जैसे ही दशहरा के विजय उत्सव का समापन हुआ वैसे ही अगले दिन सबेरे से सुरीलों के गाँव क्योलारी के हमारे टोला में बघेले बब्बा (श्री धनीराम पाल) के चौखाटे में दिवारी नृत्य के मौनिया जुड़ने लगे हैं। पहाड़िया मुहल्ला याने बदँउवा नाके की तरफ रहने वाले परमांई कक्का अपना ढोल लेकर आ गए और कढ़ोरे फूफा के चौंतरा पर बैठकर ढोल को सजा-सँवारने के बाद ढोल पर डींग डिगा डींग! डींग डिगा डींग!!डींग डिगा डींग!!! की तेज थापें झूम-झूम के बजा रहे हैं। राधेकिसुन पाल कान पर हाथ लगाकर अपने ही अंदाज में सुमरिनी की सुरीली टेर भरने लगे….
सदा भवानी दाहिनी..सन्मुख रहत गणेश।
तीनउ देव रक्षा करें …, ब्रह्मा विष्नु महेश।।
जैसे ही राधेकिसुन की के बोल थमे वैसे ही परमांई कक्का के ढोल ने रफ्तार पकड़ ली। अर्थात अब ढोल दुगन और तिगुन में की लयकारी में बजने लगा है-
डिगी की डिम डिम! डिगी की डिम डिम!!डिगी की डिमडिम!!!
दिवारी नृत्य के अभ्यास करने के लिए गाँवभर के दिवरैया नृतक(नचैया) लोग अपनी-अपनी रंग-बिरंगी पोषाकें पहन कर गोलाकार होते हुए नृत्य करने लगे हैं। लकड़ी के चाचर जिन्हें गाँव वाले लोग सैलें कहते हैं, उनकी जुगलबंदी होने लगी है। अनेक प्रकार की कलाबाजियाँ फिरकियाँ लगाई जा रहीं हैं। दिवारी नृत्य (बरेदी नृत्य/ चरवाहा नृत्य) के जानकार बड़े बुजुर्ग लोग नये दिवरैयाओं को मौनिया नृत्य की बारीकियाँ समझाते हुए खुद नाच कर दिखा रहे हैं….
अजीब दृश्य है… लगता है समूचा लोक नृत्य कर रहा है। लोक के साथ समूची सृष्टि नृत्यमय हो रही है। जिन्हें हम तथाकथित संभ्रांतजन हरवाहे-चरवाहे और गवाँर कहते हुए स्वयं को बड़ा धन्नासेठ समझते हैं, शायद हम यह भूल जाते हैं कि यही लोग लोकसंस्कृति के संवाहक हैं। इनके प्राणों में लोकसंस्कृति साँसें लेती है। लोक-परंपराएँ कुलाँचें भरतीं हैं। तीज-त्योहार बिलमते हैं.
यों तो मानव जन्मजात नर्तक है। उसने प्रकृति से, पंछियों से, पशुओं से, कीट-पतंगों आदि से नृत्यों की भंगिमाएँ ग्रहण करके अपने मन के भीतर नृत्य को आत्मसात् कर लिया है।
आज से चार दशक पहले के जमाने में मौनिया नृत्य बहुत उम्दा तरीकों से होता था। अपने बचपने में मैंने भी सलूका पहनकर, पाँवों में उल्टे-सीधे जंगा (घुँघरू) बाँधकर दिवारी नृत्य करने की कोशिशें की हैं, गुलाँटें लगाईं हैं, चौबोला गाये हैं, ढोल बजाए हैं। उस समय के लड़कों में रामकिशोर पाल, धर्मवीर पाल, मूलचन्द, मुन्नीलाल, गौरीशंकर आदि दिवारी नृतकों की विस्मयकारी अदाकारियाँ देखीं हैं। दिवारी नृत्य आज भी मेरी यादों में डिगी की डिम डिम करता नाचता रहता है। इसके साथ ही धनीराम कुशवाहा के ढोल के बोल भी जमकर कानों में गूँजते रहते हैं…
उस ज़माने में इन विषयों पर तब न कोई किताबें थीं और न पढ़ने का शऊर ही था, न गूगल बाबा की सनसनीखेज़ खबरें। उस दौरान जो कुछ था, सब कुछ असली ही था। लोगबाग अपने अनुभवों के आधार पर ही कलाओं को नयी-नयी रंगत देते रहते थे। नये-पुराने लोग एक साथ इकट्ठे होकर अपने तीज-त्योहारों को मानते और मनवाते थे। गाते और गबवाते थे। नाचते और नचाते थे। अपनेपन का वह सहज दौर अब मर चुका है। यांत्रिक हो रहे आदमी को अब लोक कलाओं के लिए फ़ुर्सत ही कहाँ ? अब तो बनावटी नकल का जमाना है जहाँ सिर्फ़ अपनी-अपनी ढफली है, अपने-अपने राग हैं। किसीकी क्या मजाल इन सब बुसरे-बेताले,भौंड़े प्रदर्शनों पर अँगुली उठाए। सयाने लोगों से मुँह लग सके। मगर कलाएँ तो असली हैं। उन्हीं असली कलाओं व कलाकारों की संगत से कुछ सीखने की कोशिश में लगा रहता हूँ…
