Sunday, October 18, 2026
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डॉ. सुनीता शर्मा का काव्य-कविता के बहाने जीवन, स्त्री और समय से संवाद

चयनित कविताओं का आलोचनात्मक अध्ययन

 प्रो. प्रकाश शंकरराव चिकुर्डेकर

कविता केवल शब्दों की कलात्मक सज्जा नहीं होती; वह अपने समय की धड़कनों को सुनने, उन्हें पहचानने और फिर संवेदना के स्तर पर उन्हें शब्द देने की सर्जनात्मक प्रक्रिया है। जब कोई कवयित्री अपने अनुभवों, स्मृतियों, प्रश्नों, अंतर्द्वंद्वों और सामाजिक सरोकारों को कविता में रूपांतरित करती है, तब कविता निजी अनुभूति की सीमा लाँघकर सामूहिक जीवन का दस्तावेज बन जाती है। डॉ. सुनीता शर्मा की काव्य-यात्रा को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में पढ़ना अधिक सार्थक प्रतीत होता है।

डॉ. सुनीता शर्मा केवल कवयित्री ही नहीं, बल्कि कथाकार, शिक्षाविद्, शोधकर्ता और संपादक के रूप में भी हिंदी साहित्यिक संसार से सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं। कृष्णा सोबती के साहित्य में ‘युगबोध एवं मूल्य-संक्रमण’ जैसे गंभीर विषय पर किया गया उनका शोध उनके आलोचनात्मक संस्कार का परिचायक है। वर्तमान में मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया में रहते हुए भी हिंदी भाषा, देवनागरी, साहित्य और प्रवासी सांस्कृतिक विमर्श के साथ उनका निरंतर संबंध बना हुआ है।

उनके तीन काव्य-संग्रह—‘मैं गांधारी नहीं’, ‘अनछुए स्पर्श’ और ‘चिर प्रतीक्षित’—को साथ रखकर पढ़ने पर केवल तीन पुस्तकों का क्रम नहीं दिखाई देता, बल्कि एक विकसित होती हुई काव्य-चेतना की यात्रा सामने आती है। प्रथम संग्रह में जहाँ प्रतिरोध, प्रश्नाकुलता और स्त्री-अस्मिता अधिक मुखर दिखाई देती है, वहीं आगे बढ़ते हुए उनकी कविता संबंधों, सामाजिक विडंबनाओं, आत्म-संवाद, स्मृति, प्रवास और मानवीय संवेदना के अधिक जटिल स्तरों को स्पर्श करती है। इस यात्रा में मिथक से वर्तमान तक, निजी वेदना से सामाजिक पीड़ा तक और स्त्री के प्रश्न से समग्र मनुष्य के प्रश्न तक निरंतर विस्तार दिखाई देता है।

मिथक को दोहराना नहीं, उससे प्रश्न करना

डॉ. शर्मा की चयनित कविताओं में मिथक बार-बार आता है, किंतु वह अतीत का अलंकार बनकर नहीं आता। ‘मैं गांधारी नहीं’, ‘वज्रपात’, ‘एकलव्य’, ‘प्रतीक्षा’ और ‘ऋण से उऋण’ जैसी रचनाओं में मिथक समकालीन जीवन के प्रश्नों को देखने का माध्यम बनता है। कवयित्री मिथकीय पात्रों को स्थिर मूर्तियों की तरह नहीं रखतीं; वे उनके भीतर छिपे मौन, असमानता, निर्णय, त्याग और आत्मसम्मान के प्रश्नों को वर्तमान में पुनः सक्रिय करती हैं।

‘मैं गांधारी नहीं’ : दृष्टि बचाए रखने का प्रतिरोध

“हाँ, मैं गांधारी नहीं,
तभी तो
मैंने उतार फेंकी अंधेपन की पट्टी।”

इन पंक्तियों को केवल स्त्री-विद्रोह के रूप में पढ़ देना कविता की संभावना को सीमित करना होगा। गांधारी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में त्याग, पति-निष्ठा और स्वेच्छा से स्वीकार किए गए अंधत्व की प्रतीक रही है। कवयित्री उसी स्थापित प्रतीक से प्रश्न करती है। यहाँ प्रश्न गांधारी के चरित्र का मूल्यांकन भर नहीं है; प्रश्न यह है कि किसी संबंध में साझेदारी का अर्थ क्या स्वयं की दृष्टि को स्थगित कर देना भी है?

