प्राननाथ,
महीनों में श्रेष्ठ महीना तो कार्तिक का ही है। कुदरत वर्षा और कीचड़ से सने वस्त्र उतारकर नए धारण कर लेती है। इस समय कुदरती अत्याचार का नामोनिशान मिट जाता है। तरो-ताजा पेड़-पौधे हवा में अठखेलियाँ करते हैं। मनमोहक मौसम ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति थिरक रही हो। लिपाई-पुताई से घरों में रौनक बरसने लगती है। दीपकों की रोशनी से गली-मुहल्ले जगमगा उठते हैं। दीपकों की कतारें अंधेरी रात में बेखौफ जलती हैं। उन्हें देखकर देह और मन उमंग से भर उठते हैं।
इस साल की दीपावली में खूब मजा आया। धनतेरस का मेला देख आई हूँ। परधान जी ट्रैक्टर ले गए थे। मुहल्ला भर की औरतें थीं। बिजली की झालरों से मेला जगमगा रहा था। हम मेला में खूब घूमे। झूले की ऊपर-नीचे झूमती पलकियों को देखकर पुरानी यादें ताजा हो गईं। मैं उन यादों में खोई थी कि सरबत चाची बोली, “रमकल्लो झूला झूल ले।” मुहल्ले के लोगों के बीच संकोच हो रहा था। चाची का साथ मिल गया तो संकोच गया चूल्हे में। मैंने कहा, “चाची, तुम भी मेरे साथ झूलो।”
मैं और चाची एक ही पलकिया में बैठ गए। झूले की पालकी जब नीचे उतरती, तो छाती धक्क हो जाती। मैं तो चाची से चिपक जाती थी।
एक जगह जादू का खेल दिखाया जा रहा था। टिकट लेकर हम उसमें घुस गए। आगे मैदान में रामलीला हो रही थी। कुछ देर तक रामलीला देखी। दीपावली की सौदा खरीदनी थी, सो हम लोग आगे बढ़ गए। भीड़ इतनी थी कि वहाँ तिल रखने का जगह
न थी। लगता था पूरी दुनिया मेला में उमड़ आई है। धक्का-मुक्की हो रही थी। कुछ लोग जानबूझकर धक्का मार रहे थे।
हम सुबह चार बजे घर लौट आए थे। आँखों में इतनी नींद भरी थी कि चारपाई पर लेटते ही सो गई।
घर की साफ-सफाई में दो दिन लग गए थे। दीवारों पर कलई पोती, फिर बखरी को उसी से ढिग देकर गेरु मिले गोबर से लीप दिया था। बखरी चम्म दिख रही है। तुम आकर देखते, तो अपनी रमकल्लो की प्रशंसा किए बिना न रहते। तुम आओगे, यही सोचकर मैंने बखरी में भाँति-भाँति के चौक काढ़े थे। द्वारे का चबूतरा चमक रहा है। तुलसी चौरा को भी लीप-पोत दिया है।
दीपावली को पूरी रात दिया (दीपक) जले। परधान जी के सतखंडा पर हर साल की तरह इस साल भी मिट्टी का बड़ा दीपक जलाया गया। हवा के थपेड़ों से बचाने के लिए उस पर लालटेन का शीशा रख दिया था। सारे बच्चे पटाखों और फुलझड़ियों में मस्त थे।
मौनिया सुबह जल्दी तैयार होकर मौन चराने निकल पड़े। बगल में मोर पंख, गले में लोई (गाय की पूंछ के बालों से बनी रस्सी) और हाथ में बाँसुरी लेकर निकले तो पूरा वातावरण श्रीकृष्णमय हो गया। पंडिज्जी के मंत्रोच्चार के साथ गाय की पूँछ पकड़कर मौनव्रत का संकल्प लेकर वे आगे बढ़ गए। उन्हीं के साथ दिवरया (दिवारी नृत्यकार) लांग (जांघिया) उसके ऊपर फुदनादार झूमर तथा सलूका पहने चल रहे थे। हाथ में लाठी लिए दिवारी नाच रहे थे। चौकटा में आकर मौनिया दिनभर के लिए मौनव्रत लिए जंगल, नदी, पहाड़ों की ओर निकल गए। दिवरयों ने गाय के साथ दिवारी खेल की रस्म अदा कर दी। इसके बाद दिवारी नृत्य शुरू हुआ। ढोल-बाँसुरी और कसौरा के साथ उनका नृत्य देखते बनता था।
