मीर इरफान अली चार भाई बहनों में दूसरे नंबर के हैं। कभी पुरखे नवाब रहे होंगे, लेकिन अब नवाबियत भी नहीं रही। बड़े भाई रहमान अली ने शादी नहीं की। वे खानदान के बचे हुए एकलौते टूटे फूटे हवेलीनुमा खंडहर में अकेले ही रहते हैं। उनके पास कुछ बचा है, तो पुरानी मुलाज़िमा की एक बेटी है, जो उनका सारा काम और किराए पर चढ़ी कुछ दुकानों का हिसाब किताब संभालती है। कभी कुछ बच-बचा जाता है तो नवाब साहब उसका कुछ हिस्सा अपने खर्च के लिए रखकर बाकी अपनी बहन को सौंप देते हैं। समझते हैं कि विधवा बहन और उसकी बेटी की कुछ मदद हो जाएगी।
छोटे दो भाई बचपन से ही परिंदों की तरह रहे। घूमने फिरने का बड़ा शौक था। बड़े भाई से मिन्नतें कर पढ़ाई के बहाने अमेरिका उड़ गये तो फिर वहीं के हो गये। बड़ी बहन रज़िया विधवा है, उसी अपार्टमेंट के एक फ्लैट में रहती है, जिसको इरफान अली ने अपने हिस्से का एक पुराना मकान तोड़कर बनवाया था। इरफान अली एजी ऑफिस में मुलाज़िम हैं। कुछ ही दिन बचे हैं, रिटायर होने में। बीते पैंतीस साल की सर्विस में कई शहरों में भटके, लेकिन कहीं सुकून नाम की चीज़ नहीं मिल पायी। दो बेटियों की शादी करने के बाद बेटे का घर बसाने के बारे में सोच ही रहे थे कि एक दिन रज़िया आपा ने अब्बा-अम्मा का वास्ता देकर ऐसे जकड़ लिया, जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद भी नहीं थी। हालाँकि वो ख़ूब समझते थे कि यह घाटे का सौदा है, लेकिन आपा जो थी, माननी पड़ी थी बात। उस दिन जब बड़े भाई सुबह-सुबह ही उनके घर आये थे, कुछ ही देर में बहन भी आ गयी। ऐसा लगता था दोनों ने पहले ही प्रोग्राम बना लिया था। चाय की चुस्कियों के दौरान बातों-बातों में बहन ने ही बात छेड़ दी।
“भाई, रासिया के बारे में आपने कुछ सोचा है?”
इरफान अली समझ नहीं पाये। उनके पास भी सवाल ही था, “क्या सोचना है?”
“यही.. उसकी शादी के बारे में।”
“क्या उसे कोई लड़का पसंद आया है?”
“नहीं।”
“क्या किसी ने उसे पसंद किया है?”
“रिश्ते तो कई आये, लेकिन बात आगे बढ़ने से पहले ही ख़त्म हो जाती है। मैं भी किसी रिश्ते में आगे बढ़ने से पहले यह सोचकर चुप हो जाती हूँ कि नये रिश्ते में निभ भी पाएगी या नहीं।”
“तो फिर?”
“क्यों न घर की बात घर में ही रह जाए?”
“मैं समझा नहीं!”
इतनी देर से चुपचाप दोनों की बातें सुन रहे रहमान अली ने मुंह खोला, “रज़िया चाहती है कि रासिया की शादी तुम्हारे बेटे सलमान अली के साथ हो।”
“… लेकिन!”
“इसमें कोई ज़ोर ज़बर्दस्ती नहीं है, रज़िया ने बात रखी तो मैंने सोचा कि सीधे तुमसे ही बात कर लूँ।”
इरफान अली आगे कोई ‘ना’ नहीं पाये। कहना ही पड़ा, “ठीक है मैं सलमान से बात करता हूँ। अगर वो मान ले तो..”
