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डॉ. गरिमा संजय दुबे की कहानी – दो ध्रुवों के बीच की आस

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“जो शहर या गांव नदी किनारे होते हैं ना  वो नदियां किनारों पर ही नहीं होती बल्कि उन गांवों शहरों के हर घर में बहती रहती है , त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे” ,कहते वे अपनी विदेश से लौटी नातिन को आज पहली प्राथमिकता में नर्मदा दर्शन के लिए ले जा रहे थे । “क्या नानू , ऐसे कैसे हर घर में नदी हो सकती है , नल हो ,कुआँ हो नदी कैसे रह सकती है ” नव्या बोली । विदेशी धरती पर पली बढ़ी लड़की लेकिन गणित न लेकर भूगोल और इतिहास चुना और जब तब नदी पहाड़ गड्ढे, पत्थरों को छानने निकल पड़ती है । उसकी जिज्ञासा का कोई अंत नहीं ,सब जानना है सब कुछ |  इतिहास पुराण ,और आजकल तो मानों विदेशों में वैदिक ग्रंथों पर शोध का जूनून सवार है । भौतिकतावाद , चमक दमक से घबराया एक पूरा समाज अब इस सनातनी परम्परा में सूत्र खोज रहा है, तो भारतीय होने का लाभ भी मिला और बचपन के संस्कृत के ज्ञान का भी तो भारत से जुड़े हर शोध में वह  शामिल रहती ही है । उसी के चलते और कुछ अपनी ही जड़ों को जानने का भाव खींच लाया  एक बार फिर वहीं जहां नाल गड़ी थी ।
इस बार दस साल बाद अपने नाना के पास महेश्वर आयी थी ,तो सोचा इसी नदी पर एक रिपोर्ट बना लूँ। यूँ तो बचपन मे हमेशा आती लेकिन तब नदी में नहाने और उसके पानी में घंटो बिताने का एक मात्र आकर्षण ही  यहां खींच लाता । बच्चों में तो पानी को लेकर भीगने का आकर्षण ही प्रबल होता है । अब बड़ी हुई तो नदियां केवल पानी नहीं रही इस धरती के पर्यावरण का एक हिस्सा बन गई उसके लिए और एक वैज्ञानिक सोच से दुनिया की हर नदी पर ध्यान जाता । सो आज इसी नर्मदा का विश्लेषण ।
सुंदर से महल को पार करते हुए ,माहेश्वरी साड़ी बुनते बुनकरों के घरों से आती खट पट ,घर्र चर्र की आवाज सुनते वे नीचे उतरने लगे | झांक कर देखा तो एक एक धागा कुशलता से ,हाथ और पैरों के संयोजन से आकर ले रहा था  । नानाजी के मुख से नर्मदा स्तुति जारी थी, सूरज उगने को था | रात को ही जिद कर रही थी आने की, लेकिन नानाजी ने यह कहकर रोक दिया , “नदी की निद्रा में बाधा नहीं डालनी चाहिए, ब्रह्ममुहूर्त में चलेंगे, बाल नद देखने, तुम्हे बड़े सुंदर फ़ोटो भी मिल जाएंगे” । “जय नर्मदा मैया पंडित जी , बिटिया को मैया दिखाने लाये हो” , छोटे मंदिर के पुजारी ने घंटी बजाते बजाते पूछा | वे राज राजेश्वर पहुंच गए थे | सुबह का वक्त मंदिर से उठने वाली अगरबत्ती की महक, दिए कि लौ और घंट ध्वनी ने मानों नव्या के मन में ऊर्जा का संचार कर दिया हो ।
बरसों चर्च के कोरेल सुनने के अभ्यस्त कानों में वैदिक मंत्र के उच्चारण ने अजीब सा भाव भर दिया,
