“तुम ठीक हो न सुमि…आज सवेरे से ही तुम्हारा ख्याल दिलों-दिमाग पर दस्तक दे रहा था। सोचा तुमसे थोड़ी देर बात कर लूँ.. तो सकूँ आ जाएगा। न जाने कितने जन्मों का तुमसे नाता है..मुझमें बहुत गहरी समाई हुई हो सुमि.. तुमको खुद से अलग सोच ही नहीं पाता।..एक बार याद आना शुरू होती हो तो बार-बार दस्तकें देती रहती हो.. जब तक बात न कर लूँ.. सकूँ नहीं आता।”
फ़ोन पर गूंजते हुए आत्मीय के वाक्य सुमि में जान फूंक देते थे। उसके निर्वात में तैरते हुए शब्दों की हरारत आज भी उसके जिंदा होने के अहसास दे देती थी।
उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर सुमि को इन शब्दों से जुड़े स्पर्शों की बेहद जरूरत थी। इन्ही शब्दों की आत्मीय-सी आहटों को दोहरा-दोहरा कर सुमि विवाह उपरांत मिली उपेक्षाओं को बिसराकर सतत चलती रही थी।
सुमि को कैंसर से जूझते हुए लगभग तीन साल हो चुके थे। जब तक बीमारी ने उसे घर में ही घूम-घूम कर काम करने की इजाजत दी…तब तक उसका मन स्वस्थ्य महसूस करता रहा। कीमोथरपी और रेडियोथेरपी के कई साइकिल होने के बाद सुमि अब बहुत थकने लगी थी।
किसी पर भी बहुत ज्यादा आश्रित होना उसे रुला देता था। बच्चे व पति उसकी मदद करने की हर संभव कोशिश करते..पर अब.. सब छूटना ही था। कैंसर सारे शरीर में फैल चुका था। सुमि ने सभी उपचार लेने से मना कर दिया। पति व बच्चों ने उसकी इस बात का विद्रोह किया। पर सुमि अब किसी भी तरह के बाहरी दर्द को भोगना नहीं चाहती थी।
दोनों बेटियां उदिता और नमिता अपने-अपने परिवारों में खुश थी। बेटा निमित्त अपनी पत्नी अंकिता और बेटे अंशु के साथ बहुत खुश था। सबको अपनी-अपनी जिंदगियों में खुश देखकर सुमि ईश्वर के आगे नतमस्तक हो जाती थी। कुछ समय से उसकी तबियत कुछ ज़्यादा खराब थी। सो घर में सभी बच्चे इककठे हो गए थे।
सुमि बीमारी से कभी भी तनावग्रस्त नहीं हुई। उसको हमेशा लगता था कि संसार से विदा लेने के लिए ईश्वर कोई ना कोई बहाना जरूर बनाता है। वो संसार से विदा लेने के लिए मानसिक तौर पर तैयार थी। आत्मीय के अचानक चले जाने ने उसकी सोच को बहुत स्थिर कर दिया था।
यूं भी उसकी घर-परिवार से जुड़ी सारी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थी। सुमि के पास अब बहुत कीमती गिनती के दिनों वाला समय शेष था। जिसमें वो खामोशी से अपने जीवन का आकलन करना चाहती थी।
निखिल अक्सर बोलते थे…
“सुमि! तुम क्यों नहीं सोचना चाहती कि तुम बीमार हो। तुमको आराम करना चाहिए। इतने नौकर-चाकर घर में काम करने के लिए है। जो तुमको चाहिए…..तुम्हारे बिस्तर तक आ जाएगा। नाहक ही तुम खुद उठकर अपने काम करने की कोशिश करती हो। शरीर में इतनी कमजोरी है संतुलन बिगड़ गया तो और मुसीबत झेलोगी।”.. निखिल लगभग हर रोज ही इस तरह की बातें बोलते थे। तो सुमि कहती…
“ठीक है निखिल आराम भी कर लूंगी। पर मुझे छोटा-मोटा काम करते रहना ठीक लगता है। मुझे लगता है.. मैं बहुत बीमार नहीं हूं।” सुमि जब अपने मन की बात बोलती, निखिल या तो अपने किसी काम में उलझे हुए होते या फिर अपनी बात बोलकर कमरे से बाहर निकल गये होते।