बेटे की शादी की सोच ही रहे थे, लेकिन अपनी बहन की बेटी के बारे में कभी सोचा नहीं था। इसलिए भी कि पूरे ख़ानदान में उसका नकचढ़ापन मशहूर था। उसका गुस्सा, हटधर्मी, अपनी ही बात को मनवाना, मनमानी करना….सब जानते थे। हालाँकि सब उसके बारे में इसलिए कुछ नहीं कहते थे कि बिन बाप की बच्ची थी, मामुओं की गोद में बड़े लाड़-प्यार से पली बड़ी हुई थी। इस सब के बावजूद, यह बात अपनी जगह पक्की थी कि किसी से उसकी जमती न थी। सब कुछ जानने समझने के बावजूद, उसी शाम उन्होंने अपने बेटे सलमान अली को बुलाया और अपनी फुप्पु की बात बताई। सलमान अली ने यह कहते हुए साफ इनकार कर दिया। बात उसकी भी सही थी, “अब्बू आप उसकी आदत के बारे में जानते तो हैं। जानबूझ कर मुझे गड्ढे में क्यों डालना चाहते हैं।”
“बेटा, मैं बड़े भाई और बेवा बहन को कैसे इनकार कर दूँ।”
“वो सीधे मुँह बात तक नहीं करती, बल्कि उसके सामने किसी की कुछ औक़ात ही नहीं है।”
“ठीक है, मैं कल भाई से बात करूँगा, तुम भी रहना, देखें क्या होता है।”
सादिया बेगम पास में ही थी। वह ये सब सुन रही थी। बात बाप-बेटे के बीच की ही नहीं थी, बल्कि भाई बहन का भी मामला था। वह कुछ नहीं कह पायी। वह जिस दिन से घर में ब्याह कर आयी थी, उस दिन से बस वही सब कुछ किये जा रही थी, जो हालात को मंज़ूर था। बेटे के लिए अपनी मर्जी की चांद सी बहू लाने का ख़्वाब देखा था, सो वो भी भी हाथ से छूटने लगा था।
दूसरे दिन जब दोनों भाई, बहन के साथ सलमान अली भी दीवानखाने में बैठकर इस बात पर चर्चा कर रहे थे, इरफान ने बताया कि सलमान इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। बात सुनकर रज़िया ने तीर छोड़ा, “भाई अगर अपनी बेटी अपने ही खानदान में नहीं संभाली जाएगी तो दूसरे घर में वह कैसे निभ पाएगी? जब वो अपनी ससुराल से किसी बात पर मायके वापस भेज दी जाएगी तो मामुओं की क्या इज्ज़त रह जाएगी!”
इरफान अली को बहन की बात से झटका-सा लगा। ऐसा लगा जैसे किसी ने झिंझोड़ कर नींद से जगा दिया है। रहमान अली भी कुछ नहीं बोले। सलमान भी अपनी फुप्पु के चेहरे को देखता रह गया। हालाँकि रासिया देखने भालने में अच्छी सूरत-शक्ल की ज़रूर थी, फिर भी उसे लगता था कि उसके नख़रे वह नहीं उठा पाएगा, लेकिन फुप्पु ने जब इज्जत की दुहाई दी तो, वह भी कुछ नहीं बोल पाया। हालाँकि बाप-बेटे दोनों जानते थे कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी बात मान ली गयी और देखते-देखते कुछ ही दिनों में सलमान और रासिया शादी के बंधन में बंध गये।
शुरू-शुरू में तो सब कुछ ठीक ही रहा। शादी के कुछ दिन अच्छे गुज़रे। नई बहू के खूब नाज़ नख़रे उठाए गये। पसंद के गहने, मंहगी-महंगी साड़ियाँ, विदेश में हनीमून.. और मनमानी शॉपिंग। जब रिश्तेदारों और दोस्तों के घरों पर दावतों का सिलसिला कम हुआ तो सलमान ने भी वापिस ऑफिस का कामकाज संभाल लिया। उन्हीं दिनों अचानक सलमान की माँ सादिया बेगम की तबियत खराब हो गयी। तीन चार दिन तक अस्पताल में रही। इधर घर का बुरा हाल था, एक मुलाज़िमा बरतन धोकर चली जाती थी, लेकिन खाना कौन पकाये। तीन दिन तक होटल से खाना मंगाकर गुज़ारा हुआ। बहू रासिया को तो कुछ आता-जाता था नहीं, अगर आता भी तो वह किचन में नहीं जाती। माँ तो माँ कुछ शादीशुदा सहेलियों ने भी जता दिया था- एक बार किचन में गयी तो फिर किचन की ही होकर रहेगी।
