यहीं, इसी जगह पर पहले एक चाल हुआ करती थी। उसमें  चार खोली हमारी थी। उधर , आनंद अपार्टमेंट के सामने वाले उस फ्लैट में तो हम बाद में गए थे। पहले यहाँ से दिखता था वो फ्लैट। अब तो देखो, बीच में ये इतने फ़्लैट  हो गए ! यहाँ मुंबई का तो पूछो मत , हर महीने एक नया फ़्लैट उग आता है। तो उस साल म्हाडा की स्कीम इस इलाके के लिए भी आई थी। मेरे भाई ने भी फार्म भर दिया।

उसका नसीब देखो , लग गया उसका नम्बर ! उस समय उसके पास पूरे पैसे भी नहीं थे। इधर-उधर से मांग के भी कम पड़ रहे थे। मेरी भाभी ने भाई को सुझाया कि माँ के गहने बेच दो , आखिर गहने इन्हीं दिनों के लिए तो होते हैं। भाई ने गहने बेच दिये। अच्छे पैसे मिले थे माँ के गहनों से … पुराने जमाने के एकदम शुद्ध सोने के मोटे-मोटे चार कड़े थे , गले की मोटी – सी चेन थी , दादी की दी हुई सोने की मोटी करधनी भी थी। अंगूठियाँ ,बुँदे तो कई-कई जोड़ थे माँ के पास। कुछ उसे शादी में मिले थे , कुछ मेरी दादी ने दिया था। माँ जब तक रहीं अपने गहनों को संभाल कर रखीं , तभी तो भाई के काम आये वो गहने।

     उधर हमारा फ़्लैट चौथे माले पर था। उस माले पर चार फ़्लैट और थे। सारे वन बी .एच. के.। एक हाल , एक बेडरूम , एक किचन ,। रसोई मिलाकर बस तीन कमरे , रहने वाले हम पांच जन –

मैं ,मेरा भाई , मेरी भाभी और उसके दो बच्चे –एक बेटा , एक बेटी। मैं सुबह उठकर घर में झाड़ू-पोछा करती , बरतन मांजती , दुकान से दूध और ब्रेड ले आती , सब्जी-भाजी काट लेती , आटा गूँथ कर रख लेती। तब तक मेरी भाभी भी उठ जाती। मेरी भाभी को घर में भीड़-भाड अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए उनके उठने के बाद मैं हाल से लगकर ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर बैठ जाती थी।  लोग लिफ्ट से ऊपर –नीचे आते- जाते थे न , इसलिए  सीढ़ियाँ खाली ही रहती थीं और मुझे बैठने का स्थान मिल जाता था।

     नाश्ता और खाना भाभी ही बनाती थीं। मुझे देख कर उन्हें घिन आ जाती थी … वो मेरे दांत थोड़े बड़े और भद्दे थे न , इसलिए। जब तक खाना बनता था , मुझे रसोई में जाने की इजाज़त नहीं थी। जब भाभी सबका टिफिन भरकर तैयार कर देती थीं और खुद भी अपना टिफिन लेकर डयूटी पर निकल जाती थीं , तब मैं रसोई में जाती थी। नाश्ता- खाना जो कुछ भी रहता था , खा लेती थी और फिर से किचन की सफाई करती, बरतन मांजती, कपड़े धोती और दोपहर में बैठकर टीवी देखती ।

      मेरी भतीजी मीता जब बड़ी हुई तो उसकी शादी हो गई। पर कैसे – कैसे तो लोग हैं इस दुनिया में। बेचारी को ठीक से रक्खे ही नहीं, आ गई लौटकर। कुछ दिन बाद उसका तलाक हो गया। उसे देख-देख कर मेरा मन भीतर ही भीतर बहुत रोता था।

     अब मेरी भतीजी भी घर में रहने लगी। अब दोपहर में हम दोनों साथ-साथ बैठकर टी . बी . देखते। वह दीवान पर बैठ जाती , मैं नीचे फर्श पर। वह मुझसे घिनाती नहीं थी। भाभी की छुट्टी वाले दिन मैं काम करके पूरी दोपहर सीढियों पर ही बैठी रहती थी। अन्य दिनों में तो कोई दिक्कत नहीं होती थी पर बरसात में पानी की बौछार सीढ़ियों तक आ जाती थी।

