Monday, April 20, 2026
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प्रकाश मनु का आत्मकथ्य – बचपन में माँ और नानी से सुनी कहानियों ने मुझे लेखक बनाया!

कहानी के लिए दीवानगी तो शुरू से ही थी। बचपन में मुझे याद है, माँ और नानी की सुनाई गई कहानियाँ मुझे किसी और ही दुनिया में पहुँचा देती थीं। लगता था वह दुनिया मेरे आसपास की देखी-भाली दुनिया से काफी अलग और कौतुक भरी है। उसमें हर क्षण कुछ न कुछ घटित होता था और मुझे लगता था, मैं बिना पंखों के उड़ रहा है, उड़ता जा रहा हूँ एक अंतहीन आकाश में, और जीवन-जगत के एक से एक नए रहस्यों को जान रहा हूँ। 
कहानी के जरिए बिना पंखों के उड़ने की कहानी शायद मेरे जीवन की सबसे अचरज भरी कहानी है, जिसने मुझे भीतरबाहर से बदल दिया, और जिस दुनिया में मैं था, जी रहा था, उसके मानी भी कुछ बदल गए। दुनिया वही थी जिसमें सब जी रहे थे, पर मेरे लिए वह दुनिया कुछ अलग हो गई थी।
मुझे याद है, बचपन में माँ से सुनी कहानियों में एक अधकू की कहानी भी थी, जो मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती थी। भला क्यों? इसलिए कि यह अधकू बड़ा विचित्र था। एक हाथ, एक पैर, एक आँख और एक कान…! सब कुछ आधा। ऐसा विचित्र था अधकू।…और मैं भी तो कुछ ऐसा ही था। एकदम दुबला-पतला, सींकिया सा। अगर घर में कोई कुछ कह देता तो माँ बरजतीं। बार-बार कहतीं, मेरा कुक्कू ताँ अड़या-जुड़या होया तीला है। इन्नू कुज्झ न आक्खो!” यानी जैसे तिनते एक-दूसरे में अटके हों, वैसे ही मेरा कुक्कू तो बस किसी तरह जुड़ा हुआ है। हाथ लगते ही तिनके बिखर जाएँगे।…इसलिए इसे जरा भी छेड़ो मत।
अधकू ऐसा था, विचित्र। पर बड़ा हँसमुख था। खुशमिजाज। हिम्मती और दिलेर भी, और आसानी से हार मानने वाला नहीं थी।… उसकी सबसे बड़ी ताकत थी उसकी माँ, जो उसे बेइंतिहा प्यार करती थी। उसके भाई चोरी और डाका डालने का काम करते थे। वे उसे मारने को तैयार हो गए, यह सोचकर कि यह सींकिया तो किसी काम का नहीं। पर माँ ने चुपके से बता दिया अधकू को कि अधकू, खबरदार! आज की रात सो मत जाना। तेरे भाई ही तेरा काल बन गए हैं। तो अधकू चुपचाप लेटा रहा और बाकी छहों भाई पत्थर पर घिस-घिसकर छुरियाँ चमकाने लगे, ताकि एक ही बार में अधकू का काम तमाम हो जाए। 
वे अधकू के सोने का इंतजार कर रहे थे। पर अधकू सो कहाँ रहा था? वह तो बस आँखें मींचे लेटा था और मन ही मन हँस रहा था। भाइयों को जोर-जोर से छुरियाँ चमकाते देखा तो मजे-मजे में बोला, छुरियाँ ना चमका, कि अधकू जागदा…!” 
सुनकर भाइयों को बड़ा गुस्सा आया। उनमें से एक बोला, मरे अधकू दी माँ, कि अधकू जागदा…!”
आखिर माँ के बहुत समझाने पर वे उसे भी साथ ले जाने लगे। पर अधकू बड़ी होशियारी से कुछ न कुछ ऐसा करता कि वे मुसीबत में पड़ जाते और आखिर भाग लेते। फिर एक बार वे राजा के यहाँ चोरी करने पहुँचे। अधकू के पास एक तूँ-तूँ बाजा था। एक तार का बाजा। अधकू की सबसे बड़ी दौलत। चलते-चलते अधकू ने उसे भी साथ ले लिया था। भाइयों ने पूछा, तू इसका क्या करेगा रे अधकू!”
अगर कोई मुसीबत हुई तो यह बाजा बजाकर आप लोगों को चेता दूँगा। अधकू ने सिर हिलाते हुए कहा।
भाइयों ने मान लिया। बोले, अच्छा, ठीक है सुकड़ू, ठीक…! तू अपना यह तूँ-तूँ बाजा भी ले ले।
अधकू ने बड़ी खुशी से सिर हिलाया, और वह छोटा सा तूँ-तूँ बाजा अपनी फेंट में कस लिया।
कुछ देर बाद जब राजा के महल में चोरी कर रहे थे उसके भाई, तो अधकू परेशान। सोचा, यह तो अच्छी बात नहीं है। उसने झट अपना तूँ-तूँ बाजा निकाला। उस बाजे को बजाते हुए उसने सोते राजा को चेताया कि अरे ओ राजा, तू तो लंबी तानकर सो रहा है,/ जबकि तेरे महल में घुस गए चोर…/ इतने सारे चोर।/ जल्दी से जाग और अपना महल सँभाल,/ अरे ओ राजा!” 
सुनते ही राजा हड़बड़ाकर उठा और अधकू के भाई पकड़े गए। राजा ने खुश होकर अधकू को अपना मंत्री और मुख्य सलाहकार बना लिया। पर अधकू को अभी चैन कहाँ था? अगले दिन बेड़ियाँ पहने अधकू के भाई दरबार में लाए गए तो अधकू बोला, महाराज, ये मेरे ही भाई हैं। गलते रास्ते पर भटक गए थे। इनके पास कोई काम नहीं था। आप कोई ढंग का काम दें तो भला ये चोरी क्यों करेंगे?” 
तब राजा ने अधकू के छहों भाइयों को अपने दरबार में रख लिया। यों अधकू जो आधा था, अधकू जो सींकिया था, विचित्र भी, उसने जीवन में एक सम्मानपूर्ण जगह बनाई और अपने भाइयों को भी तार दिया।
इस कहानी में कुछ बात थी कि मैं उसे आज तक नहीं भूल पाया। क्यों भला? शायद इसलिए कि मुझे लगता था, मैं ही अधकू हूँ। औरों से बहुत अलग। इसलिए कि मुझमें शारीरिक ताकत ज्यादा नहीं थी। दुनियादारी में कच्चड़। खेलकूद में कच्चड़… बहुत सारी चीजों में फिसड्डी। एकदम फिसड्डी। पर फिर भी लगता, कुछ है मुझमें, कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ। सारी दुनिया से कुछ अलग कर सकता हूँ।… 
वह क्या चीज थी, जिस पर इतना भरोसा था मुझे? तब तो शायद बहुत साफ न रही होगी। पर आज जानता हूँ कि वह मेरी चुपचाप सोचते रहने की आदत थी, और लिखने-पढ़ने की धुन, जो शायद पाँच-छह बरस से ही शुरू हो गई थी। वही धुन जो आगे चलकर मुझे साहित्य की खुली दुनिया में लाई।…
[2]
माँ की सुनाई कहानियों में एक और कहानी थी। एक ऐसे राजकुमार की कहानी, जिसे सात कोठरियों वाले महल में कैद कर दिया गया था। उससे कहा जाता है कि वह छह कोठरियाँ तो देख ले, पर सातवीं न खोले, क्योंकि इससे उसका अनिष्ट हो सकता है। 
राजकुमार ने पहली कोठरी खोली, दूसरी कोठरी खोली, तीसरी कोठरी खोली, एक-एक कर छह कोठरियाँ देख लीं। पर सातवीं कोठरी…? उसने सोचा, क्या सातवीं कोठरी भी खोलकर देखूँ? जरा देखना तो चाहिए कि उसमें ऐसा क्या है?
उसने धड़कते दिल से सातवीं कोठरी का दरवाजा खोला, और उसे खोलते ही भीषण हलचल हुई, एक तेज बवंडर सा आ गया। भूचाल…! जैसे सिर पर आसमान टूट पड़ा हो। एक से बढ़कर एक विपत्तियाँ आईं। कभी मौत के खेल सरीखा खौलता हुआ समंदर, कभी आग की ऊँची-ऊँची प्रचंड लपटें, कभी फुफकारते हुए बड़े-बड़े विशालकाय साँप…! यहाँ तक के अंगारों जैसी जलती हुई आँखों के साथ गरजते शेर, चिंघाड़ते हाथी और दूसरे हिंस्र जंगली जानवर भी। जैसे अभी झपट पड़ेंगे और मौत के गाल में पहुँचा देंगे। 
एक के बाद एक सात समंदर भीषण आपदाओं के!…और राजकुमार का जी थर-थर, थर-थर, थर-थर। पर उसने बड़ी हिम्मत और दिलेरी से एक-एक कर सातों समंदर पार किए। बीच-बीच में डरा, काँपा, लेकिन जूझा भी हर एक विपत्ति से। फिर एक ऐसे द्वीप पर आ पहुँचा, जहाँ सोने जैसे बालों वाली सुंदर राजकुमारी सोनबाला कैद थी। उसकी आँखों में करुण याचना, जिसने राजकुमार को द्रवित कर दिया। और फिर सोनबाला को कैदखाने से छुड़ाने की मुहिम ने उसे एक भीषण राक्षस के आगे ला खड़ा किया, जिसका भयानक अट्टहास ही धरती को कँपा देता था। 
पर राजकुमार गया उस राक्षस की गुफा में, और इतनी बहादुरी से भिड़ा कि राक्षस धड़ाम से गिरा…और एक जोर की चीख के साथ ही उसका सारा तिलिस्म खत्म! कहानी का नायक राजकुमार राजकुमारी को लेकर लौटता है तो उसके चेहरे पर विजेता होने की जो चमक है, जान पर खेलकर भी कुछ हासिल करने की चमक, वह कहानी सुनते समय हमारे दिल और आँखों में भी एक खुशी की कौंध भर देती थी। और कहानी पूरी होने पर जो मीठा सा सुकून मन में उपजता था, उसे भला मैं किन शब्दों में बताऊँ? कैसे बताऊँ…!
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि कहानी सुनते हुए हर पल मेरी साँस अटकी रहती। लगता, आँधियों के बीच फँसा वह राजकुमार मैं हूँ। मैं ही हूँ। उसके साथ कुछ बुरा घटता तो मन बुरी तरह तड़पने लगता। मैं अंदर ही अंदर छटपटाता। और उसकी बेहद-बेहद मुश्किलों से भरी किसी छोटी सी जीत पर भी आँख में आँसू आ जाते। ऊपर आसमान की ओर हाथ जोड़कर कहता, ओह, बच गया राजकुमार, बच गया…! हे राम जी, बड़ी कृपा है तुम्हारी। आखिर तुमने उस सच्चे और हिम्मती राजकुमार को बचा ही लिया।
यह कहानी थी। कहानी का जादू…! मेरा रोयाँ-रोयाँ उस समय कहानी की गिरफ्त में होता।
मैं कहानी सुन नहीं रहा होता था। उसके भीतर चला जाता था। कहानी में समा जाता था। बल्कि सच तो यह है कि मैं कहानी में और कहानी मुझमें समा जाती थी। उस समय आसपास की दुनिया और लोगों से बहुत ऊपर उठ जाता था मैं, और देर तक हवा में चक्कर काटता रहता। बड़ी देर लगती थी मुझे वास्तविक जमीन पर पैर रखने में। और सच पूछिए तो इसके लिए काफी प्रयत्न करना पड़ता था। और ये बड़े कष्टकर क्षण होते थे मेरे लिए।
यों एक नहीं, कई निराली और अबूझ दुनियाएँ मेरे आगे खुलती चली गईं। और मैंने जाना—बड़े ही अचरज के साथ यह जाना कि जो दुनिया हमारे आसपास है और जिसे हम हर घड़ी देखते हैं, अकेली वही दुनिया नहीं है। बल्कि इस दुनिया के भीतर बहुत सारी दुनियाएँ हैं, और उन दुनियाओं के भीतर और बहुत सी दुनियाएँ। तमाम रंगों और रहस्यों और अबूझ जिज्ञासाओं से भरी दुनियाएँ, जिन्हें जाने बिना हम अधूरे ही रहते हैं।
यह मेरा पुनर्जन्म था। छल-छल भावना और संवेदना वाले कुक्कू का पुनर्जन्म। तभी पहलेपहल जाना कि दिल में गहरी संवेदना हो, तो वह भीतर एक टीस ही पैदा नहीं करती, कई बार तो कलेजा चीर जाने वाले तीर की तरह आपको घायल कर देती है। और आप मछली की तरह तड़पने के लिए छूट जाते हैं।…
इस अनुभव को चाहूँ भी तो बाँट नहीं सकता। चाहूँ भी तो किसी को बता नहीं सकता। पर यही अनुभव था, जिसके कारण मैं अपने आप को औरों से अलग, और भीतर-बाहर से भरा-भरा सा महसूस कर रहा था।
क्या यही मेरे लेखक होने की पृष्ठभूमि नहीं थी?
आज सोचता हूँ, यह सब कैसे संभव होता, अगर राजकुमार सातवीं कोठरी का दरवाजा न खोलता तो…? बाकी छह कोठरियों के दरवाजे तो हर कोई खोलता है, पर सातवीं कोठरी का दरवाजा कोई-कोई ही खोलता है, और वही शायद अपने समय का नायक भी होता है।
[3]
मुझे याद है, बरसों पहले एक साहित्यिक मित्र ने मुझसे सवाल किया था किमनु जी, जिस परिवार के आप हैं, उसमें जन्म लेकर भी आप लेखक कैसे बने?” 
मित्र का सवाल सुनकर मैं एक क्षण के लिए चुप रहा। फिर कहा, भाई, इसका जवाब मैं बहुत जल्दी में, या दो-एक सतरों में नहीं दो सकता हूँ, इसलिए कि जवाब थोड़ा लंबा है।
