“हर चमकदार महानगर के पार्श्व में झुग्गी-झोपड़ियों का भी संसार होता है बाबूजी!”
कहना चाहता है गुंजन, कह नहीं पाता और पिताजी के साथ ऑटो पर बैठ जाता है।
रास्ते भर दोनों के बीच चुप्पी। जब से पिता आए हैं, यह चुप्पी गहराई हुई है।
हाँ! बस एक बार उनके मुँह से निकला था,
“इस नरक में रह रहे हो तुम? इसी नरक के लिए…?”
गुंजन ने आँखें चुराई थीं। बात काट न सका था, बात खुद कट गई थी।
“…तो क्या हुआ बाबूजी?”
हकलाया था।
“बस कुछ दिनों की बात है। फिर…।”
“फिर क्या? सीधे राजमहल पहुँच जाओगे?”
सदा की तरह उनकी तीखी आवाज गूँजी थी। फिर वे चुप।
उसने लगभग हर घंटे मनाया था,
“चुप न रहिए बाबूजी! कुछ बोलिए… न हो तो मार लीजिए।”
वह अट्ठारह साल का होने के बावजूद मार खाता रहा है। वे मारने
के बाद तुरंत पछताते। तब उसे गले से लगाकर समझाते,
“हमारे बाबूजी हर बात में लाठी से पीटते थे, तभी हम कसम खा लिये थे कि अपना किसी बच्चा पर हाथ नहीं उठाएँगे। तू हमको एतना गुस्सा काहे दिलाता है रे?”
गुंजन के दादा के जमाने में लगभग सारे पिताओं के हाथ में खुजली होती थी, ठीक माट साब लोगों की हथेलियों की तरह।
“टाटवाले स्कूल से मास्टर से मार खाकर लौटो तो बाबा और नाराज…घर में भी खाओ मार।”
कर्मठ, मेहनती, जुझारु बाबूजी बताते रहते,
“दो-चार झन्नाटेदार झापड़ गाल का पुरनका लाली का फिकर नहीं करता था। नयका मार से दोनों गाल और सूज जाता था।”
“कोई शख्स शिकायत भर कर दे, बाबा के अदालत में सुनवाई का कौनों गुंजाइश नहीं।”
“पीठ, दादा जी की लाठी या झापड़ संग-संग रहते थे हमेशा।”
बाबूजी अब हँसते थे,
“माय के पीछे आँचल पकड़कर छिपना भी काम न आता था।”
उन्हीं दिनों की धुनाई-रुलाई यादकर बाबूजी ने हीरामन-सी कसम खा तो ली लेकिन वह अक्सर टूट भी जाती। युवा गुंजन रोता नहीं था, अकड़ जाता था। तब वे मन ही मन फिर कसम खाते,
‘खाते हैं किरिया… माई किरिया, अब कब्भी नहीं हाथ उठाएँगे।’
पर मन वश में नहीं रहता, जब भी गुंजन पढ़ाई छोड़कर बाँसुरी बजाता या मोहम्मद रफी के गाने गाता रहता।
डूबकर गाते गुंजन को अमराई से खींचकर घर लाते। गनीमत थी, पिटाई बाजार, खेत की भीड़ में नहीं, घर में होती।
“हम इसको डॉकटर-इंजीनियर या अफसर बनाने का सपना देख रहे हैं और नवाबजादा गवइया बनेगा।”
वे आपे से बाहर, कसम ताक पर रख देते।
“इतनी मेहनत कर रहे हैं तुमको तानसेन की औलाद बनाने के लिए?”
फिर समझाइश,
“हम आदमी नहीं थे का, जो बाबा का बात मानकर सही राह पकड़ लिये। रामलीला और नाटक का सौख तयागकर कौनों गलत काम किए का? एकदमे आदमी बन गए आदमी।”
त्योंरियाँ चढ़ी हुईं।
बूढ़-पूरनिया गलत बोलता है का?”
