शब्द नहीं कुछ कहने को
कुछ बुनने को, फिर भी
कुछ पढ़ लेती हूँ ,
थोड़ा कुछ जो समझ हूँ पाती
पैबंद लगाकर शब्दों के
मंथन कर कुछ लिख लेती हूँ.
(देवी नागरानी)
ऐसी ही एक शख्सियत से साहित्य के मंच पर मिलने के, बतियाने के, विचारात्मक आदान-प्रदान के कई मौके मिले, जिनसे मैं बहुत ही मुतासिर रही। वे हैं मेरे मूल शहर हैदराबाद के एक जाने माने लोकप्रिय कवि-समीक्षक और हिंदी सेवी ऋषभदेव शर्मा जी, जिनके व्यक्तित्व की उपस्थिति ज्ञान व तजुर्बे की टकसाल से सरोबार रहती है। उनसे मेरी पहली मुलाक़ात 2008 में राजस्थानी स्नातक संघ, आबिड्स, हैदराबाद में अहिल्या मिश्र जी के कार्यक्रम में हुई। वहीं उनके हाथों मेरे पहले ग़ज़ल संग्रह ‘चराग़-ए-दिल’ का लोकार्पण हुआ और बाद में उन्होंने उस पर समीक्षा भी लिखी, जो मेरे लिए एक साहित्य के किले में पदार्पण करने का सुखद आगाज़ ही रहा।
फिर साहित्य के मंच पर मिलना हुआ, चेतना कॉलेज, मुंबई के प्रांगण में। ताड पश्चात 2014 में कर्नाटक विश्वविद्यालय (धारवाड़), अयोध्या शोध संस्थान (अयोध्या) और साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (उल्हासनगर) के संयुक्त तत्वावधान में धारवाड में ‘समकालीन हिंदी साहित्य की चुनौतियाँ’ विषय पर संपन्न अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर। इस वैभवपूर्ण एवं विशाल समारोह की संपन्नता सदा यादों को महकाती रहती है।
(चित्र में हैं: डॉ. कविता रेगे (मुंबई), प्रो. प्रभा भट्ट- अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़, देवी नागरानी, डॉ. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद), एवं डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा)।
यू.के. के दस्तावेजी ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी का कथन है- ‘रचनात्मकता कृतित्व में ढलने के लिए लेखक को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते हैं, उन्हें कलम की नोंक से कागज़ पर उतारना ही अनुभव की अभिव्यक्ति है।’
ऐसी अनुभवयुक्त अभिव्यक्ति करने वाले डॉ.ऋषभदेव शर्मा जी को जानना, पहचानना एक अनुभूति है। ठहरे हुए व्यक्तित्व के मालिक, भाव-भाषा सधे हुए पैमाने पर व्यक्त करते हुए वे अपनी शख्सियत की पहचान दे जाते हैं। बावजूद इसके उनसे मिलने के तीन अवसर जो मुझे मिले, मैंने पाया कि वे जितने बाहर से ठहरे हुए है, भीतर उतने ही समंदर की मानिंद गहरे भी हैं। उनकी शख्सियत उनके तजुर्बों का बखूबी प्रतिनिधित्व करती है।
किताबों से वाबस्ता उनकी दिनचर्या उनके जीवन का एक विशिष्ट अंग है। शायद इसलिए कि किताबें जीवन का दर्पण हैं। जो कुछ धरा पर है, सृष्टि में है वह सभी किताबों में है। हर भाव, हर ज्ञान, कुछ दर्द, कुछ मुस्कुराहटें। मजदूरों के श्रम से लबरेज़ पसीने की खुशबू से लेकर, सुबह माँ का चक्की चलाना, चन्दन के पालने में बालक को लोरियां सुनाना व चाँद सितारों की दमकती दुनिया भी किताबों के पन्नों का हिस्सा हैं। किताबें ज्ञान, विज्ञान, मनोविज्ञान, अध्यात्म, नैतिकता, इतिहास, संस्कार- सभी को ख़ुद में समेटे रहती हैं। क्या कुछ नहीं होता है उनमें? किताबें सच्चे मित्र की तरह हमारी पथ प्रदर्शक होती हैं। ये किताबें ही हैं जो विश्व को एक सूत्र में पिरो सकती हैं। इसी सूत्र की विस्तृत रूपरेखा में ऋषभदेव शर्मा जी के साहित्य संसार के बिम्ब देखे जा सकते हैं। उनके ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न परिचायक उनके शब्द संसार के अदृश्य में दृश्य स्वरूप मिलेंगे। गद्य, पद्य, शोध क्षेत्र में वे एक अलग पहचान रखते हैं। वास्तव में अच्छी किताबें ज्ञान का भंडार होती हैं। ये जगत में ज्ञान की गंगा बहाकर अंधकार को दूर करती हैं। लोगों के ज्ञानचक्षु खोलती हैं, संस्कार देती हैं और इतिहास को भी अपने मे समेटे भविष्य की नींव रखती हैं।
उनके काव्य के स्वरूपों का सौन्दर्य भी पढ़कर समझने व अनुकरणीय करने योग्य है। उनके कथन की हक़ीक़त भाषा में, उनकी शैली में देखिये, जिसके लिए तेलुगु कवि ओब्बिन ने भाषा के सही स्वरूप को हमारे सामने परिभाषित करते हुए कहा है-‘भाषा है मिट्टी, भाषा है पानी, प्राण है भाषा।” उसी स्वर में ऋषभदेव जी किताबों को विस्तार देते हुए कैसे खुद से पन्ना दर पन्ना उनसे जुड़ते हैं।
पोथी पढ़ पढ़ पंडित मुआ-
“मैंने, किताबें पहन रखी थीं,
औरों से अलग दिखता था,
तुम खिंची चली आईं
मेरी ही तरह किताबों को ओढ़े हुए।
अक्सर हम दोनों, पास-पास रहते,
पर चुप रहते,
हमारी किताबें आपस में बातें करतीं
और हम प्रमुदित होते।”
प्रवाह कुछ इस तरह रवाँ है, जैसे शब्द और अर्थ एकाकार हो उठे हैं.
