भोगीलाल बहुत बड़े व्यापारी थे। कारोबार अच्छा-खासा चल रहा था।आलिशान मकान था। एक बहुत बड़ी बैठक और पांच शयनकक्ष।
परिवार में अस्सी वर्ष की वृद्ध मां, पत्नी, दो जवान बेटे और एक बेटी। मां गैरेज में पड़ी खटिया पर लेटी अपनी जिंदगी के बाकी दिन गीन रही थी।
समय के बीतते कारोबार में मुनाफा कम होता गया। पत्नी की बिमारी के पीछे बहुत पैसे खर्च होने लगे।बिमारी पकड़ी नहीं जा रही थी।जवान बेटों की शादी की बात बन नहीं पा रही थी।कभी-कभी बाप-बेटे के बीच छोटे-मोटे झगड़े हो जाते थे।
भोगीलाल ने अपनी व्यथा मित्र चमनलाल को सुनाई। चमनलाल ने सलाह दी कि किसी अच्छे वास्तुशास्त्री को बताओ।शायद घर में कोई वास्तुदोष हो। चमनलाल की सलाह मानकर उसने एक बहुत बड़े वास्तुशास्त्री को बुलाया। वास्तुशास्त्री ने पूरे घर के भीतर-बाहर चक्कर लगाया और बताया कि वैसे तो आपके मकान का प्लान वास्तु के अनुसार ही है। आपके मकान में सिर्फ एक ही दोष है। भोगीलाल ने पूछा-“पंडितजी! बताइए कि इस दोष का निवारण कैसे किया जाए?”
वास्तुशास्त्री ने कहा-“आपके घर में ऊर्जा की कमी है।”
भोगीलाल ने पूछा-“ऊर्जा लाने के लिए क्या किया जाए?”
वास्तुशास्त्री ने कहा-“ईश्वर सभी जगह नहीं पहुंच पाते। इसलिए उसने बनाई है मां। मां ईश्वर का साक्षात सदेह रूप है। आपने पत्थर की मूर्ति को पूजा-स्थान में स्थापित किया है, किन्तु साक्षात सदेह रूप ईश्वर को गैरेज में स्थान दिया है। मां घर की ऊर्जा होती है। घर की उर्जा को आपने घर के बाहर रखा है। मां घर की रोशनी होती है।अब आप ही बताइए कि मां के बिना घर में उजाला कैसे होगा?आपको घर के प्लान को बदलने की या किसी विधि-विधान करने की जरूरत नहीं है।बस,घर की उर्जा को घर के भीतर स्थान दे दो। उनके आशीर्वाद से सारी आपदाएं अपने आप हल हो जाएगी।”
वास्तुशास्त्री को सुनकर भोगीलाल अवाक रह गए।

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