपदेश, सिंहासन बत्तीसी, तथा बेताल पच्चीसी आदि पुस्तके बच्चों के लिए नहीं लिखी गई थीं, यह अलग बात है कि इसकी बहुत सी कथाएँ बाल उपयोगी होने के कारण बच्चों द्वारा अपना ली गयीं।”

यह इतिहास तत्कालीन सांस्कृतिक-सामाजिक परिवर्तनों की टोह लेता है। बाल साहित्य की भाषा में किस प्रकार के क्रमागत परिवर्तन होते रहे हैं, इस इतिहास में यह भी द्रष्टव्य है। इतिहास लेखन में लेखक का व्यक्तिगत दृष्टिकोण भी एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। विभिन्न वादों से जुड़कर और प्रभावित होकर लेखक अपने-अपने मतानुसार साहित्य के सोपानों का अभिचिंतन स्थापित करते हैं। संतुलन और समन्वय की समग्रता ही साहित्य के इतिहास को सिद्ध और समृद्ध करती है। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम के पास स्रोत सामग्री की भी कोई कमी नहीं है। प्रस्तुत इतिहास में अनेक तथ्यों को उन्होंने सप्रमाण प्रस्तुत किया है और उसकी विश्वसनीयता में अभिवृद्धि की है। बाल साहित्य के इतिहास को यदि देखें तो यह बात स्पष्ट होती है कि आरंभिक दौर के सृजन में, इसकी भाषा में और इसके प्रस्तुतीकरण में पर्याप्त अंतर था। समय के साथ खड़ी बोली की प्रतिष्ठा होने पर अनेक रचनाएँ हमारे सामने आईं। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम इस तथ्य को भी रेखांकित करते हैं। लोक साहित्य के लुभावने मार्ग से बाल साहित्य तक पहुँचने का दिशा-निर्देश सुरेन्द्र विक्रम करते हैं। यह निश्चित रूप से ही एक उल्लेखनीय बात है। लोक साहित्य के महत्त्व को बाल साहित्य के संदर्भ में दर्शाते हुए सुरेन्द्र विक्रम ने ठीक ही लिखा है,“उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बालसाहित्य का मूल स्रोत लोकसाहित्य है। तथ्य तो यह भी है कि लोकसाहित्य से ही बालसाहित्य का उद्भव और विकास हुआ है। लोकसाहित्य के अंतर्गत ऐसे बहुत से गीत हैं जिनका बड़ों के लिए कोई महत्त्व नहीं हो सकता है परंतु बच्चे उनसे अपना भरपूर मनोरंजन करते हैं। चार्ल्स फ्रेंसिस पॉटर ने तो समस्त लोकसाहित्य को ही बच्चों से जोड़ दिया था। उनका कहना है–‘लोकसाहित्य तो बच्चों का आनंद है, क्योंकि वह किसी भी जाति के बचपन का काव्यात्मक पांडित्य होता है। यह उन बूढ़ों के आनंद की भी अभिव्यक्ति होता है जो अपने यौवन का नवीनीकरण जीवन चक्र से आंतरिक सत्ताओं के पुन: संस्कार द्वारा करने में सक्षम होते हैं।’ सच तो यह है कि लोक साहित्य हमारी मजबूत धरोहर है। इसे समय-समय पर साहित्यकारों द्वारा अलग-अलग ढंग से लिखा जाता रहा है। बालसाहित्य में तो लोकसाहित्य गहराई तक समाया हुआ है। इसमें बच्चों के मनोरंजन के लिए भाँति-भाँति की रचनाएँ उपलब्ध हैं, मगर सबसे अधिक लोकप्रियता बाल लोकगीतों को ही मिली है। लोकसाहित्य से प्रभावित होकर ऐसी बहुत सी लोरियाँ लिखी गई हैं जिनसे बच्चों का मनोरंजन तो होता ही है, इनमें लोक धुनों का भी अद्भुत तालमेल है।”