घर में सारा काम तो सादिया बेगम ही किया करती थीं। एक दो बार उन्होंने इरफान अली को कह भी दिया कि रासिया अब भांजी नहीं बहू है, उसे घर का कामकाज भी तो करना है, लेकिन इरफान अली की हिम्मत ही नहीं हुई। उनको डर था कि रहा सहा आंख का पानी मर गया तो फिर क्या रह जाएग। आखिर सास ने ही एक दिन बहू को आवाज़ दी, “बेटा आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है, कुछ नाश्ता बना दो।”
“मामी, मैं क्या बनाऊँगी, मुझे तो खाना बनाना आता ही नहीं।”
“कुछ तो बना दो, थोड़ा-सा पेट में जाएगा तो मैं कुछ देर बाद उठकर दोपहर का खाना बना दूँगी।”
“मैं सलमान से कह देती हूँ कि स्विग्गी से ऑर्डर करें।”
सादिया बेगम चुप रही। अब हर दो-चार दिन में एक बार जब कुछ काम करने के लिए कहा जाता तो रासिया का वही जवाब होता। एक दिन ग़ुस्से में आकर वह पैर पटकती हुई, घर से निकली और माँ के पास चली गयी। मायका भी तो वहीं था, बस कुछ सीढ़ियाँ उतरकर नीचे जाना था।
रज़िया ने बेटी का दुखड़ा सुना तो उसे भी बुरा लगा कि उसकी बेटी से घर में नौकरानियों का काम लिया जा रहा है। बरसों से जिस भाभी की तारीफ करते था नहीं करती थी, आज वही औरत उसे बुरी लगने लगी, क्योंकि बेटी की सास जो ठहरी। दो दिन बाद उसने मामला ठंडा होने के बाद भाई इरफान अली को मश्विरा दिया कि घर में खाना पकाने के लिए एक मुलाज़िमा रख लो। मश्वरा तो अच्छा था, लेकिन घर का बजट इस बात की इजाजत नहीं देता था कि एक और खर्च बढ़ा लिया जाए।
सलमान ने रासिया को बहुत समझाया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। दिन भर सेलफोन में घुसी रहती। सहेलियों और दूर की रिश्तेदारों से घंटों बात-चीत किया करती, लेकिन घर का कोई काम बता दें तो मामी पर बिफर जाती। शाम को जब बाप-बेटे घर आते तो शिकायतों का पिटारा सामने होता। इरफान अली को जिस सुकून की तलाश थी, वह दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं देता था। हालाँकि उन्होंने अपनी बेगम को भी समझाने की कोशिश की कि बहू को अपने हाल पर छोड़ दो, लेकिन दो चार दिन बाद घर में कुछ ऐसा हो ही जाता कि आवाज़ें दरवाज़ें बंद होने के बावजूद खिड़कियां और दीवारें फांद कर दूसरे अपार्टमेंट में दाख़िल हो जातीं।
इरफान अली को महसूस होने लगा लगे कि उन्होंने बड़ी ग़लती कर दी है। उन्हें बहन की बात माननी ही नहीं चाहिए थी। भला इतना अच्छा बनने का क्या फायदा, जिससे अपना ही नुक़सान हो जाए, लेकिन अब तो तीर कमान से निकल गया था और तो और उस तीर से वे घायल भी हो गये थे। इलाज कुछ नज़र नहीं आता था, बस ज़ख़्म को रिस्ते देखना ही मुक़द्दर बन गया।
बहन भाई के रिश्तों में खटास बढ़ने लगी थी। रज़िया को लगता कि बेटी को दामाद के साथ अलग रखने से मामला ठीक हो जाएगा, लेकिन बेटी उसके लिए तैयार नहीं थी। इसलिए कि तब तो सारा काम उसी को ही करना पड़ेगा। बड़े मामू ने भी माँ बेटी को समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रासिया के लिए सब कुछ अच्छा था, हर मांग पूरी हो जाती थी। किसी तरह की कोई पाबंदियाँ नहीं थी, लेकिन घर का काम, बिल्कुल नहीं। उसका बस चलता तो वह कपड़े धोने की ऑटोमेटिक मशीन चलाने के लिए भी एक नौकरानी रख लेती।
इरफान अली ने सोचा कि बहू को किसी स्कूल में टीचर के तौर पर लगा दें, लेकिन वह उसके लिए भी राज़ी नहीं हुई।
पति को परेशान देखकर एक दिन सादिया बेगम ही बोली, “छोड़ दीजिए जी, क्यों परेशान होते हैं, बच्ची है, समझ जाएगी एक दिन।”
