प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर – 466001 (म.प्र.)
आईएसबीएन नंबर : 978-81-19018-75-8
मूल्य : 300 रूपए
हिंदी के सुपरिचित कथाकार और प्रसिद्ध उपन्यास “अकाल में उत्सव” और “जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था”के लेखक श्री पंकज सुबीरएक संवेदनशील लेखक होने के साथ एक संपादक भी हैं। हाल ही में इनका नया कहानी संग्रह ज़ोया देसाई कॉटेज प्रकाशित होकर आया है। पंकज जी के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है। पंकज जी की प्रमुख रचनाओं में “ये वो सहर तो नहीं”, “अकाल में उत्सव”,“जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था”, “रूदादे-सफ़र” (उपन्यास), “ईस्ट इंडिया कम्पनी”, “कसाब.गांधी एट यरवदा.इन”, “महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ”, “चौपड़े की चुड़ैलें”, “होली”, “प्रेम”, “रिश्ते”,“ज़ोया देसाई कॉटेज” (कहानी संग्रह), “अभी तुम इश्क़ में हो” (ग़ज़ल संग्रह), “बुद्धिजीवी सम्मलेन” (व्यंग्य संग्रह), यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं (यात्रा संस्मरण) “बारह चर्चित कहानियाँ”,”विमर्श दृष्टि”, “विमर्श – नक्काशीदार केबिनेट”, “विभोम – स्वर”, “शिवना साहित्यिकी” त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिकाएँ (संपादन) शामिल हैं। कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित पंकज जी की कहानियाँ प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इस कृति में जीवन के नित नवीन पक्षों को उजागर करती कहानियाँ हैं। मुझे इस संग्रह की अधिकाँश कहानियाँ सशक्त लगी।इस कहानी संग्रह ज़ोया देसाई कॉटेज में कई विषयों को समेटे हुए 11 कहानियाँ हैं।
पंकज सुबीरमें किस्सागोई की अद्भुत क्षमता है। इन कहानियों में लेखक की खास कहानी शैली और सूक्ष्म संवेदनाओं को पेश करने की उनकी अद्भुत कला परिलक्षित होती है। उनके लेखन में ऐसी बारीकी है जो किरदारों को सजीवता प्रदान करती है।“गुफ़ा के वे फलाने आदमी स्थगित”कहानी कोरोना काल पर लिखी एक यथार्थवादी, रिश्तों के बदल जाने वाली कहानी है। निजी और सामाजिक रिश्ते व्यावसायिक रिश्तों में बदल चुके है। कोरोना काल में संक्रमित होने के डर से लोग अपने परिवार के लोगों की लाशों का अंतिम संस्कार नहीं कर पाते थे। ऐसे समय में चार लोग रात दिन लाशों के अंतिम संस्कार में जुटे रहते हैं। लोग रिश्ते भूलकर आत्मकेंद्रित हो गये हैं। कहानी में कोरोनाकाल की दहशत स्पष्ट झलक रही है। इस लम्बी कहानी में कोरोना शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। यह कहानी पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर सोचने के लिए मजबूर कर देती है। यह कहानी पाठक के रोंगटे खड़े कर देती है। कोरोना काल की घटनाओं पर जितनी भी कहानियाँ लिखी गई है उनमें यह एक उत्कृष्ट कहानी है। “ढोंड़ चले जै हैं काहू के संगे”कहानी आज की परिस्थितियों को सच के साथ अभिव्यक्त करती है। यह कहानी व्यक्ति के द्वंद्व तथा आत्मसंघर्ष को सामने लाती है और साथ ही राजनैतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मुद्दों की पड़ताल करती है। सोशल मीडिया का घातक प्रभाव कहानी में परिलक्षित होता है। राकेश कुमार के आभासी मित्र राकेश कुमार के व्यक्तित्व को द्विखंडित करके उसे मनोचिकित्सक के पास पहुँचा देते हैं। सोशल मीडिया किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की मानसिक स्थिति को कहां से कहां तक पहुँचा सकती हैं, इसका विश्लेषण इस कहानी में हुआ है। “डायरी में नीलकुसुम” शुभ्रा केकिशोर अवस्था की प्रथम निश्च्छल प्रेम की स्मृतियों की दास्ताँ है जिसमें व्यक्ति की जाति और उसके रंग का कोई अर्थ नहीं होता है।कथाकार शुभ्रा के माध्यम से समाज का यथार्थ अपनी किस्सागोई से उभार देते हैं।दलित बेटा हरिया अपनी माँ सुखिया के यौन शोषण को देखकर भी चुप रहता है और वह खून के घूँट पीने को विवश है।यह एक दलित विमर्श की कहानी है।