लड़के दिवारी नृत्य करते हैं, पर आप जैसी दिवारी कोई नहीं नाचता है। कितनी फुर्ती से तुम घूम जाते थे, पता ही नहीं चलता था। पाई-डंडा खेलते वक्त तुम्हारी घूमती कलाइयों से एक वृत्त बनता था। डंडा जब एक-दूसरे से लड़ते थे, तो मनमोहक स्वर निकलता था। दिवारी नृत्य का रंग आपके खून में दौड़ता है। कमर में बँधे घुंघरू, ढोलक के स्वर में स्वर मिलाते थे। घुँघरू के स्वर ढोल के स्वरों में एकाकार हो जाते तब एक समां बँध जाता था।
मलाहार खेलते समय जब तुम लाठी घुमाते थे, तो देखने वालों की आँखें तिलमिला जाती थी। फुर्ती से जोड़ीदार पर लाठी का प्रहार करते। चतुर खिलाड़ी उसी फुर्ती से लाठी का वार लय के साथ रोकता। साथी खिलाड़ी को आपकी लाठी कभी छू न गई। बिजली-सी गिराती लाठी को देखकर कमजोर दिलवालों की साँसें टंग जाती थीं।
आपके यहाँ दिवारी नृत्य नहीं होता होगा। होता भी हो, तो दिवारी अकेले थोड़े खेली जाती हैं, जोड़ीदार के साथ ही रंग जमता है। इस वर्ष रोहू लला ने अच्छी दिवारी खेली। बिलकुल आपके जैसी। उसने मुझसे कहा था कि भौजी इस साल मैं भैया जैसी दिवारी खेलूँगा, मैंने खूब अभ्यास किया है। गब्बे ने भी लाँग कसी थी। गब्बे परसाल कह रहा था कि अब मैं दिवारी-इवारी न खेलूँगा। खेलता तो वह भी अच्छा है। कसा हुआ शरीर देखने में भी अच्छा लगता है।
परधान जी भी जोश में थे। वे बीच-बीच में दिवारी गीत गा देते थे। एक गीत उन्होंने गाया था जिसे अक्सर आप गाते थे-
गैयाँ गईं गगवारे भइया-ऽ भैसें गई-ऽ ऽ दूर-ऽ रे-ऽऽ
अहीर के लरका ने मारी लाठी, झरे कमल के-ऽऽ फूल-ऽऽ
डग्ग… डगा, डग्ग… डगा, ड-ड-ड… डग्ग डगा… आ…हा-ऽऽ हुइया दिवारी… बारे भैया
प्राननाथ लाठी मारने और फूलों के झरने में बड़ी व्यंजना है। खेल हो या जीवन, दोनों संघर्षों से भरे होते हैं। लाठी कठोरता (संघर्ष) का प्रतीक है, किन्तु उस संघर्ष के पश्चात् जो जीत का आनन्द है, वही फूलों का झरना है। प्राननाथ मेरी बुद्धि तो यहीं तक पहुँच रही है, फिर आप जैसा समझ रहे हों।
बजगड़ी अच्छी ढोलक बजा रहा था। ढोलक की थाप पर परधान जी भी नाचने लगे थे। नाचे तो थोड़ा ही थे, पर अच्छा नाचे थे। अपने समय में वे अच्छी दिवारी खेलते होंगे। राग और राजनीति का अद्भुत संगम है उनमें। शरीर की कसावट आज भी आँखों को लुभाती है। चौड़ी छाती, कसी बाजुएँ उनकी बहादुरी को दर्शाती है। खिलाड़ी ऐसे ही अच्छे लगते हैं। पतली टाँगें, चपटी छाती वाले खिलाड़ी जँचते नहीं है। इनसे तो लाँग, झूमर का भी रूप खराब हो जाता है।
कुछ खिलाड़ी शराब पीकर उछल-कूद रहे थे। मुझे उनकी उछल-कूद नहीं भा रही थी। नशा करके दिवारी नाचते हैं। जिसके खून में नशा नहीं है, वह बाहरी नशे से इस राग को नहीं साध सकता है। अन्तर का नशा तो ढोलक की थाप सुनकर फड़कने लगता है।
गाँव में जुआ भी खूब होने लगा है। कुछ जुआरी रात को चबूतरा पर जुआ खेलने का मन बना रहे थे। मैंने कहा, “यहाँ फड़ न जमाओ, अन्त कहीं मरो।” बरगए जुआरी तो लोटा-थाली तक बेच डालते हैं। जानते हैं, हार जाएँगे तऊ खेलने को नहीं मानते हैं।
प्राननाथ, एक बात तो बताना ही भूल गई। खेतों की बुवाई करवा दी है। एक खेत में मटर बो दिया है और दूसरे का पलेबा कर दिया है। इसमें ट्रैक्टर से गेहूँ बुवा दूँगी। ज्यादा दिक्कत नहीं है। मैं खेत देख आती हूँ। बेरा-कुबेरा जाने से बचती हूँ।
यहाँ सब ठीक है। तुम वहाँ आनन्द से रहना।
आपकी ही
रमकल्लो


लखनलाल जी,
