मुझे यह कहानी दादी ने सुनाई थी। अरे, वह दादी! जो पूरे मुहल्ले की ही दादी थी। यहाँ तक कि हमारे बड़े लोग भी उसे दादी ही कहते थे। यानि कि मेरी माँ भी। दादी का नाम क्या था, यह भी कोई नहीं जानता था। दादी के नाम कभी कोई पत्र भी कहीं से नहीं आया था। लगता था जैसे वे इसी मिट्टी से उपजी हों। बहुत प्यारी लगती थी वह, गोरी चिट्टी दादी की नीली आँखें जीव मात्र पर प्यार बरसाती दादी। इस उमर में भी बला की खूबसूरत। उनका मैदे जैसा सफ़ेद रंग सबकी आँखें चुंधिया देता। इंसान तो क्या जानवरों के लिए भी उनके प्यार का कोष भरपूर रहता। उनके पास मुहल्ले की औरतों को देने के लिए अनुभवों की बहुत बड़ी पिटारी थी तो नई पीढ़ी के लिए रोचक कहानियाँ। इसीलिए वह अकेली होते हुए भी अकेली नहीं थी। उसके पास हर पल जमघट लगा रहता, पर हाँ समय सब का अलग ही रहता। औरतों की मण्डली दोपहर को अपनी सिलाई-कढ़ाई लेकर दादी के बरामदे में हाज़िर रहती तो बच्चे शाम तक प्रतीक्षा करते। जब उनकी माताएँ भोजन बनाने में व्यस्त होतीं तो बच्चे दादी के पास कहानियाँ सुनने पहुँच जाते। बस बड़े लोग यानि कि पुरुष वर्ग दादी को आते-जाते प्रणाम या राम राम कहता देखा जा सकता था। हम कुछ बीच की उम्र की लड़कियों को तो मौका तलाश करना पड़ता था दादी के पास बैठने के लिए।
दादी उस दोमंजिले मकान में अकेली रहती थी। हमारा परिवार दादी के मकान में ऊपर वाले हिस्से में बहुत बरसों से रहता था और दादी नीचे के तल पर। अब तो दादी हमारे परिवार का हिस्सा हो गयी थी। मैंने अपनी माँ से सुना था कि दादी इस मुहल्ले में अपने तीन साल के बेटे के साथ आई थी। बेटा बाद में पढ़ने के लिए विदेश गया तो वहीं का होकर रह गया। एक बार भारत आया तो दादी से मकान बेचकर अपने साथ चलने की बात करने लगा, पर दादी ने साफ़ मना कर दिया था। बस उसके बाद न वह घर आया और न उसकी कोई खबर आई। इससे ज्यादा कोई कुछ नहीं जानता था। दादी न तो कभी उसकी बात करती और न किसी की उनसे कुछ पूछने की हिम्मत होती।
लो! कहाँ तो मैं दादी की सुनाई कहानी की बात कर रही थी और कहाँ दादी की कहानी कहने लगी। हाँ, तो हुआ यूँ कि उन दिनों दादी कुछ बीमार चल रही थी। बीच में उनका बुखार बढ़ गया जिससे मेरी माँ ने मुझे रात को दादी के पास सोने के लिए कहा। हम लोग तो दादी के पास जाने का बहाना ही खोजते रहते थे, तो मैं खुशी-खुशी रोज़ ही दादी के पास सोने चली जाती। पर हाँ! एक बात इन दिनों और भी हुई। दादी के पास एक वकील भी आने लगा था। पर इस तरफ किसी ने ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया। क्योंकि दादी तो सबकी ही दादी थी और फिर उस वकील का आना भी बंद हो गया। दादी से कौन पूछता कि वह कौन है? बस उसके काले कोट से ही सब ने कहा कि वकील है।
धीरे-धीरे दादी ठीक हो रही थी पर मैंने वहाँ जाना बंद नहीं किया। ऐसे में जब दादी को नींद नहीं आती तो वह कोई न कोई कहानी सुनाती। एक दिन कहा दादी ने, ‘‘वो बहुत खूबसूरत था, बिलकुल पठान। ऊँचा-लम्बा, सुर्ख-सफेद रंग, नीली आँखें।“
‘‘कौन दादी?“
‘‘अरे मरी! कहानी सुन। खोजबीन मत कर।“