“खजुराहो” नारी संवेदना को अत्यन्त आत्मीयता एवं कलात्मक ढंग से चित्रित करती रोचक कहानी है जो पाठकों को काफी प्रभावित करती है। कहानी का कैनवास बेहतरीन है। “खजुराहो”कहानी का विषय और वैशिष्ट्य इस कहानी को उत्कृष्ट बनाता है।कहानी का शीर्षक “खजुराहो”पूरी तरह कहानी को अपने आप में समेटे हुए है।इस कहानी में उपन्यास के तत्व मौजूद हैं। यह कहानी पंकज जी के सामर्थ्य से परिचित कराती है। कहानीकार ने इस कहानी में एक नारी की संवेदनाओं की पराकाष्ठों, स्त्री के अंदर की फैंटेसी और उसके विचलन को सहजता और साहस के साथ बखूबी चित्रित किया है। जब एक पुरुष अपनी देह की संतुष्टि के लिए अन्य स्त्री देह का उपभोग कर सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? इस वर्जित विषय पर कथाकार ने इस कहानी के पात्रों के माध्यम से एक नई बहस को जन्म दिया है। पंकज सुबीर एक प्रयोगशील कथाकार हैं। इस कहानी में एक डायरी के माध्यम से भी स्त्री अपने मन की भावनाओं, अपनी कुछ आकांक्षाओं और यौन कुंठाओं को उजागर करती है। पंकज जी का कहानी बयां करने का अंदाज बहुत अद्भुत है। “प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देखकर, भागती जाती हैं लहरें यह तमाशा देखकर, क्या अजब खेल है कि हमारे आसपास कितने ही दरिया बह रहे हैं, मगर हमसे कहा गया है कि यहीं नियम है कि तुमको बस एक ही दरिया से पानी पीना है, एक ही दरिया में बहना है। क्या सितम है कि हमारा ही दरिया सूखा पड़ा है। हमारी प्यास बढ़ती ही जा रही है।” कहानी में स्त्री की आकांक्षा बिना किसी झिझक के सहज और प्रभावी ढंग से उद्घाटित की गई है। उसका अपने पति से अतृप्ति-बोध भी सहज है। यह कहानी स्त्री-मुक्ति के तमाम आंदोलनों के बरक्स स्त्री के मूल स्वभाव को रखने का प्रयास करती है। “खजुराहो”पंकज जी की एक शानदार कहानी है। इस कहानी को हिंदी साहित्य की नामवर कहानियों के समकक्ष रखा जा सकता है।“जाल फेंक रे मछेरे” कहानी में सकीना अपने बेटे ताहिर को इंदौर में रहने वाली अमीर बाप की इकलौती बेटी सबा से शादी करने के लिए तैयार करती है। सकीना जबरदस्ती अपने बेटे ताहिर को इंदौर में सबा के घर भेजती है। ताहिर सबा के यहाँ रात में भी रुकने लगा था। ताहिर अपने पिताजी के व्यवसाय के लिए अब देवास की जगह इंदौर से ही सामान लेने लगा था। इस कारण उसके इंदौर में सबा के यहाँ बहुत चक्कर लगते थे। ताहिर की माँ सकीना अब बहुत खुश रहने लगी थी क्योंकि उसने अपने बेटे को मछेरे की तरह जाल फेंकने में निपुण कर दिया था। लेकिन सकीना अपना सिर उस समय पीटने लगती है जब उसे मालूम होता है कि उसका बेटा ताहिर सबा से नहीं उसकी अम्मी से निकाह कर रहा है।
“भाभी सोनमछरी लेने गया मछेरा खुद ही जाल में फंस गया है। ताहिर निकाह की बात कर रहा है—-पर सभा से नहीं—सभा की अम्मी से निकाह की बात कर रहा है।” “ज़ोया देसाई कॉटेज” एक विदेशी महिला जोया देसाई और राहुल की ऐतिहासिक रंगों से भीगी प्रेम कहानी है। जोया देसाई के पति के पास अपनी पत्नी के लिए समय नहीं है। जोया देसाई के पास पैसों की कोई कमी नहीं है पर उसकी भावनाओं को और उसके प्रेम को समझने वाला कोई नहीं है। जोया देसाई अपने कॉर्पोरेट व्यवसायी पति के साथ विदेश से भारत आती है। जोया देसाई के पति अपनी बिज़नेस मीटिंग्स में व्यस्त हो जाते हैं और जोया देसाई मांडवगढ़ आ जाती है। वह मांडवगढ़ में राहुल के कॉटेज में रुकती है। राहुल स्वयं जोया देसाई को अटेंड करता है और उसके साथ समयबिताता है। जोया देसाई अपने आप को रानी रूपमती और राहुल को बाज बहादुर समझती है। जोया देसाई राहुल के रूप में अपने प्रेमी को पाकर चार दिनों में ही सुखी और संतुष्ट हो जाती है। राहुल का व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा था। उसके सिर पर बहुत कर्ज हो जाता है लेकिन जोया देसाई विदेश जाने के पहले राहुल को इतना अधिक पैसा देकर जाती है कि वह अपना कर्ज चुका देता है और दूसरी तरफ वह और कॉटेज बना लेता है।