इस बार तो रमकल्लो ने दीवाली और धनतेरस में गांव के रोशनी से जगमग करते मेले में खूब मस्ती करी। सरबत चाची के संग पलकिया वाले झूले का भी आनंद लिया। और चाट, मिठाई वगैरा भी जरूर खाई होगी। फिर झूमती हुई देर रात को घर लौटी। यही तो दिन हैं उसके खाने-पीने के। वरना घर की लिपाई-पुताई और खेतों के काम में ही उसकी जिंदगी समाई हुई है। प्राननाथ का कोई अता-पता ही नहीं तो इसमें उसकी क्या खता?
चारों तरफ की सभी देखी-सुनी बातें और मेले का अनुभव जब तक अपनी पाती में अपने प्रियवर प्राननाथ को न बता दे तब तक उसे चैन कहां। यही तो विशेषता है रमकल्लो की। गांव के शराबी-जुआरी लोगों की गतिविधियां भी उससे छुपी नहीं रहतीं। दुनिया भर की खबर रखने वाली रमकल्लो के पेट में कोई बात पचती ही नहीं। गांव-बिरादरी सभी की बातों को
जब तक वह प्राननाथ को विस्तार से न लिखे उसे चैन नहीं पड़ता। वह चाहती है कि उसके पति को उन सबके बारे में पता लगता रहे। न केवल अपनी हंसी-खुशी और समस्याएं बल्कि गांव भर के लोगों के सुख दुख की खोज-खबर रखने की भी जैसे वह अपनी जिम्मेदारी समझती है।
वसंत बयार की तरह बहती हुई, फूलों का मधुरस छलकाती खुशमिजाज रमकल्लो सबसे मिलजुल कर रहना व सबके बारे में जानकारी रखना या जुटाना अपना परम कर्तव्य समझती है। हर बात को बड़ी बारीकी से अपनी पाती में लिखकर अपना मन हल्का कर लेती है। जिंदगी के फलसफे के बारे में भी रमकल्लो के अपने विचार हैं: “प्राननाथ लाठी मारने और फूलों के झरने में बड़ी व्यंजना है। खेल हो या जीवन, दोनों संघर्षों से भरे होते हैं। लाठी कठोरता (संघर्ष) का प्रतीक है, किन्तु उस संघर्ष के पश्चात् जो जीत का आनन्द है, वही फूलों का झरना है।”
लेकिन अब तक न उसे और न ही हमें पता लग पाया है कि वह सारी चिट्ठियां उसके पति के पास पहुंच भी रही हैं या नहीं, या मिलती हैं तो वह पढ़ता भी है या नहीं, या फिर उन्हें पढ़कर भी उसे अपनी पत्नी की कोई चिंता है भी या नहीं। इस समय किसी भी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है। इधर रमकल्लो है कि दिन-रात अपने प्राननाथ के नाम की माला जपती हुई उनकी याद में घुली जा रही है। और पाठक उसके लिये चिंतित हो रहे हैं कि आखिरकार हम सबकी प्यारी रमकल्लो के प्राननाथ हैं कहां? इस धरती पर कहां बिला गये? राम जाने उसकी किस्मत में अब प्राननाथ से मिलना लिखा भी है या नहीं।
लेखक लखनलाल जी को प्यारी सी रमकल्लो को गढ़ने के लिये बहुत बधाई।
-शन्नो अग्रवाल
शन्नो जी, आपने रमकल्लो की हर गतिविधि को बड़ी बारीकी से निरीक्षण करके अपनी प्रतिक्रिया दी है। *आपके इस लिखे पर कि हम सबकी प्यारी रमकल्लो के प्राननाथ है कहां?* इसे पढ़कर मुस्कराना आ गया। आपकी टिप्पणी हौसला बढ़ाने वाली है।
शन्नो जी आपका बहुत-बहुत आभार
लखनलाल जी,
इस बार तो रमकल्लो ने दीवाली और धनतेरस में गांव के रोशनी से जगमग करते मेले में खूब मस्ती करी। सरबत चाची के संग पलकिया वाले झूले का भी आनंद लिया। और चाट, मिठाई वगैरा भी जरूर खाई होगी। फिर झूमती हुई देर रात को घर लौटी। यही तो दिन हैं उसके खाने-पीने के। वरना घर की लिपाई-पुताई और खेतों के काम में ही उसकी जिंदगी समाई हुई है। प्राननाथ का कोई अता-पता ही नहीं तो इसमें उसकी क्या खता?