‘‘हाँ दादी, सुनाओ।“ मैं तेल की शीशी उठा लाई और दादी की टांगों की मालिश करने लगी। दादी ने बात बढ़ाई, ‘‘वो बहुत खूबसूरत था। उसकी आँखें जैसे हर चीज़ को चीर कर भीतर देख लेती थीं। गाँव के दूध-घी का पला मजबूत कद काठी वाला कड़ियल जवान।
‘‘दादी! मुहल्ले की लड़कियों के हाल भी तो बताओ।“ मुझे चुहल सूझी।
‘‘चुप मरी!“ दादी ने बात काट दी, ‘‘दो साल पहले ही गाँव से आया था बीवी और एक छोटी-सी चार माह की बच्ची के साथ। बहुत मेहनती और मिलनसार इंसान। पहले उसने रोज़गार के लिए दो भैंसें खरीदीं। उनका दूध बेचकर काम चलाता था। फिर कुछ और भैंस-गाय और काम बढ़िया चल निकला था। एक साल के भीतर ही उसने एक इक्का भी खरीद लिया। जब इक्का खरीदा तो घोड़ा भी चाहिए। पर उसे घोड़े भी दो चाहिए थे, क्योंकि उसका इक्का दो घोड़े वाला था।“
मैं हँसने लगी तो दादी चिढ़ गईं, ‘‘क्यों री! किस बात की हँसी आई तुझे?“
‘‘दादी! आजकल कहाँ से आ गए इक्के ताँगे? आजकल तो लोग मोटरसाइकिल और कार की बात करते हैं।“ मैंने हँसते हुए कहा।
‘‘तो मैं कौन सी आज की बात बता रही हूँ। यह तो आजादी से पहले की बात है। वह भी रावलपिण्डी शहर की।“
‘‘दादी! उन दिनों तो तुम भी जवान ही होंगी न?“ मैंने फिर टांग अढ़ाई पर दादी ने ध्यान नहीं दिया।
‘‘उन दिनों जैसा इक्का उसने खरीदा था उसे तो रईस लोग ही ख़रीदा करते थे। बल्कि उसे तो बग्घी कहा जाता है। चमचमाता पीतल के काम वाला इक्का। उसमें जुती साटन सी चमकती दो लाखी (लाख के रंग वाली) घोड़ियाँ उसके रईसी ठाठ की चुगली खाती थीं। पर वह खुद कभी-कभी ही इक्का चलाता था। उसने एक नौकर रख लिया था इक्का चलाने के लिए। मुहल्ले वालों को जल्दी ही पता चल गया था कि यह इक्का उसने सिनेमा के शौकीन लोगों के लिए खरीदा था। अच्छी कमाई हो जाती थी उसकी।
‘‘दादी, तब भी ऐसे ही सिनेमा हुआ करते थे क्या?“ सिनेमा के नाम से मेरे कान खड़े हो गये थे।
‘‘हाँ, तब तक बोलने वाला सिनेमा चल चुका था।“ दादी की आँखें छत पर लगी हुई थीं, जैसे वहाँ उन्हें वह सब दिखाई दे रहा है जो वे मुझे बता रही हैं।
‘‘फिर?“
‘‘फिर यह कि वह इक्का पैसे वालों को सैर के लिए भी देने लगा था। इससे घोड़ियों को थकान होती है यह सोचकर उसने दो घोड़ियाँ और खरीद लीं। धीरे-धीरे उसका कारोबार खूब फलने फूलने लगा।“
‘‘उसका नाम क्या था दादी?“
‘‘तुझे कहानी सुननी है या नहीं? बीच में मत टोक।“ दादी शायद खीज गयी थी और मेरी तरफ़ पीठ पलटकर कम्बल सिर तक खींच लिया।
‘‘सुनाओ न दादी कहानी। अच्छा अब नहीं टोकती। आप कहानी सुनाओ।“ मैंने चिरौरी की, पर दादी नहीं बोली तो मैंने उन के मुँह पर से कम्बल खींच कर अपने कान पकड़ते हुए कहा, ‘‘ये लो दादी। दोनों कान पकड़ती हूँ, अब जो बोलूँ। सुनाओ न दादी। मेरी अच्छी दादी।“
‘‘चल, बेवकूफ कहीं की। अब मेरा मन नहीं है, कल सुनाती हूँ।“ मैं भी समझ रही थी कि दादी अब कुछ नहीं बतायेगी इसलिए मैं अपने बिस्तर पर आकर सोने की कोशिश करने लगी।
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दूसरे दिन फिर मैंने दादी को छेड़ दिया, ‘‘दादी! वह कल वाली कहानी???“
