मोबाइल का वाइब्रेटर काँपा, तो साथ-साथ लीना का दिल भी काँप उठा। हो न हो, यह वही फोन होगा। पिछले दो-तीन दिनों से वह यही तो सोच रही थी। जब से बिरवा जी को अस्पताल में भर्ती किया गया था, लीना के दिल में एक अजीब कशमकश प्रारंभ हो गई थी। जाकर एक नज़र देख आए उनको? एक उम्र का साथ था। पर क्यूँ जाए वह? एक बार जो अलविदा कह दिया, सो कह दिया।
वाइब्रेटर एक बार फिर काँपा। नहीं उठाएगी वह फोन, नहीं जाना उसे कहीं। अच्छा इंसान था– बहुत अच्छा। दरिंदों से भरी इस दुनिया में कितने बिरवा जी होते होंगे। कहते थे, ‘मुझे कंधा लगाने आ जाना।’ ज़माने की रीत-रस्मों से कभी उनकी बनी नहीं। पंडित-काज़ी से खफ़ा ही रहे। जनाजे को पत्नी ही आग लगाए तो अच्छा; कंधा सखियों का ही बेहतर। सखियाँ…? मुझ जैसी…? वे अक्सर महिलाओं को सखी तथा पुरुषों को दोस्त कहकर ही संबोधित करते थे।
फोन उठाने से कोई फायदा नहीं। अब तो जाना होगा उनके साथ। तो चलूँ…?
उसने यंत्रवत कपड़े बदले और बिरवा जी के घर की ओर चल पड़ी।
जैसा उसने सोचा था, उनके घर के सामने उनके चाहने वालों की भीड़ लगी थी। समाज के हर तबके के लोग– फिल्म-वाले, संगीत-वाले, समाज-सेवा-वाले, साहित्य-वाले, उद्योग-वाले, स्लम-वाले और भी बहुत से लोग। सभी ओर बिरवा जी की जय-जयकार थी। मंत्री से संत्री तक फूल-मालाएँ लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते हुए। उसे देखते ही भीड़ उसके लिए रास्ता बनाती है। सूखे आँसुओं से भरी धुंधली आँखों से वह उन्हें निहारती है। वह घड़ी आते ही अपने जैसी तीन और सखियों के साथ उन्हें कंधों पर उठा लेती है। कौन हैं वे अन्य तीन? वह नहीं जानती। जानना भी नहीं चाहती। बस इतना भर जानती है कि वे भी स्त्रियाँ हैं।
बिरवा जी अक्सर कहते थे कि स्त्री का सम्मान करना उनके जीवन के मूलभूत सिद्धांतों में सबसे प्रमुख है। व्यवहार में भी उनका स्व पर नियंत्रण दिख पड़ता था। मूलतः वे कभी स्त्री और पुरुष में भेद भी नहीं करते थे। उन्होंने अपनी फिल्मों में और अपने उद्योगों में भी दोनों को समान अवसर दिए।
कुछ कदम आगे बढ़ते ही लीना को लगता है, अब उसके कंधे यह भार नहीं झेल पाएँगे। तभी एक युवक उसके कंधे से शव को अपने कंधे पर ले लेता है। कंधों से बोझ कुछ कम होता है, तो वह आसपास देखती है। भीड़ में से कई सारी आँखें उसी की ओर देख रही हैं। कुछ स्वर तो “राम नाम सत्य है” से आगे बढ़ते हैं और उस तक पहुँच भी रहे हैं।