अध्याय तीन ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व का बाल साहित्य’ में बाल कविता या बाल गीत, बाल कहानी, बाल उपन्यास, बाल नाटक एवं रंगमंच और बाल जीवनी साहित्य पर विस्तारपूर्वक बात की गई है। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन परिस्थितियों में जो बाल साहित्य लिखा जा रहा था, वह उपदेशपरक और मनोरंजक होता था। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम दर्शाते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व जो बाल साहित्य लिखा गया था, उसका मूल स्वर राष्ट्रीयता ही था परन्तु उसमें मनोरंजन और ज्ञानवर्धन भी था। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग के अनेक बाल रचनाकारों का वर्णन डॉ. विक्रम यहाँ करते हैं। उनका निष्कर्ष उल्लेखनीय है,”कुल मिलाकर स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व का युग राष्ट्रीय जागरण के कारण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा है तथा इसे केन्द्र में रखकर अनेक बाल कविताएँ लिखी गईं।”

अध्याय चार ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बाल साहित्य’ है जिसमें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के बाल साहित्य पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। इसमें स्वातंत्र्योत्तर हिंदी बाल साहित्य के अंतर्गत बाल काव्य, बाल कहानी, बाल नाटक, बाल उपन्यास, बाल जीवनियों पर क्रमशः विस्तारपूर्वक विचार किया गया है। स्फुट बालोपयोगी लेखन में बाल साहित्य की मुख्य विधाओं से इतर लेखन सम्मिलित किया जाता है। इसमें यात्रा विवरण, रिपोर्ताज, संस्मरण, ज्ञानवर्धक आलेख, पहेलियाँ आदि पर बात की गई है। बाल साहित्य के इस कालखण्ड में अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं का भी योगदान इन अर्थों में रहा है कि इन संस्थाओं ने बाल साहित्य की पुस्तकें न केवल प्रचुर मात्रा में प्रकाशित कीं बल्कि उन्हें बच्चों तक पहुँचाने की लंबी कवायद भी की। उपसंहार में ही बाल साहित्य के सृजन के लिए आठ बिंदुओं के अंतर्गत डॉ. सुरेन्द्र विक्रम बड़े ही तलस्पर्शी तथ्य रखते हैं।