“जूली और कालू की प्रेमकथा मेंगोबर” एक मार्मिक कहानी है। यह शहर में नये आये जिला कलेक्टर की कुतिया जूली और छोटे किसान होरी के बेटे गोबर के पालतू कुत्ते कालू की प्रेम कहानी है। प्रेम में दोनों प्रेमी अपनी हैसियत भूल जाते हैं जिसका परिणाम गोबर को भुगतना पड़ता है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के समय का सामंतीय शोषण का आज रूप बदल गया। सामंतों की जगह सरकारी अफ़सरों ने ले ली है। आजकल सरकारी अफ़सरों द्वारा गरीब लोगों का जो शोषण किया जा रहा है वह हर सीमा पार कर चुका है। सामंतीय व्यवस्था में सामंतों द्वारा सिर्फ आर्थिक शोषण किया जाता था जबकि सत्ता के नशे में चूर अफ़सरों द्वारा गरीबों का हर तरह से शोषण किया जाता है। यह कथा बहुत ही मार्मिक और दिल को हिला देने वाली है। “रामसरुप अकेला नहीं जायेगा” हर क्षेत्र में मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण के कारण लोगों के बेरोजगार होने की कहानी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के आ जाने से आज से कुछ सालों बाद मनुष्य जीवन का भविष्य कैसा होगा उसकी कल्पना लेखक ने इस कहानी में की है। “उजियारी काकी हँस रही हैं” पितृसत्तात्मक समाज में महिला उत्पीड़न की कहानी है।कथाकार ने समाज में घरेलू स्त्रियों की बदहाल जिंदगी को उजियारी काकी के माध्यम से उजागर किया है। यह कहानी उजियारी काकी के जीवन की परेशानियों का जीवंत चित्रण है। यह एक उपेक्षित औरत का जीवंत चित्रण है। उजियारी काकी का चरित्र और मानसिक द्वंद्व कहानी में पूरी संवेदना और सूक्ष्मता के साथ उभर कर आया है।
“नोटा जान” कहानी की नायिका एक किन्नर है जो ब्रजेश से बिंदिया बन जाती है। बिंदिया अपना घर छोड़कर किन्नर समाज में आ जाती है। वह अपने जीवन में घर परिवार के लोगों की आर्थिक सहायता करती रही लेकिन परिवार के लोगों ने कभी भी उसे अपना नहीं माना। उनके लिए बिंदिया सिर्फ नोटा का एक बटन बन कर रह गई।कथाकार ने बिंदिया किन्नर के माध्यम से उन समस्त किन्नरों की दुखती नब्ज़ को पकड़ने की कोशिश की है जो अंतत: मर्मांतक होती है। लेखक ने एक किन्नर के जीवन की त्रासदी को बहुत ही सहजता के साथ पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। “हराम का अण्डा” कहानी में जावेद और उसकी पत्नी नूरी बच्चे की चाहत में डॉक्टर श्रेष्ठा के क्लिनिक पर अपनी मेडिकल रिपोर्ट्स लेकर जाते हैं। डॉक्टर रिपोर्ट्स देखकर कहती है कि नूरी के शरीर में अंडे नहीं बन रहे हैं इस कारण आपको बच्चा नहीं हो रहा है। यदि आपको अपना बच्चा चाहिए तो आईवीएफ तकनीक से आपको बच्चा हो सकता है। इसमें लाख सवा लाख रूपए खर्चा आएगा। तब जावेद कहता है कि पचास-साठ हजार में तो मैं दूसरा निकाह करके दूसरी बीवी ले आऊंगा।
“सवा लाख में हराम का अंडा लेने से अच्छा उसके आधे पैसे में हलाल का अंडा ही न ले आऊँ।”
कथाकार ने “स्थगित गुफ़ा के वे फलाने आदमी”, “डायरी में नीलकुसुम”, “जूली और कालू की प्रेमकथा मेंगोबर”, “उजियारी काकी हँस रही हैं”, “नोटा जान” इत्यादि कहानियों में समाज में बढ़ती संवेदनहीनता को रेखांकित किया है। “जाल फेंक रे मछेरे”, “जूली और कालू की प्रेमकथा मेंगोबर”,“हराम का अण्डा” कहानियों में व्यंग्य है। “डायरी में नीलकुसुम”, “जूली और कालू की प्रेमकथा मेंगोबर” कहानियाँ सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार और शोषण का पर्दाफ़ाश करती हैं। महिलाओं की अनछुई समस्या “खजुराहो” और “ज़ोया देसाई कॉटेज” जैसी कहानियों का मुख्य स्वर है, जिनमें महिलाओं की बेबसी, उनका अकेलापन, उनकी यौन कुंठाएँ, उनकी दैहिक संतुष्टि, उनकी भावनाएँ बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती हैं। कहानीकार ने नारी अंतर्मन को झांककर उसके अछूते रहस्यों को उद्घाटित किया है।