कविता की ‘पट्टी’ इसीलिए धीरे-धीरे वस्तु से प्रतीक में बदलती है। वह सामाजिक अनुकूलन की पट्टी हो सकती है, परिवार के दबाव की, परंपरा की, किसी विचारधारा की, और उस मानसिकता की भी जिसमें प्रश्न करना अवज्ञा समझ लिया जाता है। इस दृष्टि से ‘मैं गांधारी नहीं’ केवल स्त्री के आत्मनिर्णय की कविता नहीं रह जाती; वह विवेक को बचाए रखने की कविता बन जाती है।

यहीं इस कविता का प्रतिरोध अधिक गहरा हो उठता है। कवयित्री का संघर्ष पुरुष के विरुद्ध नहीं, दृष्टिहीन अनुकरण के विरुद्ध है। वह यह घोषणा करती है कि प्रेम, संबंध और दांपत्य की गरिमा तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी स्वतंत्र दृष्टि बचाए रख सके।

‘वज्रपात’ : एक वाक्य और स्त्री की व्यक्तित्व-सत्ता

‘वज्रपात’ में द्रौपदी-कुंती प्रसंग के माध्यम से एक बहुत पुराना प्रश्न नए रूप में सामने आता है—स्त्री को निर्णय की वस्तु मानना और स्त्री को स्वयं निर्णय लेने वाला व्यक्तित्व मानना, इन दोनों के बीच कितना अंतर है? “बाँट लो” जैसी सत्ता-भाषा के भीतर समस्या केवल एक मिथकीय प्रसंग की नहीं है। भाषा यहाँ सामाजिक मानसिकता का संकेत बन जाती है।

मनुष्य किसी वस्तु को बाँट सकता है, संपत्ति को बाँट सकता है, पर क्या किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा से बाहर ‘बाँटा’ जा सकता है? कविता इसी बिंदु पर मिथक को वर्तमान में खड़ा करती है। आधुनिक जीवन में भी स्त्री के विवाह, देह, संबंध, पेशे और भविष्य से जुड़े निर्णयों पर परिवार और समाज का हस्तक्षेप किस सीमा तक जायज़ है—यह प्रश्न कविता की पृष्ठभूमि में लगातार उपस्थित रहता है।

‘प्रतीक्षा’ : अहल्या को कौन मुक्त करेगा?

अहल्या की कथा सदियों से ‘उद्धार’ के आख्यान के रूप में पढ़ी जाती रही है। लेकिन जब वही कथा आधुनिक स्त्री की दृष्टि से देखी जाती है, तो प्रश्न बदल जाता है—क्या किसी स्त्री की गरिमा किसी दूसरे के आने से लौटती है? क्या न्याय किसी बाहरी उद्धारकर्ता का उपहार है? और क्या ‘प्रतीक्षा’ स्वयं एक ऐसी सामाजिक स्थिति नहीं बन सकती जिसमें पीड़ित व्यक्ति को सक्रिय न्याय के स्थान पर किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना सिखाया जाए?

डॉ. शर्मा की कविता इसी पुराने मिथक को वर्तमान के प्रश्न में बदलती है। इस पुनर्पाठ की शक्ति यह है कि वह कथा को नष्ट नहीं करता; वह कथा के भीतर एक ऐसा प्रश्न खोजता है जिसे परंपरागत पाठ अक्सर पीछे छोड़ देता है।

‘एकलव्य’ : कटा हुआ अंगूठा और आधुनिक शिक्षा

“आधुनिक युग में
कटे हुए अंगूठे फेंके नहीं,
वरन् जोड़े जाते हैं।”