हमारे पोथी वाले विद्वानों ने बताया है कि मौनिया नृत्य बुंदेलखण्ड में अहीर जाति द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से यह नृत्य ‘दीपावली’ के दूसरे दिन किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष अपनी पारंपरिक लिबास पहनकर मोर के पंखों को लेकर एक घेरा बनाकर करते हैं। दिवारी नृत्य को लेकर अनेक जनश्रुतियों के साथ ही पौराणिक संदर्भ भी जुड़े हैं। एक संदर्भ के अनुसार, द्वापरयुग में के जब श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे, तब उनकी गायें वन में कहीं खो गयीं। अपनी गायों के वियोग में भगवान श्रीकृष्ण दु:खी होकर मौन हो गए। जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर लाये, तब कहीं जाकर श्रीकृष्ण ने अपना मौन तोड़ा। तभी से परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण के भक्त गाँव-गाँव मौन व्रत रख कर दीपावली के एक दिन बाद ‘मौन परमा’ के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गाँवों की परिक्रमा लगाते हैं और मंदिर- मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करते हैं। दीपावली पूजन के बाद मध्य रात्रि में मोनिया-व्रत शुरू हो जाता है। गाँव के अहीर / गड़रिया और पशु पालक समाज के लोग तालाब, नदी, कुआँ आदि में स्नान करके अनुष्ठानपूर्वक मौन व्रत धारण करते हैं। इसी कारण इन्हें ‘मोनिया’ भी कहा जाता है। द्वापर युग से यह परम्परा चली आ रही है, इसमें विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौन रहने का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। इस दौरान सात्विकताओं से भरा जीवनयापन करना होता है। तेरहवें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर यमुना नदी के तट पर पूजन कर व्रत तोड़ना पड़ता है। लोक-परम्परा के अनुसार पूजन करके पूरे नगर में ढोल, नगड़िया की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए हुए अपने गंतव्य को आगे बढ़ते हैं। मोनिया कोंड़ियों से गुथे लाल-पीले रंग के जांघिये और लाल-पीले रंग की कुर्ती या सलूका और बनियान पहनते हैं; जिस पर कौड़ियों से सजी झूमर लगी होती है। पाँव में भी घुंघरू, हाथों में मोर पंख तथा चाचर, लाठी / डंडा आदि साथ लेकर चलते हैं। दिवारी नृत्य मूलतः चरवाहा संस्कृति का लोकनृत्य है।
आधुनिक युग में दिवारी नृत्य की यह लोक परम्परा धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। गाँव ही गाँव में सिमट रहे हैं। गो पालन घटता जा रहा है, गौचर भूमि समाप्त हो गयी है। जंगल भी अब बचे नहीं हैं। ऐसे में चरवाहे भी सीमित होते जा रहे हें। जिसका परिणाम है कि अब पहले की तरह मौनियाओं के नृतक दल नहीं दिखते हैं। हालांकि कुछ लोग इस लोक नृत्य को जीवित बनाए रखने के प्रयास भी कर रहे हैं।
