Thursday, May 21, 2026
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डॉ मुक्ति शर्मा का लेख –

कश्मीर में बहुत सी पुरानी इमारतें हैं कुछ ऐसी इमारतें हैं  जिनकी स्थिति अच्छी है और कुछ ऐसी इमारतें हैं जिनकी स्थिति गड़बड़ा गई है।
कुछ तो ऐसी है जिनकी हालत खराब है और कुछ ऐसी है कि जो जमीन में धस चुकी है। कुछ की मरम्मत हो चुकी है। कुछ इमारतें बहुत ही मजबूत है जो अब तक टिकी हुई है।
इन इमारत को देखकर अंदाजा लगाया जाता है कि कश्मीर के कारीगर कितने गुणी थे। इन इमारतों को बनाने के लिए जो भी साजो- समान की जरूरत होती है वह कश्मीर में ही मिलता है।
कश्मीर के कारीगर दूसरे मुल्कों में भी मशहूर है। इस बात को भी झूठला नहीं सकते कि इन इमारत की शोभा बढ़ाने के लिए बाहर से भी कारीगर बुलाए जाते हैं। दूसरे मुल्कों से आए कारीगरों ने भी कश्मीर के कारीगरों के हुनर को मना है।
पुराने जमाने के खंडहरो को “असारे कालिमा “कहा जाता है! इन इमारत की देखभाल के लिए राज्य सरकार ने एक सरकारी महकमा बन के रखा है जो इनका ख्याल रखता है।
यह “महकमा “कश्मीर राज्य में पाए जाने वाले बागों ओर इमारतों , खंडहरों , जियारतों की देखभाल करता है।

मार्तंड 
श्रीनगर से 40 किलोमीटर दूर अनंतनाग” इस्लामाबाद” पहलगाम जाने वाले रास्ते में एक मशहूर सूर्य मंदिर स्थापित है। जिसको कश्मीरी जुबान में “मस भवन “के नाम से जाना जाता है! सुनने में आता है कि आज से 12 सौ साल पहले कश्मीर में “ललितादित्य “हुकूमत कर रही था। उनके पिता का नाम” दुर्लभवरदना” “था !
इसी दौरान उसने यह मंदिर बनवाया।
एक बात  जिसके अनुसार “हसन शाह खुईयामी”  ने अपनी किताबों में लिखा है! यह सूर्य मंदिर मटृन में पांडव राजा रामदेवन ने बनवाया था। उसी मंदिर में ललितदत् ने नया मंदिर बनवाया।
पहाड़ के ऊपर से मटृन का पूरा नजारा देखा जाता है।  इसके 84 प्रकोष्ठ हैं। कहते हैं सूरज की पहली किरण यहीं पर पड़ती थी और लोग यहीं से समय का अंदाजा लगाते थे।
अभी के दौर में मंदिर के आसपास एक  बाग बनाया गया है बाग में रंग-बिरंगे प्रत्येक किस्म के फूल लगाए गए हैं। उन फूलों को देखकर इंसान को सुकून महसूस होता है। मंदिर की खूबसूरती देखते ही बनती है जो लाखों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
खानकाह मोहल्ला श्रीनगर
यह मशहूर” खानकाह मुहल्ला” श्रीनगर में जनकदल और फतेह कदल के दरमियान झेलम के दाई तरफ मौजूद है । इसकी बुनियाद” हजरत  अमीर कबीर हिद अली” हमदानी “रहमतुल्ला ”  के बेटे हजरत” मीर मोहम्मद हमदानी” ने की। सुल्तान सिकंदर ने 1394 में इसकी नींव रखी। 1480 में सुल्तान हसन शाह के जमाने में इसको आग लग गई। 1493 में सुल्तान मोहम्मद शाह ने इसको नए सिरे से बनवाया। 1731 में दोबारा इस खानेकाब  में आग लग गई।
खानकाह की असल इमारत चकोर शेप में है। इसकी जब नींव डाली गयी तब बड़े-बड़े देवदार लगाएंगे। इसकी लकड़ी का काम बड़े बेहतरीन हुनर कारों ने किया है।
खानकाह के आंगन में दाएं तरफ एक बड़ा प्लेटफॉर्म मौजूद है जिसमें एक अप्रैल 1931 ई डोगरा के खिलाफ बगावत की और आजादी के नारे लगाए।
खानकाह मोहल्ला में सोने की सिहाई से “औरादीफतया”  और कुराने शरीफ की आयतें लिखी गई है। आज भी खुदी हुई है। खानकाह का दरवाजा एक शानदार नमूना है। दूर-दूर से लोग इस जियारत में आते हैं। कश्मीर में बहुत सी पुरानी इमारतें हैं जो आज भी लोगों को अपनी और आकर्षित करती हैं लाखों पर्यटक यहां पर इनको देखने के लिए आते हैं।
इन इमारत की खूबसूरती देखते ही बनती है।
डॉ. मुक्ति शर्मा
डॉ. मुक्ति शर्मा
संपर्क - 9797780901
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6 टिप्पणी

  1. मुक्ति जी! आपके माध्यम से कश्मीर को काफी कुछ जान गये। वहाँ के कारीगर और उनकी कारीगरी अद्भुत और अनोखी है। लोग दिखाई देने वाले सौंदर्य पर नजर रखते हैं, उसकी प्रशंसा भी करते हैं लेकिन उस सौंदर्य का निर्माण जिन हाथों से, जिस कौशल से हुआ है उन्हें कोई नहीं पूछता! निश्चित रूप से कश्मीर भारत का स्वर्ग है! इस लेग के माध्यम से कश्मीर दर्शन के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

  2. बहुत सुंदर जानकारी देता आलेख मुक्ति जी।जो.हमारी धरती का.स्वर्ग कहा जाता था और जहां प्रकृति के.सुंदर नजारे.मनमोहक होते थे।बाद में आतंकवाद की.वजह से हमने लंबे समय तक वहां पर्यटन के.विषय में सोचा भी नहीं.लेकिन उस काश्मीर को.देखने समझने की ललक अब भी बाकी है।आपके.माध्यम से बहुत कुछ जाना,वहां की.संस्कृति, कला,कारीगरी और इमारतों के.विषय में।जानकर बहुत अच्छा लगा।सारगर्भित, सार्थक आलेख के.लिए बहुत बहुत बधाई।

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