Sunday, October 18, 2026
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चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा?

चार लोगों की चिंता इस दुनियादारी में सभी को रहती है। एक-दूसरे को बस यही नसीहत दी जाती है—“देखो, ऐसा मत करना। चार लोग क्या कहेंगे? चार लोग देख लेंगे तो… अरे, चार लोगों का तो खयाल करो!” लेकिन मैं क्या करूँ मित्र, मेरी दुनियादारी तो अब सोशल मीडिया है। यहाँ मामला उलटा है। यहाँ मैं उन चार लोगों से डरता नहीं, उनका इंतजार करता हूँ। मेरी दुनिया में वे चार लोग लगभग देवतास्वरूप हैं। हसरत भरी निगाह से देखता रहता हूँ—बस चार लोग मेरी पोस्ट पर आ जाएँ, कुछ कह जाएँ, और कुछ नहीं तो कम से कम लाइक ही दबा जाएँ। वरना पोस्ट की आत्मा अधर में लटकी रहती है, मित्र।

पोस्ट डालते ही मेरे मन की स्थिति किसी मछुआरे जैसी हो जाती है। काँटा पानी में फेंका और आँखें लहरों पर टिकीं कि कब कोई कमेंट रूपी मछली फँसे। मोबाइल स्क्रीन वही तालाब है, जिसमें हर कुछ सेकंड में झाँकता हूँ—“कुछ हलचल हुई क्या?”

क्या करूँ, सोशल मीडिया ने इंसान को लेखक से ज्यादा लेखा-जोखा रखने वाला बना दिया है। दिनभर की पूरी बैलेंस शीट सामने रहती है। पोस्ट की इकोनॉमी समझाई जाती है—सोशल मीडिया पर बढ़त, जीडीपी के आँकड़े, सोशल स्टेटस, अर्निंग, प्रॉफिट और लॉस। कितने लोगों ने देखा, कितनों ने अनदेखा किया, किसने दिल दिया, किसने अंगूठा दिखाया। यहाँ मेरी भावनाओं से ज्यादा आँकड़ों का बोलबाला है जी। मेरी पोस्ट की “रीच” अब मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा की नई मुद्रा बन चुकी है।

मैं इस मामले में सोशल मीडिया के ज्ञानीजनों से सलाह भी लेता रहता हूँ। वे आश्वस्त करते हैं—“थोड़ा और एक्टिव रहिए।” “दूसरों को लाइक कीजिए, तभी आपकी पोस्ट चलेगी।” “थोड़ा प्रमोशन करिए, कुछ खर्च करिए, ये निवेश है!” ऐसा लगता है मानो पोस्ट नहीं, कोई स्टार्टअप लॉन्च कर दिया हो, जिसे फंडिंग चाहिए।

लेकिन सच्चाई यह है कि हम जैसे लोग पोस्ट डालकर “नेकी कर दरिया में डाल” वाले संत नहीं बन पाते। हम तो दरिया में डाली नेकी के पीछे-पीछे तैरते रहते हैं, यह देखने कि कहीं वह बहकर लाइक के किनारे लगी या नहीं। दस मिनट तक कोई प्रतिक्रिया न आए तो मन में आत्मचिंतन की आँधी चल पड़ती है—“शायद लिखना ठीक नहीं था…” “लोगों को समझ नहीं आया…” और जब आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो दोष एल्गोरिदम महाराज के सिर पर न डालें तो कहाँ डालें—“उन्होंने ही पहुँच घटा दी होगी!”

फिर भी उम्मीद का दीपक टिमटिमाता रहता है—कम से कम चार लाइक तो आ ही जाएँ। क्योंकि यही चार लोग अब डिजिटल मोक्ष के द्वारपाल बन चुके हैं। चार लाइक मिल जाएँ तो लगता है पोस्ट ने गंगास्नान कर लिया। क्या करें, सोशल मीडिया का खेल ही कुछ ऐसा है। यहाँ “तुम मेरे यहाँ, मैं तुम्हारे यहाँ” का सिद्धांत चलता है—गिव एंड टेक का मामला। हाँ, चार लाइक, क्योंकि चार लोगों के बिना यह दुनिया अधूरी लगती है। बस चार लोग मिल जाएँ तो मेरी पोस्ट गंगा नहा जाए।

फिर नेटवर्क मार्केटिंग वाले का वह प्रेरक वाक्य याद आता है—“अरे, मुर्दा आदमी भी चार लोग कंधा देने के लिए जुटा लेता है, तुम तो अभी जिंदा हो!”

मैं सबसे ज्यादा दुखी व्हाट्सऐप समूहों से हूँ। जिस दिन अपनी पोस्ट डालूँ, उसी दिन सन्नाटा छा जाता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने समूह पर ग्रहण लगा दिया हो। मन में तुरंत संशय उठता है—“कहीं मेरी पोस्ट ही पनौती तो नहीं?” “हटा दूँ क्या? लेकिन एडमिन क्या सोचेंगे?”

फिर खुद पर भी शक होने लगता है—अगर मैं दूसरों की पोस्ट पर प्रतिक्रिया दूँगा तो लोग समझेंगे कि मैं अपनी पोस्ट का ट्रैफिक बढ़ा रहा हूँ। कहीं मेरी हर लाइक को मार्केटिंग की साजिश न समझ लिया जाए!

हालाँकि भीतर का इंसान अभी पूरी तरह मरा नहीं है। वह जानता है कि प्रतिक्रिया देना सिर्फ दिखावा नहीं, संवाद भी है। लाइक और कमेंट से शब्दों को साँस मिलती है और समूह में जीवंतता बनी रहती है। लेकिन यह भावना भी अब “डिस्क्लेमर” बनकर रह गई है, मानो पहले ही सफाई देनी पड़ रही हो।

अब पोस्ट डाल दी है। मोबाइल सामने है, दिल धड़क रहा है। देखते हैं, आज कितने “चार लोग” कृपादृष्टि डालते हैं। अल्लाह के नाम पर एक लाइक दे दो… बदले में तुम्हें हजार मिलें, ऐसी दुआ है मेरी।

  • डॉ. मुकेश ‘असीमित’

पता: डॉ. मुकेश गर्ग, गर्ग हॉस्पिटल, स्टेशन रोड, गंगापुर सिटी, राजस्थान – 322201
पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ, लेखन विधाएँ: हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि
नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक,  व्यंग्य संकलन गिरने में क्या हर्ज, Roses and Thorns , अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र, काव्य संकलन समय के साए  एवं अन्य कृतियाँ प्रकाशित। विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कारों से सम्मानित।
मेल [email protected]

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