 जैसे कोई सोई हुई चेतना के तार छेड़ रहा हो ।  क्यों ऐसा होता है कि कहीं होने पर अपने खो जाने का अहसास होता हो, और खोते हुए ही जैसे अपने को पा लेने का आभास । उस  समय में बहते से लगता है किसी टाइम मशीन में बैठ कहीं पीछे बहुत पीछे दौड़  पड़ा हो मन । अकसर ऐसा होता जहाँ जाना हो तो वहां के इतिहास की जानकारी लेकर पहुंचती । कई जगह मन को रूखे सूखे  स्पंदन घेर लेते ,लेकिन फिर यह तो अपना देश है  | अपनी मिट्टी जहां पांव रखते ही  ऐसा लगता जैसे मिट्टी पैर पकड़ कर कहती हो “याद हो या भूल गई” | सरसराते हुए अहसास मिट्टी के स्पर्श से ही सीधे सिर तक पहुंच  मन को नहीं चेतना को झकझोर देते । जाने कैसे लगा शायद यही रास्ता तो नहीं जिससे होकर कभी आदि शंकराचार्य ने नर्मदा के तट जो छुआ होगा | कौन जाने इसी राह से मंडन मिश्र भी अपनी प्रभात संध्या गाते यहाँ से गुजरे हों ।”  पैरों में अजीब सा कंपन हो गया मानों वहीं  पैर पड़ गया जहां कभी पवित्र चरण पड़े थे ।   प्रसाद लो बिटिया “पंडित जी के बोलने से जैसे नींद से जागी हो  नव्या , एक हाथ खुद ब खुद सिर पर चला गया और तिलक करवा दूसरा हाथ पसार उसने प्रसाद ले लिया ।
मंदिर वहाँ भी हैं , लेकिन अनुशासन का इतना आग्रह की नियम कैद में पूजा एक यंत्रचालित प्रक्रिया बन जाती । ऐसा बंधन रहित जुड़ना शायद अपनी मिट्टी में ही हो पाता है ।  वहां से आगे बढ़ वे  सीढ़ियां उतरने लगे । दुनिया इतनी जल्दी आज भी जाग जाती है ,उसे तो रात भर काम करने और सूरज चढ़ने तक सोने की आदत है । नानाजी ने कई बार कहा भी “उल्लू की प्रजाति की संतानें हो गयी हैं अब तो , सूरज का दर्शन नहीं करते तभी तो थके थके रहते हो “। वो हँस पड़ी , अब बस पहुंचने वाले ही थे कि पहली सीढ़ी पर पांव धरते ही नज़र सामने बहती नदी पर पड़ी ,जी धक्क से रह गया | पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ पड़ी ,रोमांच से आंखों में आंसू आ गए । ऐसा तो उसे किसी नदी के पास पहुंच कर नहीं लगा । क्या यह केवल नदी है , या माँ है ,जैसा कि नानाजी कहतें हैं | जिसकी गोद में ऐसा अदभुद अनुभव हुआ । ढेर सारी सीढ़ियों के नीचे बने सुंदर घाट और सामने बहती नर्मदा |  सूरज की हल्की सी आमद दिखाई दे रही थी पानी पर लाल रंग उभरने लगा मानो किरणे जलतरंग बजा रही हो । नदी के प्रवाह में गुंजायमान था एक नाद,  केवल कलकल नहीं ,जो केवल और केवल  केवल भारत की नदियों में गूंजता है ,या हमारे भीतर का भाव कभी कभी बाहरी आपाधापी से शांत हो हमें अपने चैतन्य होने का आभास देता है ,पहचानों पहचानों कौन हो तुम इस सृष्टि का एक धागा जो सबसे जुड़ा है  । एमर्सन की चेतना से जुड़ कर मन बोल पड़ा , “एन्ड आई बेहोल्ड वन्स मोर, माय ओल्ड फैमिलियर हॉन्ट्स, द सेम ब्लू वंडर देट माय इन्फेंट आईज़”
किसी सम्मोहन में बंधी वह चली जा रही थी , “बालिका नर्मदा , सुबह यह बालिका होती है , दोपहर में पूर्ण यौवना , और सांझ को प्रौढ़ा” ,नानाजी बताते जा रहे थे। सचमुच बच्चों सी अठखेलियां, किलकारी मारती लगी नदी । नींद से उठकर बच्चा जैसी अंगड़ाई लेता है वैसे ही हर लहर में एक अंगड़ाई , एक स्मित समेटे वह बह रही थी | बच्चे के लालिमा युक्त देहयष्टि सी नद, और नव्या बही चली जा रही थी उसके इस नैसर्गिक बहाव में ।
