Tuesday, June 9, 2026
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महेश शर्मा का लेख – ताजमहल का सच

हिंदुस्तान की जानी-मानी ऐतिहासिक इमारत में से एक ताजमहल, दुनिया के सात  अजूबों में से एक ताजमहल जो शाहजहां और मुमताज महल की मोहब्बत का बेमिसाल स्मारक  माना जाता है जिसे दोनों के प्यार  का सबसे बड़ा साक्षात उदाहरण कहा जाता है, यह सिद्ध करता है कि  किसी झूठ  को  सजा संवार  कर एक  समूह  विशेष के द्वारा बार-बार प्रस्तुत किया जाए तो एक लंबे समय के बाद वह  झूठ एक आकर्षक  सत्य में बदल जाता है  |
आप इस लेख में दर्शाए तथ्यों को पढ़कर भी समझ कर भी उस आकर्षक भ्रमित मिथ्या शब्दजाल  के मोह पाश से मुश्किल से छूट पाएंगे |यह जो जनमानस में चर्चित तथ्य है कि  ताजमहल का निर्माण शाहजहां के द्वारा अपनी पत्नी मुमताज की याद में निर्माण  किया गया था इस तथ्य का किसी भी पुस्तक में या शाहजहां के दरबारी किताबों में या कहीं पर भी कोई प्रमाण नहीं है | हां यह प्रमाण जरूर है कि ताजमहल शाहजहां से  1500 वर्ष पहले ही बन चुका था जिसे तेजो महल कहा जाता था , जो एक शिव मंदिर था इसके ऐतिहासिक दस्तावेज भी मौजूद है  | वैसे भी इस्लाम के पैरोंकार जो  तुर्क हब्शी ईरानी यूनानी या  अफगान मुगल आदि कभी भी और कहीं भी शांतिपुर्ण  शासक  के रूप में नहीं रहे | आक्रमण , लूटमार , विध्वंस , दूसरे धर्म को नष्ट करने की प्रवृत्ति यह उनके मुख्य गुण  रहे हैं | उनकी संस्कृति का हिस्सा विध्वंस ही रहा है | इसलिए इनसे ऐसे किसी प्रेम के या  शांति के प्रतीक निर्माण की आशा रखना या संभावना को मानना  बिल्कुल संभव नहीं है |   हम पहले महल के बारे में जो प्रचलित कहानी है उसको देखते हैं | मुमताज जो शाहजहां की प्रिय पत्नी थी | कहा जाता है वह 13वें  नंबर की पत्नी थी जो पूर्व से विवाहित थी तथा शाहजहां से उसका दूसरी बार विवाह हुआ था |  शाहजहां और मुमताज कम उम्र में ही एक दूसरे को जानते पहचानते थे , प्यार करते थे | और शाहजहां जिसका  तत्कालीन नाम खुर्रम था जहांगीर का छोटा बेटा था जबकि मुमताज ( वास्तविक नाम अरजूमंद बानू ) आगरा में रहने वाले पारसी परिवार की  बेटी थी वह भी शाहजहां से मोहब्बत करती थी | अन्य समझदार मुगल राजाओं की तरह शाहजहां के पिता जहांगीर को उनका यह संबंध जरा  नहीं भाया और उसने  अरजूमंद बानू की शादी अपने एक सेना नायक जिसे  शेर अफगान की उपाधि दी गई थी उससे निकाह करवा कर शाहजहां के जीवन से उसे दूर कर दिया था | लेकिन जहांगीर की मृत्यु के पश्चात शाहजहां ने पहला काम यही किया  कि अपनी सेना  से शेरे  अफगान पर हमला करवाया उसे मौत के घाट उतार दिया और अरजूमंद  बानो जिसे बाद में शाहजहां ने ही मुमताज महल का नाम दिया उसे आगरा अपने हरम में बुला लिया और बाद में उससे निकाह पढ़ लिया |                                           
