Thursday, June 11, 2026
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कुबेर कुमावत का लेख – राज ठाकरे का हिंदी विरोध और हिंदी के अपने अंतर्विरोध

पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में और विशेषकर मुंबई में हिंदी भाषा विरोध को लेकर माहौल काफी गरम और संवेदनशील बना हुआ है। कुछ दिनों पूर्व राज्य की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे इस राजनीतिक दल के मुखिया अर्थात सर्वेसर्वा माननीय राज ठाकरे साहब ने हिंदी भाषा का राज्य के प्राथमिक कक्षाओं में अध्यापन का तीव्रतम विरोध करते हुए कई तरह की विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ की।अपनी तथा अपनी पार्टी की मराठी भाषाविषयक नीति एवं भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि हिंदी क्यों जरूरी नहीं है। यद्यपि उनकी पार्टी और उनके बड़े भाई उद्धव बालासाहब ठाकरे की पार्टी शिवसेना उ.बा.ठा.के अतिरिक्त  किसी भी राजनीतिक दल या संगठन ने हिंदी का अभी तक इतनी तीव्रता एवं आक्रमकता से विरोध नहीं किया है। हिंदी भाषा का विरोध करते हुए अपने टीवी पर जारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक स्थान पर राज ठाकरे ने कहा कि हम हिंदू हैं,हिंदी नहीं हैं और दूसरे स्थान पर कहा कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। राज ठाकरे की यह दोनों बातें काफी गंभीर किस्म की है।उनकी यह बातें हिंदी भाषा राष्ट्रीय अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खडा करती हैI देखिए,भारत देश एक बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश है और यह जरूरी भी नहीं है कि जो हिंदू है वह हिंदी भाषी भी हो। हम हिंदी नहीं है इससे राज ठाकरे का आशय यह है कि हम हिंदी भाषी नहीं है। इस देश का हिंदू ही नहीं, मुस्लिम या अन्य अन्य धर्मीय व्यक्ति भी मराठी,तेलगु, गुजराती,पंजाबी,कन्नड़ भाषी हो सकता है। वस्तुतः हिंदी भाषा का किसी धर्म से संबंध नहीं है।
                                    जहाँ तक राज ठाकरे साहब के इस हिंदी विरोध का प्रश्न है तो यह मामला मुंबई के वर्तमान आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए अधिक गरमाया है।पता नहीं केंद्र की सरकार महाराष्ट्र में यह क्यों करना चाह रही हैं जबकि गुजरात में उनके राज्य बोर्ड की स्कूलों में हिंदी की ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं हैIक्या यह मुम्बई को महाराष्ट्र से अलग करने का कोई षडयंत्र है? दूसरी ओर मेरा एक निजी निरीक्षण यह है कि मैंने स्वयं राज ठाकरे को अच्छी हिंदी बोलते हुए टीवी चैनलों पर देखा है। अब जब उनका कहना है कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है तो फिर इतनी अच्छी हिंदी उन्होंने कहाँ से, कैसे और क्यों सीखी? यह प्रश्न उपस्थित होता है।माननीय राज जी, आपको हिंदी बोलते हुए आना ही हिंदी के राष्ट्रभाषा होने का सबसे बड़ा संकेत और प्रमाण है। इस देश में बिना हिंदी भाषा की पढ़ाई किए भी बहुसंख्या में लोग हिंदी बोलते हुए देखे जा सकते हैं।देखिए हिंदी भाषा भारत के कुछ उत्तरी राज्यों की अपनी मातृभाषा एवं राजकीय भाषा है और इस भाषा को पढ़ने का कोई औचित्य या लाभ महाराष्ट्र को नहीं है या होगा ऐसा राज ठाकरे का कथन वाकई में चिंतनीय है। यह तो राज्य के लोग ही तय करेंगे कि उन्हें हिंदी पढ़ने का अबतक क्या फायदा हुआ है ।