कोई भी इतिहास हमारे वर्तमान को प्रभावित करता है और इसी क्रम में वर्तमान भी इतिहास के पदचिह्नों को चीन्हते हुए ही आगे बढ़ता है। बाल साहित्य आज अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका समाज में निभा रहा है। हर एक जाति का अपना इतिहास होता है। हर एक साहित्य का भी अपना इतिहास होता है। इस इतिहास को देखने का भी अपना एक विशिष्ट दृष्टिकोण होता है। यह समग्र रूप में इतिहास दर्शन कहलाता है। यहाँ एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस बाल साहित्य को कृतिबद्ध करते हुए डॉ. सुरेन्द्र विक्रम का इतिहास दर्शन क्या है। इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न के उत्तर में डॉ. सुरेन्द्र विक्रम लिखते हैं,“अपने लंबे बालसाहित्य सृजन के दौरान बच्चों से रू-ब-रू होत हुए मन ने जिन चुनौतियों को महसूस किया है, उनमें सबसे पहले नए और पुराने के संक्रमण की चुनौती है। आधुनिकता की चकाचौंध में भटके हुए बच्चों को सही रास्ता दिखाने की चुनौती है, तेजी से बदलती सूचना क्रांति, बाजारवाद का प्रभाव, मीडिया की घुसपैठ तथा अभिभावकों की उदासीनता से बच्चे बालसाहित्य से विमुख हो रहे हैं। आज बच्चे कुछ नए की तलाश में हैं। पुरानी चीजों का मोहभंग उनकी नियति में शामिल हो गया है। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ से ही बालसाहित्य को लेकर नया चिंतन शुरू हो गया था। बीते दो दशकों के बाद अब यह प्रश्न फिर से उठ खड़ा हुआ  है कि आज बच्चों के लिए बालसाहित्य का नया स्वरूप क्या होगा? यह सवाल  हमेशा से ही रहा है कि बालसाहित्य सृजन हँसी-खेल नहीं है, यह चुनौती भरा लेखन रहा है। इस चुनौती का सामना करते हुए बालसाहित्य की सोच की दिशा में परिवर्तन भी अपरिहार्य है। यह प्रश्न भी बड़ा प्रासंगिक है कि बदलता परिवेश और मीडिया का बढ़ता हुआ प्रभाव कहीं हिन्दी बालसाहित्य को ही न निगल जाए? आज मीडिया के बढ़ते हुए चैनल रस्साकशी करते हुए जिस गति से बच्चों को अपनी गिरफ्त में लेते जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस सदी में बच्चे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अंधभक्त हो जाएँगे। यह परिस्थिति बाल साहित्यकारों के लिए और कठिन चुनौतीभरी होगी। इस खुली चुनौती में बालसाहित्यकारों को अधिक से अधिक प्रभावशाली, प्रेरक और दिशाबोधक रचनाओं का सृजन करना होगा जिससे बच्चे मीडिया के बढ़ते प्रभाव से मुक्त होकर बालसाहित्य की ओर अपने को केंद्रित कर सकें। यह प्रश्न भी विचारणीय है कि दस वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते बच्चा इतने सारे रक्तरंजित दृश्य, हत्या, मारपीट, अराजकता तथा बलात्कार के दृश्य विभिन्न चैनलों के माध्यम से देख चुका होता है कि उसके सामने आगे के दृश्य बौने नज़र आते हैं। ऊपर से नई-नई सूचनाओं का विस्फोट बच्चों पर किस तरह और कितना असर दिखाएगा यह कहना शायद अभी जल्दी होगी। कुछ भी हो, लेकिन इतना तय है कि ऐसी परिस्थिति में बाल साहित्यकारों को अनायास ही कम समय में बड़े हुए बच्चों को उनकी परिधि में लाकर वास्तविक ज्ञान चक्षु खोलने होंगे, उन्हें बालसाहित्य की उपयोगिता का आभास कराना ही होगा।’’

भले ही संक्षिप्त रूप में ही सही, सुरेन्द्र विक्रम अपने इस इतिहास में जिन कृतियों को विवेचित करते हैं, उनमें अंतर्निहित प्रवृत्तियों, प्रेरणाओं और उनकी वर्तमान समय में प्रासंगिकता को भी अभिलेखित करते चलते हैं। बाल साहित्य में तत्कालीन समय की क्या अपेक्षाएँ थीं, इस संक्षिप्त इतिहास को पढ़कर भली-भाँति जाना जा सकता है। इन अपेक्षाओं को हमारे बाल साहित्य सर्जकों ने समझा, पहचाना और उस लीक पर चलकर प्रत्येक युग में कुछ न कुछ बालोपयोगी नवीन साहित्य देने का प्रयत्न भी किया; यह बात भी इस बाल साहित्य से गुजरते हुए समझी जा सकती है। यह बात आह्लादित और आश्चर्यचकित ही करती है कि एक ही बच्चा बाल साहित्य में कितने रूपों में दिखाई देता है। शताब्दी भर पहले जो बच्चा चाँद-सितारों को देखकर अपनी खुशी का इज़हार करता था, आज वही बच्चा विज्ञान और फंतासी से युक्त साहित्य के माध्यम से चाँद और अन्य ग्रहों पर पहुँच भी रहा है। सोच व सर्जनात्मकता में परिवर्तन और बच्चों पर इन सबका कैसा प्रभाव पड़ा है, यह बाल साहित्य का इतिहास दर्शाता है।