लेकिन सवाल मेरे भीतर गड़ गया। और उस दिन से मैंने सोचना शुरू किया। सात भाई और दो बहनें। कुल नौ भाई-बहनों का बड़ा परिवार था हमारा। माता-पिता दोनों लगभग निरक्षर। मेरे परिवार में साहित्यकार होना तो दूर, कोई दूर-दूर तक भी साहित्य के निकट नहीं था। तो फिर मैं क्यों लेखक बना? कैसे...?
और जब मैं यह सोच रहा था, तो यही कहानी याद आ रही थी। मैं सोच रहा था, अगर इस कहानी का राजकुमार सातवीं कोठरी न खोलता तो जो रोमांचक चीजें उसके जीवन में घटित हुईं, वे कैसे होतीं? वह भी दूसरों की तरह एक सामान्य जीवन जीता और जीकर चला जाता। पर फिर कहानी कैसे बनती…? कहानी तो तभी बनती है, जब हम सारे खतरे उठाकर सातवीं कोठरी खोलते हैं और फिर एक से एक दिल को कँपा देनी वाली भीषण घटनाएँ घटती हैं, मुसीबतों के पहाड़ टूट पड़ते हैं, मन लगातार एक भीतरी द्वंद्व के बीच से गुजरता है। बुरी तरह टूट-फूट। आत्मध्वंस…! 
कई बार तो लगता है, अपने-पराए सब साथ छोड़ गए। अकेलापन, विवशता, लाचारी। कभी बुरी तरह पराजय और बेचारगी का अहसास भी। पर इन्हीं सब के बीच ही तो एक नवारुण प्रभात सूर्य की तरह जीवन का सत्य चमकता है, और जीवन में वह आनंद भी महसूस होता है, जो किसी कदर योगियों की समाधि से कम नहीं है, और दुनिया की बड़ी से बड़ी दौलत के आगे भी जो हेठा नहीं पड़ता। यह मनुष्य का मनुष्य होना है, एक आदमकद मनुष्य…!
कभी-कभी लगता है, यही शायद मेरे लेखक और कहानीकार होने का भी सच है। याद पड़ता है, अपने छात्र-जीवन में मैं बहुत होशियार विद्यार्थी माना जाता है। हर क्लास के सबसे अच्छे दो-तीन विद्याथियों में मेरा नाम चमकता था। माता-पिता और परिवार के लोगों का सोचना था कि मैं इंजीनियर बनूँ। मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कालेज इलाहाबाद में इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए चयन भी हो गया, पर मैंने बहाना बनाया कि नहीं, मैं प्रोफेसर बनूँगा। मुझे इंजीनियर नही होना। उसके बाद आगरा कालेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. पास की। पर यहाँ तक आते-आते लगा, जैसे मन के अंदर बैठा कोई कबीर कह रहा है, साइंस के प्रोफेसर होकर तो तुम जिंदगी भर चक्की के दो पाटों के बीच पिसते रहोगे, प्रकाश मनु। तो वह कब करोगे, जो करने के लिए तुम्हें भेजा गया है?” 
तभी जैसे इलहाम हुआ, मुझे तो साहित्य करना है। एक लेखक का, साहित्यकार का जीवन जीना है और उसके लिए जो भी मुश्किलें आएँ, मुसीबतें आएँ, उन्हें मैं सहन करूँगा, लेकिन जीवन वही जिऊँगा, जो मेरे मन में है। 
घर वालों से कहा तो उन्हें लगा, लड़का पागल हो गया है। इसलिए कि यह बिना कुछ आगा-पीछा सोचे, एक अथाह समंदर में कूद पड़ना था। वही एक क्षण था, जब लेखक होने का एक पूरा बिंब भीतर बना। लगा, अगर लेखक न हुआ तो जीना भी नहीं है। आधी रोटी खाकर रहूँगा, पर बनूँगा लेखक ही।
बाद में हिंदुस्तान टाइम्स में आया तो हिंदी के बड़े कहानीकार मटियानी जी से मुलाकात हुई और उनसे बहुत अंतरंगता भी हुई। वे जब भी मिलने आते, अपने बारे में बताते थे। बहुत-बहुत सी बातें। बड़े दुख-दाह से भरी भी। तो उन दिनों उनकी अपनी कहानी खुद उनके मुँह से सुनने को मिली। बहुत कठिन जीवन था उनका। एक अनाथ बच्चा, जिसके भीतर सपने थे। किशोरावस्था में कसाई का काम करना पड़ा। पर उन्हीं दिनों थोड़ा-थोड़ा लिखना भी उन्होंने शुरू कर दिया था। एक दिन कसाई की दुकान पर कीमा कूट रहे थे, तो बगल से गुजरते, किसी शख्स ने बड़ा तीखा और काटने वाला व्यंग्य किया, देखो, सरस्वती तक कीमा कूटा जा रहा है…!” 
मटियानी जी तिलमिलाए। इतना गुस्सा आया कि लगा, दीवार से सिर दे मारें। भीतर गहरी छटपटाहट। उस रात सोने से पहले वे देर तक दीवार में अपना सिर मार-मारकर पुकारते रहे, हे सरस्वती माँ, मुझे चाहे जितने दुख, चाहे जितनी तकलीफें देना, पर मुझे लेखक बनाना!…मैं बस, लेखक ही बनना चाहता हूँ, कुछ और नहीं। 
जितनी-जितनी उनकी जिंदगी में मुसीबतें आतीं, उतनी ही उनके भीतर यह पुकार गहरी होती जाती। तरुणाई में उनके मुंबई प्रवास की तकलीफदेह कहानी पता नहीं कितनों ने पढ़ी है। पर वह एक समूची दिल दहला देने वाली गाथा है। उन्हें लगता, अच्छा है कि दुख और संकट मुझ पर टूट पड़े, और एक के बाद एक तकलीफें आईं। अच्छा है कि मुझे भूखा रहना पड़ा, और मैंने पुलिस के डंडे तक खाए। पर अच्छा है…! इसलिए कि जितनी ज्यादा तकलीफें आएँगी, उतनी ही मेरे शब्दों में गहरी पुकार आएगी, और मैं और-और अच्छा लिखूँगा। 
और सच ही, मटियानी जी की कहानियों का असर कितना गहरा होता है, दिलों में उनकी कैसी गहरी गूँज पैदा होती है, यह आप देश के हर हिस्से में मौजूद उनके हजारों पाठकों से जान सकते हैं। प्रेमचंद के बाद हिंदी का शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार हो, जिसकी कहानियों को इतने पाठक मिले। पर क्या हम भूल सकते हैं कि मटियानी जी ने किन हालात में लिखा और वे क्या चीजें थीं, जो उन्हें लेखक बना रही थीं?
मैं जब मटियानी जी से उनकी कहानी सुन रहा था, उनके लेखक होने की कहानी, तो मुझे बचपन में माँ से सुनी कहानियाँ याद आ रही थीं। फिर-फिर अधकू याद आ रहा था। एक हाथ, एक पैर वाला अधकू, जिसने बड़े-बड़ों को चुनौती दी और अपनी दुनिया बदलकर दिखा दी।…मैं भी तो शरीर से दुबला-पतला सा ही था। तिनके जैसा। पर मन बड़ा था। इसलिए अधकू मुझ पर छा गया। बाद में लिखना शुरू किया तो सोचता था, कि लिखूँगा तो चीजें बदलेंगी। कुछ थोड़े से लोग तो होंगे जो पढ़ेंगे और अंदर तक महसूस करेंगे। बहुत ज्यादा नहीं, तो दो-चार ही सही। बहुत है। किसी एक ने भी उसी भाव से पढ़ा, जो भाव कहानी लिखते समय आपके भीतर जनमा था, तो यही बहुत है। 
और ऐसा होता है…! यही शायद सच्चाई की ताकत है। यही लेखन की ताकत और सार्थकता भी है।
[4]
पर बात तो कहानियों की हो रही थी न।…
मुझे याद है बचपन में अक्षर-ज्ञान के बाद जब क, ल और म को मिलाकर कलम बना लेने का जादू मैंने जाना, उस दिन मेरी दुनिया में जैसे सबसे बड़ा चमत्कार हुआ था। कहीं भी अक्षर दिखाई देते, दीवार पर, अखबार में, किताबों में, या दुकानों के आगे लगे बड़े-बड़े साइनबोर्डों पर, तो मैं उन्हें मिलाकर पढ़ने लगता। एक अतृप्त प्यास, जो एक बार भड़क गई, तो शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी। पढ़ना पढ़ना और पढ़ना…! इसके अलावा कुछ सूझता ही न था। लगता था, मैं पागल हो गया हूँ, अक्षर पागल…। एक अजब सा दीवानी। 
मुझमें पढ़ने-लिखने की रुचि देखी तो श्याम भैया मेरे लिए चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस की जीवनियाँ ले आए। मैंने उन्हें पढ़ा तो मन में एक अलग सी भावना पैदा हुई। जीवन में कुछ कर गुजरने की भावना। और यह भी कि कोई बड़ा उद्देश्य सामने हो तो आप अपना पूरा जीवन हँसकर दे देते हैं, देवता के चरणों में रखे गए किसी फूल की तरह। और जब आप अपने को समूचा दे देते हैं, तो आप बड़े भी हो जाते हैं। एक महत्तर दुनिया का अंश। यह कितने आनंद की बात है। सचमुच, कितनी बड़ी बात!… 
फिर एक दिन श्याम भाईसाहब मेरे लिए वे जो पुस्तक लाए, उसने तो मेरी जिंदगी ही बदल दी। वह प्रेमचंद की कहानियों की किताब थी। किताब का नाम था, प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियाँ। उसमें ईदगाह, दो बैलों की कथा समेत कई कहानियाँ बड़ी रुचि और आनंद से पढ़ गया। पर जब बड़े भाईसाहब कहानी पढ़ी तो मैं हक्का-बक्का। सचमुच अवाक! मैंने अपने आप से कहा, अरे, यह तो मेरे श्याम भैया की कहानी है। भला पेमचंद को कैसे पता चली…?”
उस दिन और कुछ हुआ हो या नहीं, पर मैंने कहानी की ताकत जरूर जान ली। एक की लिखी कहानी किसी जादू-मंतर से सबकी कहानी हो जाती है। एक के दिल में कुछ उमड़ता हो और वह उसे वैसे ही जिंदा और दमदार शब्दों में ढाल दे, तो जितने भी उसे पढ़ते हैं, सबके दिल में वही घुमड़ता है। मुझे लगा, अरे, यह तो दुनिया का सबसे बडा जादू है। महान करिश्मा! और यह साहित्य में घटित होता है, कहानी में। वाह, कैसा कमाल है?” 
बाद में प्रेमचंद की और कहानियाँ पढ़ीं। उनके उपन्यास गबन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवासदन, प्रेमाश्रम पढ़े, गोदान पढ़ा, शरत, रवींद्रनाथ के उपन्यास पढ़े। उन दिनों हिंद पाकेट बुक्स से हिंदी साहित्य की बड़ी अच्छी किताबें आती थीं। एक-एक रुपए में संक्षिप्त रूपांतरण मिल जाते थे। कोई-कोई दो रुपए में। तब यह भी समझ न थी कि प्रेमचंद हिंदी के हैं, शरत, रवींद्र, बंकिम बंगला के। इसकी शायद कोई जरूरत भी न थी। सवाल तो कहानी का था, कहानी जो दिल को छूती है, हर किसी के दिल को छूती है—सभी सीमाओं से परे। दुनिया के तमाम देशों की सरहदों से परे। कहानी में भी कहानी थी, उपन्यास में भी कहानी थी। मैं पढ़ता था और रोता था, रोता था और पढ़ता था। 
विश्व की इन महान और विलक्षण कृतियों में बीच-बीच में मनुष्य के भावनात्मक संबंधों के इतने करुण प्रसंग थे कि बिना रोए मैं पढ़ ही नहीं सकता था। हालाँकि कुछ समझ में आता था, कुछ नहीं। पर जो समझ में आता था, उसके सहारे जो चीज नहीं समझ में आती थी, उसके भी अर्थ खुलते जाते थे। और हाथ में किताब लिए मैं जान लेना चाहता था कि आगे क्या हुआ, आगे क्या, आगे क्या….? 
कई बार तो पढ़ते-पढ़ते ऐसे करुण प्रसंग आ जाते कि आँखों से लगातार गंगा-जमुना बहती। एक हाथ में किताब पकड़े, दूसरे से मैं आँसू पोंछता जाता और आगे पढ़ता जाता। पढ़ते-पढ़ते कई बार जोर से रोना छूट जाता, पर तब भी किताब के पन्ने पलटता जाता, क्योंकि यह जाने बिना निस्तार न था कि आगे क्या हुआ, आगे…?
उन दिनों घर में बिजली न थी। लालटेन जलाई जाती। पर पूरे घर में दो-तीन ही लालटेनें होती थीं। तो मैं जो छत पर पढ़ रहा होता, अकसर रात की स्याही गहराने तक, जब तक अक्षरों का अनुमान लगा सकता था, पढ़ता…पढ़ता और पढ़ता ही रहता, क्योंकि कहानी का डंक मुझे चुभ गया था और जितना अधिक पढ़ता, नशा और गहराता जाता। उसकी गिरफ्त और-और तेज होती जाती।
और शायद यही क्षण थे, जब जाने-अनजाने में मैं लेखक हुआ। भले ही उसका पता थोड़ा आगे चलकर लगा हो। 
[5]