हुआ भी है या नहीं? होगा भी या नहींI देखिए लोगों को अपने राज्य के बाहर यानी दूसरे राज्यों में शिक्षा,व्यापार,अर्थाजन, तीर्थयात्रा या अन्य कई कारणों से से आना-जाना होता है। ऐसी स्थिति में फाटक से उस राज्य की भाषा सिखाना संभव नहीं हैI लोगों की इस अंतरप्रांतीय आवाजाही से ही संपर्क बढ़ते हैं और दो भिन्न भाषा-भाषाओं के बीच भी मधुर संबंध स्थापित होते हैं।उन्होंने यह भी शंका उपस्थित की कि इस तरह हिंदी यदि महाराष्ट्र में सख्ती से पढ़ाई जाती है तो इससे मराठी बालकों की मानसिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। यद्यपि पांचवीं कक्षा से जो हिंदी ऐच्छिक भाषा के रूप में पढ़ाई जा रही है इसे उनका कोई विरोध नहीं है। हिंदी सख्ती से यदि पढ़ाई जाती है तो इससे मराठी माणूस को नुकसान होगा और फिर भी यदि वर्तमान सरकार हमारी बात नहीं समझती है तो हम अपनी भाषा में इस सरकार को समझाएंगे और हम उसका अपनी पूर्ण शक्ति से विरोध करेंगे।अब तो तमिलनाडु राज्य की सरकार ने भी भी राज ठाकरे की हिंदी भाषा विषयक नीति का समर्थन किया है जब कि न उन्हें मराठी भाषा आती है और न इन्हें तमिलIइस तरह इनके हिंदी भाषा विरोध में काफी अंतर्विरोध मिलते हैंI 
                                 विदित हो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत देश के सभी राज्यों में प्राथमिक कक्षाओं में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को या अन्य किसी भारतीय भाषा को पढ़ाएं जाने का प्रावधान किया है। इसके अनुसार महाराष्ट्र के राज्य शिक्षा बोर्ड ने पहली से चौथी कक्षा तक मराठी और अंग्रेजी के बाद तीसरी भाषा के रूप में हिंदी भाषा के अध्यापन को लेकर एक गवर्नमेंट रेजोल्यूशन जारी किया। इसके जारी होते ही केवल राज ठाकरे और उनके पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा इस रेजोल्यूशन का सर्वप्रथम तीव्रता से विरोध हुआ। मराठी के कई साहित्यकारों ने भी हिंदी विरोध का समर्थन किया।परंतु हिंदी भाषा का अध्ययन यदि मराठी बालक करते हैं तो इसे करने से उनका क्या नुकसान होगा इसपर वें कोई प्रकाश नहीं डाल रहे हैं। यदि मेरा अनुभव कहूँ तो हिंदी पढ़कर आजतक मेरा कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। यद्यपि मेरे समय में भी हिंदी प्राथमिक कक्षा से नहीं पढ़ाई जाती थी। हिंदी भाषा से मेरा संपर्क हाइस्कूल से ही हुआ। महाराष्ट्र राज्य बोर्ड की प्राथमिक कक्षाओं में मराठी पहली भाषा के रूप में अनिवार्य की गई है। दूसरे स्थान पर अंग्रेजी है और वह भी अनिवार्य है और अब तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को लेकर सरकारी निर्णय जो जारी हुआ वह बड़े विवाद का कारण बन गया है। प्रश्न यह उपस्थित होता है कि भारत के किसी भी राज्य की प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा में अध्ययन-अध्यापन को लेकर नीति तो स्पष्ट है।दूसरी भाषा के रूप में अंतरराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी के अध्यापन को भी महत्व दिया गया है पर तीसरी भाषा के रूप में हिंदी भाषा के अध्यापन को लेकर नीति स्पष्ट और एकसमान नहीं है। हिंदी पढ़ाने को लेकर जो आपत्ति दर्ज की जा रही है उसके वास्तविक कारण राजकीय है। भारत के संविधान द्वारा देश की विभिन्न राज्यों की मातृभाषाओं को उनका यथोचित सम्मानजनक स्थान उस राज्य में दिया गया है पर एक राष्ट्रीय संपर्क की भाषा के रूप में हिंदी अभी तक हिंदीतर भाषी राज्यों में क्यों अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पायी हैं यह निश्चित ही चिंता और चर्चा का विषय है। यद्यपि