सुमि को अक्सर महसूस होता.. उसकी बातें निखिल ने सुनी ही नहीं क्योंकि उनकी कोई भी प्रतिक्रिया सुमि के कानों तक कभी आई नहीं। पर हां युवा बच्चों के सामने अक्सर निखिल ऐसी बातें करते ही रहते थे। जिससे बच्चों को महसूस हो कि वो उनकी माँ का कितना ख्याल रखते हैं।
शुरू-शुरू में सुमि को लगता था…जिस तरह हरेक के लिए खुद करती आई है कोई उसके लिए थोड़ा-सा भी करके प्यार जताए। पर सब खुद के सोचे से नहीं होता….जो मिलता है उसको बस स्वीकारना होता है। सबके लिए सुमि थी और सुमि के लिए एक आवाज लगाने पर निखिल ने नौकरों की फ़ौज खड़ी कर रखी  थी। सुमि भ्रमों में जीना कब का छोड़ चुकी थी।
निखिल की हर उपेक्षा सुमि को आत्मीय के बहुत करीब ले जाती। एक बार सुमि कॉलेज में ही चक्कर खाकर गिर गई थी। फॅमिली डॉक्टर से जब ब्लड टेस्ट करवाए तो हीमोग्लोबिन कुछ कम आया था। उस रोज आत्मीय कितना परेशान होकर बोला था…
“सुमि! वादा करो अपने खाने-पीने का पूरा खयाल रखोगी। मैं रोज तुम्हारे लिए अनार का जूस निकाल कर लाऊँगा…बगैर न बोले…तुमको पीना होगा। यह बात बहुत अच्छे से समझ लो सुमि….मेरी जान बसती है तुममें। तुमको जरा-सा भी कुछ होता है….तो मुझे पीड़ा होती है।”
सिर्फ़ आत्मीय पुकारकर सुमि कितना रोई थी उस रोज। लगभग एक महीना तक बेनागा आत्मीय उसके लिए अपनी मोटरसाइकिल पर जूस लेकर आता  था। हर बार सुमि जूस का पहला घूंट आत्मीय को देती और बोलती ‘तुम हो तो मैं भी हूँ आत्मीय’…..जूस के अंतिम घूंट तक पहुंचते-पहुंचते उसकी आँखें आंसुओं से भर जाती। इतना लाड़-प्यार उसने पापा को कभी भी माँ पर लुटाते हुए नहीं देखा था। आत्मीय का दिया हुआ छोटे से छोटा भाव उसको भावुक कर जाता था।
सुमि को पाने के लिए आत्मीय ने पूरा एक साल व्रत रखे थे। किसी को पाने के लिए सिर्फ़ एक वक़्त भोजन करना और ईश्वर से सिर्फ़ उसके साथ को मांगना सुमि के लिए बहुत बड़ी बात थी। सुमि ने जब हाँ बोला उसके बाद ही सुमि को आत्मीय के व्रत रखने वाली बात पता लगी थी।
सुमी को जब आत्मीय से प्यार हुआ तो उसकी खुद से भी लड़ाई शुरू हो गई थी….कि उसको प्यार नहीं करना। प्यार-वयार सब भ्रम है। पर कितना धुनी था आत्मीय। उसने जी-जान लगा दिया सुमि को स्वीकार करवाने के लिए।
जिस रोज उसने आत्मीय को बोला…
‘बहुत प्यार करने करने लगी हूँ आत्मीय तुमको। प्लीज मेरे लिए कभी भी व्रत मत रखना।’ उस दिन लबालब भरी हुई आँखों से सुमि  को देखते हुए आत्मीय बोला था…
“तुम नहीं जानती तुम्हारे लिए क्या-क्या कर सकता हूँ मैं…बस हमेशा साथ रहना। मेरी एक छोटी-सी ख्वाहिश भी अब पूरी कर दो…जिस भगवान के आगे माथा टेक कर तुमको मांगा था वहाँ मेरे साथ माथा टेकने चलो प्लीज। ताकि भग़वान हमेशा हमारे साथ रहे।”
आत्मीय की सारी की सारी बातें सुमि को बहुत रुलाती थी। उसकी हर कही हुई बात याद आने पर वो बहुत रोती  थी। मंदिर में एक साथ माथा टेकने के बाद आत्मीय ने कसकर बाहों में बांध लिया था सुमि को। उस रोज आत्मीय ने सुमि को कहा था….