अलबत्ता अपनी कोई पचास बरस लंबी कथा-यात्रा पर निगाह डालता हूँ तो मन में संतोष के साथ ही एक विस्मयजनक आह्लाद का भाव उपजता है। इसलिए भी कि मेरी कहानियाँ कहानी के बने-बनाए रास्ते पर चलने से एकदम शुरू से ही इनकार करती रही हैं। यह दीगर बात है कि जब ये कहानियाँ छपकर आईंचाहे पत्र-पत्रिकाओं में या मित्रों विजयकिशोर मानव और देवेंद्रकुमार के साथ निकाले गए साझे संग्रह दिलावर खड़ा हैमें, तो इन्हें सराहने वाले पाठक कहाँ-कहाँ मिले, उनकी अलग-अलग ढंग की उत्तेजक प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं, इसकी चर्चा शायद खुद एक कहानी बन जाए। 
हाँ, इन प्रतिक्रियाओं में एक बात आश्चर्यजनक रूप से मिलती-जुलती और साझी थी कि इनमें से सभी को लगा था कि ये कहानियाँ एकदम सच्ची हैं। इन कहानियों के पात्र एकदम सच्चे हैं और ये कहानियाँ मेरी आत्मकथा के अनलिखे पन्नों में से चुपके-चुपके निकलकर आई हैं। 
बहुत-से मित्रों और पाठकों ने तो इन कहानियों को मेरे जीवन में सच-सच इसी रूप में घटित हुआ मानकर, उन पात्रों के बारे में और भी बहुत-सी बातें दरियाफ्त करनी चाहीं। मसलन, “मनु जी, अरुंधती क्या आपको फिर कभी मिली?… क्या वह अब भी उसी तरह दुख और अकेलेपन का बोझ ढो रही है?” “सुकरात क्या सचमुच उसी तरह कुरुक्षेत्र में रेल की पटरियों पर कटा हुआ पाया गया था, जैसा आपने लिखा है?… क्या आपको उसके बारे में कुछ और पता चला कि वह क्यों इतने गुस्से में हरदम गालियाँ बकता रहता था और कहाँ से आया था?” 
ऐसे और भी सवाल। कुछ बेहद तीखे भी, और कुछ बेहद दिलचस्प! इनमें से बहुतों के जवाब में सिर्फ हँसकर रह जाना ही काफी था, क्योंकि उन्होंने इन कहानियों के नायक को हटाकर पूरी तरह मुझे वहाँ फिट कर दिया था और अब वे हर चीज की कैफियत मुझसे चाहते थे। जबकि सच तो यह है कि वे आत्मकथात्मक कहानियाँ भले ही होंऔर मेरी आत्मकथा के पन्ने किसी न किसी शक्ल में वहाँ जरूर फड़फड़ा रहे थेपर ये कहानियाँ पूरी तरह आत्मकथा न थीं, हो भी नहीं सकती थीं। तो भी ये कहानियाँ पाठकों को एकदम सच्ची और जीवन में ठीक-ठीक ऐसे ही घटित होती हुई लगीं, इसे इन कहानियों की एक अलग खासियत तो मान ही सकता हूँ। 
मेरे कथा-गुरु दिग्गज कथाशिल्पी देवेंद्र सत्यार्थी ने शुरुआती दौर की लिखी मेरी यात्राकहानी सुनने के बाद जिस तरह मुग्ध और अभिभूत होकर आशीर्वाद दिया था और कहानियाँ लिखने की अपनी ही लीक पर चलते रहने का जो बल दिया था, उसे भूल पाना असंभव है। साथ ही उन्होंने कहानी को लेकर कबीर की उलटबाँसी की तरह जो बड़ी कमाल की बात कही, वह मुझे आज भी कहानी के बड़े से बड़े शास्त्रीय सिद्धांतों से बड़ी लगती है कि
याद रखो मनु, कहानी सिर्फ तुम ही नहीं लिखते, बल्कि कहानी भी तुम्हें लिखती है। इसीलिए कहानी लिखने के बाद तुम वही नहीं रहते, जो कहानी लिखने से पहले थे।
जितना-जितना इस कथन के बारे में सोचता हूँ, उतना ही भीतर उजाला सा होता जाता है। जैसे कुछ अंदर की गहरी, बहुत गहरी सच्चाइयाँ सामने आ रही हों। कोई बड़ी बात कही जाती है, तो कैसे चीजों के नए-नए अर्थ खुलते हैं, यह मैंने सत्यार्थी जी के इस कथन के साथ-साथ बहुत बार भीतरी नदी की यात्राएँ करते हुए जाना।
ईशावास्योपनिषद् का एक प्रसिद्ध मंत्र है, जो मुझे किशोर वय से ही बहुत आकर्षित करता रहा है—
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम,
तत् त्वम् पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय द्रष्टये।
अर्थात—सत्य का मुख सोने के पात्र से ढका हुआ है। हे तेजस्वी सूर्य, मुझ सत्य और धर्म के साधक के लिए तू आवरण हटाकर, मुझे सत्य के दर्शन करा। 
आश्चर्य, सत्यार्थी जी की बात पर विचार करता हूँ तो ईशावास्योपनिषद् का यह मंत्र मुझे बार-बार याद आता है। पर यह तो किसी सत्यसाधक का आत्मकथन है। तो क्या कहानी का सत्य भी सृष्टि के महासत्य से अलग नहीं? और वह क्यों हो! आखिर कहानी भी तो एक सृष्टि ही है न। एक विलक्षण कथासृष्टि…! तो क्या उसका सत्य भी हिरण्मयेन पात्र से ढका रहता है, और कथागुरु देवेंद्र सत्यार्थी सरीखा कोई बड़ा शख्स, कोई बड़े कद का कथाकार अपने किसी बड़े अनुभव को शब्दों में बाँधता है, तो वह परत-दर-परत खुलने लगता है।
इससे पहलेपहल यह भी जाना कि कोई कहानी भी, अगर वह सच में कहानी है, तो अपने आप में एक खोज है। भाषा और अनुभव के स्तर पर एक बड़ी खोज, और वह सबसे पहले तो खुद लेखक को ही समृद्ध करती है। शायद इसीलिए कहा था मेरे गुरु और कथाशिल्पी सत्यार्थी जी ने कि कहानी लिखने के बाद आप ठीक-ठीक वही नहीं रहते, जो कहानी लिखने से पहले थे। आप भीतर-बाहर से बहुत कुछ बदल चुके होते हैं।
कुछ भी हो, सत्यार्थी जी के इस महा कथन ने मुझे बहुत सारी विलक्षण अंतर्यात्राओं से जोड़ दिया। और हर यात्रा मेरे लिए कुछ बड़ी और गहन उपलब्धियाँ लेकर आई।
इसी तरह सत्यार्थी जी ने मुझे कहानी के एक और विराट सत्य का दर्शन कराते हुए कहा, “अगर तुममें कहानी को देखने की दृष्टि है, तो तुम देखोगे मनु, तुम्हारे सब ओर कहानियाँ ही कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं। बस, उन्हें तुम्हारी कलम के स्पर्श की प्रतीक्षा है। तुम उन्हें प्यार से उठाओ और लिखना शुरू कर दो। वे देखते ही देखते तुम्हारे सामने हँसते-बोलते, चहचहाते या फिर उदास रंगों वाले जीवित संसार में बदल जाएँगी।
बेशक सत्यार्थी जी की यह बात भीतर उत्साह पैदा करती थी, और लगातार मुझमें एक आत्मान्वेषण चल पड़ा था।
हालाँकि सत्यार्थी जी से भी बहुत पहले बल्लभ जी ने मेरे कथा-संसार को बड़े प्रेम से सींचा था। बड़े ही पढ़ाकू और उस्ताद कहानीकार बल्लभ सिद्धार्थ, जिनकी कहानियों की उन दिनों धूम थी, मुझ पर छा गए थे।…असल में जिन दिनों मैं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था, बल्लभ जी अकसर हमारे विश्वविद्यालय में आया करते थे और हम रिसर्च स्कालर्स के छात्रावास, टैगोर हॉस्टल में ही वे ब्रजेश भाई के साथ रुकते थे। तब पहलेपहल उन्हें जाना और उनकी कहानियों के जरिए ही बहुत यात्राएँ भीतर-बाहर की हुईं। घंटों उनके रचनात्मक संग-साथ से अंदर बहुत कुछ प्रकाशित होता चला गया। 
कहानियाँ लिखता तो पहले से ही था, पर बल्लभ जी से मिलने के बाद खुद-ब-खुद बहुत कुछ बदलता चला गया। और फिर कुछ अरसा बाद तो अंदर से कहानियों का जैसे एक सोता ही फूट पड़ा। मेरा शोध पूरा होने के बाद भी, जब मैं कुरुक्षेत्र में किराए के मकान में रहता था, बल्लभ जी से निरंतर मुलाकातें होती रहीं, और मेरी कहानियों को वे खासी रुचि से देखते थे। अपनी विस्तृत राय भी बताते।
याद पड़ता है, बरसों बाद—जब मैं हिंदुस्तान टाइम्स में आ चुका था, फिर तेजी से कहानियाँ लिखने का सिलसिला चला। मेरा पहला कहानी-संग्रह अंकल को विश नहीं करोगेछपा, तो मैंने वह बल्लभ जी को भिजवाया। कुछ अरसे बाद संग्रह की शीर्षक कथा अंकल को विश नहीं करोगे पढ़कर उन्होंने जो पत्र लिखा था, उसे पढ़कर मैं रोमांचित हो उठा था। उन्होंने लिखा था, ‘अंकल को विश नहीं करोगेउन्हें इस बुरी तरह बेचैन करने वाली पाँच-सात कहानियों में से एक है और—“मनु, तुमने कम से कम एक बड़ीकहानी लिखी है!” 
बल्लभ जी की तरह ही मेरे बहुत-से कहानीकार मित्रों को यह कहानी इस कदर प्रिय है कि बरसों बाद मिलने पर आज भी कहीं न कहीं, कभी न कभी इसकी चर्चा छिड़ ही जाती है। मेरे साहित्यिक मित्रों में श्रवणकुमार और डा. माहेश्वर भी इस कहानी की बहुत प्यार से चर्चा करते थे। श्रवणकुमार ने मेरी कहानी एक सुबह का महाभारत का अंग्रेजी में तर्जुमा किया था। फिर उन्हीं के संपादन में यह अंग्रेजी के एक कथा-संचयन में भी आई।
मेरी लंबी कहानी टैक्सी ड्राइवर रामलाल दुआ की कहानी’, याद पड़ता है, डॉ. माहेश्वर और श्रवणकुमार जैसे प्यारे लेखक-मित्रों के बीच हिंदुस्तान टाइम्स की कैंटीन में पढ़ी गई, तो कहानी सुनते हुए डॉ. माहेश्वर के आँसू छलछला आए थे। कहानी बीच में रोकनी पड़ी थी, और एक अंतराल के बाद वह फिर शुरू हुई। इस लंबी कहानी के पूरे होते-होते रात घिर आई थी। मैंने डॉ. माहेश्वर और श्रवणकुमार दोनों मित्रों से क्षमा माँगते हुए कहा, “माफ करें, कहानी बहुत लंबी थी। इस वजह से आपको देर हो गई।
इस पर डॉ. माहेश्वर ने एक सीझी हुई हँसी के साथ कहा था, “दोस्त, यही तो तुम्हारी अदा है कि जिस चीज का भी वर्णन करते हो, तुम उसके इतने बारीक से बारीक डिटेल्स देते जाते हो कि सुनने वाला ताज्जुब में पड़ जाता है। कितने लेखक हैं, जिनमें अपने पात्रों के भीतर इतनी गहराई में उतरने का धीरज है, तो तुम अपनी कहानी के लंबे होने से क्यों परेशान हो? प्रकाश मनु ऐसी कहानियाँ नहीं लिखेगा तो कौन लिखेगा?”
इसी तरह अरुंधती उदास है’, ‘सुकरात मेरे शहर में’, ‘अपराजिता की सच्ची कहानी’, ‘कुनु’, ‘प्रतिनायक’, ‘जिंदगीनामा एक जीनियस का’—ये सभी अलग-अलग मूड्स की कहानियाँ हैं। कहीं न कहीं मेरी आत्मकथा के पन्ने इनमें फड़फड़ा रहे हैं और इन पर अब भी इतनी ऊष्माभरी और अलग-अलग किस्म की प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं, तो पता लगता है, एक लंबे अरसे तक भूमिगतरही, अंदर ही अंदर बहती मेरी कथा-यात्रा अकारथ तो नहीं गई। यों यह बात अपनी जगह सही है कि यह जो दिल्ली है, कथा सर्कसऔर पापा के जाने के बाद उपन्यासों की जबरदस्त चर्चा के कारण मेरे बहुत-से निकटस्थ मित्रों-लेखकों का ध्यान इस ओर न जाता, तो यह कथा-यात्रा अभी तक भूमिगत ही रहती।
अलबत्ता इसे मैं अपनी खुशकिस्मती ही मानता हूँ कि जिंदगी की टूटन, तल्खी और हादसों के बीच अलग-अलग शक्लों में सामने आई मेरी इन कहानियों पर समय-समय पर पाठकों की बड़ी आत्मीय और भावुक कर देने वाली प्रतिक्रियाएँ मिलती रहीं। बहुत-से पाठकों का कहना था, “आपकी कहानियों का अनौपचारिक अंदाज हमें पसंद है। आप अपने साथ बहा ले जाते हैं और एक बार पढ़ने के बाद आपकी कहानियाँ हमेशा के लिए हमारे साथ हो लेती हैं।
ऐसे ही एक सुबह का महाभारत, कुनु, नंदू भैया की कहानी, एक बूढ़े आदमी के खिलौने पढ़कर लिखे गए पत्रों में उस भावनात्मक संवाद के अक्स मिले, जिसमें आत्म और पर के बीच के फासले गायब हो जाते हैं। और कुछ अरसा पहले साहित्य अमृत में छपीजोशी सर कहानी पढ़कर जो भावुक कर देने वाले पत्र मिले, उनमें सभी का कहना था, मनु जी, आपने हमारे बहुत प्यारे अध्यापक की याद दिला दी…!” कुछ ने तो बड़ी संजीदगी से अपने उन प्रिय अध्यापक के बारे में लिखकर भी भेजा, जिसे जोशी सर कहानी पढ़कर उन्होंने बेतरह याद किया।