शाहजहां और  मुमताज महल के प्यार का एक सबूत यह जरूर दिया जा सकता है कि  दोनों के विवाहित जीवन के इतने सालों में शाहजहां ने मुमताज महल को 14 बार माँ  बनाया | इन चौदह संतानों में से  सात ही जीवित रही और बाकी सात की  मृत्यु हो गई थी | चौदहवें  नंबर की संतान को जन्म देते समय आगरा से बुरहानपुर तक का सफर तय करने के बाद अस्वस्थ होने के कारण मुमताज महल बचाई नहीं जा सकी और मर गई |                                     
अपनी मृत्यु के समय मुमताज महल ने शाहजहां से दो वचन लिए थे | पहले तो यह कि अब कभी किसी से कोई निकाह नहीं करोगे | और दूसरा यह  कि मेरे लिए दुनिया का  सर्वश्रेष्ठ मकबरा बनाओगे |  शाहजहां ने मुमताज महल को दिए हुए दोनों वचन में से पहले वचन को तोड़ने में 10 दिन भी नहीं लगाये | अपनी प्रिय पत्नी के मरने के आठवें दिन ही मुमताज महल की बहन जो उसी के समान खूबसूरत थी उससे शादी कर डाली | और दूसरा वचन भी  सत्य और झूठ के कोहरे में छिपा हुआ एक आकर्षक मिथक के रूप में प्रसिद्ध किया गया |    सं 1631 में बुरहानपुर में मृत्यु होने पर  मुमताज महल को तात्कालिक रूप से बुरहानपुर में ही दफना दिया गया था  | इसके बाद आगरा जाकर जैसा बताया जाता है ताजमहल का निर्माण प्रारंभ किया गया उक्त निर्माण 1632 से प्रारंभ होकर 1659 में पूर्ण हुआ | कहीं कहीं यह समय 1630 से 1648 भी कहा जाता है | और मोटे तौर पर 18 से 25 साल तक 20000 मजदूरों द्वारा रोजाना काम किया गया और इसके निर्माण की लागत भिन्न-भिन्न इतिहासकारों ने  भिन्न-भिन्न बताई गई है जो 40- 50 लाख से लेकर तो 150 लाख तक लिखी है | इसकी लागत पर  खर्च क्या हुआ या  कितने मजदूर लगे या कितना समय लगा यह बातें प्रश्न चिन्ह खड़े नहीं करती |  प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं अन्य कई कई तथ्य जैसे कि ताजमहल के तहखाना में हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां कैसे पहुंची , या ताजमहल की दीवारों पर और छत पर और स्तंभों पर तथा दरवाजा पर हिंदू धर्म के धार्मिक चिन्ह बनाने की कौन सी व्यवस्था थी और क्या आवश्यकता या मजबूरी थी ताजमहल के बनाने वालों के पास | इस्लाम के मतानुसार सामान्यतः किसी शव को या मय्यत को एक कब्र से निकाल कर दूसरी कब्र में दफन करना उचित नहीं माना जाता है और यह भी कहा गया है कि विषम परिस्थितियों में किसी शव को एक कब्र में दफन करने के बाद ज्यादा से ज्यादा 6 माह की  अवधि के पहले उसे स्थाई कब्र में स्थानांतरीत  कर देना  चाहिए | अब  इस्लाम मत का परिपालन यहां पर क्यों नहीं हुआ इसका जवाब तो कौन देगा ?                              