     मेरे घर के सामने वाले फ़्लैट में शिंदे परिवार रहने आया। शिंदे भाभी और मेरी भाभी कभी-कभी बात-चीत करती थीं। लिफ्ट से ऊपर-नीचे आते-जाते समय जब उन्हें मैं सीढ़ियों पर बैठी दिख जाती थी तब वो मेरा भी हाल-चाल पूछ लेती थी। मेरे होंठ बहुत अधिक न फ़ैल जाएँ इस बात का ध्यान रखते  हुए मैं धीरे से मुस्करा देती थी। मुस्कराने के अलावा मैंने उन्हें कभी कोई जवाब दिया ही नहीं। धीरे-धीरे उन्होंने मुझसे कुछ पूछना छोड़ दिया पर सामने पड़ने पर मुस्करा जरुर देतीं थीं।

     मेरी भाभी कहती थीं कि मेरे दांत गंदे हैं तो मैं सोचती थी कि जैसे भाभी को मेरे दांतों की घिन है वैसे दूसरों को भी होगी। बस , इसलिए मैंने सब से बोलना , मुस्कराना छोड़ दिया था।

     एक दिन जब मेरी भाभी की छुट्टी  थी , उन्होंने पकौड़े बनाये। एक प्लेट में पकौड़े भरकर उन्होंने मुझे शिंदे भाभी के घर दे आने के लिए कहा। जब मैं वहां गई तो शिंदे भाभी ने मुझे बैठने के लिए कहा। मैं सकुचाती हुई बैठ गई। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तुम इनके यहाँ काम करती हो ?’ मैंने मुंह पर हाथ का आड़ लेते हुए कहा , ‘नहीं, ये मेरे भाई का घर है, मैं यहीं रहती हूँ।’

    ‘तुम इनकी बहन हो ?’

    ‘हाँ’

   उन्हें जैसे विश्वास ही नहीं हुआ , उन्होंने फिर से वही प्रश्न दोहरा दिया, ‘सच में ! तुम इनकी बहन हो ?’ मेरे फिर से ‘हाँ’ कहने पर वे चुप हो गईं। मैं भीतर ही भीतर शर्म से पानी-पानी हो गई – ये मुझे काम करने वाली समझती हैं  !!

  उन्होंने मुझे चाय पिलाई। थोड़ी देर वहाँ बैठकर मैं वापस आ गई। उस दिन उनसे मेरी बहुत कम बात हुई पर उतने से ही वो मुझे बहुत अच्छी लगने लगीं। मेरा उनसे बार-बार बात करने का मन होने लगा और मैं अपने दांतों पर खूब रगड़-रगड़ कर ब्रश करने लग गई।

   एक दोपहर , जब भाभी अपनी डयूटी पर थीं तथा तेजस अपने स्कूल और मीता अपनी सहेली के घर गई थी , मैंने उनका दरवाजा खटखटाया।दरवाजा उन्होंने ही खोला। मैं हड़बड़ा कर पूछ बैठी , ‘आप कौन-सा शैम्पू लगाती हैं ? …आपके बाल बहुत अच्छे हैं , मुझे भी  वही शैम्पू लाना है।’ उन्हें सामने देखकर मुझे यही बहाना सूझा था। वो मुस्कराई। उन्होंने शैम्पू का नाम बताया , जिसकी मुझे कोई जरूरत नहीं थी , मैं शैम्पू के नाम को तुरंत भूल गई और अगला प्रश्न कर बैठी , ‘उस दिन पकौड़े अच्छे बने थे ?’

‘हाँ , बहुत अच्छे ,आओ बैठो न।’ मैं यही चाहती थी। बिना देर किये अंदर जाकर कुर्सी पर बैठ गई।

‘मीता कह रही थी कि , नमक कुछ कम हो गया था।’

‘नहीं , ठीक तो था, …तुमने भी तो खाया होगा ?’