“ईश्वर भी  हमारे रिश्ते के साक्षी हैँ सुमि….तुमको खुद से ज़्यादा प्यार करना चाहता हूँ।”
“मैं भी तुमको बहुत प्यार करना चाहती हूँ आत्मीय….हद से ज़्यादा। इतना दिया है तुमने कि मुझे समझ ही नहीं आता कहाँ छिपाऊँ।” अपनी बात बोलकर सुमि ने अपना सिर आत्मीय के सीने में छिपा लिया था।
उस दिन के बाद कोई ऐसा सोमवार नहीं गया जब सुमि ने आत्मीय के लिए व्रत न रखा हो। यह बात सुमि ने कभी भी आत्मीय को नहीं बताई। नहीं तो वो भी उसके साथ-साथ व्रत रखता।
सुमि ताउम्र निखिल के साथ बसाये घर के रीति-रिवाज निभाने के लिए व्रत-उपवास रखती रही। पर उसका मन से रखा हुआ व्रत सिर्फ़ आत्मीय के लिये सोमवार का व्रत था।
निखिल बहुत उदार पति थे। उन्होंने कभी भी सुमि से रुपयों-पैसों का हिसाब-किताब नहीं पूछा। उल्टा उनको तो आश्चर्य होता था सुमि कभी भी अपने लिए कुछ भी खरीद कर लाने की बात ही नहीं करती थी। सुमि को अपने ऊपर रुपया खर्च करना समझ नहीं आया। घर की जरूरतों और बच्चों के खर्च के अलावा सुमि बहुत अधिक नहीं सोच पाई। शायद मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने की वजह से किफायत उसके संस्कारों में पहले से ही बुनी हुई थी।
विदा लेने से पहले अब सुमि के आस-पास आत्मीय की बातें और उसकी यादें अपना जमघट जमाए रहती। आत्मीय का दिया हुआ इतना कुछ था कि सुमि की शेष साँसे, शायद उन्हीं से चल रही थी।
सुमि के लगाव कभी निर्जीव चीजों से बंधे नहीं थे। जिनकी देख-रेख के लिए वो उठती। वो तो बस चलते-फिरते अपने काम करते हुए जाना चाहती थी।
अतीत में मिले अथाह प्यार की कमी सुमि को हरदम सालती रही। खुद को जिंदा महसूस करवाने के लिए सुमि बार-बार अतीत में लौटती थी। आत्मीय की मित्रता में गुज़रे पाँच सालों ने दोनों को बहुत कुछ दिया था। आत्मीय अक्सर कहता था..