हिंदी भाषा के विरोध का कोई व्यवस्थित तर्क या औचित्यपूर्ण कारण देने में हिंदी के विरोधक सफल सिद्ध नहीं हुए हैं। क्या ये लोग नहीं जानते कि हिंदी इस देश की सबसे बड़ी और परस्पर संपर्क की भाषा है और देश की अधिकांश जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। भले ही आप उसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार न करें। क्या यह लोग नहीं जानते कि हिंदी ही इस देश की एकमात्र ऐसी भाषा है जो दो भिन्न भाषा-भाषी प्रांतों के लोगों को परस्पर जोड़ने यानी उनमें संपर्क के काम में आती हैं और इस मामले में देश के पास हिंदी के अलावा और कोई  दूसरा बेहतर विकल्प नहीं है। राष्ट्रीय भाषा को सीखने से यानी उस भाषा में बोलने,लिखने से आप राष्ट्रीय स्तर पर अनेक क्षेत्रों में देश का नेतृत्व करने में सक्षम होंगे यह इन्हें क्यों समझ में नहीं आता? चलिए कि आपने हिंदी नहीं सीखी तब आप केवल मराठी भाषा में बोलने,लिखने की अपनी सीमित क्षमता के बल पर कौनसी बड़ी उपलब्धि को हासिल कर सकते हैं? कुछ भी नहीं। जिस मराठी भाषा के प्रति आपको अत्यधिक प्रेम उमड़कर आ रहा उस मराठी भाषा माध्यमों की स्कूलें तो दिन-प्रतिदिन बंद होती जा रही हैं। इसके लिए आप क्या कर रहे हैं? मराठी माध्यमों की स्कूलों के भविष्य और विकास को लेकर आप राज्य और केंद्र सरकार पर कुछ करने के लिए दबाव क्यों नहीं डालते? वहां क्यों आप असमर्थ और निष्क्रिय हो जाते हैं? मराठी भाषा में आधुनिक और गरिमामय शिक्षण दिया और लिया जा सकता है इस विषय में क्यों आप शंकित है? इस देश में हिंदी ही नहीं तो सभी प्रांतीय भाषाओं की स्थिति अत्यधिक खराब और चिंताजनक है और उससे भी चिंताजनक स्थिति देश की राष्ट्रलिपि देवनागरी और अन्य देसी लिपियों की है। हमारे अधिकांश बालक देवनागरी लिपि में पढ़ना-लिखना भूल चुके हैं। इस बारे में क्यों आप कोई विशेष बड़ा लिपि के प्रति जागृति का आंदोलन नहीं चला सकते? यह देश आपका हजारों सालों तक उपकृत रहेगा।
                                      राज ठाकरे द्वारा हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में अस्वीकार करना चिंताजनक तो है ही, खेदजनक भी है।इस तरह उनका उत्तर भारतीयों के प्रति जो सुप्त यानी छुपा हुआ द्वेष है वह जाहिर होता दिखाई देता है और इसके अपने कारण हैं।उन्हें केवल मुंबई और महाराष्ट्र की चिंता है पर देश की चिंता नहीं है। मेरे अनेक उत्तर भारतीय मित्र अच्छी मराठी बोल लेते हैं और समझ तो आसानी से लेते हैं। हिंदी उनकी मातृभाषा होते हुए भी उन्होंने मराठी सीख ली और इस राज्य के मराठी भाषी समुदाय में घुलमिल गए। मध्यप्रदेश,हरियाणा,गुजरात में स्थाई रूप से रहनेवाले भी बहुत से मराठी भाषी परिवार अच्छी तरह से हिंदी,पंजाबी,गुजराती बोल और समझ लेते हैं। लेकिन जो लोग अस्थाई रूप से रह रहे हैं उन्हें आप अपनी भाषा सीखने के लिए कैसे जबरदस्ती कर सकते हैं? हिंदी भाषा अंतरप्रांतीय या अंतरराज्यीय संपर्क की भाषा है और इस तरह हिंदी में बोलचाल या कार्यसाधक ज्ञान की क्षमता भारतीय बालकों में उत्पन्न हो यही इस राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य हो सकता है। इसका उद्देश्य प्रांतीय भाषाओं को नष्ट करना नहीं है और न ही हिंदी भाषा का प्रांतीय भाषाओं पर वर्चस्व स्थापित करना है। पर मुंबई की स्थिति अलग है। जिस तरह पिछले कई सालों में मुंबई में हिंदी भाषी लोगों की संख्या बढ़ी है और उनके द्वारा मराठी माणुस को राजनीतिक चुनौती पेश की जा रही है वहीं असल में हिंदी विरोध का कारण है।