‘‘हाँ! तो कहाँ तक पहुँचे थे हम?“ दादी फ़िर शायद पुराने दिनों को याद करने लगी थी। थोड़ी ही देर में दादी ने सिरा पकड़ लिया। आराम से तकिए की टेक लेकर लेट गईं और कुछ याद करते हुए बोली,
‘‘उसके जानवर और बग्घी जहाँ रहते थे, वहाँ से थोड़ी सी ही दूरी पर एक वैटर्नरी अस्पताल था।“
दादी के मुँह से आज पहली बार वैटर्नरी शब्द को बिलकुल शुद्ध उच्चारण में सुनकर मुझे करंट सा लगा और मैं झटके से उठकर बैठ गई। दादी की साधारण पंजाबी बोल-चाल में और पहनावे आदि से कभी भी हमें उनके पढ़ी-लिखी होने का आभास ही नहीं हुआ। बिल्कुल गाँव-देहात की साधारण औरत महसूस होती थी। बस इसीलिए हैरानी हुई थी।
‘‘क्या हुआ?“ दादी ने पूछा तो मुझे एकदम याद आ गया कि कहीं वह खीज गयी तो बंटाढार हो जाएगा। मैंने बात बनाई, ‘‘पानी पीकर आती हूँ।“
‘‘बस! इस छोकरी में यही नुक्स है कि चैन है ही नहीं। करती रहेगी इधर-उधर।“ पर मैंने वापस लौट कर फिर दादी को टोका, ‘‘हाँ दादी। तो हम अस्पताल तक आ गये थे।“
‘‘हाँ! तो उसी सड़क पर वह शानदार बग्घी रोज़ दौड़ा करती थी। रास्ता वही था, अस्पताल के सामने वाली सड़क। एक दिन उस अस्पताल से एक अंग्रेज जोड़ा निकला। उन्होंने बग्घी रोक ली। ज़माना अंग्रेजी राज का था, भला बग्घी चलाने वाले नौकर की क्या औकात कि बग्घी न रोके? उस दिन वे दोनों भी सिनेमा देखने ही
जा रहे थे। उन्हें सिनेमा पहुँचा कर वह जब वापस लौटकर घोड़ियों को बग्घी से खोल रहा था तो सरन ने पूछ ही लिया,
‘‘मुल्ला जी, क्या हुआ? आज सवारी नहीं मिली कोई?“
‘‘सरन कौन दादी?“ मैंने डरते डरते पूछा, कहीं दादी फिर न भड़क जाए, पर कुछ नहीं हुआ। वे हँसते हुए बोलीं, ‘‘वही खूबसूरत नीली आँखों वाला। उसका नाम हरी सरन था, पर सब उसे सरन ही कहते थे।“
‘‘फिर?“
‘‘फिर मुल्ला जी ने बताया कि वैटर्नरी अस्पताल की डाक्टर और उसके आदमी को सिनेमा छोड़कर आया है और तीन घंटे बाद लेने भी जाएगा। अब अंग्रेजी राज था तो इतना तो झेलना ही पड़ेगा। अब यह अक्सर होता कि डॉक्टर किसी को भी भेजकर बग्घी मंगवा लेती और जहाँ जाना होता ले जाती। बग्घी देना सरन की मजबूरी थी, पर अभी तक उसका डॉक्टर से सामना नहीं हुआ था। हाँ उसके बारे में जानकारी उसे मुल्ला जी से मिलती रहती थी।
मुल्ला जी ने सरन को जहाँ डॉक्टर के बारे में बताया वहीं डॉक्टर को भी बताया था कि उसका मालिक बड़ा अकड़खान है। यह भी बताया था कि वह एक अच्छा पशु पालक है। भैंस गाय पालकर दूध का कारोबार करता है और जानवरों की बीमारियों और देसी दवाइयों की बहुत जानकारी रखता है और सबसे बड़ी बात कि
वह बहुत खूबसूरत है, वग़ैरह वगैरह।
डॉक्टर शादीशुदा थी और उसके पति की दूर के दूसरे शहर में नौकरी थी। वह कभी-कभी आता था इसलिए डॉक्टर को अकेले ही अपने काम करने की आदत थी। वह अंग्रेज होते हुए भी ठीक सी पंजाबी बोल लेती थी। मुल्ला जी के साथ अक्सर ही आना जाना होने से बातें भी होती तो बातूनी मुल्ला जी अपने मालिक की तारीफों के पुल बाँध देते।“
मैं बड़े ध्यान से दादी की कहानी सुन रही थी पर अभी तक दादी ने उस डॉक्टर का नाम नहीं बताया था और मुझे डर था कि कहीं नाम पूछने पर दादी फिर न उखड़ जाए। पर शायद दादी का बोलते बोलते गला सूखने लगा था। मैंने पानी दिया तो दादी खुश हो गयी।
