‘अस्मि’ – उपन्यास; लेखिका – शिखा वार्ष्णेय; पृष्ठ संख्या – 119, मूल्य: ₹250 /-,
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन, सीहोर (मध्य प्रदेश), समीक्षक: तरुण कुमार
दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीते-जीते यदि हम स्वयं को भूल जाएं, तो क्या अपने भीतर के ‘मैं’ तक फिर लौट सकते हैं? शिखा वार्ष्णेय का सद्यप्रकाशित उपन्यास अस्मि इस प्रश्न की खोज है और यह इसका उत्तर भी देता है कि – हां। जीवन के किसी भी पड़ाव पर। क्योंकि ‘मैं’ की यात्रा के लिए कभी देर नहीं होती।
शिवना प्रकाशन से प्रकाशित अस्मि शिखा वार्ष्णेय का पहला उपन्यास है। जब हम ब्रिटेन के प्रवासी हिंदी साहित्याकाश पर नजर डालते हैं तो कहानीकार और कवि के रूप में तो अनेक रचनाकार दिखाई पड़ते हैं लेकिन उपन्यासकार के रूप में केवल कुछ गिने-चुने हिंदी साहित्यकार टिमटिमाते नजर आते हैं और इनमें से अधिकांश के केवल एक दो उपन्यास ही हैं। इन उपन्यासों में डॉ बी एन पांडेय के उपन्यास शहरों के कुत्ते, सुश्री विजया मायर के रिश्तों के बंधन, टूटते दायरे, तूफान से पहले, रंग बदलता आसमान, और तपस्या, प्रतिभा डाबर के वह मेरा चांद, और दो चम्मच चीनी के, भारतेंदु विमल के सोन मछरी, श्री नरोत्तम पांडे के बाबा की धरती, नीना पॉल के रिहाई, तलाश, और कुछ गांव-गांव, कुछ शहर-शहर, तथा आकाश, दिव्या माथुर के शाम भर बातें, कादंबरी मेहरा के निष्प्राण गवाह, शैल अग्रवाल के मिट्टी, व शेष-अशेष और उषा वर्मा के मॉम, डैड और मैं का उल्लेख किया जा सकता है। अस्मि के प्रकाशन के साथ ही शिखा वार्ष्णेय का नाम भी इन उपन्यासकारों में शुमार हो गया है और वह एक नई साहित्यिक यात्रा पर निकल पड़ी हैं। यात्रा संस्मरण (स्मृतियों में रूस), पत्रकारिता और प्रवासी अनुभवों से गुजरती हुई उनकी रचनात्मकता अब कथात्मक और मनोवैज्ञानिक संसार में प्रवेश कर चुकी है।
इस उपन्यास (या उपन्यासिका) का आवरण पृष्ठ ही उपन्यास की मूल संवेदना का संकेत दे देता है। पहाड़ों के पीछे से उगता सूर्य और उसके ऊपर उपन्यास का शीर्षक ‘अस्मि’, अपने होने की घोषणा करता हुआ प्रतीत होता है। उपन्यास के शीर्षक का सबसे बड़ा सौंदर्य इसकी दार्शनिक अर्थवत्ता में है। अस्मि में ‘मैं हूँ’ का साधारण-सा कथन धीरे-धीरे ‘मैं कौन हूं?’ और अंततः ‘मैं जैसी हूं, वैसी ही स्वीकार्य हूं’ अथवा “मैं जैसा हूं, वैसा ही स्वीकार्य हूं” में परिवर्तित होता दिखाई देता है।
उपन्यास का केंद्रीय बिंदु केवल अस्तित्व की घोषणा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को पहचानने, स्वीकार करने और अपनी शर्तों पर जीने की आकांक्षा का उद्घोष भी है। दरअसल यह अपने होने की तलाश की कथा है।
उपन्यास के दो मुख्य पात्र हैं- एला और रिओ। दोनों पात्रों की कहानियां समानांतर रूप से साथ-साथ चलती हैं। एला मध्यवय की उस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जिसका जीवन बाहर से व्यवस्थित और सफल दिखाई देता है, लेकिन जिसके भीतर कहीं उसका अपना ‘मैं’ धीरे-धीरे धुंधला पड़ गया है और वह उस ‘मैं’ की तलाश में है। यह स्थिति आज के समाज में असामान्य नहीं है। जबकि रिओ एक समलैंगिक है जो अपनी पहचान की सामाजिक स्वीकार्यता के लिए संघर्षरत है। दोनों दो अलग पीढ़ियों और अलग परिस्थितियों के पात्र हैं, लेकिन दोनों के संघर्ष की जड़ में एक ही प्रश्न है— क्या मुझे अपने वास्तविक रूप में होने का अधिकार है?
