Saturday, April 18, 2026
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स्वाति शर्मा की चार कविताएँ

बातें
कुछ ऐसी बातें होती हैं
कुछ यूं ही यादें होती हैं
कुछ डूब उतर के जाती हैं
कुछ देख़ती ही रह जाती हैं
कुछ ख़ुद ही खुद में खोती हैं
कुछ ऐसी बातें होती हैं
सांसों में चलती रहती हैं
कुछ चुप हैं तो कुछ कहती हैं
कुछ दम ही में अटक गईं
और ख़्याल की स्याही टपक गई
जो जी-जी कर जोती हैं
कुछ ऐसी बातें होती हैं
अनकही तो ख़ालिस ख़ुशबू है
कह दी तो बिखरा जादू है
कुछ आस में पलती रहती हैं
कुछ आह में जलती रहती हैं
कुछ बीज नए भी बोती हैं
कुछ ऐसी बातें होती हैं
बातें कुछ कह दी जाती हैं
काफ़ी पर रह ही जाती हैं
जब रातों से डर लगता है
और रातें साथी होती हैं
दिन भर तब ख़ुद से होती हैं
कुछ ऐसी बातें होती हैं
अक्षर
बचपन में सीखा था
बिंदु से बिंदु जोड़
आखर गढ़ना
तस्वीर भरना
तब से बस वही ऐक तरीक़ा
सीखा है जीवन में
कितने बिंदुओं से बिंदू जोड़े हैं
कुछ बना लेने की आस में
कई लकीरें बनाई हैं
हाशिए की तलाश में
किस बिंदू से आना है
किस बिंदू पर जाना है
बस कोई हाथ पकड़े नहीं बताता
कुछ बिंदु समय हैं
कुछ रंग हैं
तो कुछ पन्ने और स्याही
कुछ बिंदू भावनाओं जैसे दीख पड़ते हैं
कुछ छूने से चीख़ पड़ते हैं
कई सारे सील किये हुए लिफ़ाफ़े हैं
कुछ नये हैं तो कुछ पुराने
क्या ये सब बिंदू मैं हूँ?
क्या मैं इन सब में हूँ?
या ये मुझमें?
या मैं वो हूँ
जो दूर लकीरें बना रहा है?
जो इस कभी न बनने वाले शब्द को
गढ़ रहा है?
मैं जानती हूँ
आप मुझसे मिलना
चाहते हैं
कहिये किस बिंदू से मिलेंगे आप?
अधूरे चाँद सा
आज दिल है
कुछ अधूरे नग़मे सुनने का
अधूरी बातें
अधूरे सपने
अधूरी यादें बुनने का
कुछ कहो
जो सुना न हो
हो अधमरा पर फ़ना न हो
सिर्फ़ आधा ही तुम्हें दिखा हो
जिसे आधी साँस से तुमने लिखा हो
वो बात जो अधर में रुक गई
वो नज़्म जो क़लम में छुप गई
वो ख़याल जो
लफ़्जों को पीछे छोड़ गया
वो आसूं जो
तुम्हारी स्याही निचोड़ गया
वही क़िस्से जो
चुप रह न सके
वही हिस्से
पर तुम कह न सके
वो अक्षर जो
क़सक लिये बैठे हैं
वो अक्षर जो
न आने को ऐंठें हैं
वो मसले जो
अनसुलझे हो गए थे
वो रास्ते जहाँ
तुम खो गए थे
कहो उसे
जिसे दर्द के सिरे पे
तुम छोड़ आए थे
वो अतल विचार
जहाँ से पग मोड़ लाए थे
ज़रा पलटो उन वरक़ों को
जो राह तुम्हारी तकते हैं
और जानो ज़रा
क्या अधूरे वाक्य कर सकते हैं
वो सितारे हैं
तुम्हारी किताब के
वो टुकड़े हैं
आफ़ताब के
वही प्रतिबिंब
तुम्हारी कुण्ठा का
सबसे ऊँचा
सबसे सच्चा
सबसे पक्का था
बस वही अनकहा एक
पूरा है
जो कह डाला
क्या जाने वो अधूरा है
शान्ति
ज़ोर के घूमते दरयायी भँवरों से
पिसते गोल-मटोल पत्थरों की गुड़-गुड़
झरनों का बौख़ला कर
चट्टानों पर टूटते हुए गुर्राना
रहट चक्की की जीवन सरीख़ी
अन्तहीन साँय-साँय
सताये या भूखे हैं ये पंछी
आसमानों से पुकार करते हुए
जब सूरज उगता है
ढोल बजाता चला आता है
जब शाम ढलती है
कपड़ों, पिंड, जान तक से लड़ती-झगड़ती
ओस की बूँदें मसल जाती है
मन कचोट देने वाली
देवदारों से छनती चीख़ती चाँदनी
भरभरा कर बिखर जाती है
तन पर रेंगती हुई
कीट-पतंगों की रीं-रीं
क़दमों की धमक से कराहता
लकड़ी का कमज़ोर बूढ़ा सा फ़र्श
बेइन्तहाँ आवाज़ों का रूहानी एकांत
और चौबारे से पैर लटका कर
ख़ाली कप हाथ में लिए बैठी मैं
क्या ढूँढ रही हूँ मैं यहाँ
अनंत के शोर-ओ-ग़ुल में
अनंत की शान्ति
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