‘नहीं , पकौड़े कम पड़ गए थे।’ अचानक मेरे मुंह से निकल गया।वो मुझे कुछ देर तक देखती रह गईं और मैं अपनी झेप मिटाने के लिए आस-पास रखे सामानों पर नजर दौड़ाते हुए बैठी रही। उन्होंने मुझसे पूछा , “आप इतनी गरमी में भी पूरी- पूरी दोपहर बाहर जीने पर बैठी रहतीं हैं , क्यों ?”

मुझे उनके इस प्रश्न पर मुस्कराने का मन हुआ पर न जाने कैसे मैं रो पड़ी। वो मुझे गले से लगाईं , चुप कराई। कुछ देर वहाँ बैठ कर मैं अपने घर आ गई।

    अब मैं मौका पाते ही उनके पास चली जाती थी। वो मुझसे बहुत –सी बातें पूछती थी , मैं उन्हें बहुत – सी बातें बताती  थी। जैसे – हम लोग पहले पीछे वाली चाल में रहते थे। अब मेरे माँ-बाप नहीं हैं। मेरी एक बहुत अच्छी सहेली थी। हम लोग साथ-साथ बाजार जाते,पिक्चर देखते , भेल-पूरी ,बड़ा-पाव खाते। मेरी सहेली बहुत गरीब थी। उसकी पढ़ाई का भी खर्च मेरी माँ ही देती थीं।  पिताजी की किराने की दुकान थी।जब मेरे पिताजी का हार्ट फेल हो गया तब उस दुकान को मेरा भाई संभालने लगा। मेरी सहेली बहुत अच्छी थी। मेरे भाई के साथ बाजार जाती थी और दुकान के लिए मोल- भाव करके थोक में सामान खरिदवाती थी।

    बारहवीं के बाद हम दोनों ही नर्स की ट्रेनिंग करने लगे। ट्रेनिंग को तीन-चार महीने ही बीते थे कि एक दिन मेरी माँ का भी हार्ट फेल हो गया। मैं और मेरा भाई बिना माँ – बाप के हो गए। मेरी सहेली हम दोनों का अब और अधिक ध्यान रखने लगी। एक दिन उसने मुझे समझाया कि मैं ट्रेनिंग छोड़कर घर में रहूँ , भाई के खाने- पीने की व्यवस्था तथा घर की देख-भाल ट्रेनिंग से ज्यादा जरूरी है। मुझे भी उसकी बात जँच गई —मैं घर में रहूंगी तो भाई को घर, घर जैसा लगेगा , नहीं तो माँ को याद करता बैठा रहेगा — मैंने नर्स की ट्रेनिंग छोड़ दी। कुछ दिनों बाद मेरे भाई ने शादी कर ली।

‘तुमने नहीं की शादी ?’ मुझे बीच में टोकते हुए उन्होंने पूछा।

‘नहीं , … नहीं की। … शुरू-शुरू में मेरे लिए कई रिश्ते आये , कई जगह बात चली, पर मेरे भाई और भाभी को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था और जो पसंद आता था उसे मै पसंद नहीं आती थी। फिर धीरे-धीरे रिश्ते आने बंद हो गए। …मैं इतनी सुंदर भी तो नहीं थी कि कोई मुझसे शादी करता।’ मैं हँसने लगी।

‘किसने कहा ? तुम अभी भी बहुत सुंदर हो , बस रहती नही हो ठीक से … पहले भी ऐसे ही रहती रही होगी ! अब देखो न ,  … इतना लम्बा , ढीला ढाला कुरता पहनती हो ,गले में किसी भी रंग की ओढ़नी लटका लेती हो , …बुरा मत मानना, लेकिन ठीक से रहो तो अभी भी सुंदर हो।’

‘हाँ,…. पर भाभी के कपड़े मुझे बड़े और ढीले ही होते हैं।’

‘तो सिलाई करवा के अपने नाप का बनवा लिया करो न।’

“टेलर बहुत पैसा मांगता है , भाभी कहती हैं कि इतने पैसों में तो नया सिल जायेगा।’

‘तो नया सिलवा लिया करो , और ये जो बोलते समय मुँह पर हाथ रख लेती हो , ये भी पुरानी आदत होगी ?’