“सुमि! कॉलेज खत्म होते ही जैसे ही हम दोनों को नौकरी मिलेगी हम शादी कर लेंगे। धीरे-धीरे अपनी मेहनत का रुपया जमा करके घर बनाएंगे.. हम दोनों का घर.. सुमि और आत्मीय का घर.. मैं तुमको इतना प्यार करूंगा.. इतना प्यार करूंगा कि..” बोलते-बोलते आत्मीय सुमि की आँखों में झांक कर देखता ,फिर आगे बोलना शुरू करता…
“हम दोनों मिलकर घर और बाहर के काम साथ-साथ किया करेंगे ताकि मैं तुमको हर जगह महसूस कर सकूं। तुम्हारे बगैर मैं कुछ भी नहीं सोचना चाहता  सुमि। मुझ से कभी दूर मत जाना।”.. आत्मीय ऐसा बोलकर कसकर उसे गले लगा लेता।
“तुमको या तुम्हारे घरवालों को मेरे नौकरी करने पर कोई ऑब्जेक्शन तो नही होगा आत्मीय। बोलो न…मैं नौकरी करना चाहती हूं.. बहुत कुछ साबित करना चाहती हूं कि मैं भी कुछ हूँ। बस इस बात के लिए कभी मना मत करना। मैं घर व बाहर दोनों के काम संभाल लूँगी।”
“सुमि! जो भी होगा हम दोनों मिलकर करेंगे। यही मैंने अपने घर में देखा है। मम्मी के कामकाजी होने से पापा भी उनके साथ घर-बाहर दोनों का काम संभालते थे। पापा मम्मा को बहुत प्यार व इज़्ज़त देते थे। उन दोनों ने भी अपनी मर्जी से शादी की थी।..
मैं भी चाहता हूं तुमको बहुत प्यार करूँ, जैसा मेरे पापा मम्मा को करते थे। अक्सर रिश्तेदार पापा को बोलते थे ‘जोरू का गुलाम है।’ पर पापा ने कभी इन छोटी बातों को नहीं सुना।” पिछली बातों को बताते-बताते आत्मीय अपने मम्मा-पापा की स्मृतियों में खो गया। उसकी आँखों को देख कर लग रहा था,बहुत इज़्ज़त करता है वो अपने माँ-पापा की। थोड़ी देर में अपनी बात को जारी रखते हुए बोला..
“जानती हो सुमि, एक बार मां की तबियत बहुत खराब हो गई थी…छोटी बहन के पैदा होने के कुछ साल बाद। पापा जब मम्मा का छोटे से छोटा काम करते तो माँ सुबकने लगती थी। तब पापा उनको गले लगाकर बहुत प्यार करते और बोलते..
‘अभी कर रहा हूँ तुम्हारा सब.. फिर खूब सेवा करवाऊंगा.. भूलना नही।’ तब मां मुस्कुरा जाती।  मैं तब बारह साल का था। सब बातें समझ आती थी मुझे। मैने मम्मा-पापा को एक दूसरे के लिए हमेशा बहुत करते देखा है सुमि।”
सुमि उसकी बातें एकटक निगाह जमाये सुनती रहती। जैसे-जैसे वो बोलता सुमि की आंखें भर आती और चुपके से आत्मीय को बोलती..’बहुत प्यार करने लगी हूँ तुमको..’
सुमि का इतना-सा बोलना आत्मीय को कितना निहाल कर जाता। उसको कसकर गले लगा लेता और बोलता…
“सुमि! तुम्हारे सब काम मिल-बांट कर करूंगा। बस एक काम को छोड़कर..  तुमको प्यार मैं ही ज्यादा करूंगा। तुमसे ज्यादा.. क्यों कि मेरी जान बसती है तुममें। तुम इतनी प्यारी हो कि तुमको बहुत प्यार करने को जी चाहता है।”
“और मेरा तुमको बहुत सारा प्यार करने को जी चाहता है।जब तुम ऐसी बातें करते हो आत्मीय…बहुत भावुक हो जाती हूँ। लगता है बहुत जोर-जोर से रोऊँ। मैंने ऐसे होते हुए नही देखा अपने घर में कभी। पापा ने कभी मां पर लाड़ लुटाया ही नहीं। सारा-सारा दिन संयुक्त परिवार में खटने के बाद भी पापा उनको कभी प्यार नही कर पाए। मैंने बहुत बार मां को चुपचाप सुबकते हुए देखा था आत्मीय। जब तुम ऐसी बातें करते हो, समझ नही पाती कहां छिपा लूं तुमको। कही मेरी ही नज़र न लग जाये।”