उनकी तेल पिलाई गई छड़ी पुनः उसकी पीठ, पिछवाड़े को लाल करने लगती। गुंजन के लिए देखे गए अपने सपने को उसी के द्वारा रौंदा जाना उन्हें नहीं भाता। वे आपे से बाहर हो ही जाते।
उसका वह घर छोटा था पर रिश्तों की आँच से भरा था। गाँव में माई, बाबूजी, एक दीदी और एक छोटी बहन के साथ चाचा-चाची, उनके चार बच्चे भी रहते थे। संयुक्त परिवार था। विधवा होने के कारण बुआ भी साथ ही रह रही थी। वह वहीं के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई के साथ खेती के काम में हाथ बँटाया करती। सबके रिश्तेदारों का अक्सर तांता लगा रहता। चाची-माँ को पल भर भी आराम करने का समय नहीं मिलता था। रसोई सोता तो बारी, गोहाल के काम जग जाते। मथानी से छाछ बनाकर मक्खन निकालना भी दिनचर्या में शामिल।
कभी-कभी उसे बहुत गुस्सा आता और वह इंडियन आइडल की राशि जीतकर माँ के साथ शहर में बस जाने का सपना देखने लगता था।
बाबूजी ने अधबीच ही पढ़ाई छोड़कर खेतों से नाता जोड़ लिया था। गुंजन के दादा ने उनके लिए खेती-बारी संभालने तक ही कल्पना कर रखी थी। दादा जी के गुजरने के समय कर्ज का बोझ और पाँच छोटे भाई-बहन की जिम्मेदारी थी। पाँच कट्ठा खेत भी साहूकार के पास गिरवी। धीरे-धीरे सूझ-बूझ और मेहनत से बाबूजी ने खेत भी छुड़ा लिया, भाई-बहनों के पालक भी बन गए। अब सब खुशहाल।
चैत, बैशाख महीने में पोखरा, तालाब सूख जाता। गोरा-चिट्टा, मध्यम कद का गुंजन खेतों में खटते हुए, मेहनत से तालाब-पोखरे की माटी काटते हुए सँवला जाता। दुहराता रहता,
“हमको यहाँ अपना जिंदगी नहीं खपाना है। बाबूजी, चच्चा नहीं बनना है।”
छूटते ही गुंजन अमराई या नदी तट पर भाग जाता। हाथ में होती बाँसुरी और मोबाइल। मोबाइल में म्यूजिक लगाकर रफी के गानों संग हर तरह के गानों का अभ्यास बढ़ा देता। दादी का मीठा स्वर और गाने की समझ उसके भीतर उतर आती। दादी-बुआ के गीत तो ढेकी में चावल कूटने, जाता में बूट कूटने, खेत में खटने, शादी-बियाह में बन्ना या छट्ठी में सोहर गाने तक सीमित था। गुंजन का बहुत आगे बढ़ने के स्वप्न का…असीमित।
डरते-डरते कई बार बात रखने पर भी बाबूजी नहीं पसीजे।
एक दिन जा पहुँचा खेत की मेड़ पर टिफिन में नाश्ता लेकर।
“बाबूजी…बाबूजी… हम…।”
“का हम?…बोल?”
वे हँसे तो उसका मन बढ़ गया था।
“हमको इंडियन आइडल में जाना है। हमको संगीत सीखने के लिए मास्टर जी के पास जाने दीजिए।”
“फिर बोला?…फिर…? बाप न मारे पोड़की, बेटा तीरंदाज!”