घाट पर दुकान लगाने वाले पहुंचने लगे थे , तभी बच्चों का झुंड दौड़ता हुआ नदी में छलांग लगा चुका था । “हुर्रर्रर्ररर छपाक” की आवाज़ के साथ नव्या की तंद्रा टूटी, तो झट से अपने कैमरे की आंख उन बच्चों पर टिका दी पानी में छलांग मारते , हँसते खिलखिलाते लंगोट बाँधे बच्चे । उसे टेम्स का किनारा याद आया, आस पास  बेहद साफ सुथरा,  लंबी लंबी रेलिंग से बंधे किनारे, साफ बहती नदी देख कर अच्छा तो लगता है लेकिन नदी को छू कहा पाता है कोई, देख भर ही तो पाता है । जैसे नदी को म्यूज़ियम में कैद कर दिया हो | जैसे अति अभिजात्यता के नियमों से बंधी कोई युवती जिसकी हर हरकत ,अदा बड़ी मेहनत से घंटो पार्लर में मशक्कत कर तराशी गई हो और वो बेचारी अपने आडम्बर से त्रस्त अपनी नैसर्गीक मुस्कान ही खो बैठी हो ।  स्पेंसर बोल उठे थे न  “Sweet Thames, run softly, till I end my song. ” ऐसे ही सधे कदमों से चलती है टेम्स ।
और यहां यह अल्हड़ किशोरी सी नर्मदा, उन्मुक्त हो अपने पूरे नैसर्गीक वैभव और सौन्दर्य से खिलखिलाती है और उसके साथ ही खिलखिलाता है उसके आस पास का वातावरण । वहां है न हर घर में स्विमिंग पूल नहाने के लिए नदी के पानी को बस देखिए, देखते ही हैं उसकी आत्मा को छू भी नहीं पाते । अभिजात्य नदी और उससे अधिक अभिजात्य लोग।  बड़ी सतर्कता से एक एक हरकत करते रोबोट हो जैसे । वह मचल पड़ी और अपना बैग किनारे पर दौड़ लगा कर लगा दी छलांग ।  “अर्र्रर्रर्रर क्या कर रही है बिटिया तैरना आता भी है” , भय में भूल गए कि हाल ही में स्विमिंग चैंपियनशिप जीत कर आई है उनकी नातिन, और वो नदी में से ही उनके भय ग्रस्त चेहरे को देख खिलखिला दी | न जाने क्यों आंसू निकल पड़े खुशी के थे या विषाद के, या दोनों के । बरसो से नदी छुई नहीं थी, बस देखी भर थी, बताईये किस स्विमिंग पूल में आपको नदी में नहाने का सुख मिला | नहीं कभी नहीं नकली नकली ही रहेगा । महंगे स्विमिंग सूट, वॉरपटूफ सनस्क्रीन, सन ग्लासेस कैप पहन क्लोरीन से गंधाते पानी मे क्या यह स्फूर्ति मिली जो इस जल में है । तैरते तैरते सोचने लगी “जिन्हें नदी की आत्मा को छूने का हक मिला था उन्होंने उसे कैसा गंदला दिया, और जो छू सकते थे उन्होंने उस आत्मा को स्वच्छता के नाम कैद कर दिया । नदियों को छूना उसकी आत्मा को महसूस करना हर इंसान का हक है, उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता , यही होगा न प्रकृति से जुड़ने का तरीका ,तभी स्नान अर्ध्य