इस छोटे-से कथन के भीतर पूरी पुरानी कथा का अर्थ उलट जाता है। एकलव्य का अंगूठा केवल शरीर का अंग नहीं है; वह प्रतिभा, अवसर, ज्ञान और सत्ता के संबंध का प्रतीक है। यदि व्यवस्था किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति के सामने ऐसे अवरोध खड़े करती है जिनके कारण उसका विकास रुक जाए, तो वह आधुनिक रूप में ‘अंगूठा माँगना’ ही है।

कवयित्री आधुनिक युग की संभावना को ‘जोड़ने’ की क्रिया में देखती है। यह जोड़ना केवल चिकित्सा-विज्ञान का संकेत नहीं, बल्कि ऐसी मानवीय और शैक्षिक दृष्टि का रूपक है जो वंचना को स्थायी नियति मानने के बजाय प्रतिभा को अवसर देना चाहती है। यहाँ गुरु की महिमा से आगे गुरु-सत्ता की नैतिकता पर भी प्रश्न उठता है—ज्ञान किसका है, अवसर किसका है और प्रतिभा पर अधिकार किसका होना चाहिए?

‘मैं धरती बनना चाहती हूँ’ : सहनशीलता से उपचार तक

‘मैं धरती बनना चाहती हूँ’ में प्रकृति केवल दृश्य नहीं रहती। धरती पीड़ा, स्मृति, धैर्य और उपचार का रूपक बनती है। धरती बहुत कुछ ग्रहण करती है—बीज भी, रक्त भी, बारिश भी, आघात भी—लेकिन उसी मिट्टी में पुनः जीवन अंकुरित हो सकता है।

कवयित्री का धरती बनना केवल सब कुछ सहते रहने की पारंपरिक स्त्री-छवि के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि पीड़ा को ग्रहण कर उसे जीवन में रूपांतरित करने की क्षमता किस प्रकार मनुष्य को पुनर्निर्मित करती है। सहनशीलता यदि केवल उत्पीड़न सहने का नाम हो तो वह मूल्य नहीं; लेकिन यदि वह टूटन से गुजरकर पुनः खड़े होने की क्षमता बने, तो उसका अर्थ बदल जाता है।

‘गीत’ : जब शब्द हथियार डाल देते हैं

‘गीत’ भाषा और मौन के बीच उस जगह को स्पर्श करती है जहाँ अनुभूति शब्द से बड़ी हो जाती है। कई बार हम मान लेते हैं कि भाषा सब कुछ व्यक्त कर सकती है, किंतु प्रेम, स्मृति, हानि, भय या किसी गहरे संबंध का अनुभव कई बार शब्द के पहले और शब्द के बाद भी बचा रह जाता है। जहाँ शब्द ‘हथियार डाल देते हैं’, वहाँ मौन स्वयं अर्थ ग्रहण करने लगता है।

‘अनछुए स्पर्श’ : भीतर की ओर जाती कविता

‘अनछुए स्पर्श’ में प्रवेश करते ही काव्य-स्वर अधिक आत्मसंवादी दिखाई देता है। यहाँ बाहरी प्रतिरोध के साथ आत्मान्वेषण, अपूर्णता, संबंधों की नमी, टूटन और जिजीविषा की आवाज अधिक स्पष्ट होती है।

‘अधूरापन’ : पूर्णता का दूसरा अर्थ

“पूरा होना माना मानो थम जाना…
जिस दिन अधूरी से, मैं पूरी हो गई…
समझो उस दिन जिंदगी की कहानी भी पूरी हो गई…!!”

