- निधि अग्रवाल
जैसे लोग काशी अयोध्या मक्का मदीना जाना चाहते हैं वैसे मैं ‘गिल्लू’ की किताब आने के बाद से लखनऊ जाना चाहती थी। कभी नरेश सर नहीं होते थे लखनऊ में, कभी मेरा निकलना नहीं हो पाता था। मन कहता था जाने कब संजोग बनेगा! मेडिकल कांफ्रेंस के बहाने एक दिन के लिए लखनऊ जाने का अवसर मिला। लखनऊ के युवा कवि रविकांत का मैसेज आया था मिलने के लिए। मैंने नरेश सर की उदारता का लाभ उठाते हुए उसे भी उनके घर बुला लिया। हम जब वहां पहुंचे तो जाना कि पितृपक्ष की अमावस्या का दिन है। उन्होंने कहा यह दिन हमारे बिछड़ गए आत्मीय-जनों के प्रति किए हमारे अपराध और पछतावे का दिन है, उनके स्मरण और माफी का दिन है।
मेरी स्मृति में नरेश सर से परिचय की श्रृंखला घूम गई। सबसे पहले उनकी ‘पार’ कविता से उन्हें जाना था फिर उनकी कविताओं से अनेक सोशल प्लेटफॉर्म्स पर मिलना होता रहा। अपनी तीक्ष्ण कविताओं के बल पर वे मोस्ट वायरल कवियों में शुमार हैं। पंकज चतुर्वेदी जी के माध्यम से भी सर के बारे में पढ़ती रही फिर किसी पोस्ट को पढ़कर स्तब्ध हुई कि ऐसी बारीक देह के भीतर कैसा गहरा आगार होगा। जहां इतना दुख तहाकर रखा जा सकता है, निजी प्रलाप में न डूब औरों की कुशल क्षेम पूछी जा सकती है। उस दिन दिल ने कहा था कि इस कवि पिता को मुझे अपनी आंखों से देखना है।
धीरे-धीरे समय के साथ उनके व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं को, विजय जी के साथ प्रेम को जानती गई उनके प्रति सम्मान बढ़ता गया। झांसी के एक आयोजन में मैंने उनकी उपस्थिति चाहीं। झिझकते हुए कहा – सर मैं नहीं जानती कि हाल में पांच श्रोता होंगे या पचास; पर मैं चाहती हूं कि आप आएं।

वे आदतन हँसे और सहर्ष राजी हो गए। उनका कहा मुझे भूलता नहीं –
निधि जी आप अपने घर के आंगन में कविता पाठ के लिए बुलाएंगी, तब भी मैं आऊंगा। अपने खर्चे से भी आऊंगा और साथ में अन्य दस कवियों को लेकर आऊंगा।
ऐसा है उनका कविता से प्रेम और समर्पण। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें न केवल अपनी बल्कि अपने प्रिय कवियों की कविताएं भी शब्दशः याद हैं। झांसी में अपनी लंबी कविता चंबल के भी कई अंश उन्होंने मुंह-जुबानी सुनाए थे। उस कविता पाठ के बाद हाल में व्याप्त सन्नाटा मुझे भूलता नहीं। कविता के बाद ताली न बजना कविता की बड़ी ताकत है। मुझे इस पाठ को सुनते हुई सिहरन पुनः महसूस हुई।