आज बाल साहित्य का पर्याप्त मात्रा में सृजन किया जा रहा है। हिंदी ही क्या, भारत की सभी भाषाओं में बाल साहित्य का पर्याप्त मात्रा में अनेक विधाओं में सृजन हो रहा है। आज नये दृष्टिकोण, नये आयाम, नये विचारों के साथ-साथ नये तथ्य भी बाल साहित्य में अपना स्थान सुरक्षित कर रहे हैं। बाल साहित्य के आधारभूत प्रतिमान तो हमारे सामने हैं ही और रहेंगे भी, परन्तु निरंतर सर्जन और शोध से इसका एक युगानुकूल रूप सामने आ रहा है। इससे बाल साहित्य के विकास की गुणवत्ता, इसके स्वरूप-विस्तार को भी नव्य आयाम प्राप्त हो रहे हैं। यहाँ बाल साहित्य का इतिहास तो है ही, साथ ही साथ बाल साहित्य के साहित्यालोचन का दायित्व भी सुरेन्द्र विक्रम निभाते चलते हैं। यद्यपि साहित्य का इतिहास लेखन और साहित्यालोचन– दोनों एक ही बात नहीं है। दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं, अपनी-अपनी कार्यपद्धति है। जहाँ इतिहास को दर्शाते हुए सुरेन्द्र विक्रम बाल साहित्य का विकास क्रम दर्शाते हैं, वहीं उपलब्ध सामग्री को साहित्यालोचन के दृष्टिकोण से देखते हुए उस सामग्री को वर्तमान युग की कसौटियों पर भी कसा गया है। इस प्रकार लेखक विकासक्रम और वर्तमान परिस्थितियों– दोनों ही आधारों पर अपनी बात को स्पष्ट करता हुआ चलता है। सुरेन्द्र विक्रम अपने इस इतिहास के माध्यम से बाल साहित्य को समझने का प्रयास करते हैं, तत्कालीन युगीन परिस्थितियों पर विचार करते हैं और क्रमानुसार बाल साहित्य के साथ-साथ बच्चों के सोचने-समझने की शक्ति के विकास पर भी सूक्ष्म दृष्टिपात करते हैं। और यह सारी प्रक्रिया ऐतिहासिक अध्ययन और बौद्धिक चिन्तन मात्र बनकर ही नहीं रह गई है। बाल साहित्य की अंतर्धारा की सुमधुर ध्वनियों को शब्दबद्ध करने का एक सार्थक प्रयास बनकर यह इतिहास हमारे समक्ष आता है।

बाल साहित्य के इतिहास को लिपिबद्ध करते हुए सुरेन्द्र विक्रम इसकी मूलभूत प्रक्रिया और प्रवृत्तियों के अनुसंधान की ओर अग्रसर होते हैं। बाल साहित्य की विधा विशेष पर बात करते हुए वे सर्वप्रथम उस साहित्य की सोच, सर्जना और सार्थकता को दर्शाते हैं। कृति और कृतिकार का केवल साहित्यिक मूल्यांकन ही उनका अभीष्ट नहीं होता अपितु सांस्कृतिक रूप से भी वह विधा कितनी समृद्ध और सक्षम हो पाई है, इसका भी विवेचन सुरेन्द्र विक्रम प्रस्तुत करते हैं। वह कृति अपनी परम्परा में क्या नया जोड़ती है, इस पर भी बात रखी गई है। इस प्रकार विधा विशेष के विभिन्न सर्जकों का मूल्यांकन, उनकी परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में निर्दिष्ट युग के सन्दर्भ में किया गया है। यद्यपि बाल साहित्य के इस संक्षिप्त इतिहास में सुरेन्द्र विक्रम कोई मौलिक प्रतिमान तो स्थापित नहीं करते परन्तु इतना अवश्य है कि अपनी सीमाओं के दायरे में रहकर वह उन बिखरी हुई पगडंडियों और देखे-अनदेखे रास्तों को खोजने और उन पर चिन्तन-मनन करने की कोशिश अवश्य करते हैं जिनमें से होकर हमारा बाल साहित्य गुजरा है, बाल साहित्य ने अपना स्वरूप निर्धारित किया है, बाल साहित्यकारों ने अपनी सोच का वितान निर्मित किया है और इसी के साथ पाठकों ने भी अपने-अपने हिसाब से बाल साहित्य को जाना और समझा है।