हम इस आकर्षक प्रेम कहानी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर करते हैं जो ताजमहल की वास्तविकता की ओर संकेत करते हैं – 
   ) कहा जाता है कि शाहजहां ने ताजमहल को अपनी प्रिय पत्नी मुमताज की याद को जिंदा रखने के लिए बनवाया था और उसमें मुमताज के शव  को दफन कर उस पर कब्र बनाई गई थी | यदि यह बात सही है तो वहां पर शाहजहां और मुमताज महल की कब्र के अलावा दो कब्र और बनी है यह कब्रें  हैं शाहजहां की  दो अन्य पत्नियों सती और सरहदी बेगम की तो ताजमहल को सिर्फ मुमताज महल के प्यार का स्मारक कहना कैसे पूर्ण सत्य होगा |
बाबर की आत्मकथा के द्वितीय खंड के प्रष्ठ  251 पर यह लिखा गया है की 11 जुलाई 1526 को आगरा में ही एक आलीशान महल में एक भोज आयोजित किया गया था जिसमें कई शानदार स्तंभ थे तथा  ठीकबीच में एक बड़ा भारी खंबा था |  आगरा में इस तरह का ताजमहल के अलावा अन्य कोई भवन नहीं है  | अर्थात जिस महल को ताजमहल कहा जा रहा है उसका अस्तित्व 1632 से पहले से ही था | इसी संदर्भ में शाहजहां के दरबारी लेखक मुला अब्दुल मजीद लाहौरी ने बादशाहनामा  में लिखा है कि जिस इमारत में मुमताज को दफनाया गया उसका गुंबद गगन चुंबी था जिसके नीचे और अंदर एक बहुत बड़ा स्तंभ था | उक्त बादशाहनामा  में मुला अब्दुल्ल मजीद लाहोरी ने इस ईमारत को ताजमहल होने का या  इस महल को शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था ऐसा कोई जिक्र नहीं किया गया | ताजमहल का निर्माण इतनी छोटी घटना तो नहीं मानी जा सकती थी कि शाहजहाँ के दरबारी लेखक उसके बारे में कुछ भी नहीं लिखे | 
) ताजमहल के शीर्ष पर कमल की पंखुड़ियां वाले शिखर पर बने कलश त्रिशूल युक्त है | त्रिशूल भगवान शिव का चिन्ह है | मुस्लिम इमारत के गुंबदों पर कमल पुष्प के अंकन वाले शिखर  नहीं होते हैं जिस प्रकार कोई मुस्लिम अपने सिर पर शिखा धारण नहीं करता  उसी प्रकार मुस्लिम भावनाओं के गुंबदों पर कमल पुष्प के शिखर भी  भी नहीं हो सकते | यह विशुद्ध रूप से भारतीय संस्कृति के धार्मिक चिन्ह है |
) मुमताज का असली नाम  अरजू मंद बानो था और मुमताज नाम शाहजहां द्वारा दिया गया था तो मकबरे का नाम ताजमहल किस प्रकार रखा गया ? इसका नाम तो मुमताज महल ही होना था |  तथ्य तो यह है कि प्रसाद और पूजा स्थल के रूप में धवल प्रस्तुत्रों से निर्मित यह भवन तेजोमहालय नाम से पहले से प्रसिद्ध था | इसके चारों ओर हिंदुओं की बसी हुई आबादी ताजगंज या तेजगंज कहलाती थी |  और यही तेज गंज का सम्बोधन बाद में ताजगंज हो गया और तेजोमहालय को ताजमहल संबोधन दे दिया गया | सैयद मोहम्मद लतीफ फेलो आफ  रॉयल एशियाटिक सोसाइटी , एक इतिहास लेखक हैं | इन्होंने अपनी पुस्तक आगरा हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव जो वर्ष 1896 में प्रकाशित हुई थी | उसके प्रष्ट   105 पर स्पष्ट लिखा है कि ताजमहल राजा मानसिंह का महल था वैसे भी यह सोचने का विषय है कि शाहजहां ने जब अपनी पत्नी की याद में उस भवन का निर्माण कराया तो उसका नाम मुमताज महल ना देते हुए ताजमहल क्यों कहा ?  दूसरा संपूर्ण मुस्लिम जगत में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जहां मकबरे को महल कहा जाता हो |
