समीक्षक : तरुण कुमार,
(अताशे हिंदी व संस्कृति),
भारत का उच्चायोग, लंदन.
यों तो छंदोबद्ध वैदिक मंत्रों को ऋचाएं कहते हैं। इनमें पवित्रता और आध्यात्मिकता का बोध होता है इसलिए ये पूजनीय भी मानी जाती हैं लेकिन ऋचा जैन जिंदल की ऋचाएं उनके जीवन के विविध अनुभवों की कविताएं हैं जिनमें मानवीय मूल्यों के निरंतर फैलते क्षितिज का विस्तार देखा जा सकता है।
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन द्वारा प्रकाशित जीवनवृत्त व्यास ऋचाएं ऋचा जैन का प्रथम काव्य संग्रह है जिसमें इन्द्रधनुषी मानवीय संवेदनाओं की कुल 62 कविताएं हैं। जितना अर्थपूर्ण इस संग्रह का शीर्षक है उतनी ही मार्मिक और संवेदनायुक्त इसमें संगृहीत रचनाएं हैं। इंजीनियरिंग की पृष्ठभमि से हिंदी काव्य-लेखन के क्षेत्र में आई ऋचा जैन के लिए कविता लिखना न केवल स्वयं की खोज और अंतर्मन की यात्रा है वरन् इस यात्रा के अनुभवों से बाह्य जगत को अवगत कराना भी है। उनकी कविताओं में खुद को अभिव्यक्त करने की एक छटपटाहट, एक बेचैनी साफ झलकती है।
षडयंत्र शीर्षक कविता में वह कहती हैं: “शब्द सताते रहे सालों साल, बिछाते रहे एक मायावी जाल, खुद से बातें करना, खाली दृश्य देख मुसकाना, अकथनीय पे झुंझलाना, उन्मत्त सी रहने लगी जब तक कि मैंने लेखनी नहीं उठाई।’’ संग्रह की एक अन्य कविता कोशिश भी कुछ इसी भाव की है: ‘‘मैं सीख रही हूं सच बोलना स्वयं से, मैं सीख रही हूं लिखना कविता।’’
यद्यपि संग्रह का शीर्षक किसी गणितीय सूत्र जैसा लगता है परंतु ऋचा जैन के लिए जीवन कोई गणित नहीं है जिसमें दो और दो का जोड़ हमेशा चार होता है। उनके लिए गणित का मतलब है: ‘‘जो जोड़ा वो जाता रहा, जो बांटा बस गया मुझमें।’’