चारों तरफ की सभी देखी-सुनी बातें और मेले का अनुभव जब तक अपनी पाती में अपने प्रियवर प्राननाथ को न बता दे तब तक उसे चैन कहां। यही तो विशेषता है रमकल्लो की। गांव के शराबी-जुआरी लोगों की गतिविधियां भी उससे छुपी नहीं रहतीं। दुनिया भर की खबर रखने वाली रमकल्लो के पेट में कोई बात पचती ही नहीं। गांव-बिरादरी सभी की बातों को वह जब तक प्राननाथ को विस्तार से न लिखे उसे चैन नहीं पड़ता। वह चाहती है कि उसके पति को उन सबके बारे में पता लगता रहे। न केवल अपनी हंसी-खुशी और समस्याएं बल्कि गांव भर के लोगों के सुख दुख की खोज-खबर रखने की भी जैसे वह अपनी जिम्मेदारी समझती है।
वसंत बयार की तरह बहती हुई, फूलों का मधुरस छलकाती खुशमिजाज रमकल्लो सबसे मिलजुल कर रहना व सबके बारे में जानकारी रखना या जुटाना अपना परम कर्तव्य समझती है। हर बात को बड़ी बारीकी से अपनी पाती में लिखकर अपना मन हल्का कर लेती है। जिंदगी के फलसफे के बारे में भी रमकल्लो के अपने विचार हैं: “प्राननाथ लाठी मारने और फूलों के झरने में बड़ी व्यंजना है। खेल हो या जीवन, दोनों संघर्षों से भरे होते हैं। लाठी कठोरता (संघर्ष) का प्रतीक है, किन्तु उस संघर्ष के पश्चात् जो जीत का आनन्द है, वही फूलों का झरना है।”
लेकिन अब तक न उसे और न ही हमें पता लग पाया है कि वह सारी चिट्ठियां उसके पति के पास पहुंच भी रही हैं या नहीं, या मिलती हैं तो वह पढ़ता भी है या नहीं, या फिर उन्हें पढ़कर भी उसे अपनी पत्नी की कोई चिंता है भी या नहीं। इस समय किसी भी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है। इधर रमकल्लो है कि दिन-रात अपने प्राननाथ के नाम की माला जपती हुई उनकी याद में घुली जा रही है। और पाठक उसके लिये चिंतित हो रहे हैं कि आखिरकार हम सबकी प्यारी रमकल्लो के प्राननाथ हैं कहां? इस धरती पर कहां बिला गये? राम जाने उसकी किस्मत में अब प्राननाथ से मिलना लिखा भी है या नहीं।
लेखक लखनलाल जी को प्यारी सी रमकल्लो को गढ़ने के लिये बहुत बधाई।
-शन्नो अग्रवाल
सफल रचनाकार लखन लाल पाल की रमकल्लो की पाती को पढ़कर कुछ बातें उभरकर आई.
एक स्त्री के मनोभावों को समझना और लिखना बहुत ही मुश्किल है. इस संदर्भ में हम भारती की कनुप्रिया का उदाहरण दे सकते हैं.