सामान्यतः अधूरापन कमी का पर्याय माना जाता है, लेकिन यहाँ वही अधूरापन जीवन की गति और सृजन की संभावना बन जाता है। पूर्णता यदि अंतिम बिंदु है, तो उसके बाद यात्रा कहाँ? इसीलिए कविता अधूरेपन को कमजोरी नहीं, खुली संभावना के रूप में स्वीकार करती है। कुछ पाने, कुछ जानने, कुछ बनने और कुछ बदलने के लिए जो शेष रहता है, वही जीवन को गति देता है।

‘चरैवेति’ : टूटना, मरम्मत करना और चलते रहना

“अदम्य साहस से
अपनी जोड़-मरम्मत
करते-करते…”

‘जोड़-मरम्मत’ अत्यंत साधारण शब्द है, लेकिन कविता में वही असाधारण अर्थ ग्रहण करता है। यहाँ मनुष्य किसी महाकाव्य का अजेय नायक नहीं है। वह टूटता है, थकता है, उसकी आकांक्षाएँ अधूरी रहती हैं; फिर वह स्वयं की ‘मरम्मत’ करता है और आगे चलता है। जिजीविषा का अर्थ कभी न टूटना नहीं, टूटने के बाद भी स्वयं को पुनः जोड़ना है।

‘चरैवेति’ का प्राचीन भारतीय सूत्र इस प्रकार आधुनिक व्यक्तिगत संघर्ष के भीतर नया अर्थ ग्रहण करता है। यह कविता जीवन के प्रति आशावादी अवश्य है, किंतु उसका आशावाद भोला नहीं है; वह टूटन की वास्तविकता को स्वीकार करके आगे बढ़ने की बात करती है।

‘आम’ : एक फल से ‘आम आदमी’ तक

‘आम’ की शक्ति उसकी सादगी में है। एक बच्ची आम चाहती है और पिता उसकी इच्छा पूरी नहीं कर पाता। इतनी सामान्य-सी स्थिति के भीतर आर्थिक असमानता का पूरा संसार खुल जाता है। ‘आम’ फल है और ‘आम’ आदमी भी। इस दोहरे अर्थ के कारण छोटी-सी घटना सामाजिक व्यंग्य में बदल जाती है।

कविता आर्थिक विषमता पर भाषण नहीं देती; वह केवल एक इच्छा और उसकी असंभवता सामने रखती है। साहित्य का प्रभाव कई बार इसी में अधिक होता है—वह आँकड़ा नहीं देता, उस आँकड़े के पीछे का मनुष्य दिखाता है।

‘मेकअप’ : चेहरे से आगे सामाजिक आवरण तक

‘मेकअप’ प्रथम दृष्टि में सौंदर्य-प्रसाधन से जुड़ी कविता लग सकती है, किंतु धीरे-धीरे मेकअप सामाजिक जीवन का रूपक बन जाता है—चेहरे पर मेकअप, व्यवहार पर मेकअप, दुःख पर मेकअप, टूटे हुए संबंध पर मेकअप।

विशेषतः स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भीतर चाहे जितनी आहत हो, बाहर ‘ठीक’ दिखाई दे। परिवार की प्रतिष्ठा बचाए, चेहरे पर निशान छिपाए, आँसू छिपाए और फिर वही समाज उसकी ‘कृत्रिमता’ पर टिप्पणी भी करे। यही कविता का व्यंग्य है—समाज पहले मुखौटा लगाने को बाध्य करता है और बाद में उसी मुखौटे के लिए व्यक्ति को दोषी ठहराता है। इस अर्थ में ‘मेकअप’ स्त्री-विमर्श के साथ सामाजिक अभिनय और पहचान की कविता भी है।

‘बंजारन’ : प्रेम से अधिक स्वयं की खोज

‘बंजारन’ में रेगिस्तान, मृग-मरीचिका, नागफनी, बादल, वर्षा और समुद्र का विस्तृत बिंब-संसार उपस्थित है। लेकिन बाहरी भूगोल धीरे-धीरे भीतरी भूगोल बन जाता है। कवयित्री लिखती हैं—‘मैं अपनी तलाश में खुद…’। यही पंक्ति कविता की कुंजी है।

यह किसी प्रिय की तलाश भर नहीं है। कई बार प्रेम के भीतर मनुष्य वास्तव में स्वयं को खोज रहा होता है। रेगिस्तान भीतर का सूखापन बन जाता है, मृग-मरीचिका आशा और भ्रम, नागफनी पीड़ा, वर्षा पुनर्जीवन और समुद्र मिलन अथवा व्यापकता की संभावना। प्रकृति यहाँ सजावटी पृष्ठभूमि नहीं, मनःस्थिति का विस्तार बनती है।