इनके जैसी गायिका विरले ही पैदा होती है। भाई, इनके गले में मिठास बिरवा जी ने ही घोली है। एक सीधी-सादी गाँव की लड़की; न कोई शौर, न कहीं शिक्षा। इस पारस ने छुआ, तो सोना बन गई। एक बार जो तान छेड़ी, तो सात समुंदर पार कर गई।
सब लोग अपने-अपने घरों को लौट गए, तब भी वह अधजगी, अधजली चिता के पास बनी रही। शायद अभी भी उस चिता से उसके मन की उधेड़बुन बंधी हुई थी। तीसरे पहर तक सब कुछ राख हो चुका था। उसने चुपचाप थोड़ी-सी राख अपने माथे पर लगा ली और भारी कदमों से घर की ओर लौट चली।
जाने क्यों लगा बिरवा जी सारी दुनिया को एक तरफ छोड़ उसका हाथ पकड़कर चल रहे हैं। “तुम्हारा हाथ जब हाथ में आता है, तो लगता है सफलता स्वयं ही हाथ आ गई है। एक मजबूती देते हैं तुम्हारे ये हाथ मेरे इरादों को,” वे अक्सर लीना से कहते थे। लीना जब भी उनके साथ होती, वे अक्सर उसका हाथ अपने हाथों में लिए रहते। कभी-कभी यूँ ही वे कोई गीत गुनगुनाने लगते और फिर आधे में ही रुककर कहते, “अब तुम इसे पूरा करो।” प्रकृति की कृपा ऐसी कि वह भी बिना सोचे-समझे उस गीत को वहीं गाकर पूरा कर देती। ऐसे अप्रतिम क्षणों में बिरवा जी को वह कला की देवी प्रतीत होती। उन दुर्लभ क्षणों में वे कभी-कभी उसका हाथ चूम लेते। उनकी फिल्मों के कई गाने इसी तरह बने थे। जाने कौन-सा जादू था कला की इस अद्भुत उपासना में कि इस तरह बने लगभग सभी गीत लोकप्रिय हुए थे। लीना को लगता कि बिरवा जी का पवित्र प्रेम तथा उसकी निष्काम साधना ही उसकी वाणी बनकर उसके मुख से बोलती है।
दूसरे दिन सभी अख़बार, टीवी चैनल तथा सोशल मीडिया बिरवा जी की तारीफ़ से पटे पड़े थे। जीवन का कोई ऐसा आयाम नहीं था, जहाँ बिरवा जी ने अपनी छाप न छोड़ी हो। कई अख़बारों में बिरवा जी के साथ उसके चित्र भी छपे थे। “बिरवा जी जिएँगे लीना जी के गानों में”, “लीना जी के स्वर में बोलेगी बिरवा जी की आत्मा”।
यूँ तो उनके जीवन में अनगिनत लोग शामिल थे। सभी के लिए उनके मन में प्यार, आदर, विश्वास तथा सहयोग की भावना थी। कभी किसी से कोई बैर नहीं, शिकवा नहीं, शिकायत नहीं– दुनिया के अनकहे मसीहा।
“मैंने तो केवल तुम्हारा हाथ पकड़ा है, तुमने तो मेरी आत्मा को ही जकड़ रखा है,” कहकर वे ठहाका मार देते। संसार के हर दुख-दर्द से विचलित हो जाते। वे जहाँ भी जाते, उसे सदा साथ रखते। उम्र में दादा-पोती का अंतर, फिर भी स्वर, विचार और व्यवहार समवयस्क मित्रों सा। कहाँ से आती थी इतनी ऊर्जा उनके पास?