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मेरी बहुचर्चित लंबी कहानियों में मिसेज मजूमदार भी है, जिसमें एक बंगाली स्त्री की विचित्र किस्म की रुक्षता और निर्ममता है, जिससे पड़ोस का परिवार करीब-करीब आक्रांत हो उठता है। उसे मिसेज मजूमदार एक ऐसी मोटी खाल वाली स्त्री लगती है, जिसके भीतर करुणा और संवेदना का नामोनिशान नहीं है। तिस पर उसकी अजीब सी सनकें और कर्कशता उसे मोहल्ले में लगभग सभी की घृणा का पात्र बना देती है। पर कहानी के अंत में उसकी दीनता और असहायता की जो अचीन्ही छवियाँ उभरती हैं, उससे एक और ही मिसेज मजूमदार सामने आती है, जो सचमुच करुणा की पात्र हैं। 
कहानी का अंत आते-आते मिसेज मजूमदार के दुख, करुणा और असहायता का चित्रण करते हुए, खुद मेरी हालत बहुत खराब हो गई थी, और किस पीड़ा और वेदना से भरकर मैंने डबडबाई आँखों से उसे आखिरी छोर तक पहुँचाया था, इसकी याद आज फिर मुझे भावुक बना रही है। 
गंगा चौकीदारनी की कथा भी एक ऐसे स्त्री पात्र पर लिखी गई कहानी है, जिसको दर्जनों बार बहुत पास से देखा। हर बार कुछ न कुछ अलग और बदला हुआ उसका रूप। कुछ-कुछ अबूझ, रहस्यपूर्ण और मायावी भी। लेकिन कुछ ऐसा भी था, जो कभी नहीं बदला, और उसी के भीतर से उसकी तरह-तरह की शक्लें और अक्स प्रकट हो जाया करते थे। हर बार कुछ-कुछ विमूढ़ और हतप्रभ करते हुए। पर उसकी कथा में एक ऐसी अबूझ करुणा का बारीक सा धागा है, जो निरंतर चलता जाता है, और उसके साथ ही नए-नए पड़ावों से गुजरती गंगा चौकीदारनी की कथा नई-नई भंगिमाओं में आगे बढ़ती जाती है और एक अंतहीन अंत तक पहुँचती है। 
यों उस स्त्री की जिंदगी में बहुत पड़ाव आए, अच्छे-बुरे सब तरह के। पर हर हाल में उसकी दीनता में छिपी अदीनता प्रकट हुए हुए बिना न रहती, और मेरी यह लंबी कहानी कमोबेश उसी से बावस्ता है। और उसी ने मन में यह कहानी लिखने की तड़प पैदा की।
तुम कहाँ हो नवीन भाई, प्रतिनायकऔर अंधी गुफा का मसीहा कहानियाँ साहित्यिक दुनिया के भीतरी अँधेरों की कहानियाँ हैं, और अपने कुछ अलग और विशिष्ट ढंग से उन शक्लों को उजागर करती हैं, जो शायद बहुतों के लिए अनजानी और विस्मयजनक होंगी। थोड़ी चौंकाने वाली भी। स्वयं मेरे लिए इन कहानियों को लिखना बेहद तकलीफ भरी, काली अँधेरी सुरंग से गुजरने जैसा मर्मांतक अनुभव था। जो दुनियादारी में कामयाब हैं, वे कैसे साहित्य और कलाओं की दुनिया में भी झटपट सफलताओं के शिखर पर पहुँचते हैं, और जीवन भर खुद से और हालात से जूझने वाले लेखक के हिस्से यहाँ भी उपेक्षा, असफलता और नाकामयाबी ही आती है। यह चीज एक मनुष्य और कहानीकार के रूप में बार-बार मुझे विदग्ध करती है। तब भीतर से जो एक अज्ञात कराह और हाहाकार सा फूटता है, उसे शब्दों का जामा पहनाना निस्संदेह बहुत दारुण पीड़ा भरे अनुभवों को फिर-फिर जीना था। 
जाहिर है, यह तकलीफ बहुत तोड़ने वाली थी, और इन कहानियों को बहुत अंदर तक टूट-फूटकर ही लिखा गया। लिहाजा इन कहानियों को पढ़ना आज भी मुझे भीतर-बाहर से थरथरा देता है।
तुम याद आओगे लीलाराम मेरी आत्मकथात्मक कहानी है, जिसमें गर्दिश के दिनों की ऐसी तकलीफें हैं, जिन्हें कभी किसी से कहा या बाँटा नहीं जा सका। मेरे समय और जीवन का बहुत कुछ जो अभी तक अनकहा है, वह न जाने कैसे इस कहानी में खुद-ब-खुद ढलता चला गया। और यह ऐसी कहानी है, जिसके बारे में मैं कह सकता हूँ, कि इसमें आपको मेरी आत्मकथा के बहुत करुण पन्ने फड़फड़ाते मिलेंगे। मेरी आत्मकथा का यह भाग अभी सामने आया नहीं है, पर तुम याद आओगे लीलाराम में कुरुक्षेत्र के दिनों के दारुण कष्टों की तसवीर आप शायद बहुत विश्वसनीय रूप से देख पाएँगे। 
तुम याद आओगे लीलाराम कहानी ही है, आत्मकथा नहीं। पर बेशक वह मेरी आत्मकथा से बहुत सटकर निकलती कहानी है। मेरे जीवन का यह वह दौर था, जब बहुत रोना आता था, और आप रो भी नहीं पाते थे। अंदर-अंदर रुदन दबाकर जीना और इस हालत में भी मजबूती से कलम पकड़े रहना, यह उस दौर की एक ऐसी खब्त है, जिसे मैं ताजिंदगी नहीं भूल सकता। उन दिनों इस हालत में भी जो कुछ लिखा गया, वह एक जलती भट्ठी के बीच बैठकर लिखने से कम न था।
अपने उस गर्दिशों भरे दौर को याद करता हूँ तो मानसिंह की काफी याद आती है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध के दौरान हिंदी विभाग के पीयन भाई मानसिंह का प्यार, अपनत्व और दिलासे भरा साथ हमें निरंतर मिला। हमें, यानी मुझे और सुनीता को। रात-दिन काम और काम के बीच मानसिंह ने कड़क चाय पिलाकर हमें जीवंत रखा था। इससे भी अधिक उसके किस्से और कहानियाँ की अविरल  वाग्धारा ने, जिनमें जीवन बोलता था। कहने को मानसिंह पीयन ही था। ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं। पर उसकी चेतना मुझे बहुतेरे कथित भद्र जनों और दिन-रात किताबें घोकने वालों पढ़ाकुओं से कहीं अधिक उजली नजर आई। 
ऐसे मानसिंह की एक उजली सी छवि मेरी कहानी तुम याद आओगे लीलाराम में कहीं उतर आई है। कहानी में आते-आते बहुत कुछ बदल गया है। पर वह बुनियादी तौर से मानसिंह के चरित्र का विकास ही है, और कहानी में मानसिंह को पहचानना मुश्किल नहीं है।
हिंदी के जाने-माने लेखक और प्रोफेसर शशिभूषण सिंहल भी उन दिनों कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में ही थी। कोई तीन बरस पहले साहित्य अमृत में यह कहानी छपी तो उनका फोन आया। कहानी की देर तक प्रशंसा करने के बाद उन्होंने कहा, मानसिंह को हमने भी देखा तो था। पर उसका चरित्र इतना बड़ा है, यह तो मनु जी, पहली बार आपकी कहानी पढ़कर ही पता चला। 
अब मैं उनसे क्या कहता, और कैसे समझाता कि अगर वे मेरी जगह खड़े होकर देखते, तभी समझ सकते थे कि मानसिंह क्या था। उनकी नजर में वह एक पीयन था, और मेरी नजरों में सोने के दिल वाला एक खरा इनसान। देखने के अलग-अलग फ्रेम ऑफ रेफरेंस ने सब कुछ बदल दिया।
आज मानसिंह नहीं है, पर उसके लिए मन में जो गहरी कृतज्ञता का भाव है, उसे शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ, मैं नहीं जानता। आज वह जिंदादिल शख्स नहीं है, पर उसकी स्मृति को तो मैं प्रणाम कर ही सकता हूँ। उसकी निकटता में मैंने जीवन के जो गहरे पाठ पढ़े, उन्हें आज भी भूला नहीं हूँ। और शायद कभी भूलूँगा भी नहीं।
आप कहाँ हैं जित्ते सर में मेरे मलोट के दिनों के अनुभव हैं, और जो मुझे थोड़ा निकट से जानते हैं, वे जित्ते सर की चिंताओं और कशमकश में कहीं न कहीं खुद मेरी व्यथा और बेचैनी ढूँढ़ ही लेंगे। कहानी का करुण अंत एक लेखक की उस त्रासदी को सामने रखता है, जिसमें एक ईमानदार, धुनी और जेनुइन लेखक अंत में एकदम अकेला होता जाता है। पूरी दुनिया में अकेला। और बेतरह प्रेम करने वाले कुछ निकटस्थ जनों और अंतेवासी लोगों के सिवा कोई नहीं जान पाता कि वह कैसी परिस्थितियों में निरंतर टूटता चला गया। हालाँकि उसकी खुद्दारी, जिद और स्वाभिमान तब भी कम नहीं होता। उसे टूट-टूटकर मरना पसंद है, पर बहुत से दुनियादार लेखकों की तरह दूसरों की शर्त पर जीना और सफल होना नहीं।  
एक और मोचीराम मेरी लंबी कहानियों में शायद सबसे अलग है, जिसमें मोचीराम का चरित्र खासा दिलचस्प भी है, जिंदगी और जिंदादिली से लबरेज भी। इस कहानी के बारे में सिर्फ इतना कहना है कि जिस मोचीराम की यह कहानी है, उसकी भीतरी-बाहरी शक्लें मैंने बहुत करीब से देखी हैं। वह सिर्फ एक जूते ठीक करने वाला इनसान नहीं था, सच में एक कलाकार था, अभिनेता भी। इस कहानी में वह थोड़ा-थोड़ा उभरा है। 
यों एक और मोचीराम सिर्फ लंबी कहानी ही नहीं है, बल्कि उसमें एक सुर है, भीमसेन जोशी जैसा शास्त्रीय संगीत का एक अलग सा और गहरा-गहरा सा सुर, जिसके आरोह-अवरोह और आलोपों में कहीं न कहीं मेरी अपनी जिंदगी और परिवेश की कशमकश भी जुड़ गई है। लिहाजा इस कहानी में भी स्वभावतः मेरी आत्मकथा के पन्ने बिखरे हुए नजर आ सकते हैं।
अंत में इधर लिखी गई अपनी ताजा कहानी भटकती जिंदगी का नाटक की चर्चा करने का मन है। मेरे बहुत प्रिय कवि विष्णु खरे जब हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बने, तो उन्होंने इंद्रप्रस्थ भारती का कहानी विशेषांक निकालने की योजना बनाई। इस विशेषांक के लिए उन्होंने आग्रहपूर्वक कहानी माँगी तो मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास अधलिखी कुछ कहानियाँ हैं। उनमें से एक कहानी मैं जल्दी ही पूरी करके भेजता हूँ। 
विष्णु जी का आग्रह, प्रकाश जी, कहानी आज ही चाहिए।
उनके आग्रह की अवहेलना भला मैं कैसे कर सकता था? लिहाजा सुबह से लेकर रात कोई बारह बजे तक इस कहानी से जूझता रहा। तब कहीं यह पूरी हुई। रात में ही मैंने विष्णु जी को कहानी भेजी। और आश्चर्य, रात में ही उन्होने इसे पढ़ भी लिया। और सुबह पाँच बजे मैं उठा तो देखा, मोबाइल में उनका संदेश था। कहानी उन्हें बेहद पसंद आई थी और बड़ी प्रमुखता से उन्होंने इसे इंद्रप्रस्थ भारती में छापा। 
तब से दर्जनों फोन इस इस पर प्रशंसा के आ चुके हैं और इनमें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से निकले तीन नाट्यकर्मी भी हैं। थोड़े-थोड़े अंतराल बाद उनके फोन आए और तीनों ने ही इस कहानी के नाट्य रूपांतरण की अनुमति देने की गुजारिश की। वे इसे रंगमंच पर लाने के लिए उत्सुक थे। 
मेरे जीवन का यह पहला और विलक्षण अनुभव था कि किसी एक कहानी की नाट्य संभावनाएँ इतने संभावनाशील रंगकर्मियों को लगभग एक साथ ही नजर आई। मेरी कई कहानियों में खासा नाटकीय तत्व है, यह तो मैं जानता था, पर वे रंगकर्मियों को भी इस कदर मोह लेंगी, मैंने सोचा न था।
[7]
मैं नहीं जानता कि यह अच्छा और वरेण्य है या नहीं, पर इधर मेरी कहानियों में आत्मकथा के हरफ ज्यादा से ज्यादा उतरते गए हैं। इसकी वजह क्या है, यह खुद मेरे लिए एक पहली से कम नहीं है। हालाँकि देश भर में फैले मेरे पाठकों ने इसे पसंद किया, और इन कहानियों के साथ एक गहरा नाता और जुड़ाव महसूस किया, यह स्वयं मेरे लिए कम सुकून और तसल्ली की बात नहीं है। पाठकों की अपरंपार स्नेहमय चिट्ठियाँ और फोन-वार्ताएँ मेरे लिए कितने बड़े सुख का खजाना हैं, मैं बता नहीं सकता। कई बार लगता है, मेरे पास यह ऐसी अकूत दौलत है, जिसका मुकाबला किसी से नहीं हो सकता। बड़े से बड़े अमीरों की अमीरी और राजे-महाराजाओं के सिंहासन भी इसके आगे पोच हैं।