‘चिर प्रतीक्षित’ : संबंधों से व्यापक मनुष्यता तक

‘चिर प्रतीक्षित’ तक आते-आते डॉ. शर्मा का काव्य-संसार संबंधों, सांस्कृतिक स्मृतियों, प्रवासी अनुभव और मानवीय संवेदना की अधिक जटिल परतों को स्पर्श करता है। यहाँ स्त्री की आवाज अपने अधिकार की माँग के साथ-साथ दूसरे मनुष्य की भीतरी पीड़ा को सुनने की क्षमता विकसित करती दिखाई देती है।

‘चलो बसाएँ’ : पुरुष भी मनुष्य है

“पुरुष हूँ तो इसीलिए
क्या पीड़ा का भी
अनुभव न करूँ कहीं..!”

इस कविता का महत्त्व इसलिए विशेष है कि यहाँ स्त्री-विमर्श एकतरफा सत्ता-विरोध में नहीं रुकता। पितृसत्ता केवल स्त्री पर ही नियम नहीं लगाती; वह पुरुष से भी एक निश्चित अभिनय की अपेक्षा करती है—पुरुष रोए नहीं, टूटे नहीं, सहारा माँगे नहीं, उसे सदैव मजबूत ही दिखाई देना चाहिए।

‘चलो बसाएँ’ इसी कृत्रिम पुरुषत्व को चुनौती देती है। यहीं कवयित्री का स्त्री-विमर्श मानवीय विमर्श की ओर बढ़ता है। समानता का अर्थ केवल यह नहीं कि स्त्री को स्वतंत्रता मिले; इसका अर्थ यह भी है कि पुरुष को उस भावनात्मक कैद से मुक्त किया जाए जिसे समाज ‘मर्दानगी’ कहता आया है।

‘लैंप पोस्ट’ : माँ की प्रतीक्षा और वृद्धावस्था का अकेलापन

“लैंप पोस्ट सी
देर रात तक जगती माँ
टिमटिमाती सी
निहारती रहती
रात दिन एक सड़क…!”

यहाँ उपमा बहुत सरल है, लेकिन उसका विस्तार अत्यंत मार्मिक है। लैंप पोस्ट स्वयं कहीं नहीं जाता; वह सड़क के किनारे खड़ा रहता है और दूसरों के आने-जाने की राह रोशन करता है। माँ भी प्रतीक्षा में वैसी ही स्थिर हो गई है। उसका शरीर क्षीण हो रहा है, पर आँखें अभी सड़क पर हैं।

कविता मातृत्व के साथ वृद्धावस्था के अकेलेपन का प्रश्न भी उठाती है। बदलते परिवार, दूर होती संतानें, प्रवास और वृद्ध माता-पिता—आज की सामाजिक संरचना में यह विषय और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। इसीलिए ‘लैंप पोस्ट’ व्यक्तिगत करुणा से आगे बढ़कर हमारे समय का सामाजिक दस्तावेज भी बन जाती है।

‘मंद-मंद’ : वटवृक्ष जब बोनसाई बन जाता है

‘मंद-मंद’ में गाँव और महानगर के बीच का अंतर केवल स्थान का अंतर नहीं है। सरसों के खेत, कच्ची कैरियाँ, मटर, गन्ना और आँगन का वटवृक्ष—इन सबके सामने शहर का ‘मरुस्थली ड्राइंग रूम’, कैक्टस और ‘बोनसाई वटवृक्ष’ खड़े हैं।

विशेषतः ‘बोनसाई वटवृक्ष’ आधुनिक जीवन की गहरी विडंबना को उद्घाटित करता है। वटवृक्ष भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में विस्तार, छाया, जड़ों और पीढ़ियों की निरंतरता का प्रतीक है। जब वही वटवृक्ष गमले में बोनसाई बन जाता है, तो प्रश्न केवल पेड़ के आकार का नहीं रहता—क्या हमने आधुनिक सुविधा और प्रदर्शनप्रियता के बीच अपनी परंपराओं को भी सजावटी और नियंत्रित रूप में सीमित कर दिया है?