किताब सी जिंदगी
जिंदगी सी किताब…
उनके अल्फ़ाज़ सूरज की तरह रौशन होकर जिंदगी को अँधेरों से बाहर निकालने में सक्षम हैं।
मुक्तक का माधुर्य दर्शाते कुछ अंश:
गुस्सा
“पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था।
आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।
मैं जिसे गुस्सा समझ ता-ज़िंदगी डरता रहा;
डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।”
क्षणिकाओं में हैरतअंगेज़ ललकारती शब्दावली के अलग अंदाज-ए-मिसाल:
1.
“शोर है, हंगामा है;
लोग
ताबड़तोड़ पीट रहे हैं
मेजें
और सोच रहे हैं
हिंदुस्तान
बहरा है!”
2.
‘सड़कों पर
उतर आई है भीड़,
जनता
नक्कारे पीट रही है,
पूछता है कबीर-
बहरे हो गए क्या
खुदा
लोकतंत्र के!”
हिंदी ग़ज़ल में उनकी बानगी में दवा और दुआ की सीमाओं से परे की विचाराभिव्यक्ति का स्वरूप पढ़िए और परखिए उनका अंदाज़े बयाँ में :
“मैं झूठ हूँ, फरेब हूँ, पाखंड बड़ा हूँ!
लेकिन तुम्हारे सत्य के पैरों में पड़ा हूँ!!
हीरा भी नहीं हूँ खरा मोती भी नहीं हूँ;
फिर भी तुम्हारी स्वर्ण की मुंदरी में जड़ा हूँ!!”
तेवरियों में-
रोटियों व लोकतंत्र पर अनुभूति पर उपस्थित अनगिनत दिशाएँ व दशाएँ मिलती हैं, जो साहित्य की सुरंगों से होते हुए शाहीमार्ग पर आ रुकती हैं। यहाँ मैं उनके आविष्कृत इस नवीन काव्यरूप ‘तेवरी’ के बारे में उनकी टिप्पणी प्रस्तुत करती हूँ, जिससे मुतासिर होकर मैंने भी इस विधा को प्रयोग में लाया।
“तेवरी काव्यांदोलन की घोषणा 11 जनवरी 1981 को मेरठ, उत्तर प्रदेश, में कुछ मित्रों ने की थी। इसका घोषणापत्र डॉ. देवराज और ऋषभदेव शर्मा ने जारी किया था। तेवरी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विसंगतियों पर प्रहार करने वाली आक्रोशपूर्ण कविता है। यह किसी भी छंद में लिखी जा सकती है। इसकी हर दो पंक्तियाँ स्वतःपूर्ण होते हुए भी पूरी रचना में अंतःसूत्र विद्यमान रहता है। तेवरी का छंद सम-पंक्तियों में तुकांत होता है। इसे अमेरिकन कांग्रेस की लाइब्रेरी के कैटेलॉग में ‘पोएट्री ऑफ प्रोटेस्ट’ कहा गया है।”
हाँ, यही वह पुकार है, यही ललकार है, मानव के भूखे मन की चीत्कार है, जो आम आदमी की सोच में तहलका मचाने में सक्षम है। डॉ. ऋषभदेव शर्मा के इस आंदोलन में एक नहीं अनेक लेखकों के सीने में धधकती, प्रहार करती चिंगारी भड़कती रही, जिनमें मैं भी शामिल हुई। किसी भी विषय पर अपनी आक्रोश भरी मनःस्थिति को अभिव्यक्त करने का एक औज़ार सा बन गई ‘तेवरी’, जिसका अनुवाद शायद भाषा-भाव भी पूर्ण-अपूर्ण रूप से करते रहे। उनकी तेवरी की जागीर का एक हिस्सा अभिव्यक्ति के मंच पर ‘रोटी : दस तेवरियाँ’ के उन्वान के तहत आज भी अपनी पहचान के साथ स्थापित है:
“शक्ति का अवतार हैं ये रोटियाँ।
शिव स्वयं साकार हैं ये रोटियाँ।।
भूख में होता भजन, यारो! नहीं;
भक्ति का आधार हैं ये रोटियाँ।।”
सही मायनों में यह आक्रोश भरी अभिव्यक्ति हर स्थिति-मन:स्थिति की परिचायक बन गयी, जो भीतर की भड़ास को बाहर फिज़ाओं में फैलाने में कामयाब रही। इसकी परिभाषा करते हुए खुद ऋषभदेव जी ने लिखा है:
“गलियारों में सन्नाटा है, नुक्कड़-नुक्कड़ हवा सहमती;उठो, समर्पण की बेला है, समय चीख कर तुम्हें बुलाए।।
बुझे हुए चूल्हों की तुमको, फिर से आँच जगानी होगी;
‘रोटी-इष्टि’ यज्ञ में यारो, हर कुर्सी स्वाहा हो जाए।।”
2020 के आगाज़ में कोविड का आक्रमण हम अभी तक भूले नहीं हैं, उस दौर से गुज़रते हुए इस वक़्त भी समय के साथ, ज़रूरतों की माँग के लिए अपने-अपने क्षेत्र में कार्यरत हैं। अपने परिवार के लिए, इस पेट के लिए कुछ घर से काम करते हैं, कुछ तकाज़े अनुसार निश्चित स्थान पर अपनी हाज़िरी लगाने पहुँच जाते हैं। लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है अपने वक़्त को सही तरीके से पहचानकर, परख कर उसे अपनी रचनाओं में दर्ज करे। इस संकटकाल के अनेक दृश्य दिलो-दिमाग पर दिन रात हावी रहे। अनेक संवेदनात्मक रचनाएँ गध्य व पद्य के रूप में सामने आईं। संवेदना ही तो है जो अपनेआप को, अपनी सोच के तानों-बानों को शब्दों के पैरहन से सजाकर अभिव्यक्ति को कागज़ पर उतारने पर आमादा करती है, जब तक मन मंथन की छटपटाहट से मुक्ति नहीं हासिल होती। उन्हीं दिनों डॉ. ऋषभदेव जी ने जाने-माने अखबार ‘डेली हिंदी मिलाप’ में इसी विषय पर लगातार संपादकीय कॉलम में टिप्पणियाँ लिखते रहे, जो अब “कोरोना काल की डायरी” के रूप में ऑनलाइन उपलब्ध है। यह समय इतिहास के पन्नों में दर्ज़ होगा और साथ में ये रोज़मर्रा की गाथाएँ इंसान पर गुज़रे समय का दस्तावेज़ बनेंगी।
हर आदम इस संसार में गुरु भी है और शिष्य भी। कभी सीखता भी है, कभी सिखाता भी है। उसी गुरु-शिष्य-परम्परा के खूंटे से बंधे अनेक शिष्यों की तरह मैंने भी ऋषभदेव जी से बहुत कुछ सीखा है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं।
उनकी रचनात्मक सोच-शब्दों का संगम प्रायः विस्मित करता है और ऐसे में मेरी सोच भी ठिठक कर फिर-फिर पढ़ती है, यह समझने के लिए कि हम आज़ाद हैं या आज़ादी की सलाख़ों के पीछे क़ैद हैं:
“रेखाओं के चक्रव्यूह में स्वयं बिंदु ही क़ैद हो गया।
यह कैसी आज़ादी आई व्यक्ति तंत्र का दास हो गया ।।”
साहित्य के रूप में उनका अनमोल योगदान पाठकों व शोध-शागिर्दों की धरोहर है और सदा रहेगी। उनके परिचय का विस्तार फलक को छूता हुआ मालूम होता है, प्रकाशित सूची में विशेष कृतियाँ हैं- ‘तेवरी’, ‘तरकश:, ‘ताकि सनद रहे’ और ‘देहरी’ जैसे काव्यसंग्रह; ‘तेवरी चर्चा’, ‘कविता के पक्ष में’ और ‘कथाकारों की दुनिया’ जैसे आलोचनग्रंथ तथा ‘संपादकीयम्’ और ‘खींचो न कमानों को’ जैसे वैचारिक निबंध-संग्रह। इसके अतिरिक्त अनेक पुस्तकों का संपादन, पाठ्यक्रम लेखन और शोध निर्देशन। 1981 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन। यह अत्यंत मुबारक क़दम है कि शोध आलेखों की पत्रिकाएँ शोधार्थियों के लिए ऐसे लेख-आलेखों को प्रकाशित करने में पहल करती है, जिससे साहित्यकार का व्यक्तित्व व कृतित्व उभर आये और मार्गदर्शन की राहें रौशन होती रहे…