‘‘हाँ, तो।“ पानी पीकर दादी ने फिर से सिरा पकड़ लिया, ‘‘एक दिन फिर मेरी को किसी रिश्तेदार के घर काम से जाना था,“
‘‘मेरी कौन दादी?“
‘‘मेरी, वही डाक्टर। हाँ, मैंने नाम तो बताया ही नहीं।“ दादी शान्त थीं। लगता था आज वे कहानी सुना ही देंगी।
‘‘डॉक्टर मेरी ने अस्पताल से चपरासी को सरन की डेरी भेजा। उसे शाम को बग्घी चाहिए। सरन के पास कोई चारा नहीं था। मना कैसे कर सकता था। अंग्रेजी राज था। मुल्ला जी को ससुराल गये दो दिन हो गये थे। उन की साली की शादी थी। दूसरा कोई नौकर इक्का चलाना जानता नहीं था और डॉक्टर की ड्यूटी मजबूरी थी।“
मैं फिर चौंक गई, दादी का उच्चारण इतना साफ़ था कि हैरानी होती थी, पर मैं चुप ही रही। दरअसल अपनी सतरह साल की उम्र में मैंने कभी उन से अंग्रेजी का कोई शब्द नहीं सुना था इसलिए आज बड़ा अजीब लग रहा था।
‘‘ठीक वकत पर बग्घी आ कर अस्पताल के सामने खड़ी हुई तो मेरी अपना खूबसूरत गाउन सभाँलती आ कर ठसके से उसमें पिछली सीट पर बैठ गयी। हल्के बादलों की वजह से अंधेरा होने लग था। बग्घी सरपट दौड़ रही थी। चपरासी दिन में बता आया था कि कहाँ जाना है इसलिए रास्ता आराम से कटता रहा। मेरी भी किसी सोच
विचार में थी, इसलिए बस एक बार उसने ठीक से पता बता दिया । मंज़िल पर पहुँचने तक बत्तियाँ जलनी शुरू हो चुकी थीं। एक कोठी के गेट पर पहुँच कर मेरी ने बग्घी रुकवाई और नीचे उतरकर बोली, ‘‘मुल्ला। आज तुम चुप ही रहा, बोला नहीं। मार्निंग नौ बजे आना।“
कोचवान ने घोड़ियों की लगाम खींची पर बोला फिर भी नहीं तो मेरी को शक हुआ कि यह मुल्ला नहीं है। वह झपट कर सामने आ गई तो कोचवान ने झटके से लगाम खींच ली वरना कुछ भी हो सकता था।
‘‘कौन है तुम?“ मेरी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे सरन को पहचानने में जरा सी भी देर नहीं लगी। मुल्ला जी से उसकी खूबसूरती के इतने कसीदे सुन चुकी थी कि अब कुछ बाकी नहीं बचा था, ‘‘तुम?“
‘‘मुल्ला जी ससुराल गये हैं और अभी दो दिन और नहीं आयेंगे। मुझे ही आना पड़ेगा।“
‘‘ओखे।“ कहकर मेरी लापरवाही से पर्स झुलाती गेट के भीतर चली गई। पर रात भर हरि सरन की वे नीली आँखें और गोरा सिंदूरी रंग उसकी आँखों में घूमता रहा। वह बेचैनी से सुबह का इंतजार करती रही। सुबह हरी सरन समय पर बग्घी लेकर आ गया था और मेरी को अस्पताल छोड़ कर वह उसी दिन कहीं चला भी गया। शाम को चपरासी भेजने पर वह खाली ही लौटा था। चपरासी ने आकर बताया था कि सरन काम से पंजा साहब गया है। तीन दिन बाद आएगा। दूसरे दिन बग्घी बुलाने पर मुल्ला जी ही लेकर आए थे।
अब मेरी ऐसे तो नहीं कह सकती थी कि उसके काम के लिए सरन ही बग्घी लेकर आए। पर वह उसे बुलाने के लिए बहाने खोजने लगी थी। मुल्ला जी ने बताया था कि सरन जानवरों के बारे बहुत जानकारी रखता है तो एक दिन मेरी को बहाना भी मिल ही गया।
हुआ यूँ कि पेशावर से एक सौदागर घोड़े बेचने आया था। मेरी ने चपरासी भेजकर सरन को ही बुलवा लिया। सरन हालांकि अस्पताल के रास्ते से ही बचता रहता था पर यह बुलावा तो सीधा उसी के लिए था, क्या करता।