और तभी लगता है, मैं एक फक्कड़ लेखक सही, पर ऐसा फक्कड़ बादशाह हूँ, जिससे बड़ी बादशाहत इस दुनिया में कोई और नहीं।
देश में दूर-दूर तक फैले असंख्य पाठकों का यह अकूत स्नेह-सम्मान मैंने अपने रचे साहित्य के जरिए पाया, खासकर कहानियों और उपन्यासों के जरिए, यह उपलब्धि कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। अपने बड़े से बड़े दुख और मुश्किलें तब मुझे हलके जान पड़ते हैं। लगता है, इन दुखों का हार पहनकर जीना भी कम गौरव की बात नहीं। आखिर यही तो एक सच्चे लेखक की विभूति हैं। एक शाश्वत, कालजयी और अपार्थिव विभूति…!! और मेरे साहित्य का तो उत्स ही यही है।
[8]
क्या मैं बताऊँ कि ऐसे क्षण ही मेरे जीवन के सबसे बेशकीमती, यादगार और भावुक कर देने वाले पल-छिन हैं, जब मन में यह अहसास उपजता है कि शायद थोड़ा सा तो मैं अपनी इस यात्रा में सफल हुआ। और तब अनायास ही, अपने अंतर्मन में बैठे देवता के लिए हाथ जुड़ जाते हैं। ये मेरे जीवन के ऐसे आनंद के क्षण हैं, जब आँखें भीगती हैं और आप निःशब्द रह जाते हैं। इसलिए कि आखिर तो कोई भी कहानी, कहानी से पहले जिंदगी का एक टुकड़ा है…एक धड़कता हुआ टुकड़ा, जो अपने आप में मुकम्मल भी है।
सच पूछिए तो जीवन के बहुत से कोमल-कठिन अनुभवों और यातनाओं की गवाह बनी ये कहानियाँ मुझे जीने के मानी भी देती हैं। शायद इसीलिए उपन्यास, कविता, लेख, संस्मरण जैसी विधाओं में बहुत लिखने के बावजूद कहानियों से मेरा कुछ अलग रिश्ता है, जो कई बार संजीदा कर देता है। हो सकता है, इन कहानियों में कहीं न कहीं मेरा कवि, उपन्यासकार और संस्मरणकार भी छिपा हो, जो विधाओं की शुद्धता का कायल न होकर उनकी ताजगी और जिंदादिली में रस लेता हो! 
अलबत्ता मेरी कोई पचास बरस लंबी कथा-यात्रा में स्वभावतः लिखी गई इन कहानियों में मेरी कुछ गहरे सुर और लय-ताल वाली लंबी कहानियाँ भी शामिल हैं, जिनमें कहीं न कहीं मैं अपनी आत्मा का संगीत पाता हूँ।…इनमें से एक-एक कहानी को लिखने में महीनों नहीं, कभी-कभी तो बरसों तक भटकना पड़ा। तब लगा कि हाँ, अब कुछ बना सा है।
एक गहरी अंतःपुकार के साथ लिखी गई लंबी कहानियों को, जिन्हें आजकल लघु उपन्यास कहने का चलन है, मैंने कहानी कहना ही पसंद किया। हालाँकि मेरी लंबी कहानियाँ सिर्फ आकार में ही बड़ी नहीं हैं, बल्कि इनमें कुछ ऐसी कसक और पीड़ा है जो मन में देर तक और दूर तक बहती है। दर्जनों बार इन्हें लिखना और काटना-छाँटना पड़ा, एक गहरी असंतुष्टि और व्याकुलता के साथ। ताकि इन कहानियों के अनुभव क्षणों में भीतर आत्मा की जो कुरलाहट थी, वह ठीक-ठीक उसी लय और अंदाज में शब्दों में उतर आए। इन्हें लिखने के बाद के तृप्ति-क्षणों में मुझे हमेशा लगा कि ये केवल लंबी कहानियाँ ही नहीं, कुछ अपेक्षाकृत गहरे सुर-ताल की कहानियाँ हैं, जो पढ़ते समय भीतर आत्मा को रोशन करती हैं और देर तक उनकी गूँज हमारा पीछा करती है। मैंने इन कहानियों के लेखक और पहले पाठक होने का सुख लिया है, और बता नहीं सकता कि हर बार इनके निकट आना मुझे कैसे अचीन्हे शिखरों की ओर ले जाता रहा है।
ये वे कहानियाँ हैं, जिनकी सतरों के बीच की खाली जगहों में मेरे जीवन की कही-अनकही वह मर्मकथा भी समाई है, जो शायद सीधे-सीधे कही ही नहीं जा सकती थी। 
[9]
आज ये सतरें लिखते समय मुझे बेहद याद आ रहे हैं अपने कथागुरु सत्यार्थी जी, जिन्होंने पहलेपहल मेरी कहानियों को सुनकर दीवानगी की हद तक उनकी प्रशंसा की थी। मेरे भीतर अपनी कहानियों को लेकर आत्मविश्वास जगाने का काम सबसे पहले सत्यार्थी जी ने ही किया था, और बिना कुछ कहे, मुझे किस्सागोई के उस तार से जोड़ दिया था, जिससे मेरे तीनों बहुचर्चित उपन्यास यह जो दिल्ली है, कथा-सर्कस और पापा के जाने के बाद तो सिरजे ही गए, एक के बाद एक कहानियों का अनंत सिलसिला भी चल निकला। 
सत्यार्थी जी उन्हें सुनते तो आनंदित होते, और मीठे शब्दों की ऐसी थपकियाँ देते, जिससे भीतर की सारी टूटन, व्यग्रता और थकान काफूर हो जाती, और मैं एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाता, जहाँ कहानियों की बारिश में भीगने का एक विरल और कुछ-कुछ अलौकिक सा अहसास मुझे हुआ।
अपने मित्र और वरिष्ठ कथाकारों डा. माहेश्वर, श्रवणकुमार और बल्लभ सिद्धार्थ, की भी इस समय बहद याद आ रही है, जिन्होंने मुझे और मेरे भीतर बैठे कथाकार को अपने अनन्य प्रेम से नहलाया। इनमें बल्लभ जी के विलक्षण उत्साह भरे फोन तो अभी कुछ अरसा पहले तक आते रहे। डा. माहेश्वर और श्रवणकुमार के बाद बल्लभ सिद्धार्थ भी अब नहीं रहे। पर मेरे भीतर तो वे अब भी उसी जीवंतता और जिंदादिली के साथ मौजूद हैं। खासकर हिंदुस्तान टाइम्स में डा. माहेश्वर और श्रवणकुमार के साथ हुई अनवरत मुलाकातें याद आती हैं, तो मन अंदर तक भीगता है। जब हम तीनों होते तो कहानियों, कहानियों और बस कहानियों की बारिश होती, और हमारे शब्दों की दीवानगी हवाओं पर भी तारी होने लगती। 
वे अजब कशिश भरे दिन थे, जब बहुत कहानियाँ लिखी गईं। और लिखूँ या न लिखूँ, हर वक्त कहानियों की एक दुनिया मेरे साथ चलती थी। मेरे अंदर-बाहर उसी का पसारा था, बल्कि हर पल वह मेरे साथ-साथ साँस लेती थी।
बहुत से जाने-अनजाने पाठकों ने फोन पर या चिट्ठियों के जरिए गहरी तन्मयता के साथ मेरी इन लंबी और कुछ अलग लय-सुर में लिखी गई कहानियों की बड़ी शिद्दत से चर्चा और तारीफ की। पाठकों के ऐसे दीवानगी भरे फोन अब भी आ जाते हैं, और मेरा वह दिन कुछ अलग सा हो जाता है। उनके शब्दों का आवेग मन को रोमांच से भर जाता है। इनमें से एक उम्रदराज पाठक, जो पिछले चालीस बरसों से बड़ी उत्कटता से कहानियों को जी रहे थे—ने मेरी एक लंबी कहानी तुम याद आओगे लीलाराम की चर्चा करते हुए, गुलेरी जी की उसने कहा था कहानी से उसकी तुलना की और उसे हिंदी की कुछ महानतम कहानियों में शुमार किया तो कुछ देर के लिए मैं अवाक सा रह गया। 
बरसों तक उनके फोन आते रहे, और हर बार वे कुछ नए अंदाज में, मगर उसी शिद्दत से मेरी कहानी तुम याद आओगे लीलाराम की चर्चा करते रहे। उनका कहना था कि मनु जी, आपकी कहानी तुम याद आओगे लीलाराम पढ़ने के बाद इधर पढ़ी हुई तमाम कहानियों मुझे बहुत फीकी और बेजान लगती हैं। बार-बार तुम याद आओगे लीलाराम उनके आगे आकर खड़ी हो जाती है। कोई महान कहानी तो ऐसी ही होती है। उससे मन को इतनी तृप्ति मिल जाती है कि बहुत अरसे तक फिर कुछ और पढ़ने का मन ही नहीं करता।” 
अपनी कहानियों के इन सरल और आवेगी पाठकों के प्रति आज भी मैं गहरी कृतज्ञता अनुभव करता हूँ। सच पूछिए तो आलोचकीय टीपों से कहीं अधिक पाठकों की सरल और निर्व्याज टिप्पणियों ने मुझे तृप्ति और रचनात्मक संतोष दिया। 
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प्रकाश मनु, 545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
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  1. बचपन जीवन का सबसे खूबसूरत, सुहावना और अविस्मरणीय समय होता है जिसे हम आजीवन भुला नहीं पाते,।मन बार बार बचपन की उन गलियों में लौटना चाहता है,अपने बिछुडे साथी खेल खिलौनों से एक बार फिर बतियाना चाहता है तभी तो सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहा था — *बार बार आती है मुझको,मधुर याद बचपन तेरी,गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी* ।आज दान प्रकाश मनु सर.ने अपने आत्म कथ्य के माध्यम से अपने बचपन को जितनी आत्मीयता, स्नेह और ललक के.साथ याद किया है,उसका एक एक शब्द भावुक बनाता है,,न जाने कितनी बार पलकें भींगी हैं।दादी नानी की कहानियों का जादू,परियों की तरह खुले आसमान की सैर करना,उडना ऊंचे और ऊंचे ,न जाने कल्पना लोक के कितने पडाव पार कर आता है उनका मन। बचपन में सुनी एक कहानी को वे याद करते हैं,जिसका पात्र *अधकू* है,शरीर से आधा अधूरा ,कृतकार्य,जिसकी तुलना वे स्वयं से करते हैं,जब वे भी दुबले पतले थे।अंधकूप अशक्त होने पर भी बडे बडे कार्य अपनी बुद्धि से कर लेता है और एक दिन राजा का मंत्री बन जाता है।आदरणीय प्रकाश मनु सर उसके चरित्र से अत्यंत प्रभावित हैं,जब वे कहते हैं– *इस कहानी में कुछ बात थी कि मैं उसे आज तक नहीं भूल पाया। क्यों भला? शायद इसलिए कि मुझे लगता था, मैं ही अधकू हूँ। औरों से बहुत अलग। इसलिए कि मुझमें शारीरिक ताकत ज्यादा नहीं थी। दुनियादारी में कच्चड़। खेलकूद में कच्चड़… बहुत सारी चीजों में फिसड्डी। एकदम फिसड्डी। पर फिर भी लगता, कुछ है मुझमें, कि मैं भी कुछ कर सकता हूँ। सारी दुनिया से कुछ अलग कर सकता हूँ*बचपन में बिताये और जिये गये ये पल उनकी प्रेरणा भी हैं।जब उनकी कहानी का कोई राजकुमार सारी कठिनाई को.पार कर सातवीं कोठरी तक पहुंचता है,उसे खोलते ही भयंकर आंधी तूफान और विपत्तियां आती हैं और वह सब पर विजय प्राप्त कर लेता है,यही कामना बचपन के कुक्कू और आज के हमारे बाबूजी ,डा प्रकाश मनु सर के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाती है कि हर अंधेरे के बाद उम्मीद का सूरज जरुर निकलता है ।अपने आत्म कथ्य में वे कहते हैं– *कई बार तो लगता है, अपने-पराए सब साथ छोड़ गए। अकेलापन, विवशता, लाचारी। कभी बुरी तरह पराजय और बेचारगी का अहसास भी। पर इन्हीं सब के बीच ही तो एक नवारुण प्रभात सूर्य की तरह जीवन का सत्य चमकता है, और जीवन में वह आनंद भी महसूस होता है, जो किसी कदर योगियों की समाधि से कम नहीं है, और दुनिया की बड़ी से बड़ी दौलत के आगे भी जो हेठा नहीं पड़ता। यह मनुष्य का मनुष्य होना है, एक आदमकद मनुष्य*।बहुत बहुत बधाई, अशेष शुभ कामनाए, मंगलकामनाए ,,सादर प्रणाम बाबूजी.पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • बेटी, आपकी इतनी अच्छी और इतने मन, इतनी तन्मयता से लिखी गई टिप्पणी कल ही पढ़ ली थी। पर कल किसी किसी काम में डूबा था। कुछ लिखना चाहता था। पर फिर लगा, आपकी इतनी विस्तृत और महत्वपूर्ण टिप्पणी है, थोड़ी फुर्सत से लिखना चाहिए।