 बने थे लेकिन बढ़ते लालच का शिकार नदियों के साथ इंसान की मासूम चाहते भी हुई” । नानाजी घाट पर तेजी से उसके साथ चल रहे थे “अरे संभाल कर ,उधर गहरा है” , उन बच्चों के साथ वह भी बच्ची बन पानी से खेलने लगी ,नानाजी वहीं घाट पर बैठ उसके अंदर की नदी को अंगड़ाई लेते देखते रहे । तभी बच्चे ने कहा “अरे दीदी उधर खो है वहां मत जाओ पैर फंस जाते हैं ,नर्मदा मैया फिर अपने पास ही रख लेती है” ।  चेहरे पर वात्सल्य भरी मुस्कान फैल गई और उसने अपने तैरने की दिशा बदल दी , मन तो किया कि घुस कर देख आये जरा इस जल के नीचे और चुपके से पूछ ले कैसे पाती हो यह ऊर्जा ।  नानाजी ने बचपन में एक कविता सुनाई थी गुरुदेव की,  दो लाइन याद रह गई :
” पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम,
काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम”।
 उस घाम की शुरुवात हो चुकी थी ,  अनायास अंजुरी भर उगते सूरज को अर्ध्य दे देखा , नानाजी ने भी स्नान कर अर्ध्य दिया और घाट पर बैठे हैं , वह घाट की और पलट गई , “कपड़े लाई नहीं अभी भीगी बैठी रहो  ,हमें तो अभ्यास है “, नानाजी ने उलाहना दिया । “कोई बात नहीं नानाजी सूख जाएंगे” , घाट पर चल रही हवा ने उसके बदन में झुरझुरी सी पैदा कर दी । शरीर तो सूख ही जाना था लेकिन मन , मन  न जाने कब से सूखा था जो आज रह रह कर भीग जाना चाह रहा था । वह बैठी रही और बोली ‘नानाजी घाट के उस पर चलते हैं आज का पूरा दिन नदी के साथ , चलिए “। चलो घाट से ही चना चबेना लिया और नाव में बैठ चल पड़े ।
घाट का कोलाहल धीरे धीरे दूर होता जा रहा था और अब नदी की कल कल और चप्पू की ध्वनि सुनाई दे रही थी । वो और नदी बाकी सब जैसे ब्लर हो गया । इस सौन्दर्य को देखने के लिए किसी बाहरी कैमरे की ज़रूरत नहीं बस अनुभव किया जा सकता है ।
 कहीं कहीं गंदगी देख मन व्यथित हुआ | कितना आनंद है इस उन्मुक्तता में किन्तु नदी की स्वच्छता का ध्यान क्यों नहीं | टेम्स के किनारे ध्यान दिया तो अति कर बांध दिया | यहां छोड़ दिया तो लोगों ने नदी की आत्मा को मार दिया | नदी कब स्वतंत्र और स्वच्छ होगी ? नदी को छूना हमारा अधिकार है तो नदी की आत्मा को मुक्त और निर्मल रखना क्या हमारा कर्तव्य नहीं ?  अचानक एक तेज लहर ने नाव से टकरा कर अपनी बूंदों से उसे एक बार फिर तरबतर कर दिया मानों कह रही हो “हाँ हाँ तूने मेरे  मन की बात समझ ली ,यही यही तो चाहती हूं मैं “, निर्मल उन्मुक्त हो बहना” | चेहरे पर फैल गए पानी को उसने नहीं पौछा और देखती रही नदी को । किनारा आ गया था ,हरे भरे पेड़ों और खेत खलिहान वाला ,शांत किनारा यहाँ से घाट पूरे नज़र आते । जैसी जिज्ञासु प्रवृत्ति रही है उसकी जब जहां जाती पूरी तैयारी के साथ जाती ,तो आने के पहले नर्मदा से जुड़ा हर साहित्य चाट डाला था । उन्हीं में से एक को पढ़कर नानाजी से पूछा था “ये कौन हैं “,तो उन्होंने कहा था बिटिया पूर्वजन्म के कोई ऋषी ही होते हैं जिन्हें प्रकृति अपने रहस्य उज़ागर कर देती है । ऐसे ही संत हैं वेगड़ दादा , उनसे मिलने का मन बना कर आई थी कि पता चला वे परम चेतना में विलीन हो गए ।   