पंकज सुबीर की किस्सागोई लाजवाब है। पंकज सुबीर के इस कहानी संग्रह की हर कहानी अपने आप में बेजोड़ है। पंकज जी की कहानियों के विषय हमेशा गंभीर सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते हैं, जो हर वर्ग को सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं। संग्रह की सभी कहानियाँ रोचक है। इन कहानियों का दायरा विस्तृत है। जीवन के अनेक रंगों के चित्रण के साथ इन कहानियों में नई भंगिमा एवं नयी ताज़गी का समावेश दिखाई देता है। पंकज सुबीर अपने कथा साहित्य द्वारा समाज द्वारा स्थापित परम्परागत पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दरवाजों पर अपने प्रतिरोध की दस्तक देते दिखते हैं। इस कहानी संग्रह की कहानियों में कथाकार ने मनोविज्ञान, नारी की सुकोमल भावनाओं, छुआछूत, लालच, विकास, प्रेम, यौन-कुंठा, देह की संतुष्टि, धर्म, रिश्तेदारों की संवेदनहीनता, पारिवारिक रिश्तों का विद्रूप चेहरा, किन्नरों की अंधेरों से भरी दुनिया, घरेलू स्त्रियों की बदहाल जिंदगी, दलितों पर अत्याचार और शोषण इन सब आयामों को विश्लेषित किया है। पंकज सुबीर के कथा साहित्य में परिवेश अधिक सशक्तता से प्रस्तुत होता है। पंकज जी की कहानियों के स्त्री चरित्र स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। इन कहानियों में पंकज जी की प्रतिबद्धता और उनकी गहन सूझबूझ का भी परिचय मिलता है। लेखक इन कहानियों में स्मृति के पन्नों में पहुँचकर वहाँ के दृश्य साकार कर देते हैं। ये कहानियाँ मानवीय संवेदना और जीवन संघर्ष के चित्र उकेरती हैं। पंकज सुबीर के कथा साहित्य में सामाजिक सरोकारों के साथ मार्मिकता प्रभावी रूप से अभिव्यक्त हुई है। इन 11 कहानियों से गुजरकर पाठक को एक अलग ही अनुभव होता है। कहानी के शीर्षक पाठक के मन में कुतूहल जगाते हैं। इससंग्रहकीहरकहानीअपनेअनूठेपनसेपाठककेमनकोछूलेतीहै।
संवेदनशील व उम्दा कथाकार श्री पंकज सुबीर का कथा साहित्य आम व्यक्ति के दुःख दर्द को अभिव्यक्त करता है। लेखक द्वारा समाज के विविध पक्षों को लेकर चिंताएं व्यक्त की गई है। कथाकार अपने उपन्यासों और कहानियों में इंसानियत को बचा लेते है।पंकज सुबीर हिंदी साहित्य के ऐसे कथा-शिल्पी हैं जिन्होंने अपने कथा साहित्य में सामाजिक यथार्थ के कई पहलुओं को उजागर किया हैं।पंकज सुबीर की कहानियों को समझने के लिए मनोविज्ञान के साथ मानव स्वभाव के सृजनात्मक पक्ष की समझ होना भी जरुरी है। इनका कथा साहित्य देश के विविध परिदृश्य, दुनिया और समाज को समझने की अंतर्दृष्टि देता है।पठनीयता से भरपूर इन कहानियों का अंत पाठक को चकित करता है। पंकज जी की कहानियाँ समाज के विविध रूपों के स्याह-सफ़ेद सभी रंगों को बेबाकी से उघाड़कर सामने लाती हैं। पंकज सुबीर की कहानियाँ हिन्दी कथा साहित्य के भविष्य को आश्वस्त करती है।
सुबीर जी के कहानी संग्रह ‘देसाई कॉटेज’ पर दीपक गिरकर जी की समीक्षा पढ़ी। अच्छी समीक्षा है, वैसे भी पंकज सुबीर एक स्थापित रचनाकार हैं। सधी हुई कलम है उनकी। उनका अनुभव उनकी रचनाओं में नजर आता है। दीपक जी को बधाई
सुबीर जी के कहानी संग्रह ‘देसाई कॉटेज’ पर दीपक गिरकर जी की समीक्षा पढ़ी। अच्छी समीक्षा है, वैसे भी पंकज सुबीर एक स्थापित रचनाकार हैं। सधी हुई कलम है उनकी। उनका अनुभव उनकी रचनाओं में नजर आता है। दीपक जी को बधाई