      मैंने देखा है बिटिया, आप जिस रचना पर भी लिखती हैं, पूरी तरह उसकी भावना में बहते हुए इतने मर्मस्पशी शब्दों में अपनी बात कहती हैं, कि उसे पढ़कर खुद रचनाकार के भीतर भी विचार और संवेदन के कुछ नये क्षितिज खुलते हैं।

      आपने बेटी, न सिर्फ मेरे भीतर पालथी‌ लगाकर बैठे बचपन के अधकू को समझा है, बल्कि मेरे भीतर के उस सर्जनात्मक द्वंद्व को भी, जो मेरी ही तरह हर लेखक को कभी-कभी एकदम अकेला कर देता है। अपनी रचना के भीतरी तहखाने में उसे कई-कई दिनों तक लाचार और असहाय सा भटकना पड़ता है, ताकि वह उसे ठीक-ठीक कह सके, जो उसके भीतर किसी क्षण बिजली की तरह कौंध गया था।

      आपने दिग्गज कथाकार शैलेश मटियानी के रचनात्मक द्वंद्व और तकलीफ को भी बहुत अच्छे से समझा। वे अकसर हिंदुस्तान टाइम्स में मिलने आते थे, और हर बार उनके दुख, तकलीफ और वेदना का एक नया अध्याय खुल पड़ता था, जो मुझे मर्माहत कर जाता। मैंने उनकी तकलीफ को बहुत नजदीक से देखा, और जाना कि एक सच्चा, खुद्दार लेखक होता कैसा है!