नानाजी ने कहा ,”तुमने अपने पत्र में वेगड़ दादा से मिलने की बात कही थी , अब वे तो समा गए इसी माई की गोद में , लेकिन तुम उनसे मिलने जाती न  तो वे कहते ,  “मुझसे क्या मिलना ,खुद नर्मदा से मिलो ” ,और देखो तुम नदी से मिलने ही आ सकी “। घाट पर पहुंच कर जब देखा  नव्या ने तो उनकी पुस्तक याद हो आई “नर्मदा सौंदर्य की नदी है” । लगा सच ही तो कहा था , जब एक टुकड़ा भर हिस्सा देख उसे सौंदर्य के सारे प्रतिमान याद आ रहें हैं ,शब्द नहीं सूझ रहे इसका वर्णन करने को तो पूर्ण सौंदर्य को अपने चेतना के स्तर पर जी लेने वाले को क्योंकर प्रेम न हो जाये इस साक्षात सौंदर्य विग्रह से “। “नानू आई वांट टू लीव हीयर फ़ॉर रेस्ट ऑफ माय लाइफ,  हाऊ मेसमेराइज़िंग ब्यूटी इट हेस , ग्रेट,”वह बुदबुदाई । नानाजी बोले -“यस , दोस  आर नेटीवस ऑफ अ रिवर साइड नेवर वांट टू लीव इट, बिकॉज़  अ रिवर ऑलवेज़ फ़्लोज़ इनसाइड ” उसने नानाजी की तरफ देखा  ” सर्प्राइज़ ना “, वे ठहाका मारकर हँस पड़े ,  “इफ यु कैन लर्न संस्कृत , वाह्य आई कांट लर्न इंग्लिश” , वह खिलखिला उठी ।
नदी के किनारों के खेतों में किसानो का काम शुरू हो चुका था । बैल ,गाय ,मजदूर स्त्रीयाँ , और उनके सम्मिलित खिलखिलाते स्वर। हरी भरी फसलों में नर्मदा के पानी की मिठास और सौंदर्य दोनो दमक रहे थे । एक किसान ने  पूछा “राम राम दादा आज अल्याङ्ग कसा,”  नानाजी ने जवाब दिया ,”पोरई आएल छै ,ओकss नर्मदा दिखावणss लायोज, “।
वही किसान थोड़ी देर में अपनी झोपड़ी के बाहर भुट्टे सेंक कर दो गिलास में गरम चाय ला उन्हें दे गया ।
दादा “आज यांज खाणों खाजो , दाल बाफला बणई रइज म्हारी बैरो”  , बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये अपने निमंत्रण को अपना अधिकार मान वह पलट गया ।
“नानाजी ये जो नदी है उसको अपने भारत में कितना गंदा कर देते हैं , नदियों में नहाना गंदगी फेंकना बंद कर देना चहिये , दूर से देखो  लंदन में तो नदी को ऐसे छू भी नहीं सकते “, सूरज की बढ़ती रोशनी में सोने की नदी को चांदी की धारा में तब्दील होते देख नव्या बोली ।
नदी में नहाकर जिस ऊर्जा से वह भर उठी थी और टेम्स का डिजाइनर फ्रेम उसे दुःखी कर गया था | उसके लिए उत्तर नहीं सूझने पर कि क्या सहीं है | फ्रेम में जकड़ी साफ सुथरी टेम्स या अल्हड़ ,मुक्त किन्तु  गन्दलाती नर्मदा तो सोचा विद्वान  नानू से ही उत्तर पालूं।
 नानू कुछ देर चुप रहे और बोले ,  “माँ  की गोद देखने की चीज़ नहीं होती बिटिया, उसके आँचल की गर्मी और ममता तो उसमें समा जाने पर ही मिलती है” ।
“लेकिन इसमें उसके गंदा होने का भय भी तो होता है”- वह फिर बोली ।
“बच्चे की सु सु पोटी से माँ की गोद गंदी हुई है कभी भला , उसमें इतना सामर्थ्य तो होता है कि वह उससे  पार पा निर्मल बनी रह सके । माँ कोई मॉडल नहीं होती सजी धजी कांच के उस पार, नपे तुले अंग प्रत्यंग में ढली, गहने ज़ेवरों से लदी , मेकअप की परतों में जिसे केवल देखा जा सके, न छुआ जा सके न उसमें कोई ममत्व हो न प्रेम , माँ तो थोड़ी उबड़ खाबड़, कहीं पतली,  कहीं थुलथुली , अपनी नैसर्गीक ममता और सौंदर्य लुटाती अपने बच्चों की चिंता में अपने सौंदर्य को बिसारती ही सुहाती है । “