                                       हिंदी ही नहीं देश की सभी भाषाओं को लेकर स्थिति बड़ी गंभीर है। हर गली-मोहल्लों में अंग्रेजी माध्यमों की स्कूलें खुली हुई है। वहां बालकों और अभिभावकों से अंग्रेजी में वार्तालाप को लेकर सख्ती की जाती है। हिंदी भाषी प्रांतों में भी यही स्थिति है।मातृभाषा में बोलना हीनता का सूचक माना जाता है। क्या मातृभाषाओं की यह त्रासद स्थिति या अपमान इन राजनेताओं को दिखाई नहीं देता? जिन अंग्रेजों ने हम पर बलपूर्वक राज्य किया और हमारा शोषण किया उन अंग्रेजों की भाषा सीखने में हमें गौरव की अनुभूति कैसे होती है? और जिस भाषा के बल पर हमने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की वह हमें नहीं सीखनी? कितना दुखद एवं संतापजनक है यह सब? क्या हमें राष्ट्रीय चेतना या गौरव का भाव शेष नहीं रहा है? क्या हमारे वर्तमान राजनेता नहीं जानते कि हिंदी भाषा स्वतंत्रता आंदोलन की उपज है। भारत के माथे की बिंदी जिसे कहा जाता है उसे आप राष्ट्रभाषा नहीं मानते? जिस हिंदी भाषा की लिपि हमारी प्राचीन देवनागरी लिपि है उसे आप राष्ट्रभाषा नहीं मानते? फिर तो आप राष्ट्र को भी नहीं मानते होंगे? विभिन्न प्रांतों,विभिन्न भाषाओं और विभिन्न तरह के टुकड़ों में राजा-महाराजाओं, सामंतों,बादशाहों के अधीन भीषण गुलामी और शोषण का शिकार रही असहाय भारतीय जनता को एक राष्ट्र और एक संविधान के द्वारा एकजुट करने में लाखों-करोड़ों बलिदान देने पड़े हैं। क्या वर्तमान राजनेता यह रक्तरंजित स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भूल चुके हैं? विरोध तो उन्हें अंग्रेजी का करना चाहिए। क्यों नहीं करते? आपके राज्य की उर्दू स्कूलों में मराठी नहीं पढ़ाई जाती उसके लिए क्यों नहीं आंदोलन करते? देखिए, हिंदी इस देश की सभी प्रांतीय भाषा-भाषी लोगों को जोड़ने का काम करनेवाली भाषा है। इस देश में अनेक स्थानों पर हिंदी अलग-अलग ढंग से बोली जाती है और अच्छी हिंदी बोलने को लेकर अब भी हम बहुत कमजोर है। केवल बोलचाल की अच्छी हिंदी भी हमारे बालकों को आ जाए तो इसमें कौनसी हानि है? यह तो नहीं कहा जा रहा है ना कि मराठी मत बोलो और मत सीखो। मराठी के साथ हिंदी भी थोड़ी बहुत सीख लो तो क्या हर्ज है? आप तो देखते ही है न कि महाराष्ट्र राज्य के नेता राष्ट्रीय संचार माध्यमों के समक्ष कैसी दयनीय और हास्यास्पद हिंदी बोलते है। हिंदी सीखने से राष्ट्रीय स्तर पर अपने विचारों की सार्थक अभिव्यक्ति करने में आपका व्यक्तित्व निखरेगा। स्वर्गीय प्रमोद महाजन, स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे और स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे भी बहुत अच्छी हिंदी बोल लेते थे इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर उनकी एक अच्छी राजनीतिक छवि बनी। इस राज्य के अधिकांश राजनेताओं ने भी अच्छी हिंदी बोलते आनी चाहिए तभी तो वें राष्ट्रीय स्तर का नेता बनेंगे। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ओजपूर्ण हिंदी भाषण कला यानी वाकचातुर्य के बल पर ही तो देश के सबसे बड़े नेता बने हैं यह हम क्यों अनदेखा करते हैं? मा. प्रधानमंत्री को महाराष्ट्र में भाषण हिंदी में ही देना पड़ता है वह इसलिए कि हिंदी राष्ट्रभाषा है जबकि हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं है, गुजराती है।