इस अर्थ में अस्मि केवल एला का ही नहीं, रिओ का भी उद्घोष बन जाता है और इसलिए अस्मि को केवल स्त्री-केंद्रित उपन्यास कहना कुछ हद तक इसके दायरे को सीमित करना होगा। यह मूलतः आत्म-पहचान और आत्म-स्वीकृति का उपन्यास है।
स्त्री से पत्नी, मां, बहू, बेटी, परिवार के सदस्य और सामाजिक रूप से ‘सफल महिला’ होने की अपेक्षाएं तो की जाती हैं, लेकिन इन भूमिकाओं के बीच वह स्वयं क्या चाहती है, यह प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है। एला की यात्रा इसी विस्मृत प्रश्न की पुनर्खोज है। वह किसी विद्रोही की तरह अपने अस्तित्व की घोषणा नहीं करती, बल्कि जीवन के अनुभवों से गुजरकर उस मुकाम पर पहुंचती है जहां उसे अपने होने का बोध होता है।
एला एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की है। उसका विवाह एक संपन्न परिवार के लड़के राजीव के साथ होता है। उसके एक बेटा है अंकुर। एक दिन राजीव और अंकुर के साथ वह स्काई डाइविंग करते हुए लैंडिंग के दौरान पैराशूट खराब होने के कारण किसी अनजान जगह पर गिर जाती है। उसे गंभीर चोटें आती हैं। काफी देर तक बेहोश रहने के बाद जब उसे होश आता है तो वह अपने पास तीन ग्रामीण महिलाओं को देखती है। तीनों महिलाएं उसे अपने घर ले जाती हैं, उसकी देखभाल करती हैं। उसे उम्मीद थी कि उसका पति राजीव उसे ढूंढ़ते हुए यहां आएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। काफी दिन बीत जाते हैं। जब उसे पता चलता है कि उसके पति ने कुछ दिनों की खोजबीन के बाद यह मान लिया है कि वह मर चुकी है तो उसे गहरा धक्का लगता है। वह दुखी मन से कहती है, “मरा ही मान लिया। क्या इतना कम फर्क पड़ता है, उसके होने या न होने से।”
एला मन ही मन निश्चय करती है कि वह अपने घर वापस नहीं लौटेगी। सनौली में रहते हुए उसे अपना अतीत याद आता है कि राजीव ने किस तरह उसकी चित्रकला की प्रदर्शनी पर गुस्सा जाहिर किया था। शादी के पांच-छह वर्षों के बाद उसकी मुलाकात उसके पड़ोस में रहनेवाली महिला जागृति से होती है जो आधुनिक और खुले विचारों की है। वह अपने मित्र रिओ की सहायता से एला के चित्रों की प्रदर्शनी लगवाती है। प्रदर्शनी काफी सफल होती है और एला की पेंटिग्स को काफी प्रशंसा भी मिलती है। लेकिन राजीव को जब यह खबर समाचार पत्रों के माध्यम से मिलती है तो वह आग बबूला हो जाता है।
रिओ जागृति का बचपन का दोस्त है। वह समलैंगिक है इसलिए उसे सामाजिक अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है। रिओ अपने शरीर और अपनी लैंगिक पहचान के बीच एक गहरे अंतर्द्वंद्व से गुजरता है। उसके भीतर अपने जैविक शरीर से अलग जीवन जीने की आकांक्षा है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है—“क्या समाज उसे उसके वास्तविक रूप में स्वीकार करेगा”? उसके माता-पिता उसे लेकर समाज में असहज महसूस करते हैं इसलिए वे उसे पढ़ने के लिए लंदन भेज देते हैं जहां वह कला के माध्यम से अपनी पहचान बनाता है और जीवन में कामयाबी हासिल करता है। इस प्रकार उपन्यास के दोनों मुख्य पात्र अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और अपनी स्वीकार्यता के लिए संघर्ष करते हैं और अपने परिवार और समाज से मनवाते हैं कि “अभी मैं हूं।”