प्रवासी अनुभव में इस बिंब का अर्थ और गहरा हो उठता है। नई भूमि पर जड़ों को बचाए रखने की कोशिश स्वाभाविक है, किंतु वे जड़ें नए भूगोल में किस रूप में जीवित रहेंगी—यह प्रश्न भी कविता के भीतर अनकहा उपस्थित है।

‘शब्द’ : भाषा का नैतिक जीवन

“कभी आग बन
झुलसा देना जिस्म को
तो कभी पानी बन
बुझा डालना मन की प्यास को।”

‘शब्द’ कविता भाषा के स्वभाव को अनेक विरोधी बिंबों में देखती है—आग और पानी, तमाचा और मरहम, पतझड़ और बसंत। शब्द केवल संवाद का साधन नहीं रहते; वे क्रिया बन जाते हैं। वे चोट पहुँचाते हैं, उपचार करते हैं, संबंध बनाते और बिगाड़ते हैं। और कभी जब सबसे अधिक आवश्यकता होती है, शब्द अनुपस्थित हो जाते हैं।

भाषा के प्रति यह सजगता डॉ. शर्मा के साहित्यिक संस्कार का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ शब्द की शक्ति का उत्सव भी है और उसके उपयोग की नैतिक जिम्मेदारी का बोध भी।

‘ऋण से उऋण’ : इतिहास का मौन पक्ष

‘ऋण से उऋण’ डॉ. शर्मा के मिथकीय पुनर्पाठ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कविता है। सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण मानव इतिहास की प्रतिष्ठित कथाओं में से एक है। संसार के दुःख का समाधान खोजने के लिए एक राजकुमार सब कुछ छोड़ देता है और इतिहास इसे महान त्याग के रूप में स्मरण करता है। कवयित्री उसी घटना को यशोधरा की ओर खड़े होकर देखती हैं।

वहीं से प्रश्न बदल जाता है। सिद्धार्थ ने क्या छोड़ा—यह इतिहास ने बहुत कहा। लेकिन जो पीछे छूट गए, उनका क्या हुआ? यशोधरा, राहुल, दांपत्य, एक अधूरा संवाद और वह रात—कविता इन्हीं उपेक्षित बिंदुओं को केंद्र में लाती है।

कविता यशोधरा को केवल त्यागी गई स्त्री के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। उसमें सिद्धार्थ के भीतर चल रही बेचैनी को समझने की क्षमता भी है। वह जानती है कि सिद्धार्थ जा सकते हैं, वह चाहती तो उनकी राह रोक सकती थी, लेकिन कविता में एक क्षण आता है जहाँ हाथ की पकड़ ढीली पड़ जाती है—

“मन ने जैसे आदेश दिया हो
मुक्त करो…
निर्णायक घड़ी…
न कमजोर बनो…”

यही बिंदु यशोधरा को निष्क्रिय परित्यक्ता से अलग करता है। कविता अपनी कल्पना में उस ऐतिहासिक मौन को भरती है जिसमें यशोधरा का निर्णय दर्ज नहीं हुआ। क्या वह सो रही थी? या उसने जाना और जाने दिया? इतिहास एक उत्तर देता है; कविता दूसरा प्रश्न उठाती है।

यहाँ स्त्री-विमर्श पुरुष की महत्ता कम करके स्थापित नहीं किया जाता। सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण अपनी जगह है, लेकिन यशोधरा का पीछे रह जाना भी एक प्रकार की तपस्या है। एक बाहर गया; एक भीतर रही। एक ने संसार का दुःख देखा; दूसरी ने अपने निजी दुःख को जीवन की जिम्मेदारियों में रूपांतरित किया। इतिहास ने पहले को ‘बुद्ध’ के रूप में स्मरण किया; कविता दूसरे के मौन पर रोशनी डालती है।