      अलबत्ता, आपने इतने सुंदर और भावपूर्ण शब्दों में अपनी बात कही कि उसके साथ मन में और भी बहुत कुछ उमगता चला गया। हालांकि शब्द उसके लिए नाकाफी हैं।

      बहुत-बहुत आभार बिटिया, इतनी महत्वपूर्ण टिप्पणी के लिए, जिसने मुझे भी अपने साथ-साथ बहा दिया।

      मेरा स्नेहाशीष,
      प्रकाश मनु

  2. आदरणीय बाबूजी

    आपका आत्मकथ्य पढ़ा ।बड़ा ही जीवन्त लगा।
    कहानियों की ऐसी तीव्र ललक बचपन में बच्चों को रहा करती थी। हमें भी बिना कहानी सुने नींद नहीं आती थी। जिज्ञासा और अंत पहले ही जान लेने की उत्सुकता भी रहती और दुखद अंत का दुख और सुखद अंत की खुशी महसूस होती।
    जहाँ तक हमें याद आ रहा है पहले सात कमरे और सात दरवाजे, सात समुंदर पार, साथ पहाड़ों को पार करके, कहानियों में प्रायः रहते थे। सारी संवेदनाओं के साथ अन्य लोक में विचरण आप जैसा अतिसंवेदन शील पाठक ही कर सकता है।
    अधकू की कहानी ने सच में द्रवित किया।
    आपका पूर्वार्द्ध पढ़कर अपना हीआत्कथ्य लगा। अधकू की कहानी दिलचस्प रही और प्रेरणादायक भी। संवेदनाओं से प्रभावित होकर मछली की तरह तड़पने को हम महसूस कर सकते हैं।
    शैलेश मटियानी जी के बारे में आपसे व सुनीता जी को पढ़कर जाना।उनकी तकलीफों ने द्रवित किया।उनका दीवार पर सिर मार-मार कर किलपना मर्माहत कर गया। जब इंसान बहुत बेबस हो जाता है और अपना क्रोध और बेबसी उतारने के लिये उसके पास और कोई जरिया नहीं होता तो वह अपने आप को तकलीफ देता है।
    पढ़ने की दीवानगी तो महसूस हुई क्योंकि इस दीवानगी से हम भी गुजरे हैं। प्रेमचंद और शरद्साहित्य पूरा हमने भी पढ़ा। आपको पढ़ते हुए अपना वक्त याद आया जब एग्जाम के दिनों में भी दो उपन्यास प्रतिदिन पढ़ा करते थे।

    देवेंद्र सत्यार्थी जी की यह बात काबिले गौर लगी कि *”जब तुम कहानी लिखते हो तब सिर्फ तुम ही कहानी नहीं लिखते, कहानी भी तुमको लिखती है। कहानी लिखने के बाद तुम सिर्फ वही नहीं रहते जो कहानी लिखने से पहले थे।”*
    आपने जो लिखा है कि “कई पाठकों ने कहानी को आपकी ही कहानी समझ लिया था” तो यह बहुत स्वाभाविक है। पढ़ते हुए हमारे मन में भी कई बार यह ख्याल आता है कि यह घटना लेखक के साथ तो नहीं घटी और हम चिंतित हो जाते हैं।पूछ भी लेते हैं
    कई बार।
    आपका संग्रह पुनः हमारे पास आ गया है नागपुर से अब पढ़ेंगे उसे।
    आपका लेखन हमेशा ही बहुत संवेदनशील रहता है। पाठक उसमें डूब सा जाता है।
    लेखन के प्रति यह क्रियाशीलता बनी रहे और हम लोग आपको पढ़ते रहें।

  3. बिटिया, आपने यह पूरा आत्मकथ्य इतने मन से पढ़ा, और बचपन में मेरे साथ चलते हुए बड़े ही विचित्र किस्म के अधकू और सात कोठरियों वाले महल में भटककर जा पहुंचे जिद्दी राजकुमार से भी मिल लीं, जानकर कुछ रोमांचित सा हं। असल में बचपन ऐसी चीज है, जिसे आप पूरा नहीं, आधा ही समझ पाते हैं, और उसे पूरा समझने के लिए आपको बचपन की कहानियों में उतरना पड़ता है।

    आश्चर्य, ज्यादातर बड़े लोग, थोड़ा बड़े होते ही बचपन की कहानियों से दूर हो जाते हैं, और उन्हें वे बेवकूफाना लगने लगती हैं। पर मुझे उन्हीं में अपने जीवन का अर्थ मिला। आज भी मिलता है। और मुझे खुशी है कि मैं आज भी बड़ा नहीं हुआ। बड़ा होना चाहा ही नहीं, क्योंकि बड़ा होने का अर्थ अपने बचपन को मार लेना होता है, और मुझे यह क्रूरता लगती है। बचपन को मार लेने का मतलब तो अपने आप को मार लेना है। अपने भीतर के भोलेपन, संवेदना और इन्सानियत को मार लेना है।

    बहुत से लोग ऐसा करते हैं और इसी को समझदारी कहते हैं। पर मुझे खुशी है कि मैंने अपने भीतर के बचपन को बचाया हुआ है, और आज भी सच पूछिए तो मैं पचहत्तर बरस का अबोध बच्चा ही हूं, जिसे बच्चों की तरह हंसना, रोना आता है, और अपने बुद्धूपने पर कतई शर्म नहीं आती है।‌ बल्कि इसी के जरिए मैं बीच-बीच में खुद को टटोलता रहता हूं, कि मैं अंदर से जिंदा तो हूं! कहीं मर तो नहीं गया? क्योंकि मैंने अपनी लंबी जिंदगी में बहुत से ऐसे लोगों को देखा है, जो अंदर से मर चुके होते हैं, पर खुद को जिंदा मानते हैं। बहुत से कथित विद्वान ऐसे ही होते हैं, जिन पर मुझे अक्सर हंसी आती है। भले ही मैं उनके सामने नहीं, अपने एकांत में हंसता हूं।

    अलबत्ता बिटिया, आपने इतने मन से पढ़ा और इतने मन से लिखा भी, कि क्या कहूं। अवाक हूं। आपमें बहुत सरलता और सच्ची संवेदना है, बेटी। इसलिए आप जो भी लिखती हैं, बहुत डूबकर लिखती हैं। आपका लिखा देर तक मन में गूंजता रहता है। इसे प्रभु का वरदान ही समझना चाहिए।

    मेरे बहुत-बहुत आशीर्वाद बेटी,
    प्रकाश मनु

  4. पुरवाई के इस बार के अंक में प्रकाश मनु जी का आत्मकथ्य पढ़ा और जीवन के विभिन्न सोपान दर सोपान पुनः गुजरना बहुत ही सुख कर लगा। आदरणीय बारह मई को अमृत वर्ष के पार जाकर अमृत कालखंड में अग्रसर हो जाएंगे।
    भारतीय संस्कृति के अनुसार संन्यास भाव में!इस दुर्लभ उपलब्धि हेतु ,आपको आदरणीय हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

    अब बात आत्मकथ्य की जो आदरणीय अग्रज तेजेंद्र शर्मा जी और पुरवाई पत्रिका परिवार के कारण पढ़ने गुनने और पुनः आख्यीत करने को मिला है। देश की विभाजन भी विभीषिका से ज़िंदा , सबूता यानी पूरा का पूरा,स्वस्थ और संघर्ष करता हुआ,विरल परिवारों में से एक परिवार जो दिल्ली से होता हुआ उत्तर प्रदेश में जा बसा। इस परिवार के सबसे छोटे अंकुर का आत्मकथ्य है।
    अतः यह भावों की अतिरेकता और उनके इंद्रधनुषी रंगों से लबरेज़ तो है ही और ऐसा होना स्वाभाविक भी है।ऐसी त्रासदी हमें होम हुई विशेष रूप से बच्चियां,लड़कियां, युवतियां,महिलाएं,अधेड़ और बुजुर्ग प्रवयाओं से मिलने और उन्हें अपनी सीमित और मोटी बुद्धि से समझने का प्रयास जीवन पर्यंत रहा है।मेरे स्कूल के टीचर श्री राधा कृष्ण मक्कड़ जी अब नब्बे वर्ष से ऊपर की आयु के हैं।उनके द्वारा ,उनके परिवार जनों और ऐसे ही लोगों की पीड़ाओं, कुंठाओं , संघर्षों और उस समय के अलगाव पूर्ण सामाजिक व्यवहार का पूरा या समग्र परिदृश्य ,,,इस आत्मकथ्य को पढ़ने के बाद चलचित्र सा घूम कर घुमा भी गया।
    इस त्रासदी में पुरुषों के दुखों,संघर्षों और