                                                महाराष्ट्र में राज ठाकरे द्वारा हिंदी के विरोध को लेकर जो आक्रमक बयानबाजी हुई है और मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा जो तोड़फोड़ और मारपीट आदि की गतिविधियाँ हुई है और की जा रही है उसे लेकर विशेषकर व्यापारजगत एवं  शिक्षाजगत में भय और असुरक्षितता का माहौल बन गया है। मैं भी दुखी हूँ।विशेषकर जो मराठी भाषी लोग स्कूलों-कॉलेजों में हिंदी भाषा अध्यापन का कार्य करते हैं वें भी चिंतीत हैं।महाराष्ट्र में ऐसे अनेक लोग आपको मिलेंगे जो हिंदी भाषा से प्रेम करते हैं। मेरी मातृभाषा मराठी है पर मैं हिंदी का अध्यापक हूँ और हिंदी से प्रेम भी करता हूँ। मुझे भी लगता है कि हिंदी का अध्यापक बनकर मैंने कोई अपराध तो नहीं किया है? कल मेरी बेटी भी मुझे पूछ रही थी कि पापा, आप तो हिंदी के प्रोफेसर है तो क्या आपको भी कठिनाई आएगी? उसे यह समझ में नहीं आया कि आखिर हिंदी का विरोध क्यों हो रहा है? असल में यदि हिंदी अध्ययन-अध्यापन को लेकर मेरे छात्र जीवन में यदि स्थितियां प्रतिकूल होती तो क्या मैं हिंदी का प्रोफेसर बनता? वैसे देखा जाए तो मेरे समय में भी स्थितियां कुछ बहुत संतोषजनक नहीं थी। पर हिंदी ऐच्छिक स्तर पर पढ़ी जा सकती थी। हिंदी पढ़ना तब भी अनिवार्य नहीं था और न अब है। माननीय मुख्यमंत्री फडणवीस तो कह भी चुके है कि तीसरी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ना अनिवार्य नहीं है पर सत्य यह है कि वह अनिवार्य ही है ।
                                          अंत में मुझे यह भी कहना अभिप्रेत लग रहा है कि महाराष्ट्र में हिंदी भाषा विरोध को लेकर हो रहे इस विवाद में हिंदी भाषी प्रदेश के लोगों को अधिक उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है। पर दुर्भाग्य से हिंदी भाषी प्रदेश के लोगों एवं उनके नेताओं द्वारा भी उकसाने वाले बयान आ रहे हैंIराज ठाकरे और उनके कार्यकर्ता ही नहीं, इस राज्य की अधिकांश मराठी जनता हिंदी समझना और बोलना जानती है। हिंदी प्रदेश के हिंदी भाषी लोग हिंदीतर भाषी हिंदी प्रेमी लोगों को कितना सम्मान और अवसर देते हैं इसे मैं भलीभांति जानता हूँ। महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि कर्नाटक एवं अन्य दक्षिणी राज्यों में जो आए दिन हिंदी विरोध के किस्से सुनने मिलते हैं उन्हें लेकर हिंदी भाषी प्रदेश के तथाकथित हिंदी समर्थक लोग भी कुछ कम जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है।यह कुछ गिने-चुने राजनीतिक हेतु से प्रेरित लोग हैं जो हिंदी भाषा की राष्ट्रीय छवि को हानि पहुंचा रहे हैंI
                                                                   
कुबेर कुमावत
प्लाट नं.३८, १७६२/३, केले नगर,
ढेकू रोड,
अमलनेर-४२५४०१
(महाराष्ट्र) 
मोबाइल नं.  : 9823660903
Email : [email protected]
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1 टिप्पणी

  1. कुबेर जी!

    महाराष्ट्र में हिंदी भाषा को लेकर जो विवाद उठे हैं। बाकी यह चिंता जनक है भले ही हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है लेकिन राजभाषा तो है! इस तरह की बातें करके विश्व के सामने हमारी अपनी भाषा उपहास का कारण बन रही है। यह चिंताजनक है। पता नहीं क्यों नेता बनने के बाद भी स्वयं से ऊपर नहीं उठ पाते।
    इस पर कहा तो बहुत कुछ जा सकता हैं,लेकिन कहने का कोई लाभ नहीं।
    बताइए आपको।
    अपने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात की है। बधाई आपको।

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