“मेरी ऊर्जा मेरा प्यार है। सब सीमाओं से परे, उदात्त प्यार। प्यार, जिसकी कोई बोली नहीं, आवाज़ नहीं, एक खामोशी है, जो सुनती है और कहा करती है।” वे भावुक होकर कभी उसके हाथों को हौले-से दबा देते, तो कभी हल्के से उसके गालों को छू लेते। उस समय सचमुच लीना को लगता, जैसे स्वयं देवता पृथ्वी पर उतरकर उसका मनुहार कर रहे हों।
एक बार एक दूरस्थ जिले में स्थित एक ऐसे आश्रम में ले गए थे वे उसे, जहाँ प्रकृति का क्षत-विक्षत रूप सर्वत्र विद्यमान था। अँधे, लूले-लंगड़े, कुष्ठ रोगी, मूक-बधिर, समाज की थूकी हुई महिलाएँ, घरों से फेंके हुए जर्जर वृद्ध, मृत्यु की राह तकते असाध्य रोगी– सबका एक ही आश्रय स्थान। उस आश्रम के संस्थापक-दंपती को बिरवा जी अपना माँ-बाप कहते। लीना जब पहली बार उनके साथ वहाँ गई, तो मानव का ऐसा टूटा-फूटा स्वरूप देख कर अंदर से हिल गई। लेकिन बिरवा जी? वे तो सभी के साथ मस्त होकर खेले-कूदे, नाचे-गाए। सभी के साथ बैठकर मिठाई और पकवान खाए, जो वे हमेशा उनके लिए लाते थे। दिन में इस तरह मदमस्त रहने वाला यह मजबूत प्राणी, रात की स्तब्धता में प्रकृति के इस अन्याय पर बैठकर आँसू बहाता है। वह जानता है कि प्रकृति मनुष्य की तरह सहृदय नहीं है। वह नितांत निष्ठुर, तथाकथित देव की प्रस्तर प्रतिमा-सी कठोर होती है। मगर मनुष्य दिल भी रखता है– जो दूसरों के दुख से दुखता है, दूसरों के दर्द से दहलता है, दूसरों के देह के दाह से स्वयं दहकता है और उजड़े हुए दिलों के प्यार से महकता भी है।
रात के ढाई बज चुके थे। उन्हीं के पास रखे पलंग पर लीना भी सो रही थी। जाने किस आहट से उसकी आँख खुलती है, तो देखती है कि बिरवा जी उसके सिरहाने बैठे हैं। उनकी आँखों से अविरल अश्रु-धार बह रही है। वह चौंककर उठ बैठती है और हौले से उनके हाथों पर अपना हाथ रख देती है। यूँ ऐसा कम ही होता है, जब वह स्वयं बढ़कर उनके हाथों को छू लेती हो।
सारे संसार को सुरभिमय बनाने वाली, सबकी माँ कहलाने वाली यह प्रकृति क्यों कुछ लोगों के साथ इतनी निष्ठुर हो जाती है! उनके आँसू अब हिचकियाँ बनकर उनके मुँह से फूट पड़े थे। एक मानव के हृदय का ऐसा वृहद् स्वरूप उसने पहली बार देखा था। उस क्षण जैसे प्रकृति के सारे क्रिया-कलाप रुक गए थे, ज़मीन के सारे भेद मिट गए थे। भूत, वर्तमान और भविष्य एकाकार हो रहे थे। दो हृदयों में उमड़ती साँझी संवेदनाएँ एक-दूसरे का सहारा बनकर एकाकार होने को आतुर हो रही थीं। ऐसे ही पलों में शायद जीवन की नई इबारतें लिखी जाती हैं।
वह रात, वे पल और वह अनुभव– सबकुछ लीना को बहुत अजीब-सा लगा। क्या यह उसके जीवन का पुनरावतार है? किस दिशा से किस दिशा को जा रही है वह? कुछ पा रही है, या कुछ खो रही है।
संभ्रम सदा नहीं रहता, समय के साथ शिथिल हो जाता है। सच्चाई से सामना हुआ, तो सहज ही सबकुछ खुलने लगा। शुरू से ही वह एक निम्न-मध्यमवर्गीय रुढ़िवादी परिवार में पली थी। ग्रामीण परिवेश में पुरुषों का सहवास कम ही मिला था; स्कूल-कॉलेज में भी लड़कियों का ही साथ रहा। प्रकृति का एक ही वरदान था– मीठा स्वर, और वही उसे मुंबई भी ले आया था। केवल मधुर कंठ होने से जीवन नहीं बन जाता– उसके लिए मेहनत, लगन, ईमानदारी, अवसर, तथा इससे भी अधिक कोई वरदहस्त सिर पर होना आवश्यक होता है। समय गवाह है, यह तथाकथित वरदहस्त भी सभी को नहीं मिलता और मिलता भी है, तो बहुत महंगे दामों पर। फिर वह तो महिला होने के अतिरिक्त अभिशाप से भी ग्रस्त थी।