“नहीं, बेगम हमारी एक तरफ़ा मुहब्बत है। वन वे…बस लुटाते जाओ.. रिटर्न की कोई उम्मीद ही मत रखो, लेकिन कहीं तो यू टर्न होना चाहिए, कब तक चलते चले जाएंगे, इस इकहरे रास्ते पर। आदमी लगातार चलते चले जाने से थक जाता है। कभी तो सामने वाले का दिल पसीज जाए, अब तो ऐसा सोचना भी ग़लत है।”
“आप इतने मायूस क्यों होते हैं। हमारी भी तो बेटियाँ हैं।”
“मगर मैंने अपनी बेटियों को कभी ये नहीं सिखाया कि अपने घर को बर्बाद करो। ना ही कभी बेकार की बातों पर उनकी तरफ़दारी की।”
भाई-भावज की हालत बड़े नवाब से भी छुपी नहीं थी। आख़िकार उन्होंने आखिरी क़दम उठाते हुए एक दिन सबके सामने कह दिया, “बस अब बहुत हो गया। अगर रासिया अपनी मामी का ख़याल नहीं रखेगी तो उसे अपने मियाँ के साथ अलग रहना होगा और सलमान की जिम्मेदारी होगी कि अपनी माँ का ख़याल रखने वो हर दिन माँ के पास कुछ वक़्त गुज़ार कर अपनी बीवी के पास चला जाएगा।”
सादिबा बेगम ने बात को संभालने की कोशिश की, “नहीं भाई साहब, मुझे कोई शिकायत नहीं है।”
“नहीं अब इसके आगे कोई बात नहीं होगी। रज़िया तुम भी इस घर में अमल दख़ल मत दो। अपनी बेटी के बसे बसाए घर को बर्बाद करना क्यों चाहती हो!”
रासिया को लगा कि बात बिगड़ रही है, तो उसने अपने को संभालते हुए कहा, “नहीं मामू, मैं अब कोई शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी।”
रासिया समझती थी कि मामू-मामी और घर के सारे लोग उसे चाहते हैं, लेकिन वह अपने आपको घर के कामकाज के लिए तैयार ही नहीं कर पा रही थी। सबसे पहले तो उसे सुबह दस बजे से पहले उठने की कभी आदत ही नहीं रही। उसे लगता था, जैसे ही वह घर का काम संभालेगी, सुबह देर तक सो नहीं पाएगी। वह सोचती, घर के काम काज में फंस जाने से उसकी आज़ादी छिन जाएगी। उसने वादा तो किया कि वह शिकायत का मौक़ा नहीं देगी और दो-चार दिन कोशिश भी की, लेकिन बहुत बार इरादा करने के बावजूद भी वह उसमें निरंतरता नहीं रख पायी और धीरे-धीरे वही पुरानी रासिया बनती गयी। देर से उठना, घंटों फोन पर लगे रहना, घर के किसी काम से कोई वास्ता न रखना। मुश्किल से कभी कोई बीमार हो जाता तो बस पूछ लिया करती, कभी चाय से आगे उसके हाथ बढ़े ही नहीं। वह अपने आपको उस बेगानगी वाले ‘वन वे’ से हटा नहीं पायी। वह बस लेना जानती थी, देना तो कभी सीखा ही नहीं था, उसके भीतर का किरदार इतना टेढ़ा बन गया था कि सीधा होने के बारे में कुछ देर के लिए सोच भी ले तो उस सोच पर देर तक खड़े रहना बहुत मुश्किल था, बल्कि नामुमकिन।
इरफान अली भला क्या करते.. बाजी तो पहले भी उनके हाथ में नहीं थी। हारी हुई बाज़ी फिर एक बार हार गये। मामू जो ठहरे। घर की इज्ज़त घर ही में बनी रही। जैसे किसी रैन बसेरे में लोग वक़्त गुज़ार रहे हों। दो नदियों की उन धाराओं की तरह, जो कभी-कभी मिलकर भी अलग-अलग बहती हैं। हालांकि अब भी उन्हें इंतज़ार है उस वक़्त का, जब हालात बदल जाएँ। सोचते हैं, जब घर में छोटे बच्चों की किलकारियाँ होंगी तो यह कठिन वक़्त कुछ आसान होगा।
उम्मीद बंधी है, उन पलों से जो आएंगे ही, ऐसा कोई पक्का यक़ीन नहीं है, लेकिन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है।
- एफ एम सलीम
ब्यूरो चीफ, डेली हिंदी मिलाप, हैदराबाद
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मूल रूप से पत्रकार, कहानी, कविता, ललित निबंध एवं आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, 13 पुस्तकें प्रकाशित।