नव्या एकटक नानाजी की तरफ देखती रही।
वे आगे बोले -“और नर्मदा ममतामयी माँ जो अपने बच्चों के पालन पोषण में अपना पूरा सौंदर्य बिसारती रही है लेकिन उसका अपने को यूं बिसारना ही उसका सबसे बड़ा सौंदर्य और यश बन गया” ।
“लेकिन नानाजी ..”……………वह बोलने वाली ही थी कि नानाजी ने हाथ के इशारे से उसे चुप करते हुए कहा- “उदार माँ की संतानें सदा उतनी ही उदार हो जरूरी नहीं ,नालायक संतानों ने इसके सौंदर्य को धूमिल कर दिया  , माँ का आँचल मैला कर दिया , कभी कभी सुनना बिटिया यदि सुन सको तो उल्लास, उत्सव ही नहीं लहरों में सिसकियां  भी सुनाई देती है” । कहते कहते वे उदास हो गए ।
दोनो चुप हो गए , मौन में लहरे बोल रही थी , क्या बोल रही थी कौन जाने ? तभी किसान अपनी झोपड़ी से उन्हें बुलाने चला आया , भूख तो लगी ही थी मना करने का प्रश्न नहीं | वे दोनों उठकर चल दिये , खेत से तोड़ी ताजी हरी मिर्ची जिसे नमक के साथ तल दिया गया था , ताजे लसन की लालमिर्च की चटनी , टमाटर प्याज ककड़ी का सलाद , और दाल बाफले ऐसी कुशलता से थोड़ी ही देर में सारी व्यवस्था जैसे उस किसान पत्नी ने जुटाई देख हैरान रह गई| रात को पहरा देने की झोपड़ी में थोड़े से सामान में ऐसा स्वादिष्ट भोजन की उंगलियां चाटती रह  गई नव्या | नाप तौल कर  खाने वाली फ़िगर कॉन्शियस नव्या  तेज मिर्ची के खाने से लाल हुई नाक सुड़काती जा रही थी और खाना खाती जा रही थी | पेट भर गया पर मन और और मांग रहा था | ज्यादा खा लेने पर नींद की खुमारी होने लगी।  वहीं किनारे पर दरी डाल सो गई | नानाजी भी दूसरे किसानों से बतिया रहे थे । एक घंटे बाद उठी तो दोपहर हो चली थी|नानाजी एक बार फिर भीग लेती हूँ नदी में “, नानाजी ने टोका नहीं , “अभी नदी पूर्ण यौवना है, दोपहर है, इस समय उसके रति विलास को भंग न करो, यह उसका निज समय है, उसका एकांत, वैसे भी यौवन कोई बंधन नहीं मानता और खलल डालने पर उग्र हो जाता है,  उफनता यौवन अनर्थ कर देता है बिटिया इसलिए अभी नहीं ।नदी की निजता का सम्मान करो “।  किसान बोला  “इना धड़धड़ा टेम पsss जावण वालो वापस नई आवतो “, कहानी चाहे जो हो ,अंधविश्वास ही सहीं लेकिन नदी की निजता का ऐसा सम्मान करने वाली संस्कृति कैसे नदियों की शत्रु बन गई ?प्रश्न मन में कुलबुलाने लगा ।
उसने नदी को गौर से देखा सच तो कह  रहे थे नानू  लहरों में सुबह वाली अल्हड़ता नहीं, इन  लहरों की अंगड़ाईयों में यौवन की मदमाती चाल और ऊर्जा का अतिरेक दिखाई दे रहा था  जो सौंदर्य का चरम था । उसने सहम कर पैर पीछे कर लिए ।