) शाहजहां या उसके पुत्र औरंगजेब या अन्य किसी दरबारी ने किसी भी वाकये में या किसी  ऐतिहासिक किताब में  कभी ताजमहल शब्द का उपयोग नहीं किया वे  उसे अल मंजिल या अल इमारत या मंजिले राजा जयसिंह के नाम से संबोधित करते थे | क्योंकि शाहजहां ने उस भवन को उसके तत्कालीन स्वामी जय सिंह से जो राजा मानसिंह का पोता था , नाम मात्र की कीमत देकर हस्तगत कर लिया था | शाहजहां के शाही अभिलेख बादशाहनामा  में भी ताजमहल शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है |
प्रसिद्ध अमृत बाजार पत्रिका के अग्रलेख में ताजमहल दी इम्मोर्टल मुगल फ़्राड शीर्षक से एक लेख लिखा गया था जिसमें इसी तथ्य को दोहराया गया था |  उस लेख के बाद भूतल  के कई कमरों को सुरक्षा और गोपनीयता  की दृष्टि से बंद कर दिया गया | जबकि कुछ तथ्यों के अनुसार उन कमरों में देवी देवताओं की मूर्तियां तालों में बंद पड़ी है | इसी प्रकार ताजमहल के फाटक की लकड़ी का कार्बन टेस्ट किया गया तब  थाने स्थित ओरिएंटल अध्ययन संस्थान के संस्थापक डॉक्टर विजय बेडेकर के अनुसार ताजमहल के उत्तरी छोर स्थित दरवाजे की लकड़ी के टुकड़े का रेडियो कार्बन टेस्ट उस दरवाजे का निर्माण ताजमहल के निर्माण  समय 1632 से काफी समय पहले का दर्शाया गया है | उत्तरी अमेरिका में मध्य एशियाई अध्ययन संगठन के एक सदस्य श्री मार्विन मिल्स ने यह रिपोर्ट ठाणे स्थित संस्थान को भेजी थी | 
) लखनऊ संग्रहालय में बटेश्वर शिलालेख है जिसमें यह वर्णित है कि ताजमहल 1155 ईस्वी में बना था और यह मूल रूप से शिव मंदिर था |  और इस मंदिर के निर्माता चंदेल सम्राट परमार्डी देव थे | यह शिलालेख सन 1900 में खुदाई के समय जनरल कनिंघम को मिट्टी में दबा हुआ मिला था जिसे उन्होंने  लखनऊ संग्रहालय में जमा कर दिया था | यह शिलालेख संस्कृत भाषा में है और इसमें स्फटिक के समान  श्वेत पत्थरों से मंदिर के निर्माण की बात कही गई है |
) प्रसिद्ध इतिहासकार  ट्रेलर इस संबंध में कहते हैं कि जहां इस्लामिक साम्राज्य के मूल केंद्र हुआ करते हैं , सीरिया इराक अरब देश इत्यादि वहां पर यह स्थापत्य कला अच्छी तरह से कभी विकसित नहीं हो पाई , लेकिन स्पेन और भारत जैसे देशों में इस्लामी शिल्प कला बढ़ी ,  तेजी से  विकसित हुई  और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई | क्या यह आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय तथ्य नहीं है | सीरिया इराक अरब और अन्य मुस्लिम देशों में ताजमहल लाल किला या जमा मस्जिद या कुतुब मीनार जैसे भवनों  का निर्माण क्यों नहीं हुआ ? उत्तर इसका स्पष्ट है कि मुसलमान ने भारत में किसी भवन का निर्माण नहीं किया अपितु हिंदी भवनों  को तोड़ मरोड़ के नष्ट करके उन्हें मुस्लिम भवनों  का रूप देने के प्रयास किया | ताजमहल का निर्माण करने वाला शिल्पी कौन था ? इसके बारे में भी कोई स्पष्ट अभीमत नहीं है | शाहजहां के दरबारी लेखक मुला अब्दुल हमीद लाहौरी जिसने  