‘‘मैन! खोड़ा फसंड खरो। (घोड़ा पसंद करो) फॉर मी।“ मुझे दादी के नाटक पर फिर हँसी आ गयी, ‘‘दादी! वो अंग्रेज डॉक्टर ऐसे ही बोलती थी क्या?“
‘‘और क्या। तो सरन ने एक अच्छा घोड़ा पसंद कर के बता दिया और तुरन्त ही वहाँ से खिसक लिया। अब मेरी उसे किसी न किसी बहाने से अक्सर ही बुलाने लगी। सरन इतना भी बुद्धू नहीं था कि कुछ समझता ही न हो, पर वह तो बिलकुल चिकना घड़ा बना रहता। डॉक्टर उसे अपने पास आदर से बिठाती, चाय पिलाती और देर तक बातें करती रहती। हरि सरन समझ कर भी नासमझ बना अपने काम से काम रखता।
इस बीच डॉक्टर मेरी एक बेटे की माँ बन गई थी। उसने हरि सरन से कहा कि वह अपनी बेटी को वहाँ ले आए। दोनों बच्चे साथ रहेंगे पर हरि सरन ने सुना अनसुना कर दिया। इसी तरह छः महीने बीत गए। हरि सरन यह बात अच्छी तरह से समझ चुका था कि मेरी क्या चाहती है, फिर भी अनजान ही बना रहा।
जब मेरी की कोई चाल कामयाब नहीं हुई तो एक दिन उसने मौका देख कर हरि सरन से साफ़ शब्दों में कह दिया कि वह सरन से प्रेम करने लगी है।
‘‘ये क्या कह रही हैं आप डॉक्टर? मेरी एक बेटी है एक बीवी है और आपके भी बेटा है। आपका पति मुझे गोली मार देगा।“ हरि सरन एकदम कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया।
‘‘तो? हम रास्ता निकालेगा न।“
‘‘क्या रास्ता है?“
‘‘तुम यहाँ कम्पाउंडर ज्वाइन कर लो।“
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?“
‘‘तुम को करने का है।“
‘‘कभी भी नहीं।“ कह कर वह अस्पताल से बाहर निकल गया। फिर कभी मेरी के बुलाने पर भी नहीं आया। इससे मेरी के मन में कई कई भाव आने जाने लगे। उसे अपने मन से लड़ना भारी पड़ रहा था। उस दिन सिनेमा का आखिरी शो खतम होकर थोड़ी देर हो चुकी थी, मेरी अपने क्वार्टर की छत पर टहल रही थी, तभी उसको दूर से सरन की बग्घी आती दिखाई दे गई। पता नहीं क्या हुआ कि मेरी झपटकर अन्दर गई। जब लौटकर बाहर आई तब तक बग्घी पास आ चुकी थी। मेरी का हाथ उठा और एक गोली में एक घोड़ी सड़क पर
थी। बग्घी आगे कैसे जाती।
तीसरे दिन एक और घोड़ी, फिर एक और। शिकायत किसके पास करे। अंग्रेजी राज था, फिर भी हरि सरन शिकायत लेकर मेरी के पास आया।
‘‘क्यों मार रही हैं आप बेजुबान जानवरों को?“
‘‘जब तुम इनसान की जुबान नहीं समझते तो मैं क्या करूँ? तुम्हारी घोड़ी को लाग लगी है। उसकी गर्दन पर घाव है, फिर भी तुम उसको बग्घी में जोत रहे हो।“
हरि सरन समझ गया था कि कुछ होने वाला नहीं है। चार घड़ियों की बलि देकर उसने बग्घी खड़ी कर दी। फिर उसे भय लगा कि वह जानवरों की डॉक्टर है तो डेरी में भी उत्पात मचा सकती है। शायद ऐसा होता भी पर तभी मेरी को अचानक अपने पति के पास लाहौर जाना पड़ गया। उसके पति तक बात पहुँच गई थी। मेरी ने बात झुठलाना की बड़ी कोशिश की पर झगड़ा इतना बढ़ गया कि वह वापस लाहौर न जाने की कसम खाकर लौटी।“
दादी किसी रेकार्ड की तरह बोल रही थीं और मेरे दिमाग में एक सन्नाटा पसर रहा था, आखिर दादी मेरी की भावनाओं तक कैसे पहुँचीं। शायद ये भी कहीं मेरी के साथ तो नहीं रहती थीं। मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी। दादी फिर कहने लगीं,