उनकी छड़ी उठी थी कि वह नौ दो ग्यारह। उसी दिन बाबूजी के सपनों पर पाँव धरकर गुंजन मुंबई की गाड़ी में जा बैठा था।
जैसे ही बाबूजी रेल पर बैठे उसने उनके पाँव छू लिये।
“हम भी आपके ही बेटा हैं बाबूजी! हार नहीं मानेंगे। देखना, एक दिन आपको गर्व होगा।”
आज उनकी छड़ी साथ रहते हुए भी उठी नहीं।
छलछलाते आँखों से देखा दूसरी ओर।
“जुग-जुग जियो। मन का साध पूरा हो।”
“देखिएगा, एक दिन आपके जैसा ही घर-दुरा सब कर लेंगे। खुद मुख्तार बनेंगे।”
गाड़ी ने सीटी दी, वह उतर गया। उसने महसूस किया, बाबूजी ने खिड़की से चुपके से उसकी ओर देखा है। उसने हाथ हिलाया कि रेल चल पड़ी। बाबूजी का कठोर श्रम से तपा हाथ ऊपर उठ गया, आशीष में। लगा, जैसे एक के सपने ने दूसरे के सपने को मात दी। जैसे एक के सपने पर भारी दूसरे सपने को जीत की आस मिली। गुंजन जानता-पहचानता है बाबूजी को। गाँव लौटकर सबको दालान में इकट्ठा करेंगे। कहेंगे,
“रहने दो वहीं। खाने दो ठोकर। लड़ने दो समय से। दो दिन में होश ठिकाने आते ही लौटकर बुद्धू घर ही…।”
पहचानता है, वे नारियल हैं। पर चुगली किसने की होगी, इसका जवाब नहीं है उसके पास। हीरो बनने के लिए मोहना, दिनेश कब से इस झोपड़पट्टी में जमे हैं। वे थे यहाँ, उसे ठौर मिल गई।
अब उसका अभ्यास और बढ़ गया।
ऑडिशन राउंड पार करते ही पँख लग गए सपने को। अभ्यास चौगुना। दिन को दिन, रात को रात कहाँ समझा।
कदम-दर-कदम आगे बढ़ता गया। जजों का चहेता, दर्शकों का प्यारा प्रतिभागी। तीनों जज एकमत,
“आवाज में एक अछूती मासूमियत है। मिट्टी से जुड़ी आवाज!”
“हाँ! हम बरसों से ढूँढ रहे थे।”
“तुम बहुत आगे जाओगे।”
कदम दर कदम,
“अब तुम्हें कोई रोक नहीं सकता।”
उस दिन वीडिओ कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये उसके माता-पिता से बात कराई गई। दोनों टीवी पर नजर आए। दोनों तरफ के सपनों की टक्कर की बात उठाई गई। खूब रोए दर्शक, माँ, गुंजन। वीडिओ कॉन्फ्रेंसिंग में बाबूजी ने पछताते हुए बेटे को सच्चा लाल बताया। बात आगे बढ़ी। शो का टी आर पी उफान पर। पक्के सुरों की बात देश भर में फैलने लगी। गुंजन का नाम चारों दिशाओं में गूंजने लगा। सब कुछ फटाफट…जैसे सपना…जागती आँखों का सपना। उसके नाम का जादू बाबूजी के सर पर भी चढ़ा।
एक बार चैनलवालों ने उसे गाँव भेजा। और टीवी पर देश-विदेश के दर्शकों के बीच गाँव की संकरी गलियों में हीरो या नेता की तरह ठेले पर मालाधारी गुंजन नजर आया। साँस रोककर स्टूडियो के दर्शक देख रहे थे, टिप्पणियों के साथ जज और आमंत्रित अतिथि। उसके पीछे भीड़। भीड़ बीच झुकी मूँछों को ऐंठकर ऊपर उठाते बाबूजी भी नजर आ रहे थे। शिवालय में बेटे संग घंटी बजाते और तो और अमराई में बाँसुरी की तान पर झूमते, मोहम्मद रफी के गीत की दो लाइनों पर इतराते बाबूजी भी वीडिओ के हीरो थे।
नदी किनारे दो पाटों पर खड़े दोनों एक हो रहे थे। गुंजन की बाँसुरी हौले-हौले लहर उठा रही थी।