बादशाहनामा  लिखा है उसमें भी इसके निर्माण से जुड़े किसी शिल्पी का नाम नहीं दिया गया है | प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार केन ने इस संबंध में यह लिखा है  कि शाहजहां ने अब्दुल हमीद को बादशाहनामा  में ताजमहल का जिक्र करने का विशेष निर्देश दिया था | तो ताजमहल का निर्माण तो कोई साधारण बात नहीं थी तो उसका जिक्र करने के लिए विशेष निर्देश की क्या आवश्यकता थी |                                   ८) महाराष्ट्र ज्ञान कोष में ताजमहल के निर्माण से जुड़े दो सुपरवाइजर का जिक्र है एक मुकम्मल का , दूसरा अब्दुल करीम का यानी कब्र बनाने संबंधी कार्य के लिए दो व्यक्ति पर्याप्त थे | इसी प्रकार एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका का कहना है कि शिल्पकारों की समिति ने कई नक्शा तैयार किए थे | जब एक विदेशी यात्री बर्नर ने ताजमहल के शिल्पकार के बारे में पूछा तो बताया गया कि जिसने ताजमहल बनाया था उसकी हत्या कर दी गई है | एक अन्य रहस्य उद्घाटन जो सलमान द्वारा किया गया था कि उसे एक फ्रांसीसी इंजीनियर आस्तिक दी बोर्ड ने बनाया है | एक अन्य मोहम्मद इशा अफांदी को भी इसके निर्माण का श्रेय दिया जाता है जिसका जिक्र फारसी की पुस्तक तारीख ए ताजमहल में वर्णित है लेकिन यह ऐसा कौन था इसका भी कोई पता नहीं है | इंपीरियल लाइब्रेरी की पुस्तक में पांच प्रमुख शिल्पियों का जिक्र है तो एक अन्य इतिहासकार आईजी फ्यूल का कहना है कि ताजमहल के बारे में कुछ रिकॉर्ड में मन्नू बाग का जिक्र है | इस तरह से देश विदेश के इतिहासकारों ने ताजमहल के निर्माण को अपनेअपने  देश के शिल्पज्ञों से जोड़ने के लिए कई तरह के तथ्य स्थापित किये |
तो आखिर क्या है ताजमहल की  वास्तविकता ?
हिंदुस्तान के अन्य ऐतिहासिक निर्माण जैसे अजंता एलोरा ,  खजुराहो के मंदिर आदि  के समान तेजोमहालय का भी पीढ़ी दर पीढ़ी निर्माण हुआ है |  महाराज अग्रसेन द्वारा आरंभ किए गए इस प्रासाद , परिसर का निर्माण अंततः राजा जयसिंह द्वारा संपूर्ण किया गया था महाराज अग्रसेन और तत्कालीन राजा जयसिंह के मध्य समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त द्वितीय और परमार्डी देव आदि सम्राटों ने इस परिसर के वैभव को समृद्ध किया था |  इसके आसपास बसे गांव के खंडहर में शिवजी की मूर्तियां मिलती है | जयसिंहपुर , खवासपुरा आदि की उपस्थिति भी इसके हिंदू भवन होने का प्रमाण देता है |
भविष्य पुराण केदार खंड के अनुसार आरंभ में श्रोतायु अग्रसेन ने अपने नाम पर गंगा जमुना के मध्य में 12 योजन विस्तारित  आगरा नाम का शहर बसाया था | वही आगरा जो आजकल आगरा के नाम से जाना गया है | नगर के मध्य में कमला देवी विष्णु भगवान और शिव का श्वेत मंदिर था जिसमें उद्यान बावड़ी आदि के अलावा  वाटिका सरस हंस सारिका मयूर और कमल दल का चिन्हित होना बताया गया है | इसी भवन में महाराज सत्तायु अग्रसेन ने 18 यज्ञ किए थे जो गर्भ ग्रह के मध्य में स्थित धवल श्वेत स्फटिक  के शिवलिंग के प्रकाश के  तेज के कारण यह महालय महाधन्यालय(  विशाल परिसर// ग्रैंड कंपलेक्सतेजो महालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ | जिसमें 350 कक्ष ,  अनंतपुर , अतिथि गृह ,अस्तबल घोड़े के लिए कूप तड़ाग , बावड़िया , मंदिर , संकुल बाजार विथीका आदि अनेक निर्माण और व्यवस्थित प्रांगण बनाए गए थे|  इन सभी के अवशेष कुछ पूर्ण कुछ अपूर्ण रूप में अभी भी विद्यमान है | तो क्या विश्व की किसी भी मस्जिद में मकबरे में इस तरह के निर्माण पाए जाते हैं ? वह तो जैसा की चाटुकारिता की प्रवृत्ति होती है , शाहजहां के  दरबारियों  ने इसी तेज महालय को ताजमहल नाम से प्रचारित किया | उक्त नाम को सार्थक सिद्ध करने के लिए शाहजहां मुमताज महल की मिथ्या प्रणय प्रेम की कहानी घड़ी गई  और यह दुर्भाग्यपूर्ण हादसा सिर्फ ताजमहल के साथ ही नहीं हुआ भारत में कई कई तथा कथित मुगलकालीन इमारत की यही कहानी है | मूल रूप में यह  इमारतें हिंदू भवन थे जिनमें फेरबदल कर के उन्हें नष्ट करके कहींकहीं उन्हीं  की सामग्री को वही उपयोग करते हुए उन्हें मस्जिद , मकबरा , मदरसा या मजार आदि का नाम दे दिया गया है |
इन सबके बावजूद अत्यंत हास्यास्पद और विद्रूपता पूर्ण बात यह है कि पिछले  60 70 सालों से हर विदेशी अतिथि को हिंदुस्तान की तरफ से भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह ताजमहल देने वालों को जरा भी  शर्म नहीं आई कि वे  क्यों ताजमहल को भारतीय संस्कृति का प्रतीक मानते हैं | ताजमहल को एक विदेशी आक्रांता द्वारा अपनी विवाहित प्रेमिका के पति  की हत्या करवाकर उसे जबरदस्ती अपने हरम में शामील कर उससे शादी करना और उसकी मौत के बाद किसी हिन्दू राजा के महल को हस्तगत कर उस तेजो महालय को ताजमहल का रूप देने वाले स्मारक को आप भारतीय संस्कृति का प्रतीक कहते हैं  ? और बड़े रुआब से ऊस स्मारक के प्रतीक चिन्ह को विदेशी  मेहमानों को उपहार में देते हैं |  यदि ताजमहल भारतीय संस्कृति का सम्मानजनक प्रतीक है तो फिर सम्राट अशोक क्या है और उनका अशोक स्तम्भ क्या है ? महाराजा भरत क्या है ? विश्व प्रसिद्ध नालंदा और अन्य शिक्षा केंद्र क्या हैं  हमारे वैदिक आदि पुरुष राम और कृष्ण क्या है ? गीता का ज्ञान क्या है ? वे प्रकांड विद्वान जिन्होंने नक्षत्र के तारामंडल के पृथ्वी के समुद्र के कई कई रहस्यों को  उजागर किया है उनका कोई मूल्यांकन नहीं ? क्या इन्हे भारतीय सभ्यता का कोई अन्य सम्मानित प्रतीक नहीं मिला ? ऐसे में क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि  धन्य है वह व्यक्तित्व जिसने यह अविवेकपूर्ण कुत्सित परंपरा को  बंद करके  भारत की महान अद्भुत ज्ञान और सिद्धांतों को प्रकट करने वाले गीता  के ग्रंथ को  विदेशियों के लिए  उपहार स्वरूप माना |
 संदर्भ ———————–                                               
1)ताजमहल द इमॉर्टल मुगल फ़्राड- अमृत बाजार पत्रिका  
2)आगरा हिस्टोरीकल एंड डिसक्रीपटिव – सैयद मोहम्मद लतीफ़ 
3) प्ली टू  रिराइट ताज हिस्ट्री —द हिन्दू 
4) लखनऊ संग्रहालय स्थित बटेश्वर शीलालेख  
महेश शर्मा धार वाले
लखनऊ 
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