मैं झांसी से लखनऊ लौटी। इस मेहमान कक्ष में प्रवेश करते ही मेहमान का लेबल कहीं बिला जाता है। आठ दीवारों में बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले इस कमरे में भीतर बाहर हरियाली का आधिपत्य है पर्दे हटा देने पर पारदर्शी कांच अनुपस्थित सा हो विस्तार का आख्यान रच देता है। मिट्टी,बांस, लकड़ी प्राकृत सजावट वाला यह घर आपको बेहद परिचित सा लगता है… आत्म का अंश हो जैसे।
“आपके घर की वाइब्स बहुत soothing है सर ।”
फिर वही खुली हंसी ।
“एक चक्कर पीछे का भी लगा कर आइए निधि जी।”
हम लोग घर के आंगन में आए और आम के विशाल पेड़ के सम्मोहन में वहां खड़े रह गए। ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल की ओर ऊंचे उठते इस प्रौढ़ पेड़ को भवन निर्माण के दौरान सहजते हुए लेंटर डाला गया है। एक कवि का हृदय ऐसा ही विशाल होना चाहिए। अपनी परिधि में शामिल किसी कोमल चीज को नष्ट न होने देना।
“सर्दियों में यहां खूब धूप उतरती होगी”, मैंने कहा
“धूप से मिलना है… आइए धूप से मिलाता हूं।”
वे तेजी से सीढ़ियां चढ़ रहे हैं हम धीरे-धीरे। द्वितीय तल पर स्थित उनकी टेरेस बगिया पर इस समय धूप ने अपना सुनहरा आँचल पसारा हुआ है। घर की अगवानी करता विशाल वृक्ष इस आंचल में लटकन सा पिरा दिख रहा है। अमरूद के शिशु पौधे में फल लटके हैं। इसी गमले के आस पास नन्हा अनहद खड़ा है। अनहद की चपलता पूरे समय हमारे आसपास बनी रही थी। अब पछता रही हूं कि बार-बार चाह कर भी उसके साथ तस्वीर क्यों नहीं ली।
तस्वीर से मुझे नरेश जी और विनोद कुमार शुक्ल जी का वीडियो याद आता है। नरेश जी शूटिंग के बीच विनोद जी के बाल ठीक कर रहे हैं। अपने दो अति प्रिय लेखकों की इस प्रगाढ़ दोस्ती को जानना मुझे सदा विभोर करता है। कुछ-कुछ दृश्य हमारी स्मृतियों में गहरे अंकित हो जाते हैं।
किसी सुबह की एक और तरल स्मृति जाग रही है । हर दिन की तरह मैं घर संजो रही थी। अपने कमरे में रखे एक खिलौने को उठाकर मैं बच्चों के कमरे में रख कर आई। थोड़ी देर बाद लौटी तो देखा वह साइड स्टूल पर रखा है। ऐसा ही तो इन दिनों दिमाग हो गया है। मैंने उसे उठाया और बाकी खिलौनो के साथ रख आई। किसी काम से कमरे में लौटी तो वह वापस वहीं । मैं हैरान हुई।
“दिवा, यह टेडी बियर तुमने रखा है यहां?”
“हां मम्मी और यह यही रहेगा
यह केवल आपका कमरा नहीं है।”
“बिल्कुल यहीं रहेगा, हमेशा यहीं रहेगा।” मैं हंस पड़ी। सब तनाव झर गया । तीन साल की दिवा का चेहरा चमक उठा। वह भी खिलखिलाई।
संलग्न तस्वीर में वैसी ही चमक मेरे चेहरे पर है। अपने जिन प्रियजनों से हम पहली बार मिलते हैं या कभी कभार मिलते हैं तो मन में लालच रहता है, उनके पास कुछ ऐसा छोड़ आने का जिसे वे अपने जीवन में शामिल कर सकें। दिवा की तरह हम हक़ से कह सकें कि आपका जीवन केवल आपका नहीं है उस पर हमारा भी ज़रा सा अधिकार है। अब यह सामने वाले की सहृदयता… उदारता कि वह इतनी सी जगह, इतना सा सुख हमें दे या न दे।
नरेश सर से मिलने जाते हुए उनकी छवि लहराई। कुर्ता पाजामा में ही उन्हें सदा देखा है। उस छवि में मैंने एक शॉल जोड़ा। अब संकोच-वश लिए बैठी हूं।
सर ने कहा – “इस पैकेट की कोई जरूरत नहीं थी।”
“जरूरत नहीं थी पर आप देख लीजिए। बहुत मन से लाई हूं।” जरा हिम्मत जुटा उन्हें दिया।
“इतना सुंदर शॉल लाई हो मेरे लिए। यह बड़ा सम्मान है।”
उन्होंने रविकांत से तस्वीर लेने के लिए कहा।
मैं स्तब्ध देख रही हूं नरेश जी को। हमारे समय के इतने बड़े कवि जाने कितने बड़े बड़े मंचों पर कितनी ही बार कितनी ही बड़ी-बड़ी हस्तियों ने नतमस्तक हो उन्हें पुष्पगुच्छ दिए होंगे, शॉल उड़ाए होंगे, सम्मान पत्र दिए होंगे, धनराशि दी होगी। ऐसा महान लेखक एक नए लेखक के हाथों शॉल पा अभिभूत हुए जाता है। कविता केवल शब्दों से बड़ी नहीं होती, उसमें कवि की निर्मलता भी कहीं न कहीं शामिल होती है।
‘चंबल एक नदी का नाम’ उनकी लंबी कविता के प्रकाशन की प्रतीक्षा है। इस कारण भी कि इस महत्वपूर्ण कविता में खड़ी बोली के बीच हमारी बुंदेली ने भी अपना स्नेहाधिकार पाया है।

डॉ. निधि अग्रवाल
झांसी, उत्तर प्रदेश
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