स्त्री मन की अवधारणाओं और गूत्थियों को शब्द बद्ध करने का सफ़ल प्रयास विवेच्य रचनाकार ने किया है.
प्रतीक्षा के पल काफी लंबे होते हैं. कभी कभी तो ये पल जन्म जन्मांतर के हो जाते हैं.
इस पाती में मेले का चित्रण मिलता है जो हम सब को बचपन की ओर ले जाता है. आज मेले नहीं अपितु फैस्टिवल ही होते हैं. ऐसे समय मेले की रौनक का याद आना लाजमी है.
आदरणीय रामशंकर भारती जी ने सही कहा है अतीत के लोक आख्यान हमें वर्तमान में जीने की प्रेरणा देते हैं.
इसलिए किसी कालजयी रचना को हम अतीत और भविष्य दोनों से जब जोड़ते हैं तो रचना अपने आप बोलती है.
इस पाती के संदर्भ में नीरज जी की दो पंक्तियां जोड़ना चाहते हैं जो शायद रमकल्लो की आपबीती हों सकतीं हैं –
कौन समझे मेरी आंखों की नमी का मतलब?
ज़िन्दगी वेद थी पर जिल्द बंधाने में कटी.
रचनाकार लखन लाल पाल जी को बहुत बहुत बधाई और संपादक महोदय को भी धन्यवाद.
आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे सर जी, आपकी प्रतिक्रिया में बहुत गहराई है। *किसी कालजयी रचना को हम अतीत और भविष्य दोनों से जोड़ते हैं तो रचना अपने आप बोलती है*
नीरज जी की पंक्तियों का उद्धरण मेरे लिए व मेरी रचना के लिए सौभाग्य की बात हो गई। बहुत बढ़िया समीक्षा लिखी है सर आपने।
आपका हृदय से आभार सर
*अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई’ में वरिष्ठ कथाकार डॉ० लखनलाल पाल की कालजयी कृति *रमकल्लो की पाती* *धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रही है।*
*उत्कृष्ट कृति रमकल्लो की पाती पढ़वाने के लिए पत्रिका के*
*यशस्वी संपादक आदरणीय तेजेंद्र शर्मा को अनेक साधुवाद।*
*रमकल्लो की पाती*’ *पर मैं निरंतर अपनी प्रतिक्रियाँ दे रहा हूँ। इस बार रमकल्लो को उसकी पाती का जवाब देने की कोशिश*…
*प्यारी रमकल्लो* !
जा दफै तुमाई चिठिया कौ जबाब लंबौ लिख रयौ। कायसें, तुमनै अपँई चिठिया में कातिक महीना के बहानैं हमाऔ दिवारी नाच कौ भी जिकर करौ है।
टैंम निकार कैं तसल्ली से पूरी चिठिया पढ़िओ …
रमकल्लो! तुम सच कह रही हो कातिक का महीना सचमुच बड़ा गुणकारी होता है। बड़ा ही रमणीक और आस्था भरा होता है। जैसे ही कुआँर माह के पुनौ की रजत जुन्हैया पश्चिम के पिछवारे वाली अटारी के मुंडेरों पर धीरे से पाँव धरती है, वैसे ही भिनसारे के भोर-चिरैंया मधुर भैरवी में मंगलगीत गुनगुनाने लगतीं हैं। दिवारी त्योहार की जगरमगरवाली तैयारियाँ होने लगतीं हैं। धनतेरस, जमघंट, छोटी दिवारी और लक्ष्मी पूजन के अनुष्ठान के कथा-किस्से
दोहराए जाने लगते हैं। हमारे यही तीज त्योहार और परंपराएँ हमें आज भी जिंदा
रखे हैं। साँची कय रये, अगर ये न हों तो गाँव मरघटा बन जाएँ।