और अंत में जब यशोधरा राहुल को भी सिद्धार्थ को समर्पित करती है, ‘ऋण से उऋण’ का अर्थ और जटिल हो जाता है। यह प्रतिशोध नहीं, केवल विरह भी नहीं। यह संबंधों, स्वायत्तता, प्रेम और त्याग की ऐसी गाँठ है जिसे कविता सरल नैतिक निष्कर्ष में नहीं बाँधती। यही इस रचना की शक्ति है—वह इतिहास के प्रसिद्ध नायक को गिराती नहीं, इतिहास की दृष्टि को विस्तृत करती है।

अन्य चयनित रचनाएँ : विस्तृत होता अनुभव-संसार

‘भूख’, ‘कलयुग की राधा’, ‘मुखौटा’, ‘प्रवासी भारतीय तू…!’, ‘हिंदी’ और ‘मैं चिर प्रतीक्षित…!!’ जैसी रचनाएँ डॉ. शर्मा के काव्य-संसार के अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम सामने लाती हैं। ‘भूख’ गरीबी के साथ-साथ उस संवेदनहीनता पर प्रश्न करती है जो किसी की पीड़ा को प्रदर्शन और लोकप्रियता की वस्तु में बदल देती है।

‘मुखौटा’ डिजिटल युग की कृत्रिम प्रस्तुति और आत्म-पहचान के विस्थापन को छूती है। ‘कलयुग की राधा’ प्रेम, देह, मित्रता और स्त्री-चरित्र के सामाजिक मानदंडों पर पुनर्विचार कराती है। ‘प्रवासी भारतीय तू…!’ और ‘हिंदी’ भाषा, संस्कृति, जड़ों और वैश्विक जीवन के बीच बनने वाले नए संबंधों को सामने लाती हैं। ‘मैं चिर प्रतीक्षित…!!’ विभिन्न मिथकीय स्त्रियों के अनुभवों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए स्त्री-अनुभव की दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति की ओर संकेत करती है।

क्षणिका और लघुकाव्य : कम शब्द, विस्तृत अर्थ

डॉ. शर्मा की क्षणिकाओं और लघुकविताओं में भी उनकी काव्य-दृष्टि का एक विशिष्ट पक्ष दिखाई देता है। ‘चुनौती’, ‘पारदर्शी आँसू’, ‘एक चेहरा’, ‘कमरा’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘रूह की खुशी’, ‘वह मुस्कुराना’, ‘दीदार’ और ‘रिहाई’ जैसी रचनाएँ कम शब्दों में बिंब, प्रश्न और जीवन-दृष्टि का विस्तार करती हैं।

क्षणिका की सफलता केवल उसके छोटे होने में नहीं है। कम शब्दों में यदि केवल कथन रह जाए तो वह कविता नहीं बनती। क्षणिका वहाँ सफल होती है जहाँ शब्द कम हों लेकिन उनके बाद अर्थ खुलता रहे। डॉ. शर्मा की लघु रचनाओं में कई बार एक छोटा-सा बिंब पूरे अनुभव-संसार को खोल देता है। यह संक्षिप्तता उनके काव्य की एक अलग पहचान बनाती है।

किसी एक वाद में सीमित नहीं

इस समूचे चयन को देखते हुए यह कहना अधिक उचित होगा कि डॉ. सुनीता शर्मा की कविता किसी एक ‘वाद’ की चौहद्दी में स्वयं को सीमित नहीं करती। उसमें स्त्री-विमर्श है, किंतु केवल स्त्री-विमर्श नहीं; उसमें मिथक है, किंतु केवल मिथकीय पुनरावर्तन नहीं; उसमें प्रवासी अनुभव है, किंतु केवल प्रवास का आत्मवृत्तांत नहीं; उसमें प्रेम है, किंतु केवल प्रणय की अभिव्यक्ति नहीं; उसमें सामाजिक यथार्थ है, किंतु वह नारे में नहीं बदलता।

इन सबके भीतर उनका मूल सरोकार मनुष्य है। शायद इसीलिए उनकी स्त्री-कविता धीरे-धीरे मानवीय कविता बन जाती है और उनका निजी अनुभव व्यापक सामाजिक अनुभव में रूपांतरित होता है।