‘जी,   … वो मेरे दांत बहुत बड़े  और गंदे हैं न।’ मैंने नजरे झुकाते हुए कहा।

‘ तुम्हारे दांत न तो इतने बड़े हैं और न ही गंदे।… अपने नाप का कपड़ा पहनों, बात करते समय मुँह  पर  हाथ मत रक्खा करो  … तुम्हारे अंदर कोई कमी नही है … अपने को कम मत समझा करो।’

मै चुप हो गई। उस दिन मैंने पहली बार सोचा कि , सही तो कह रही हैं ये। मुझे अपने नाप के ही कपड़े पहनने चाहिए। कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने उन्हें बताया , “जब मेरी सहेली थी न ,तब मैं उसके साथ जाकर अपने नाप के कपड़े खरीदती थी …बहुत अच्छी पसंद थी उसकी … और तब मेरे पास पैसे भी रहते थे।”

“तुम्हारी सहेली अब कहाँ है ?”

“ यहीं है।”

“इसी शहर में ?”

“हाँ” मेरी आवाज धीमी हो गई।

“ कभी मिलने नहीं आती ?” मैं  चुप रही , उन्होंने बात जारी रखते हुए पूछा , “उसकी तो शादी हो गई होगी न ?”

“हाँ , कब की हो गई।”

“ शादी के बाद बहुत-सी जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं , इसलिए वो नहीं आ पाती होगी …. तुम लोगों को मिले भी तो लंबा समय बीत गया है , एक बार जाकर उससे मिल आओ तो फिर से मिलने-जुलने का ,

सिलसिला शुरू हो जायेगा और तुम्हें अच्छा भी लगेगा  …  अकेले जाना तुम्हें कठिन लगे तो अपनी भतीजी या भाभी को साथ लेकर चली जाओ।” मैं  चुप रहना चाहती थी पर पता नहीं कैसे मैंने सिर नीचे किया और धीरे से कह गई, “  मेरी भाभी ही मेरी सहेली थीं।”

   वो बड़ी जोर से  “क्या” कह कर चौंकी थी। फिर बहुत देर तक हम दोनों ही चुप बैठे रहे। बाद में मैं अपने घर आ गई।

       अगले  कई महीनों तक सब ठीक-ठाक चलता रहा। इस बीच नगर पालिका ने हमारी चाल को तोड़ कर  उस जगह पर अपार्टमेंट बनाना शुरू किया। हमारी खोली के बदले में मेरे भाई को दो “वन आर  के” फ़्लैट मिलने वाले थे।

     एक दिन जब मेरे घर में कोई नहीं था तब शिंदे भाभी ने मुझे अपने घर बुलाया। उनके घर में एक मैडम बैठी थीं। शिंदे भाभी ने बताया कि ये एक संस्था की अध्यक्ष हैं, इनकी संस्था महिलाओं के हित का काम करती है। उन मैडम ने मुझसे मेरे पिता का नाम तथा मेरी चाल का पता और नम्बर पूछा। मैंने उन्हें बता तो दिया पर मन मे विचार आया कि जब अब चाल गिरा दी गई है तब उसका पता और नम्बर पूछ कर ये क्या करेंगी ! शिंदे भाभी ने मुझसे कहा कि ये  पता और नम्बर पूछने वाली बात को मैं किसी से न करूँ। वो मुझे अपनी-सी लगने लगीं थीं , मैंने उनकी बात गांठ बांध ली और कभी किसी के सामने इस बात का जिक्र नहीं किया।

   एक महीने बाद महानगर पालिका से एक नोटिस आई , जिसे पढ़कर मेरा भाई चिंतित दिखने लगा। मैं बाहर सीढियों पर बैठी थी, वह भाभी से बता रहा था कि , “मैं खोली का अकेला वारिस नहीं हूँ , किसी ने इस बात की शिकायत कर दी है , अब जाँच होगी।” उसके बाद भाभी उस पेपर को बहुत देर तक पढ़ती रहीं|