रमकल्लो! तुम तो जानती ही हो, लोकविश्वास और जातीय स्मृतियाँ आश्चर्यजनक तरीके से हमें अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इन तीज-त्योहारों के लोक आख्यान हैं, जीवन के सतरंगी सपने हैं और जीवन का सच भी इनमें बिलमता है। इससे आँखें फेर कर कोई आगे की यात्रा नहीं कर पाएगा।
गाँव में शराबियों और जुआरियों और शराबियों की कुचालों व उनकी धींगामुश्ती की बातें चिठिया में पढ़कर मुझे बहुत पीड़ा हो रही है। गाँब में जबरन घुस आए चोर, उचक्कों, जुआरियों और शराबियों को कौन समझाए।
हमारे उत्सवों का अंतरंग जितना संपन्न, जीवंत और वैभवशाली है, बहिरंग उतना ही विपन्न होता जा रहा है। अब तो समूचा गाँव (लोक) स्वार्थपरता, आधुनिकता के बाज़ार और राजनीतिक खेलों से निरंतर जूझ रहा है।
रमकल्लो! चिठिया में तुम्हारी साँसों की आहटें मुझे साफ सुनाई दे रहीं हैं। तुम जिस मासूमियत से चिठियां लिखती हो, मैं उसी शिद्दत से उन्हें जीता हूँ। मेरी रग – रग फड़क रही है। काश! मैं इस बार दिवाली का नाच कर पाता। बजगड़ी की ढोलक की थापों पर खूबंई कुलाँचें और फिरकियाँ लगा पाता। तू दूर खड़ी हो, मुझे दिवारी नाचते हुए देखकर घूँघट में धीरे-धीरे हँसती- मुसकाती।
मगर पेट की जरूरतों की आग को ये कौन समझाए, उसे जितने बुझाओ, वह उतनी ही बढ़ती जाती है। फैक्ट्री मालिक इस बार छुट्टी देने से मुकर गया।
सो तुम तो, भरोसा करो अपँय तीज- त्योहारन पर, अपँई परंपराओं पै। जे मन कौं खुशियन से भरते हैं। पेट खाली भी रहे मगर मन भरा रहे तो, अखरता नहीं है।
रमकल्लो! हर बार की तरह तुमने इस बार भी चिठिया में अपने गाँव की नरिया, तला और पेड़-पौधन की सलामती की बातें लिखकैं बड़ौ अच्छौ करौ। मैं तो यहाँ शहर के पथरौटा मौसम में अपने गाँव- हार- त्योहार आदि की यादों से ही सुकून ले लेता हूँ। जे हैं तौ हम-तुमहैं। कायसैं प्रकृति और मानुस जात ही तो लोक के बनाबे बारे होतइ।
रमकल्लो! आज बहुत अफसोस के साथ चिठिया में लिख रहा हूँ कि अब आधुनिकता की दौड़ में हमारे पवित्र पर्वों की वैज्ञानिकता, सामाजिकता और लोकमंगल का जो स्वरूप था वह नष्ट हो रहा है। हमने सच से आँखें फेरलीं हैं। गाँव में हमें शहरों के लुभावने झूठों ने भरमा लिया है। लोकोत्सवों से बढ़नेवाली समरसता अब कटुता में बदल रही है। त्योहारों के नाम पर भौंड़े व बनावटी प्रदर्शन हो रहे हैं। लोक संस्कृति के मेलों में भी बड़े झमेले हैं। पिज्जा-बर्गर खाने वाले लोग दूध-महेरी, महुआ-मुरकी पर प्रवचन कर रहे हैं। बड़े शहरों की बड़ी व ऊँची वातानुकूलित कोठियों में बैठे शहरी लोग किसानों के पसीने पर शोध कर रहे हैं….
हमारे जमाने के दिवारी नृत्य के तो दिबाले ही निकल गये हैं। आज के मौनिया बतकाव में व्यस्त हैं। चाचर पर चैं-चैं हो रही है। और क्या-क्या बताएँ? कहाँ तक गिनाएँ.?
सब कुछ उलटा-सुलटा होता जा रहा है।
रमकल्लो! मगर तुमै तनकंउ चिंता नंइ कननै।अपँई परंपराओं कौ खूबंई पालनैं, पोसनैं-पूजनै हैं।
…….हमाये तुमाये परान तौ जिनंइ मै बसत हैं…..