धीरे धीरे सांझ उतरने लगी थी |  नदी चांदी से फिर सोना होने लगी कई कई कोनों से तपता सोना । कहीं कहीं चांदी की सफेदी जैसे प्रौढ़ हो चले व्यक्ति के बाल कान के पास से चमकने लगते हैं कुछ कुछ वैसे ही | शाम का धुंधलका , सूरज के आराम का समय और नदी के भी | नदी की लहरों में एक प्रौढ़ा की गरिमा थी | “सो ग्रेसफुल रिवर”,वह बुदबुदाई |     संध्या आरती का समय होने से पहले ही वे इस किनारे आ लगे “धड़धड़े समय पर नदी के अंदर नहीं होते बिटिया “,नानाजी ने कहा । तो पूछ बैठी “धड़धड़ा मतलब” ,  जवाब आया ” दिन में संक्रांति के समय में,  केवल एक समय शुभ माना जाता है ,जब रात विदा ले रही होती है और भोर का आगमन ,तब नदी का स्पर्श लिया जा सकता है । दोपहर  को त्याज्य और सांझ ,दिया बत्ती का समय ,गोधूलि बेला में पूजन का विधान है ,चलो नर्मदा आरती का समय है” ।
अदभुद द्रश्य बड़े बड़े दियों में असंख्य रौशनी की ज्वालायें निकल पड़ी | गीले कपड़े को हाथ पर लपेटे ,धोती जनेऊ धारी पंडितों ने वैदिक मंत्रोउच्चर  के साथ आरती प्रारम्भ की | घंट घड़ियाल शंख और मनुज के समवेत स्वर ने रोमांच भर दिया । नदी की लहरों में आरती के दियों की ज्वाला का प्रतिबिम्ब नज़र आ रहा था | ढलता सूरज , उगता चांद और असंख्य तारों के प्रतिबिम्ब ने मानो नदी को भी सितारों भरी चुनर ओढ़ा दी थी । फ्रेम वाली नदियों के किनारे अट्टालिकाओं की रौशनी जगमगाती है या जगमगाते हैं आतिशबाजियों के प्रतिबिम्ब ।  वह सोचने लगी “नदियों को ऐसे ही बहते रहना चाहिए, निर्द्वन्द ,नैसर्गीक और जिनमे जीवंत प्रतिबिम्ब हो प्रकृति के नकली बंधन और  नकली रोशनियाँ नहीं । नदियों को उन्मुक्त बहने दो उन्हें फ्रेम में नही जकड़ना है, न उन्हें म्यूज़ियम की चीज़ बनाना है  । उसमें तो घटने दो जीवन,  बचपन , यौवन और बुढ़ापा | सच कहते हैं नानाजी हर घर मे एक नदी होती है | हर घर में क्यों हम सबमें एक नदी बहती है, उसे बहते रहना होगा , बहती रहना माँ अपने इसी रूप के साथ” , रात गहराने लगी थी  । चांद की शीतलता और दमक नदी की शीतलता से मिलकर द्विगुणित हो गई थी | किनारे धीरे धीरे सिमट रहे थे, बत्तियां सो गई थीं । अब नर्मदा है और यह विराट प्रकृति का रंगमंच है , जहां न जाने कैसे कैसे कौतुक होते होंगें कौन जाने ? नदी की निद्रा का समय कोई ठहरता नहीं किनारे पर |  हवाओं में गूंज रहा था नाद और नीरवता में दूर दूर तक महक थी नदी की । पलट पलट कर देखती रही नव्या जैसे नदी से पूछ रही हो कि “बहती रहोगी न हमेशा”, और वह जैसे बोल रही हो कि “फ्रेम में जकड़ना नहीं है , न ही मैला होना है,  इनके बीच का कोई रास्ता निकाल सको तो पाते रहोगे बहती नदी बाहर भी और भीतर भी । दो ध्रुवों के  बीच की यह आस लिए नव्या चल पड़ी और उसी आस के साथ नदी ने अपनी राह ली ।
सहायक प्राध्यापक , अंग्रेजी साहित्य , बचपन से पठन पाठन , लेखन में रूचि , गत 8 वर्षों से लेखन में सक्रीय , कई कहानियाँ , व्यंग्य , कवितायें व लघुकथा , समसामयिक लेख , समीक्षा नईदुनिया, जागरण , पत्रिका , हरिभूमि , दैनिक भास्कर , फेमिना , अहा ज़िन्दगी, आदि पात्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। संपर्क - garima.dubey108@gmail.com

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