इतने वर्षों में बिरवा जी के साथ रहकर उसने समय का एक और सत्य भी जाना था कि प्रकृति अपने कुछ विशेष हृदयों में अक्षुण्ण प्रेम-भाव भी भर देती है। यही प्रेम-भाव था, जो बिरवा जी को एक सच्चा कलाकार और अच्छा इंसान भी बनाता था। उनका कला, साहित्य, संस्कृति, समाज, तथा शिक्षा के प्रति जो उदार दृष्टिकोण था, वह केवल अप्रतिम था। वे अपने समय से आगे की सोच रखते थे। लीना उनके साथ स्वयं को पूर्णतः सहज महसूस करती थी।
किन्तु उस रात के बाद अंतस्तल के किसी अज्ञात कोने से उठकर एक गुबार-सा धीरे-धीरे उसके मन-मस्तिष्क पर छाता चला गया था। दिन-रात अब भी अपनी गति से आगे बढ़ रहे थे, किन्तु जाने कौन-सी अदृश्य-सी महीन दरार कहीं उभर आई थी।
अब कई बार लीना का हाथ स्वयं में सिमट जाता। वाणी में यदा-कदा अकारण ही तल्खी उतर आती। कभी-कभी गालों पर अंगारों-सी चुभन महसूस होती। धूप अक्सर त्वचा को झुलसाने लगती। रातों में आधी सोई, आधी जागी-सी जाने किससे और जाने क्या-क्या पूछने लग जाती। अक्सर चलते-फिरते उसके अंगों में अजीब बेचैनी-सी होने लग जाती। मन की यह कौन सी अवस्था थी? सबकुछ पहले-सा, मगर फिर भी बहुत कुछ बदला-बदला।
हर घड़ी खुद से उलझना है मुकद्दर मेरा,
मैं ही साहिल हूँ, मुझी में है समंदर मेरा!
अनजाने ही वह कदम-कदम बिरवा जी से अंतर बनाती चली गई। वह नहीं जानती थी कि क्या सही है और क्या गलत। यूँ भी अक्सर जीवन में जो कुछ होता है, उसमें कितना सही और कितना गलत है, इसका निर्णय हम नहीं कर पाते।
अब तक सिनेमा उद्योग में लीना एक अच्छी गायिका के रूप में स्थापित हो चली थी। शनैः-शनैः उसकी आवाज की गूँज सारे बंधन तोड़ती हुई दसों दिशाओं में फैलने लगी थी। जो लकीर उस रात समय ने खींची थी, वह धीरे-धीरे आकार ग्रहण करती हुई शरीर की बाधाएँ लाँघकर मन को भी संक्रमित करने लगी थी। प्रकृति-दत्त सहज स्नेह पर संकुचित संस्कृति के संस्कारों की धूल जमने लगी थी।
वर्षों के अंतराल ने जब सबकुछ धुंधला-धुंधला कर दिया था, तभी बिरवा जी की बीमारी की सूचना आई थी। एक धुआँ-सा फिर उठने लगा था। इस बीच जीवन ने मन को कई भले-बुरे पाठ भी पढ़ा दिए थे। अब जीवन का आकाश कई गुना विशाल हो गया था। अनुभव की कसौटी पर कई चीजें खरी उतरी थीं, तो कई खोटी भी सिद्ध हुई थीं।
अंतिम यात्रा से लौटी, तो अँधेरा घिर आया था। जाने क्यों उसे लगा कि इतने वर्षों से मन पर रखा बोझ आज हल्का हो गया था। उसका मन कुछ कहने को मचल रहा था। उसने अपनी डायरी का एक पन्ना खोला और काँपते हाथों से कुछ लिखा:
“मैं ऋणी हूँ उस रात की, जिसने मुझमें मेरा “मैं” जगाया।”
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डॉ. घनश्याम आसूदाणी : संवेदनशील कथाकार
डॉ. घनश्याम आसूदाणी हिंदी के लेखक एवं शिक्षाविद् हैं। आत्मकथा सफर की धूप (2008) तथा सात कहानी संग्रहों सहित आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
संपर्क : सहयोगी अधिव्याख्याता,
आनंद निकेतन कृषि महाविद्यालय,
वरोरा-442914
जिला चंद्रपूर, (महाराष्ट्र)
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