भाषा, बिंब और संवादधर्मिता

डॉ. शर्मा की भाषा सामान्यतः सहज, सीधी और संवादधर्मी है, किंतु उसके भीतर रूपक और व्यंजना की दूसरी परत भी उपस्थित रहती है। ‘पट्टी’, ‘अंगूठा’, ‘मेकअप’, ‘लैंप पोस्ट’, ‘बोनसाई वटवृक्ष’, ‘जोड़-मरम्मत’ जैसे शब्द और बिंब सामान्य जीवन से लिए गए हैं, लेकिन कविता में आते ही व्यापक वैचारिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।

उनकी रचनाएँ कई बार तैयार उत्तर देने के बजाय प्रश्न उत्पन्न करती हैं। गांधारी की पट्टी क्यों? एकलव्य का अंगूठा क्यों? अहल्या को कौन मुक्त करेगा? यशोधरा का त्याग इतिहास में कहाँ है? पुरुष क्यों नहीं रो सकता? भूख की तस्वीर खींचना करुणा है या प्रदर्शन? वटवृक्ष को बचाना है या केवल उसका बोनसाई सजाना है? शब्द कब मरहम और कब तमाचा बनते हैं? यही प्रश्न उनकी कविता को पाठक के भीतर सक्रिय रखते हैं।

निष्कर्ष

डॉ. सुनीता शर्मा की चयनित कविताओं को समग्र रूप से पढ़ने पर कुछ अंतःसूत्र लगातार दिखाई देते हैं—प्रश्न करने की प्रवृत्ति, स्थापित कथा को दूसरी ओर से देखने की इच्छा, मनुष्य की गरिमा के प्रति चिंता और जीवन को किसी एक निश्चित उत्तर में बंद न करने की बेचैनी।

इन कविताओं में स्त्री की आवाज है, लेकिन वह केवल स्त्री तक सीमित नहीं रहती। शिक्षा का प्रश्न है, पर वह केवल संस्था का प्रश्न नहीं रहता। मिथक है, किंतु अतीत में बंद नहीं। प्रेम है, किंतु केवल प्रणय नहीं। सामाजिक यथार्थ है, किंतु नारे में नहीं बदलता। भाषा सरल दिखाई देते हुए भी अनेक जगह दूसरे और तीसरे अर्थ की संभावना खोलती है।

डॉ. शर्मा की कविता की शक्ति इस बात में है कि वह पाठक को निष्क्रिय नहीं रहने देती। वह कभी प्रश्न करती है, कभी चौंकाती है, कभी स्मृति में लौटाती है और कभी भीतर के मौन से सामना कराती है। उनकी कविता में आँसू हैं तो प्रतिरोध भी; स्मृति है तो प्रश्न भी; प्रेम है तो आत्मसम्मान भी; पीड़ा है तो जिजीविषा भी।

किसी कवयित्री की सार्थकता अंततः इसी में है कि उसके शब्द पुस्तक के पृष्ठों से बाहर निकलकर पाठक के जीवन और विचार में प्रवेश करें। डॉ. सुनीता शर्मा की रचनाशीलता में यह संभावना स्पष्ट रूप से उपस्थित है। उनकी कविता अतीत से संवाद करते हुए वर्तमान को देखती है, वर्तमान से प्रश्न करते हुए भविष्य की ओर खुलती है और सबसे बढ़कर मनुष्य को उसकी अपनी संवेदना से पुनः परिचित कराती है।

इसी अर्थ में डॉ. सुनीता शर्मा का काव्य कविता के बहाने जीवन, स्त्री, समय, स्मृति, समाज और मनुष्य से चलता हुआ एक सतत संवाद है।

प्रो. डॉ. प्रकाश शंकरराव चिकुर्डेकर
प्राचार्य, श्रीमती चंपाबेन बालचंद शाह महिला महाविद्यालय, सांगली, महाराष्ट्र
वारणानगर, जिला कोल्हापुर, महाराष्ट्र, भारत

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