कतकी पूनौ नौं जरूर आऊँगौ।
सो जानवी
तुमाओ
प्राननाथ
भारती जी, आपने तो बढ़िया जवाब दे दिया है रमकल्लो को। चलो कम से कम उसे ढांढस बंध जाएगा। रमकल्लो की पाती को इतना मान देने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद भारती जी।
सुप्रभात, प्रणाम सर,
मै तो खो सी गयी इस बार लमकल्लो की पाती पढकर। कभी बुंदेलखंड की धरती को तीज त्योहार याद आये तो कभी रेणु की लाल पान की बेगम।कैसा अद्भुत प्राकृतिक समां बांध दिया रमकल्लो ने कि बरसात भी मुसकरा उठी।परधान जी के ट्रैक्टर पर बैठ गांव का मेला घूमने जाना ,झूला झूलना दिवारी नाच,मुनिया का मौन मुखरित होकर कदमों की लय ताल के साथ थिरक रहा है.और रमकल्लो मगन है अपने प्रिय के स्वागत में अपना घर अंगना लीलने पोतने में,।मन आह्लाद और भावुकता से भर गया।मोनिका नाच के दृश्य बिंब तो जैसे आंखों में बस गये.हैं–*मौनिया सुबह जल्दी तैयार होकर मौन चराने निकल पड़े। बगल में मोर पंख, गले में लोई (गाय की पूंछ के बालों से बनी रस्सी) और हाथ में बाँसुरी लेकर निकले तो पूरा वातावरण श्रीकृष्णमय हो गया।*।कितनी मधुरता ,कितना.स्नेह। शब्द शब्द रसमय हो गया है और बरस.रहा है इस पाती में कि उसके.प्रिय उसे पढें और उतने ही आनंदित हों।यह पाती तो जैसे मेघदूत की यक्ष प्रिया की पाती सी मन को मोहती है।बहुत सुंदर संवेदनशील, अप्रतिम सृजन। हार्दिक बधाई ।अगली पाती की प्रतीक्षा है।बहुत बहुत बधाई हो आपको.और आदरणीय तेजेन्द्र भाई को भी इस सुंदर पोस्ट के.लिए।..पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
पद्मा जी, आपने पाती पढ़ी और उस पर इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया दी इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार। ग्रामीण जीवन के तीज-त्योहार, राग ,मेला, उत्सव आदि हर जगह थोड़े बहुत अंतर से लगभग एक जैसे होते हैं। लेखन में ये चीजें आती हैं तो बहुत अपनी सी लगने लगती हैं। आपकी प्रतिक्रिया इसी का परिणाम है। इतनी अच्छी टिप्पणी के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद
प्रिय भाई लखन जी,
आपकी रमकल्लो से कल बड़ी ही सुखद भेंट हो गई थी। कुछ लिखना चाहता था, पर सोचा, इतनी अच्छी, इतनी कमेरी, इतनी समझदार, और अपने ‘प्राननाथ’ को जी-जान से चाहने वाली इतनी संवेदनशील रमकल्लो पर थोड़ी फुर्सत से लिखना चाहिए। तो कल से ही रमकल्लो दिल-दिमाग में बसी हुई है, और कुछ न कहकर भी यह इसरार कर रही है कि आप इतना लिखते रहते हैं, पर मुझ पर तो आपने कभी लिखा नहीं। तो अब जल्दी बताइए, कब लिखेंगे बाबू जी?
और रमकल्लो के इसरार के साथ ही मन में बड़ा अपराध-बोध भी उमड़ पड़ा कि रमकल्लो को रचने और सच में ‘हाड़-मांस का परानी’ बनाने वाले भाई लखनलाल पाल को भी पढ़ा तो इतनी दफे, और मन ही मन सराहा भी बहुत बार, पर ढंग से कभी लिखा नहीं। यह तो अच्छी बात नहीं प्रकाश मनु?