“धत्त पागल हो तुम सुमि। अपनो की भी कोई नज़र लगती है। तुम तो जब भी मेरे स्वप्नों में आती हो खूब लाड़ करवाती हो। मेरा एक काम करोगी सुमि..ईश्वर से अपने लिए मुझे जरूर मांग लेना। कहते है ईश्वर स्त्रियों की बातें जरूर सुनते है। बहुत भावुक होती है न वो। मैं भी मांगता हूं तुमको.. पर वो पहले तुम्हारी सुनेंगे।” बोलते-बोलते आत्मीय की आंखे नम हो जाती। तब सुमि उसके साथ-साथ रोने लगती किसी भी कीमत पर सुमि आत्मीय से दूर नही होना चाहती थी।
दोनों की मोहब्बत करीब-करीब पांच साल चली। दोनों  मोटरसाइकिल पर साथ-साथ न जाने कितनी दूर तक घूमकर आते। आत्मीय के कंधे पर सुमि घंटों सिर रखकर बैठी रहती। प्रेम की अथाह अनुभूतियों को महसूस कर भाव-विभोर हो जाती।
दोनों के परिवार वाले इस विवाह के लिए राज़ी थे। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। अगर दिक्कत थी तो वो उस निमित्त को थी, जहां का लेखा-जोखा सबकी समझ से बाहर होता है।
एक दिन अचानक जब सुमि को पता लगा कि आत्मीय को डॉक्टर्स पैंक्रियास का कैंसर बता रहे है। उसके पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई। कोई भी लक्षण पहले से न दिखने के कारण बीमारी आखरी स्टेज में पता लगी.. जब आत्मीय को लगातार उल्टियाँ और भूख लगना बंद हो गई। आत्मीय के बचने की संभावनाएं न के बराबर थी। सुमि और आत्मीय के लिए एक-एक क्षण बेशकीमती था। आने वाला हर दिन खत्म होने से पहले दोनों को रुला कर जाता।
जब भी दोनों मिलते, आत्मीय सुमि की गोद में सिर रखकर लेट जाता। उन दिनों उनके पास बात करने के लिए शब्द नहीं होते थे। भविष्य के धुंधला जाने से बस एक दूसरे का स्पर्श बहुत सकूँ देता था।  कुछ ऐसे ही अंतरंग क्षणों में आत्मीय ने जैसे ही सुमि को स्पर्श किया.. दोनों बहते चले गए। जैसे-जैसे उनके प्रेम का गुबार चरम छूने लगा ….दोनों ने एक दूसरे को कसकर गले लगाकर रोना शुरू कर दिया। रोने के सिवा दोनों के पास विकल्प कहाँ था। न जाने कब तक दोनों एक दूसरे से लिपटे सिसकते रहे..
“सुमि मेरी जान! मुझे खुद को और तुम्हें रोकना चाहिए था। जाने से पहले शायद यह मुझसे गलती हुई है।.. समझ नहीं आता अफ़सोस करूँ या हमारे प्रेम के इस खूबसूरत रूप को स्वीकारूँ।.. तुम मेरी हो… क्या-क्या सोचा था.. तुम्हारी झोली प्यार से भर दूंगा…. पर अब तुम्हारी खुशबू लेकर जा रहा हूं सुमि। मैं हमेशा तुम्हारा इंतजार करूंगा.. तुम मेरी जिंदगी हो।  बस हमेशा यही चाहूंगा कि तुम बहुत खुश रहो मैं कहीं दूर से तुम को देखूंगा और खुश रहूंगा। तुम अपने परिवार के साथ हमेशा खुश रहना।”
“नहीं आत्मीय अब यह मुझसे नहीं होगा। तुम रहोगे  मेरे पास हमेशा और मैं अपनी जिंदगी यूं ही गुजार लूंगी।”
“सुमि! आज तुम मुझे वचन दो कि भविष्य में शादी जरूर करोगी। अकेले जिंदगी काटना बहुत मुश्किल है। भगवान तुमको मुझसे ज्यादा प्यार करने वाला साथी दे। जो तुम्हारी हर जरूरत में साथ दें.. मैं प्रार्थना करूंगा। सुमि  मैं हमेशा चाहूंगा कि तुम बहुत खुश रहो।…मैं चाहता था तुमको बहुत प्यार करना पर……” बोलते-बोलते आत्मीय फिर से सुबकने लगा था।
सुमि के लिए आत्मीय के साथ गुजारे हुए दिन हमेशा के लिए ठहर गये। जिस तरह आत्मीय ने उसे अंतिम विदा ली…वो सुमि के जीवन से जाकर भी कभी नहीं गया। तभी शायद दोनों की जीवन-यात्रा के अंतिम समय में एक ही बीमारी कैंसर…सारथी बनी।