एला की जीवन-यात्रा यह विचार सामने लाती है कि जीवन के मध्य पड़ाव पर भी नई शुरुआत संभव है। रिओ का चरित्र इस विचार को व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करता है कि किसी व्यक्ति की पहचान को समझने और स्वीकार करने में संवेदनशीलता का महत्त्व कितना अधिक है।
अस्मि का एक महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष यह भी प्रतीत होता है कि परिवार और समाज अक्सर व्यक्ति के लिए एक ‘सही’ जीवन निर्धारित कर देते हैं- कैसा शरीर हो? कैसा व्यवहार हो? कैसा विवाह हो? किस उम्र में क्या करना चाहिए? स्त्री को कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए? इन प्रश्नों के बीच व्यक्ति का अपना प्रश्न दब जाता है।
उपन्यास संभवतः इसी सामाजिक मानसिकता को चुनौती देता है और कहता है कि मनुष्य की पहली आवश्यकता किसी सांचे में फिट होना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को पहचानना है। अस्मि की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह ‘अस्मिता’ को किसी बड़े वैचारिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव के रूप में सामने लाने की कोशिश करता है।
उपन्यासकार ने जापानी जीवन दर्शन ‘इकिगाय’ को भी बड़ी खूबसूरती से अस्मि के कथानक से जोड़ा है। साहित्यिक दृष्टि से इसका महत्व इसलिए है कि उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न—‘जीवन का अर्थ क्या है और मैं अपने जीवन को किस तरह सार्थक बनाऊं?’—इकिगाय के विचार से स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है।
अर्थात् अस्मि केवल यह नहीं पूछता कि ‘मैं कौन हूँ?’ बल्कि उससे आगे जाकर यह बताता भी है—‘जब मैं अपने आपको पहचान लूँ, तब मैं कैसे जिऊं?’
उपन्यास का कथानक प्रवाहपूर्ण है और घटनाओं का क्रम पाठक में आगे पढ़ने की उत्सुकता बनाए रखता है। घटनाओं के बदलाव और चरित्र-विकास इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। यहां पहाड़ी जीवन की सादगी और सरलता का भी सुंदर चित्रण मिलता है। अस्मि का कथानक भारतीय परिवेश का है परंतु सनौली गांव देश के किस कोने में है यह पता नहीं चलता। बस यह अनुमान किया जा सकता है कि यह किसी पहाड़ी क्षेत्र का कोई गांव है। इसलिए ऐसा लगता है कि उपन्यास में घटनाएं अधिक हैं और विवरण थोड़ा कम है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। इसमें पत्रकारिता की सहजता और साहित्य की संवेदनात्मकता का मेल दिखाई देता है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि शिखा वार्ष्णेय का अस्मि अपने शीर्षक की तरह ही ‘अपने होने’ की घोषणा का उपन्यास है। यह उस स्त्री की कहानी है जो जीवन की निर्धारित भूमिकाओं से आगे बढ़कर अपने व्यक्तित्व को पहचानना चाहती है और उस युवा की भी कहानी है जो समाज की निर्धारित पहचान के बजाय अपनी वास्तविक पहचान के साथ जीना चाहता है।
इसलिए अस्मि को केवल प्रवासी महिला लेखन, केवल नारी-विमर्श, अथवा केवल पहचान के संकट का उपन्यास कहना पर्याप्त नहीं होगा।
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समीक्षक: तरुण कुमार
उप निदेशक
सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली
पू्र्व अताशे (हिंदी व संस्कृति)
भारत का उच्चायोग, लंदन।