    अगले कई दिनों तक मेरे घर पर महानगर पालिका के कई कर्मचारी आये , गए। मेरा भाई भी  वकीलों के यहाँ चक्कर लगाता रहा। मुझे शक हुआ कि ये सब जो कुछ भी हो रहा है कहीं उसका सम्बंध उस महिला को खोली का पता और नम्बर बता देने से तो नहीं है ! मैं मौका देखकर सामने वाली भाभी के पास गई। उन्हें सब कुछ बताया और जानना चाही कि मेरे पता और चाल नम्बर बताने के कारण ही ये सब हो रहा है क्या।

   मैंने शिंदे भाभी से जो कुछ पूछा उसका जवाब तो उन्होंने नहीं दिया उल्टे मुझसे ही पूछ बैठीं , “वो तुम्हारे पिता की खोली थी न , क्या तुम नहीं चाहती हो कि उसमें तुम्हे भी हिस्सा मिले ?”

“हिस्सा !!… क्या करूंगी मैं हिस्सा लेकर ? …रहती तो मैं यहीं हूँ।”

“हाँ ,सीढियों पर बैठकर , उतरे हुए कपड़े पहनकर , बच जाये तो खाकर नहीं तो संतोष करके —वो आवेश में बोल रही थीं और मैं आश्चर्य से उन्हें देख रही थी। क्या रिश्ता था उनसे हमारा ! फिर भी कितनी अपनी – सी लग रहीं थीं वो ! कुछ देर बाद वो एकाएक नरम हुईं। मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोलीं , “चार खोली के बदले , दो फ्लैट मिल रहा है –वन आर के ही सही , पर है तो दो फ्लैट – उसमें से एक तुम्हे मिल जाये तो क्या गलत होगा ? …क्या तुम नहीं चाहती हो कि दोपहर आराम से बिताओ, बोलो ?”

मैंने ‘हाँ’ में  सिर हिला दिया।

“तब तुम शांत रहो , बस इतना ध्यान रखना कि चाहे कुछ भी हो जाये पर  प्रापर्टी के किसी पेपर पर दस्तखत मत करना और जब भी जरूरत पड़े खुल कर कहना कि तुम्हें भी पिता की सम्पत्ति में हिस्सा चाहिए , समझी न ?”

   मैंने फिर से ‘हाँ ‘ में सिर हिला दिया पर ठीक-ठाक कुछ समझ नहीं पाई। मेरी बुद्धि इस ओर कभी गई ही नहीं।  ये मेरे भाई का घर है ,मैं उसके साथ रह रही हूँ और ऐसे ही रहते रहना है। इससे अधिक मैंने कुछ सोचा ही नहीं था। पर अब दिमाग में हर समय यही गूंजता है — –मेरा भी हक ! और मैं दिन-दिन भर सीढियों पर बैठी रहती हूँ !!मेरा भी हक, और मैं भाभी के उतारे कपड़े पहनती हूँ !! मेरा भी हक, और मैं कुर्सी या बिस्तर पर बैठ नहीं सकती हूँ !! मेरा भी हक और मैं पकौड़े , समोसे या कुछ नया बनने पर रसोई में उसे बनता देखकर संतोष करती हूँ !! मेरा भी हक !! मेरा भी हक !!

      हथौड़े की तरह वार कर-करके मुझे सचेत कर दिया इस शब्द ने। अब मैं भी चाहने लग गई की एक फ्लैट मुझे मिल जाये।

    मेरा भाई और भाभी दिन-दिन भर अनुमान लगाते कि उनके खिलाफ शिकायत करने वाला व्यक्ति बिल्डिंग का ही है या कोई नाते रिश्तेदार है।

एक दिन मेरे भाई ने एक पेपर मेरे सामने फैला कर कहा , “यहाँ, इस जगह पर दस्तखत कर दो।” मुझे शिंदे भाभी की बात याद हो आई। मैंने पूछा , क्या है ये ? …मेरा दस्तखत क्यों चाहिए ?”