निखिल एक संपूर्ण जीवन गुजर जाने के बाद भी आत्मीय की जगह न ले सके। निखिल को सुमि के शरीर से जुड़ी हुई जरूरतें समझ आती थी। पर भावनात्मक जरूरतों को उन्होंने कभी समझना नहीं चाहा। निखिल भावनात्मक रूप से अगर सुमि से जुड़ते तो शायद आत्मीय छूट जाता। निखिल को शायद ही सुमि के खाने,पीने और दूसरी पसंद का भी पता हो। कभी ऐसा कुछ हुआ हो याद ही नहीं आता सुमि को। अब तो सुमि भी अपनी पसंद-नापसंद भूल चुकी थी।
सब यंत्रवत चल रहा था। मशीन के जैसे काम करते-करते विवाह को भी सैंतीस साल गुजर चुके थे। पर आत्मीय के प्रेम से जुड़ा सकून उससे चिपक कर बैठ गया था। निखिल ने सुमि को कभी नौकरी नही करने दी क्यों की वो खूब कमाते थे।
सुमि का जब भी मन उदास होता….आत्मीय को उसकी यादों और बातों के साथ  अपने पास बुला लेती। अतीत में आत्मीय की कही हुई बातें उसके हरे होते ज़ख्मों पर मरहम का काम करती। सुमि का उदास होना कभी निखिल को पता चला हो उसे याद नही आता। निखिल के हिसाब से हर खुशी सुमि को मिल रही थी। तभी तो अक्सर निखिल बोलते थे..
“सुमि तुमसे ज्यादा सुखी स्त्री कौन होगी। तुम्हारे पास क्या नही है। घर,नौकर,ज़ेवर,महंगे कपड़े सभी कुछ। मुझे गर्व होता है मैं तुमको यह सब दे पाया। नही तो अपनी मां को सोचता हूँ, तो याद आता है..सारा दिन काम करती थी वो। उसके पास ऐसी कोई भी सुविधाएं नहीं थी।”
निखिल भी कहां गलत थे। उन्होंने जो देखा था उसमें वही पनपा। समय तो सुमि और आत्मीय का खराब था..जो आत्मीय को उससे इतनी दूर ले गया। आत्मीय का अथाह प्रेम सुमि को हमेशा स्पर्श करता रहा। आत्मीय की बातें सुमि को जिंदा होने के अहसास देती थी।शायद तभी….वो कुछ भी भुला नही पाई।
खैर अब तो उसका जीवन भी पूर्णविराम की ओर बढ़ रहा था।
गुजरे हुए तीन सालों में निखिल भी मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार हो चुके थे। सुमि को कभी भी कुछ भी हो सकता है। पर इन गुजरे हुए तीन सालों में निखिल ने एक बार भी सुमि से नहीं कहा.. ‘तुम्हारी कमी रहेगी सुमि’.. शायद सुमि यह वाक्य जाने से पहले सुनना चाहती थी। सैंतीस साल कम नहीं होते परिवार को देने के लिए। जिसके साथ बने परिवार के लिए अपना संपूर्ण जीवन दे दिया उसने सुमि  की मृत्यु को भी फॉर ग्रांटेड ले लिया। बच्चों की अपनी दुनिया थी। उनसे सुमि को कुछ भी अपेक्षित नहीं था।
अब सुमि को महसूस होता था अगर आत्मीय का असीम प्रेम न होता तो शेष जीवन कैसे कटता। आत्मीय से मिला आत्मिक प्रेम इतना गहरा था कि निखिल का दिया हुआ शारारिक प्रेम हल्का पड़ गया। तभी तो आत्मीय साथ न होकर भी शेष यात्रा में भी साथी बना रहा।
जब तक सुमि आत्मीय के साथ रही समर्पित रही। निखिल से विवाह के बाद उसके लिए समर्पित रही। पर कभी आत्मीय जितना जुड़ नहीं पाई। निखिल जुड़ना भी कहाँ चाहता था उससे। समानांतर रेखाओं के जैसे दोनों हमेशा साथ चलते रहे थे। जरूरतों से जुड़े रिश्तों की उम्र होती ही कितनी है….सुमि बहुत अच्छे से जानती थी।
आज एक अरसे बाद अचानक रात को स्वप्न में सुमि को लगा उसको आत्मीय ने पुकारा है..