सच कहूँ,तो हमारे यहाँ ऋतु-पर्व जीवन की व्यापकता निर्मित करने के उद्देश्य से संचित हैं। इन्हीं ऋतु-पर्वों के माध्यम से मनुष्य की संवेदनाओं को व्यापकता मिलती है, उसका सौंदर्यबोध परिष्कृत होता है और नैतिक वृत्ति पवित्र होती है। प्रकारांतर से ऋतु पर्व सांस्कृतिक चेतना को अनुप्राणित–विकसित और परिमार्जित करने का सर्वोत्तम माध्यम है। भारतीय संस्कृति के मूल में यहाँ के लोक पर्वों-लोकोत्सवों की एक विराट परंपरा समाहित है। संस्कृति को जानने के लिए मनुष्य ने चिरकाल से प्रकृति से अपने संबंध स्थापित किए हैं। क्योंकि प्रकृति अंतश्चेतना की अनुभूति होती है। जिससे आत्मा में आनंद और तन्मयता उत्पन्न होती है।
आज हम एक रुग्ण और खंडित समाज में जी रहे। ऐसे नाज़ुक समय में संस्कृति संरक्षण के सघन प्रयास न हुए तो देश की आत्मा नहीं बचने वाली। आधुनिक बाजारीकरण ने हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनी चपेट में ले लिया है। बचाव का रास्ता अपनी लोक-संस्कृति के संरक्षण में ही है। दिवारी और मौनिया नृत्य के बहाने हमें समूचे लोकोत्सवों पर गहराए संकट के बादलों को गरजने और बरसने से हरहाल में रोकना ही होगा…।
डॉ रामशंकर भारती
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डॉ० रामशंकर भारती साहित्य और संस्कृति के विशिष्ट अध्येता के रूप में विश्रुत हैं। डॉ० भारती को लोकसंस्कृति, आलोचना एवं ललित लेखन के क्षेत्र में विशिष्टता प्राप्त है। आपने हिन्दी की विविध विधाओं में मौलिक लेखन किया है।
संप्रति, ‘बुंदेलखंड सांस्कृतिक एकेडमी’ के निदेशक के रूप में आप निरंतर सर्जनात्मक कार्य कर रहे हैं।
संपर्क– सुरीलों का गाँव क्योलारी (कैलाशनगर) जनपद – जालौन-285123 (उत्तर प्रदेश)
पुरवाई पत्रिका के इस अंक में साहित्य और संस्कृति के विशिष्ट अध्येता डॉ रामशंकर भारती का लेख ‘लोकपर्व स्मरण ‘ पढ़ा। यह लोकपर्व बुंदेलखंड में दीपावली के एक दिन बाद मनाने का रिवाज है। इस दिन युवा लोकनृत्य दिवाली को भावपूर्ण ढंग से नृत्य करते हैं, उसी के साथ तरह-तरह की कलाओं का भी प्रदर्शन करते हैं। इसमें संगीत के साथ विशेष वाद्ययंत्र इस खेल में चटक रंग भर देते हैं।
यद्यपि यह लोकपर्व क्षेत्रविशेष का है ।इसके बावजूद इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है तो मैं
इसे संपादक जी की विराट सोच कहूंगा। उन्हें ग्रामीण अंचल की छोटी से छोटी गतिविधियों पर उनकी नजर है।
मैं इस लोकनृत्य से बचपन से जुड़ा रहा हूं। बहुत वर्षों तक मैंने इसमें पार्टीसिपेट किया है। इसलिए मुझे इस नृत्य की हर भाव-भंगिमा की जानकारी है। ऐसे मौकों पर मेरा उत्साह देखते बनता है। इस लेख की विशेषता यह है कि इसको पढ़कर नृत्य करता हुआ कलाकार आपकी आंखों के सामने नाचता दिखाई देगा। लेखक के साथ पत्रिका की पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई
लोक संगीत और लोक नृत्य हमारी संस्कृति के पहरुओं की तरह हैं।लोक संस्कृति के रक्षक हैं। हालांकि इस स्मरण में जिसकी बात की गई है उससे हम अनभिज्ञ हैं,हम नहीं जानते हैं लेकिन हर क्षेत्र की बुनियादी जड़ ये ही हैं और वास्तविक सुख व आनंद लोक संस्कृति में ही समाहित है। आंतरिक सुख महसूस होता है बिल्कुल निश्छल आनंद की अनुभूति होती है। हमने राजस्थान, उड़ीसा के अतिरिक्त कभी-कभी स्कूलों में देखा है । जो शिक्षक क्षेत्रीय लोक नृत्य से परिचित और इसके जानकार रहते हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ में भी छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य हमने देखा है। चाहे जो हो और जहाँ का भी हो लेकिन यह लोक नृत्य और लोग संगीत आत्मिक आनंद और शांति प्रदान करते हैं। हमने पूरा पढ़ा।