“खोली का पेपर है , दोनों फ्लैट मेरे नाम चढ़ने हैं ,इसलिए।” मेरे भाई को विश्वास था कि मैं उसके बोलते ही दस्तखत कर दूंगी। पर जब मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया तो वह चीखा , “क्या ! …तुम दस्तखत नहीं करोगी ? क्यों ?”

“क्योंकि मुझे भी हिस्सा चाहिए।” शिंदे भाभी ने मुझे जैसा कहा था ,मैंने वैसा ही बोल दिया। मेरे भाई को जैसे करंट लगा।

“तो तुमने शिकायत की थी मेरी ?”

“नहीं , मैंने कुछ नहीं किया , पर लेना है मुझे।”

   वर्षों से मैं भाई के सामने चुप रहती आई थी और अब जब बोली तो सीधे हिस्से की बात।   मेरे भाई को मेरी ये गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं हुई। उसने मुझे जोर का धक्का दिया। मैं फर्श पर गिर पड़ी। वह चिल्लाता रहा ,–नमकहराम , मैं इतने सालों से पाल रहा हूँ तुम्हें और तुम हो कि एहसान मानने की बजाय हिस्सा माँग रही हो।… याद है ,  माँ-बाप को गुजरे पच्चीस साल हो गए , मैंने मुँह मोड़ लिया होता तो अनाथों की तरह कहीं भीख मांगती पड़ी रहती , तब तुम्हारा दिमाग इतना न चलता… आज चली हो हिस्सा माँगने ….

       वह चिल्लाता रहा , मैं फर्श पर औंधे मुँह पड़ी रही। …नहीं , चोट लगने के कारण नहीं , दिल के दर्द के कारण – सारी शक्ति निचुड़ गई थी , अपने से उठ पाना संभव नहीं लग रहा था। मीता घर पर थी , तेजस भी था। तेजस से तो नहीं पर मीता से मुझे उम्मीद थी कि वह आएगी मेरे पास। लेकिन वह भी नहीं आई। अचानक मुझे ध्यान आया कि मीता कैसे आयेगी ,आखिर पैर तो पेट की तरफ ही मुड़ता है , मैं ही उल्टी  उम्मीद लगा बैठी हूँ। हताश होकर मैं खुद ही उठी। भाई अब भी चिल्ला रहा था , मैं चुप रही पर दस्तखत मैंने नहीं किये।

    अगले कई दिनों तक मेरी भाभी और भाई ने मुझे तरह – तरह से समझाया। प्रेम दिखाया , लालच दिखाई ,डांट –फटकार लगाई पर मैं टस से मस न हुई। शिंदे भाभी की बात मुझे अपने भाई भाभी की बात से अधिक भरोसे की लगी थी।

    एक दिन मेरे भाई का धैर्य समाप्त हो गया। उसने पहले तो मुझे खूब गालियां दी , जी भरकर हाथ उठाया और अंत में मुझे घर से निकाल दिया। दो अपार्टमेंट छोड़कर दूर के रिश्ते की मेरी एक मौसी रहती थीं , मैं उनके घर गई। मेरी मौसी ने कहा , “मैं तुम दोनों की लड़ाई – झगड़े में तो नहीं पडूँगी पर तुम जब तक चाहो मेरे घर रह सकती हो।” मैं मौसी के घर रहने लगी।  भाई कोर्ट में ये नहीं सिद्ध कर सकता था कि वह पिता की इकलौती संतान है और मैं अपना हिस्सा छोड़ने को तैयार नहीं थी।

  … और इसप्रकार दो आर के फ्लैट में से एक , ये वाला ,मेरे नाम हो गया।

   फ्लैट मिलने में साल-डेढ़ साल का समय बाकी था। मैं मौसी के घर रहने लग गई थी। मौसी ने वहीँ पास की ही एक किराना की दुकान पर मेरी नौकरी लगवा दी। मौसी को एक बेटी थी जो अपने ससुराल में थी , यहाँ बस मौसा मौसी रह रहे थे। मैं अपनी कमाई का कुछ पैसा मौसी को दे देती थी तथा घर के कामों को भी कर लेती थी। इसप्रकार मैं मौसी पर बोझ नहीं थी।