  5. पुरवाई के इस बार के अंक में प्रकाश मनु जी का आत्मकथ्य पढ़ा और जीवन के विभिन्न सोपान दर सोपान पुनः गुजरना बहुत ही सुख कर लगा। आदरणीय बारह मई को अमृत वर्ष के पार जाकर अमृत कालखंड में अग्रसर हो जाएंगे।
    भारतीय संस्कृति के अनुसार संन्यास भाव में!इस दुर्लभ उपलब्धि हेतु ,आपको आदरणीय हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

    अब बात आत्मकथ्य की जो आदरणीय अग्रज तेजेंद्र शर्मा जी और पुरवाई पत्रिका परिवार के कारण पढ़ने गुनने और पुनः आख्यीत करने को मिला है। देश की विभाजन भी विभीषिका से ज़िंदा , सबूता यानी पूरा का पूरा,स्वस्थ और संघर्ष करता हुआ,विरल परिवारों में से एक परिवार जो दिल्ली से होता हुआ उत्तर प्रदेश में जा बसा। इस परिवार के सबसे छोटे अंकुर का आत्मकथ्य है।
    अतः यह भावों की अतिरेकता और उनके इंद्रधनुषी रंगों से लबरेज़ तो है ही और ऐसा होना स्वाभाविक भी है।ऐसी त्रासदी हमें होम हुई विशेष रूप से बच्चियां,लड़कियां, युवतियां,महिलाएं,अधेड़ और बुजुर्ग प्रवयाओं से मिलने और उन्हें अपनी सीमित और मोटी बुद्धि से समझने का प्रयास जीवन पर्यंत रहा है।मेरे स्कूल के टीचर श्री राधा कृष्ण मक्कड़ जी अब नब्बे वर्ष से ऊपर की आयु के हैं।उनके द्वारा ,उनके परिवार जनों और ऐसे ही लोगों की पीड़ाओं, कुंठाओं , संघर्षों और उस समय के अलगाव पूर्ण सामाजिक व्यवहार का पूरा या समग्र परिदृश्य ,,,इस आत्मकथ्य को पढ़ने के बाद चलचित्र सा घूम कर घुमा भी गया।
    इस त्रासदी में पुरुषों के दुखों,संघर्षों और
    रिफ्यूजी है,,,ला ?!जैसी सदृश उपमाओं से सराबोर रहा।
    खैर अक्कू और कक्कू का बचपन स्नेहिल रहा ,यह भी बड़े सुखद आश्चर्य की बात है। क्योंकि यह भी एक क्रूर,कड़वा और माफ कीजियेगा कि नंगा सच है कि वे आधी आबादी की बदकिस्मत प्रतिनिधि हर स्तर पर शोषित और उत्पीड़ित रही,परिणामतः वे अपने स्वाभाविक व्यवहार में आ ही नहीं पाई।कुछ को स्पष्ट रूप से देखा गया लेकिन उस से कहीं अधिक मानसिक द्वंदों,बीमारियों से ताउम्र ग्रसित रही और अपनी पीड़ाओं,दर्द और ,,,समेटे दुनिया से विदा हो गईं।
    लड़कपन या कैशोर्य,और युवा के सपने और अपनों के सरोकार भी खूब भाए हैं।विज्ञान से साहित्य और अख़बार का संग,एक मुकाम जिसमें सुप्रसिद्ध साहित्यकार सीनियर मटियानी जी की दारुण और करुण गाथा का सर्ग, ब्रह्मर्षि देवेंद्र सत्यार्थी ,कुछ सानिध्य की खुशबू मेरे पास भी रही ,ठीक सौर मंडल के यूरेनस की मानिंद,डॉक्टर माहेश्वरी जी का सानिध्य,विद्यालंकार जी का समीप्य,इस लेख में नहीं,इस पूरी जीवन यात्रा को बखूबी संवेदनशीलता और दृढ़ता से उकेरते हैं।
    एक आत्मकथ्य एक लघु उपन्यास का रूप ले सकता है।
    पुनः आदरणीय को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

  6. प्रिय भाई सूर्यकांत जी, आपने बहुत मन से मेरा *आत्मकथ्य* पढ़ा, और उतनी ही आत्मीयता से उस पर लिखा। आभारी हूं। सच ही पूरे परिवार के लिए वह दौर एक अग्निपरीक्षा से गुजरने जैसा था। हालांकि जैसे सामाजिक अलगाव की चर्चा आपने अपने अध्यापक राधाकृष्ण मक्कड़ जी के संबंध में की, वैसा तो मुझे या परिवार के लोगों को नहीं झेलना पड़ा।

    शायद *दारा शिकोह की नगरी* होने के कारण हमारे शहर शिकोहाबाद में काफी आपसी सौहार्द का माहौल था, और हमारे मित्रों और आत्मीय जनों में सभी लोग थे। यहां तक कि मुस्लिम भी, पर आपस में कोई फर्क न था। कोई भेदभाव या पराएपन की दूरियां नहीं। शाहजहां के जिस उदार हृदय बेटे *दारा शिकोह* ने इसे बसाया था, वह साझी भारतीय संस्कृति का बहुत बड़ा अलंबरदार था। शायद उसी का कुछ असर रहा हो, कि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिमों के होने पर भी आज तक वहां कभी सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ। सांप्रदायिक दंगा तो कभी हुआ ही नहीं। हम लोगों को भी कोई अजनबीपन झेलना पड़ा हो, ऐसा बिल्कुल याद नहीं आता।

    लेकिन पूरा परिवार पाकिस्तान से लुट-पिटकर आया था, और अचानक आर्थिक विपन्नता की त्रासदी ने उसे बुरी तरह लपेट में ले लिया था, यह तो सच है ही।‌ ऐसे में पूरे परिवार ने किस तरह एक होकर संघर्ष किया, और कैसे हालात से हमें गुजरना पड़ा, ये कथाएं मैंने घर के बड़े लोगों से सुनी हैं। और सुनते हुए आंखें भीगती थीं। अब भी उन दिनों को याद करना आसान नहीं है।

    बहरहाल, ऐसे परिवार में जन्म लेकर, जिसमें हम नौ भाई-बहन थे, कैसे मुझे और सिर्फ मुझे ही कहानी-कविता का दंश चुभा, जिसने मुझे कुछ दीवाना सा बना दिया, और मैं कुछ का कुछ होता चला गया, यह बता पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि थोड़ी सी कोशिश इस आत्मकथ्य में मैंने की है। दिल्ली आने पर लोक यायावर देवेंद्र सत्यार्थी जी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी और रामदरश जी जैसे बड़े साहित्यकारों के चरणों में बैठने का सौभाग्य मुझे मिला, और यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी दौलत था।

    मुझे खुशी है, भाई सूर्यकांत जी, आपने इतने धैर्यपूर्वक मेरी कहानी, जिसमें मेरे लेखक होने की कहानी भी शामिल थी, का अक्षर-अक्षर पढ़ा, और उतनी ही संवेदना के साथ लिखा भी। मैं सचमुच कृतज्ञ हूं।

    मेरा बहुत-बहुत स्नेह और साधुवाद,
    प्रकाश मनु

  7. यदा-कदा किसी लेखक की आत्मकथा पढ़ने का अवसर प्राप्त होता है तो सामान्यतः महसूस होता है कि लेखक के जीवन में घटित बातें उसके स्वयं के लिए अवश्य ही रोचक रही होंगी…परन्तु क्या वे पाठक का भी हृदय स्पर्श कर रहीं हैं? लेकिन यह तथ्य आदरणीय मनु जी पर सटीक नहीं बैठता। कारण? कारण यही कि इनकी आत्मकथा पढ़ते हुए उसके प्रवाह में पाठक भी यूँ बहता चला जाता है जैसे कोई चलचित्र देख रहा हो। आजकल मैं समय मिलने पर मनु जी के संस्मरण ‘यादें घर-आँगन की’ पढ़ रही हूँ। पाठकगण से निवेदन है कि आप इन महान साहित्यकार मनु जी की रचनाएँ अवश्य पढ़िएगा।

  8. आ. एवं स्नेही मनु जी
    सादर ,स्नेहिल प्रणाम आपको

    आपसे संवाद होने से पूर्व ही मैं आ सत्यार्थी जी की बेटियों के माध्यम से आपसे परिचित थी ।
    यह घटना संभवत : आठ वर्ष पूर्व की है जब मेरा और उनका परिचय एक पार्क में हुआ था जो उनके निवास के सामने ही है ।
    अपने पिता की चर्चा करते हुए पूरे समय उनके मुख से आपका नाम भी सुनती रही । मन था कि आपसे संवाद करूँ लेकिन शायद संकोच अथवा कुछ लापरवाही के कारण भी नहीं कर पाई ।
    मन से धन्यवाद प्रेषित करती हूँ तेजेंद्र जी का जिनकी पुरवाई से जुड़कर मैं आपका नाम बार-बार देखती रही । वैसे अलका ने मुझे आपका नं दिया था किन्तु वह कहीं खो चुकी थी। मैंने पुरवाई ग्रुप से आपका नं उठाकर आपको फ़ोन किया और आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता का अनुभव हुआ जब देखा कि आपने मुझे पहचान लिया है ।
    ज़िंदगी की इस कगार पर पहुंचकर अपनी मानसिकता के जैसे बंधुओं से जुड़ना जीवन के खूबसूरत लम्हे हैं । मैं ईश्वर व माँ वीणापाणि के प्रति कृतज्ञ हूँ कि सब अपने से महसूस होने वाले साहित्यिक महानुभावों से जुड़ना हो रहा है ।
    आपसे जब चर्चा हुई थी तब आपने लेखन के समय अपने आंसुओं के साथ देने की बात पर बहुत कुछ बताया था । सच तो यह है कि बिना संवेदना के कलम कुछ बोल ही नहीं सकती इसलिए आँसु व मुस्कान दोनों ही इस भागीरथ लेखन यात्रा के सहभागी बने रहते हैं । अपने लेखन में लेखक की उपस्थिति कहीं न कहीं होती ही है इसलिए वह चरित्रों के साथ रोता,गाता ,नाचता,कूदता है और मुझे लगता है तभी लेखन की यात्रा सफलता की ओर अग्रसर रहती है ।
    आपने बिलकुल सच कहा कि बचपन में माँ,नानी की कहानियों के माध्यम से आपमें लेखक बनने का चमत्कारिक परिवर्तन हुआ । मुझे लगता है लेखन के प्रति जन्मजात संवेदना भीतर रहती है तभी दृष्टि अपने पास बिखरे पात्रों को सहज,सरल रूप में पकड़ती है और हृदय की धड़कन व आँखों के आँसु से सिंचाई करके उस कहानी को अपनी से सबकी कहानी में परिवर्तित कर देती हैं । सुंदर ,भीतर उतरने वाली भाषा शैली पाठक को इतना प्रभावित करती है कि मन में करुणा उपजने लगती है ।
    आपके उस विशेष चरित्र ने मुझे भी कई विशेष चरित्रों के पर्दे खोलने की मानसिक स्थिति में ला खड़ा किया ।
    आदरणीय! मनु जी अभी कई बार इसमें से गुजरना होगा ,महसूसना होगा ‘ये आँसू मेरे दिल की जुबान हैं !”
    आपको व पुरवाई को दिली शुक्रिया ।
    सादर ,सस्नेह
    प्रणव भारती

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