‘‘इस सारी कहानी के बीच दो महीने तक मेरी लाहौर ही रही थी। वापस लौट कर उसे पता चला कि हरि सरन सारे कारोबार को समेट कर पता नहीं कहाँ चला गया था। मुल्ला जी भी अपने गाँव चले गये थे। मेरी चारों तरफ से लुट गयी थी। डेढ़ साल का बेटा लेकर वह अपनी माँ के पास हरिपुर हज़ारा चली गयी। इधर आज़ादी की लड़ाई ने जोर पकड़ लिया था और फिर भारत आजाद भी हो गया। मेरी के माता पिता इंग्लैंड वापस चले गये थे। वे लोग मेरी को साथ ले जाना चाहते थे पर मेरी ने इंग्लैंड जाने से इनकार कर दिया। अब बेटा फिर मेरी के पास आ गया था। मेरी ने नौकरी भी छोड़ दी थी। कुछ पैसा इकट्ठा कर के वह कहीं सुरक्षित जगह तलाश रही थी। कुछ सलवार सूट खरीदे और बच्चे को गोद में लिए एक काफले के साथ अम्बाला आ गई।
अंग्रेजों की जान खतरे में थी। ऐसे में उसे इस पंजाबी भेस ने बड़ी मदद की। बाल बिखरा कर हल्का घूंघट उसे पंजाबी ही सिद्ध करता। जतन करके उसने पंजाबी बोलने का अभ्यास किया। बस वक्त कैसे कट गया पता ही नहीं चला। फिर एक छोटे-से शहर में छोटा सा स्कूल खोला पर मन नहीं लगा। वह भी बंद कर दिया, जो पैसा था उससे थोड़ी सी जमीन खरीद ली। बेटे को पढ़ाती रही, पर एक दिन बेटा भी दूर चला गया। उसे अपना बाप मिल गया था। मेरी अम्बाला आकर भी माँ-बाप से सम्पर्क बनाने में सफल हो गई थी, यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी। उन्होंने ही मेरी के पति को उसका पता दे दिया था। उन लोगों ने पढ़ने के बहाने लड़के को इंग्लैण्ड बुला लिया, फिर वह अकेले ही दिन गुजारने लगी।“
‘‘दादी! वह डॉक्टर कौन-से शहर में चली गई और तुम्हें कैसे पता कि वह कहाँ गई थी? क्या तुम उसे जानती हो?’’
दादी अचानक बोलते-बोलते चुप हो गई। मैंने देखा, दादी की आँखें छत पर टंगी हुई थीं। दोनों आँखों से बहती धाराएँ उसके गोरे मुखड़े को धो रही थीं। मैं सोच रही थी कि यह अचानक दादी क्यों रोने लगी? हमने आज तक कभी दादी को रोते नहीं देखा था। मैं थोड़ा डर गई।
‘‘फिर क्या हुआ दादी?“ पर दादी चुप थीं। पर मुझे नींद नहीं आ रही थी, उजाला भी होने लगा था और रात का अंधेरा छंटने लगा था। दादी की आँखें अब भी छत पर टंगी हुई थीं। शायद आज मन का सारा बोझ उतार कर वे सो गई थीं। मैंने उनके हाथ को पकड़ कर सीधा करना चाहा तो वह लटक गया था।
……………………
दादी के सारे क्रियाकर्म पापा ने ही किये। इस बीच पापा अपने लिए दूसरा घर भी खोजते रहे, मकान तो छोड़ना ही पड़ेगा। फिर सारे मुहल्ले और पुलिस की मौजूदगी में उनके सामान को इस उद्देश्य से खंगाला गया कि हो सकता है इससे उनके किसी सम्बंधी का पता मिल जाए। सामान में और तो कुछ खास नहीं मिला पर उनकी अल्मारी में एक लिफाफा पापा के नाम का मिला, जिसे पुलिस इंस्पेक्टर को दे दिया गया। यह अंग्रेजी में लिखी एक वसीयत थी।
जिसमें लिखा था, ‘हरि शंकर के परिवार ने मेरी बहुत सेवा की है, इसलिए मैं अपनी हर चीज़ पर हरि शंकर के परिवार का अधिकार मानती हूँ।”
हस्ताक्षर की जगह लिखा था  ‘ डॉ मेरी जोसफ’

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