तो सोचा कि लिखूंगा, जो भी, जैसा भी, मन में आया, लिखूंगा। तो लखन भाई, पहली और सबसे जरूरी बात तो मुझे यह कहानी है कि आप में लोक की इतनी अच्छी समझ और इतनी गहरी संवेदना है कि लगता है, रमकल्लो को आपने रचा नहीं। रमकल्लो ऐसी है कि उसे कोई रच ही नहीं सकता। जैसे हम परानियो को इस दुनिया में लाने वाले करुणानिधान हमें रचते हैं, वैसे ही हाड़-मांस के जीवंत परानी के रूप में उन्होंने रमकल्लो को रचा है। यह दीगर बात है कि माध्यम आप बने।
यों असली माध्यम तो आपके रोम-रोम में रची लोक भावना थी, और रमकल्लो आपके भीतर से कुछ ऐसे फूट पड़ी, जैसे धरती फोड़कर फसलें उगती हैं, पेड़-पौधे और फूलों के झाड़ उगते हैं। और रमकल्लो भी तो किसी छोटे दरख़्त जैसी ही है, जो फूलों, पत्तों से लदी हुई है और धीरे-धीरे बहती पुरवाई की तरह उसमें जीवन लहलहा रहा है। बड़े-बड़े पढ़ाकू भी न सोच पाएं, इतनी जिंदगी और दुनियादारी की समझ उसमें है, और अच्छे-बुरे का विवेक भी। धुर गांव की होकर भी, और पूरे मन से पुरानी परंपराओं को निभाती हुई भी, वह अपने सोच-विचार में कितनी आधुनिक है, यह बात लखन भाई खासी रोमांचित करने वाली है, और यह उस सृष्टि की सफलता का मर्म भी है, जिसे आप और हम सभी रमकल्लो कहते हैं।
हां, बीच-बीच में कुछ ऐसे शब्द जरूर अखरते हैं, जो हम पढ़ाकुओं की दुनिया के हैं, और रमकल्लो से किसी तरह जुड़ते नहीं हैं। आपने थोड़ा और धीरज दिखाया होता, तो उनकी जगह लोक जीवन के या कि आम बोलचाल के शब्द बड़ी आसानी से मिल सकते थे।
आपने अपने एक वक्तव्य में अचरज जताया था, कि आपकी उम्मीद के विरुद्ध रमकल्लो इतनी चढ़ गई और आपकी वह कृति, जिसे आप बड़ा समझते थे, रह गई। ऐसा होता है लखन भाई। बहुत बार होता है, जबकि हम अपनी ज्यादा कलात्मक चीजों को अपनी कामयाबी मान लेते हैं। जबकि रमकल्लो सरीखी दुनिया भर की सारी कला-अला को अंगूठा दिखाने वाली सीधी-सादी स्त्री लगातार ऊपर, और-और ऊपर उठती चली जाती है, क्योंकि उसमें किसी अलमस्त पुरवाई का-सा जीवन बहता है, जीवन-राग बहता है। और इसलिए भी कि उसे आपने नहीं रचा, बल्कि उस करुणानिधान ने रचा है, जिसने हम सब परानियों को जन्म दिया है। हां, आपके भीतर से तो वह फूट पड़ी, जैसे धरती फोड़कर फसलें उगती हैं, पेड़-पौधे और फूलदार झाड़ उगते हैं।
क्या अब भी यह कहने की जरूरत रह जाती है लखन भाई, कि रमकल्लो आपकी अमर सृष्टि है, और हम सब खुशकिस्मत हैं, कि ‘पुरवाई परिवार’ के जरिए उससे किस्त-दर-किस्त मिलने का सौभाग्य पा रहे हैं।
मेरा स्नेह और शुभाशीष,
प्रकाश मनु
अरे सर, आपके द्वारा इस पाती पर की गई समीक्षा मेरे लिए वरदान हो गई। आपने रमकल्लो और लेखक दोनों के भीतर इतना झांक लिया है कि इतना तो वे दोनों ही अपने बारे में न जानते होंगे। साहित्यकार युगदृष्टा होता है। तो आप जैसे साहित्यकार की दृष्टि से कुछ भी ओझल नहीं हो सकता है। आपकी इस समीक्षा ने बता दिया है।
सर आपको कितना याद रहता है, यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है। मैंने एक बार लिखा था कि मैं अपने *ऋतदान* उपन्यास को श्रेष्ठ मानता रहा। *रमकल्लो की पाती* को मानता रहा हूं कि यह एक ग्रामीण स्त्री की साधारण सी कहानी भर है, बस।
उपर्युक्त कथन मैंने बहुत पहले इसी पुरवाई परिवार में व्यक्त किया था। आपने उस कथन का उल्लेख करके पूरे पुरवाई परिवार को बता दिया है कि सभी रचनाएं और टिप्पणियां आपकी नजरों से गुजर कर जाती है। वाह सर, आपकी पैनी दृष्टि को सैल्यूट करता हूं।
बहुत-बहुत आभार सर
आदरणीय तेजेन्द्र सर जी का भी बहुत-बहुत आभार कि उन्होंने प्रतिष्ठित पत्रिका पुरवाई में धारावाहिक प्रकाशन करके पाती को इतना मान दे रहे हैं।