   अब मैं खुल कर साँस ले रही  थी और मन ही मन शिंदे भाभी के प्रति कृतज्ञ थी। कभी-कभी मेरा उनसे मिल लेने का मन होता था पर उनके घर जाकर  मिलने पर मेरे भाई- भाभी को उनपर शंका हो जाती। कभी-कदा रास्ते में आते-जाते समय मुलाकात हो जाती तो मुझे बहुत अच्छा लगता।

   जब मैं मौसी के घर रहने लगी तो म्हाडा आफिस में मौसी का ही पता दे आई थी। एक दिन एक पेपर आया जिसमें फ्लैट के बनकर पूरा होने की सूचना थी तथा मुझे म्हाडा आफिस में बुलाया गया था। मैं मौसी को साथ लेकर वहाँ गई। मेरा भाई भी वहाँ पहुँचा था। मैं उसे देखकर एकबारगी खुश हुई ,पर उसने मुझें घूरकर देखा और अपनी नजरें दूसरी ओर फेर ली। उसने मौसी से भी बात नहीं की। मुझे बहुत दुःख हुआ। मैं फिर से कमजोर हुई  —क्या करूँगी इस फ्लैट को लेकर जब अपना भाई ही अपना न रहा तो —पर ये कमजोरी थोड़ी देर के लिए थी, जल्दी ही मुझे शिंदे भाभी की बातें याद आ गईं।भाई का व्यवहार याद आ गया। मैंने भी भाई की ओर से नजरें फेर ली और जहाँ – जहाँ मुझे दस्तखत करने को कहा गया मैंने किया तथा फ्लैट का पेपर और चाबी लेकर वापस आ गई।

   मौसी ने मेरे लिए बत्तीवाला एक स्टोव , कुछ जरूरी बरतन , थोड़ा – सा  राशन – पानी आदि खरीदवा दिया। मैं इन सामानों को लेकर अपने घर में अपनी गृहस्थी जमा कर रहने लगी। नौकरी मैं अब भी किराने की दुकान पर ही करती थी और हर रोज मौसी से मिलने उनके घर जाती थी।

   अब  सब कुछ था मेरे पास, जरुरत भर का पैसा , घर ,सुख-शांति ,सब …सब कुछ। फिर भी कभी-कभी भाई और भाई के बच्चों की बहुत याद आती थी। कभी-कभी रास्ते में तेजस या मीता मुझे मिल जाते थे पर मुझे देखते ही वो या तो अपना रास्ता बदल देते या अपना मुँह मोड़कर दूसरी तरफ देखते हुए निकल जाते। और ऐसा जिस दिन भी होता मैं मौसी के पास जाकर घंटों रोती।

…दस वर्ष हो गये इस बात को !! अब तो मैंने नौकरी भी छोड़ दी। अपने घर में पेइंग गेस्ट  रखती हूँ –दो लडकियाँ  हैं। उनको खाना भी बनाकर देती हूँ। इतना पैसा मिल जाता है कि मेरा गुजर-बसर हो जाता है।

क्या कहा ? मेरे बाद इस घर का क्या होगा ? मौसी को भी यही चिंता थी। कभी- कभी कहती थीं, तेजस के नाम वसीयत कर दे। अपने आखिरी समय में सठिया गई थीं  न। …वैसे एक राज की बात बताऊँ , वसीयत मैंने कर दी है। अरे नहीं , तेजस के नाम नहीं , मीता के नाम।

तलाक लेकर मायके में रहती है।  … आखिर उसे भी तो एक भाई है।

आशा पाण्डेय
कई कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह आदि प्रकाशित तथा विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में भी कहानियां, लेख, यात्रा – वृत्तांत एवं कविताएँ प्रकाशित. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार प्राप्त. महाराष्ट्र में निवास. संपर्क - ashapandey286@gmail.com

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