बाल साहित्य के इतिहास लेखन में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है सामग्री का चयन। बाल साहित्य में भी अब तक मात्रा में सृजन किया जा चुका है। परंतु इतिहास लेखन में केवल इन्हें सूचीवार प्रदर्शित कर देना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि तथ्य चयन और तथ्य प्रस्तुतीकरण– ये दोनों बातें अपना विशेष स्थान निर्धारित करती हैं। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम संगठित और बिखरी हुई सामग्री में से ही अपने बाल साहित्य के संक्षिप्त इतिहास की सामग्री निर्मित करते हैं। परंतु यह बात भी दर्शनीय है कि कुछ कृतियों का विवेचन अधिक विस्तार से पुस्तक में हो गया है। फिर भी प्रवृत्ति और प्रतिमान स्थापना की दृष्टि से अध्यायवार सामग्री संकलन में लेखक का परिश्रम सार्थक दिखाई देता है।

बाल साहित्य का इतिहास केवल इतिहास के तत्त्वों के आधार पर ऐतिहासिक तथ्यों का समेकन नहीं है। यह केवल वर्षों पूर्व प्रकाशित सामग्री का पुनरावलोकन भी नहीं है। यह कोई अनुसंधान भी नहीं है जिसमें नये-नये तथ्यों और विचारों को सामने लाकर रख दिया जाए और उनकी विस्तृत व्याख्या की जाए। इतिहास लेखन में महत्त्वपूर्ण तथ्य है इसकी प्रमाणिकता। समन्वयात्मक दृष्टिकोण से ही परम्परा में चली जा रही विषयवस्तु का तलस्पर्शी विवेचन प्रस्तुत किया जा सकता है। डॉ. ओम निश्चल ठीक ही लिखते हैं,“मुझे यह कहने में हिचक नहीं है हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखकर उन्होंने अपने अब तक के महत्त्वपूर्ण डॉक्यूमेंट का लाभ बाल साहित्य को दिया है| यह पुस्तक निश्चय ही बाल साहित्य के पाठकों के लिए उपयोगी होगी तथा उच्च अकादमिक स्तर के बाल साहित्य पर होने वाले शोध व प्रश्न पत्रों के निर्माण में आधार स्त्रोत का काम करेगी।’’ सुरेन्द्र विक्रम की प्रशंसा इन अर्थों में की जानी चाहिए कि बाल साहित्य के इस संक्षिप्त इतिहास में अधिकतम ज्ञात तथ्यों का संतुलित और सार्थक रूप से समावेशीकरण किया गया है।

अपने साहित्यिक सन्दर्भों, सकारात्मक संवादों और सांस्कृतिक संयोजन की आधारशिला पर डॉ. सुरेन्द्र विक्रम हिंदी बाल साहित्य के संक्षिप्त इतिहास को जब पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, तब अपनी सीमाओं और अंतर्विरोधों के दायरों से आगे बढ़कर यह पुस्तक एक रचनात्मक प्रामाणिक प्रदेय और उपयोगी संदर्भ ग्रंथ के रूप में हमारे समक्ष आती है। बाल साहित्य की स्थापित परंपरा, विधागत व्यापकता और सृजनधर्मी गुणवत्ता के साथ-साथ बाल साहित्य की वर्तमान समय में स्थिति को भी यह पुस्तक क्रमबद्ध रूप से दर्शाती है। यहाँ एक आश्वस्ति भी है कि हिंदी बाल साहित्य का यह संक्षिप्त इतिहास आने वाले समय में अपने विषय-विस्तार और सामग्री-वैभव के साथ और भी विस्तृत और विशालकाय रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होगा।

  • डॉ. नितिन सेठी
    सी-231,शाहदाना कॉलोनी
    बरेली (243005)
    मो. 9027422306
    [email protected]

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