“सुमि! तुम ठीक हो न….तुमको बहुत दर्द तो नहीं हैं.. मैं भी गुज़र चुका हूँ इस यंत्रणा से…तुम मेरी पीड़ा के समय हमेशा मेरे साथ रही.. महसूस कर सकता हूँ तुम्हारी हर पीड़ा को… बहुत अच्छे से जानता हूँ तुम्हें..तुम कभी भी हार नहीं मानती हो..मैं आज भी तुम्हारे साथ हूँ”..
सुमि को लगा आत्मीय की एक ही पुकार ने उसे भींचकर गले लगा लिया हो। आज सुमि को याद आया वही आखिरी दिन और पल जब आत्मीय ने उसे ऐसे ही गले लगाकर बोला था..
“मेरी जान सुमि यहीं रहो मेरे बहुत पास.. मैं अंतिम सांस लेने से पहले तुमको पूरी तरह महसूस करना चाहता हूँ.. ताकि जाते-जाते मुझे कहीं न लगे मैं बहुत रीता गया हूँ।”
आत्मीय की कही बातों में सुमि की दुनिया पूरी सिमट गई थी। दोनों के ही पापा-मम्मी को इस प्यार का पता था। दोनों विवाह करने का भी सोच रहे थे तो उनके मिलने-जुलने पर कोई बंदिश भी नहीं थी।
आज सुमि के विदा लेने से पहले निखिल कहीं पर नहीं था….था तो सिर्फ़ आत्मीय….उसकी स्मृतियाँ….उसकी बातें। आज भी वो बाँहें फैलाए सुमि को उसकी दर्द-पीड़ाओं को अपनी अंक में समा लेने के लिए आतुर था।
इस वक़्त सुमि को कोई भी दर्द महसूस नहीं हो रहा था। सुमि के अंदर-बाहर सब बहुत शांत था। धीरे-धीरे सुमि की आत्मा ने देह को छोड़ा और अपने निर्जीव पड़ी देह को निहारा। अपूर्व शांति थी सुमि के चेहरे पर। आज सुमि के शरीर से जुड़ा नाम भी खामोश हो गया था। जिसने बगैर किसी चाहना व अपेक्षा के पूरी ज़िंदगी निकाल दी थी।
सुमि की भावनाओं और चाहतों से बेखबर निखिल पहले भी सोए रहे और आज भी निश्चिंत सोए हुए थे। अपने सभी बच्चों पर एक नज़र डालकर अब वो लौटना चाहती थी। उस अनंत यात्रा पर जहां उसका आत्मीय प्रतीक्षारत था….चिरकाल से..शेष बस यही।।।

2 टिप्पणी

  1. मैडम रुला दिया मुझे तो क्या कहानी है??अद्भूत जीवन में पढ़ी सारी कहानियों में नंबर 1 कहानी बहुत खूब

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