उन दिनों न तो गुंजन को, न ही बाबूजी को कडुआ तेल (सरसों) से भीगी छड़ी की याद आई। बेकार बेटा अब पसंद आने लगा था।
गुंजन ने सबको बताकर दिल जीत लिया,
“बाबूजी कभी मंदिर नहीं जाते थे। अपने शिवभक्त पापा के अन्याय का बदला इस तरह लिया था उन्होंने।”
आगे महिला जज ने बात पूरी कर दी,
“अब अपने बेटे की खातिर जा रहे हैं।”
गुंजन झाड़ पर चढ़ता गया, चढ़ता गया।
“तुम यूँ ही मेंटर का साथ देते रहे, ट्रॉफी तुम्हारे हाथ में होगी गुंजन।”
“तुम्हारी आवाज पूरे वर्ल्ड में राज करेगी।”
“एक नया इंडियन आइडल मिल गया है।”
एक-एक कर प्रतिभागियोंकी घर वापसी हो रही थी। गुंजन फाइनल की ओर। दस-बारह वर्ष से प्रशिक्षित गायक भी लौट रहे थे। गुंजन को सूनी अमराई की मेहनत याद आती। तीन बजे से नदी किनारे का रियाज भी। पढ़ाई छोड़ने का अफसोस पहले भी नहीं था, अब तो एकदम नहीं।
मारुती गाड़ी, ट्रॉफी और भारी रकम के साथ गुंजन के प्रवेश की कल्पना में सारा गाँव-घर मगन। हर तरफ संगीत की लहर। कोड़ते, बोते, उपजाते, काटते, सरियाते बाबूजी की आँखों में इकलौते बेटे का सपना समा गया।
फाइनल से पहले पैरेंट्स राउंड में माँ-बाबूजी दोनों को बुलाया गया। बहुत भव्य स्टेज, सामने कतारबद्ध बैठे कई माता-पिता, परिजन, पास में जजों का पैनल। एक तरफ प्रतिभागी, दूसरी ओर वाद्य-यंत्र, वादक।… जादुई वातावरण। पैरेंट्स भी चकाचौंध में गुम।
ट्रॉफी दिखला दी गई। बाहर खड़ी चमचमाती कार भी। रौशनी के फव्वारे स्टेज को परीलोक का लुक दे रहे थे। गायन, वादन की जुगलबंदी में पिताओं या माताओं या दोनों के आन्नद की जुगलबंदी जुड़ गई। गुंजन तीसरे नं. पर आया। गुंजन ने गाया,
मन तड़पत हरि दर्शन को आज
बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ
आँखों से आँसू भर गए। क्या जज, क्या प्रतिभागी, क्या अन्य प्रतिभागियों के माता-पिता, क्या दर्शक, सबकी आँखें छलक उठीं। गुंजन की आवाज फिर,
पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा
बेटा हमारा ऐसा काम करेगा
थोड़ी सी काँपी,
बेटा हमारा ऎसा काम करेगा
बाबूजी भी रो पड़े। गमछा कंधे से उतर आँखों से जा लगा। शिकवे और भी धुल गए। गर्व और गहराया। दोनों की आँखें चार हुईं, दो-चार बार हुईं। दौड़कर बेटा बाबूजी के चरणों में जा बैठा। फिर उन्हें सादर मंच पर ले आया। अभी माँ से ज्यादा बाबूजी निकट लगे। पीछे माँ भी मंच पर आ गईं।
थोड़ी-देर संघर्ष की कहानी चली, बल्कि दौड़ी। छड़ी, लाठी, झापड़, कान उमेठने की अदाएँ सब विगत में ले जाने लगीं, मंच को भिगोने लगीं।
सबने कथा सुनाई। पिताओं के पिताओं के विरोध को भी पूरी तरह से बताकर कई बार अश्रु गंगा बहाई गई।
इतना ही नहीं, अधिकांश माता-पिता ने अपने छूट गए या छुड़ा दिए गए हुनर को प्रस्तुत किया। बाबूजी के भी मन में अँखुवाया,
‘अब बाबा तो रहें नहीं, फिर से रामलीला में…।’