लखन जी की लंबी टिप्पणी देखकर हमें लगा कि उन्होंने इस पर इतना बड़ा क्या लिखा है? इसलिए हमने वह टिप्पणी भी पढ़ी और जब पता लगा कि उन्होंने इसमें भाग लिया है तो अच्छा लगा ।उनकी खुशी हमने महसूस की। बहुत-बहुत बधाई आपको इस लेख के लिये। तेजेन्द्र जी व पुरवाई का दिली धन्यवाद बनता है इसे प्रस्तुत करने व पढ़वाने के लिये।
आदरणीय तेजेंदर शर्मा जी
संपादक पुरवाई
एवं
आदरणीया शैली जी
पुरवाई के 2 नवंबर 24 के अंक में मेरे लेख को स्थान देने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार।
पुरवाई पत्रिका के इस अंक में साहित्य और संस्कृति के विशिष्ट अध्येता डॉ रामशंकर भारती का लेख ‘लोकपर्व स्मरण ‘ पढ़ा। यह लोकपर्व बुंदेलखंड में दीपावली के एक दिन बाद मनाने का रिवाज है। इस दिन युवा लोकनृत्य दिवाली को भावपूर्ण ढंग से नृत्य करते हैं, उसी के साथ तरह-तरह की कलाओं का भी प्रदर्शन करते हैं। इसमें संगीत के साथ विशेष वाद्ययंत्र इस खेल में चटक रंग भर देते हैं।
यद्यपि यह लोकपर्व क्षेत्रविशेष का है ।इसके बावजूद इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है तो मैं
इसे संपादक जी की विराट सोच कहूंगा। उन्हें ग्रामीण अंचल की छोटी से छोटी गतिविधियों पर उनकी नजर है।
मैं इस लोकनृत्य से बचपन से जुड़ा रहा हूं। बहुत वर्षों तक मैंने इसमें पार्टीसिपेट किया है। इसलिए मुझे इस नृत्य की हर भाव-भंगिमा की जानकारी है। ऐसे मौकों पर मेरा उत्साह देखते बनता है। इस लेख की विशेषता यह है कि इसको पढ़कर नृत्य करता हुआ कलाकार आपकी आंखों के सामने नाचता दिखाई देगा। लेखक के साथ पत्रिका की पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई
लोक संगीत और लोक नृत्य हमारी संस्कृति के पहरुओं की तरह हैं।लोक संस्कृति के रक्षक हैं। हालांकि इस स्मरण में जिसकी बात की गई है उससे हम अनभिज्ञ हैं,हम नहीं जानते हैं लेकिन हर क्षेत्र की बुनियादी जड़ ये ही हैं और वास्तविक सुख व आनंद लोक संस्कृति में ही समाहित है। आंतरिक सुख महसूस होता है बिल्कुल निश्छल आनंद की अनुभूति होती है। हमने राजस्थान, उड़ीसा के अतिरिक्त कभी-कभी स्कूलों में देखा है । जो शिक्षक क्षेत्रीय लोक नृत्य से परिचित और इसके जानकार रहते हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ में भी छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य हमने देखा है। चाहे जो हो और जहाँ का भी हो लेकिन यह लोक नृत्य और लोग संगीत आत्मिक आनंद और शांति प्रदान करते हैं। हमने पूरा पढ़ा।
लखन जी की लंबी टिप्पणी देखकर हमें लगा कि उन्होंने इस पर इतना बड़ा क्या लिखा है? इसलिए हमने वह टिप्पणी भी पढ़ी और जब पता लगा कि उन्होंने इसमें भाग लिया है तो अच्छा लगा ।उनकी खुशी हमने महसूस की। बहुत-बहुत बधाई आपको इस लेख के लिये। तेजेन्द्र जी व पुरवाई का दिली धन्यवाद बनता है इसे प्रस्तुत करने व पढ़वाने के लिये।