Sunday, April 19, 2026
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युवा लेखिका शिवानी की दो लघुकथाएँ

उपहार
दिवाली के आसपास शहर में कई सारी सेल और प्रर्दशनियाँ लगती हैं। बहुत सस्ते दामों में कपड़े और अन्य घरेलू सामान वहां मिलते हैं। निम्न आय वर्ग के लिए ये बहुत काम की होती हैं। लावण्या को वहां से खूब सारे सामान के साथ बाहर आते देखकर उधर से गुज़र रही कुमुद आश्चर्यचकित रह गई। वो लपककर लावण्या के पास पहुंचीं और अपना सारा अचरज उंडेलते हुए बोलीं “अरे लावण्या! तुम यहां से शॉपिंग कर रही हो?”
लावण्या हँसी, “हां कुमुद! कुछ बांटने का सामान लेने आई थी!”
“तुम यहां से सामान लेकर बांटती हो?” कुमुद ने कुछ हिकारत से कहा! “मैं तो सबको अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से ही चीज़ें देती हूं। हमारे ड्राइवर और नौकर चाकर साल भर इंतज़ार करते हैं हमारे गिफ्ट का!” उन्होंने गर्दन कुछ टेढ़ी करके शान बघारी।
“अच्छी बात है कुमुद!पर तुम्हीं ने बताया था ना पिछले साल कि तुम्हारे दिए हुए मंहगे कपड़े  उनके बच्चे दिन-रात लटकाए रहते हैं! तुम्हें पता है वो ऐसा क्यों करते हैं? दरअसल वो अपनी बस्ती में असहज महसूस करते हैं और उन्हें जल्दी से जल्दी पुराने करने की कोशिश करते हैं कुमुद ताकि अपने आसपास के माहौल में सहजता महसूस करें! तुम बताओ क्या फायदा ऐसे महंगे कपड़ों का जो मन भर कर पहने भी नहीं जा सकें!” लावण्या ने सामान गाड़ी में रखते हुए मुस्कुराते हुए आगे कहा “ये कपड़े और ज़रूरत का सामान पाकर उन्हें जो खुशी होती है वो अपने माहौल से जोड़े रखती है इसलिए यही इनके लिए उपयुक्त है।”
कुमुद की टेढ़ी गर्दन कुछ झुक सी गई।
इच्छा मृत्यु
“लो जी! इच्छा मृत्यु कानून पास हो गया है।भगवान की भूल अब सरकार सुधारेगी।” बहू ने अखबार पढ़ते हुए कहा।
“हां सही है!” बेटे ने बात आगे बढ़ाई। “भले-चंगे बाऊजी को ले गए और इस बुढ़िया को छोड़ दिया जिसे दीखे न भाले, न चले न फिरे! कोई काम की नहीं!”
“अरे अगर ये जाती और बाऊजी बच जाते तो घर भर के तो काम करते और पेंशन भी पूरी आती सो अलग!” दुख-दर्द से मुक्ति की आस में बुढ़िया का रोना रुक गया।
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