गुंजन की प्रस्तुति यादगार। अन्य योग्य प्रतिभागी सोच रहे थे,
‘अब पुरस्कार गुंजन के ही नाम होगा, हंड्रेड परशेंट। इस गाँव के छोरे की कहानी सब पर भारी।’
एक-ब-एक बाबूजी और गुंजन आसमान से गिरे, खजूर पे अटके। बाबूजी को लगा, उन्हें झाईं मार देगा। माँ सदा की तरह अडिग। शांति का एक वलय उसके चारों ओर। हर हाल में अडोल रहनेवाली माँ अभी भी अडोल।
फाइनल के पहले का अंतिम शो…
होस्ट की घोषणा गाज की तरह गिरी,
“गुंजन को आज शो छोड़कर जाना हो। बाकी चार सुरक्षित हैं।”
गुंजन को नर्वस ब्रेकडाउन का भय सताया। तभी एक हथेली कंधे से आ लगी। तुरंत सँभल गए बाबूजी की हथेली थी वह। इसकी भी दाहिनी हथेली बाबूजी के वृषभ कंधे से जा लगी। दो हथेलियाँ भिन्न-भिन्न, दो कंधे भी भिन्न-भिन्न…कौन किसे सांत्वना दे रहा है, कहना कठिन।
सबको लगा, अब गुंजन के जिद्दी, गुस्सैल पापा उसे गाँव वापस ले ही जाएँगे।
तीनों जज दौड़कर मंच पर चढ़ आए। एक ने कहा,
“मेरे अगले गाने में गुंजन की आवाज होगी।”
दूसरे का वादा,
“मेरे जर्मनी के कंसर्ट में मेरी टीम के साथ गुंजन भी होगा।”
तीसरे ने उसका गुरु बनने की पेशकश की।
तभी बाबूजी ने उद्घोषक से माइक लगभग छीन ली। एक सन्नाटा तारी।
“अब गुंजन यहीं रहकर आगे का संघर्ष जारी रखेगा। हमारा पूरा परिवार इसके साथ है।”
माँ मुस्काईं, गुंजन भी। कंधे पर एक बुदबुदाहट,
“आपका ही बेटा हूँ बाबूजी।”
एक स्वर भारी,
“मेरा ही बेटा है, हार कैसे मानेगा।”
रौशनी अँधेरे के खिलाफ थीं ही। बाबूजी सोच रहे थे, ‘एक घर यहाँ भी लेना चाहिए। उस झुग्गी में गुंजन कैसे रहेगा। हम भी आते रहेंगे तो…।’
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- अनिता रश्मि
अनेक विधाओं में रचनारत। दो उपन्यास एवं कविता संग्रहों सहित चौदह किताबें प्रकाशित, अनेक रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद
पता- 1 सी, डी ब्लाॅक, सत्यभामा ग्रैंड, कुसई, डोरंडा, राँची, झारखण्ड -834002
ईमेल : [email protected]
मो. 9431701893

बहुत सुंदर कहानी अनीता जी। आपकी शैली बहुत पसंद आयी। गहरी बात कहते छोटे वाक्य..!
कम शब्दों में पूरा मर्म..!
बधाई रश्मि जी..
बहुत सुंदर कहानी। भाषा, शैली और सकारात्मक अंत बहुत अच्छा लगा।
शुक्रिया आपका
बहुत अच्छी कहानी दी! शिल्प भी शानदार
शानदार शिल्प से सजी हुई अच्छी और सच्ची कहानी दी !
आदरणीया दी,
इस कहानी को सिर्फ कहानी कहनें का दिल नही कर रहा है. बहुत सारे संघर्षशील नौजवान और उनसे जुड़े लोग इस दौर में मौजूद हैं और यह कहानी उन्हे सही मायने मे परिभाषित कर गई.शुरूआत से लेकर खत्म होने तक की हर घटना चलचित्र सा आँखों के सामने गुजरता रहा.
एक बेहद सशक्त, बेहतरीन और भावुक सृजन के लिए आपको बधाई और नमन
बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी कहानी । प्रारंभ में विलेन से दिखने वाला पिता अंत तक भावनात्मक ऊंचाइयों पर पहुंच गए।