Sunday, April 19, 2026
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प्रकाश मनु का लेख – उनका भारत प्रेम खुद एक मिसाल बन गया!

भारतीय स्वाधीनता संग्राम कई तरह से अनोखा है। एक ऐतिहासिक प्रयोग, जो शायद अपनी मिसाल खुद है। इसलिए दुनिया के बहुत सारे चिंतकों को वह एक अबूझ रहस्यपूर्ण पहेली सा लगा था। शायद आज भी लगता है। संसार उसे समझने की कोशिश करता है, पर अवाक् ही रह जाता है। दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल…!” गीत की पंक्तियाँ ऊपर से देखने पर भले ही एक पहेली सरीखी लगें, पर जब हम इसे महात्मा कहे जाने वाले राजनीति के एक करिश्माई व्यक्तित्व की लड़ाई के तौर-तरीकों से जोड़कर देखते हैं, अहिंसा को लेकर किए गए दुनिया के अब तक के सबसे बड़े और अद्भुत प्रयोग के रूप में देखते हैं, तो चीजें कुछ साफ होने लगती हैं। 
साथ ही इस विलक्षण स्वाधीनता संग्राम के पीछे शक्ति-स्रोत के रूप में, भारतीय जनता की जिस असाधारण दृढ़ता और आत्मशक्ति का पता चलता है, उससे समझ में आता है कि आज भी कोरी किताबों से इस महान ऐतिहासिक प्रयोग को समझने वालों की मुश्किल क्या है।
ठीक इसी तरह कोरी राजनीति की भाषा से सीधे-सरल, एक पसली के, लेकिन विराट् महात्मा गांधी की असाधारण आत्मिक शक्ति को समझ पाना भी सरल नहीं है। उन्होंने जिस अहिंसा को अपनी शक्ति, अपनी ढाल बनाया, उसे लेकर प्रयोग बुद्ध और महावीर की इस धरती पर हजारों बरस पहले प्रारंभ हो गए थे। प्राचीन चिंतन की ये गूँजें इस देश की हवाओं में आज भी घुली-मिली सी हैं कि शस्त्र और ताकत से नहीं, प्रेम से दिलों को जीत लेने से जो विजय हासिल होती है, असल में तो वही स्थायी विजय है। कलिंग में रक्त की नदियाँ बहाने के बाद अशोक को भी यही समझ में आया था, और इससे केवल अशोक का ही हृदय-परिवर्तन नहीं हुआ, इस महादेश में और भी बहुत कुछ बदल गया था। 
किसी अच्छे, बड़े और शक्तिशाली राज्य का उद्देश्य अपनी सीमाओं को लहू से सींचना नहीं, प्रजा की बेहतरी और कल्याण है। लोकतंत्र का यह सत्य इसी देश की मिट्टी से निकला और अब सारी दुनिया में फैल चुका है।
चलिए, फिर थोड़ी गांधी जी की बात करें, जिन्होंने शस्त्र और ताकत के बजाय भारत की विशाल जनता के आत्मबल पर भरोसा किया और उसे जगाने का काम किया। उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई को भारत के प्रेम और अहिंसा के महान आदर्शों के जरिए हासिल करने की लक्ष्य सामने रखा। अब तक प्रेम और अहिंसा की बात तो सब करते थे, पर सोचते थे कि ये बस कहने की बातें हैं, इनका व्यवहार से कोई संबंध नहीं है। या फिर ये अधिक से अधिक ये निजी आदर्श हो सकते हैं, इनका किसी बड़ी राजनीतिक लड़ाई में कोई मतलब नहीं। यानी, ये असंभव आदर्श हैं। कहो, पर सिर्फ कहो। करनी से इनका कोई वास्ता नहीं। गांधी जी ने तय किया वे इसी असंभव को संभव करेंगे और प्रेम और अहिंसा के जरिए आजादी लेकर दिखा देंगे। और सचमुच, भारतीय जनता का सत्याग्रह और दृढ़ प्रतिरोध देखते ही देखते दुनिया का सबसे बड़ा और विलक्षण शस्त्र बन गया, जिसने इतनी बड़ी आततायी फिरंगी सरकार को हिला दिया।
फिर इस लड़ाई के तौर-तरीकों पर भी जरा विचार करें। गांधी जी ने चरखा और खादी को लेकर जब पूरी बुलंदी से आवाज उठाई और उसे स्वराज ही नहीं, देश की आजादी की लड़ाई के साथ जोड़कर देखा तो उनके बहुत से शिष्यों और अनुयायियों को भी परेशानी हुई। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि चरखे का आजादी से क्या मतलब है, खादी का आजादी से क्या मतलब है? यहाँ तक कि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर भी अचकचाए और उन्होंने अपनी असहमति जाहिर की। बहुत से अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों ने हँसी-ठट्ठा किया, देखो तो गांधी को, यह चरखे से आजादी लेने चला है!” 
पर जो बात पढ़े-लिखे लोगों को अजूबा लगी, गाँव के सीधे-सादे अनपढ़ लोगों को नहीं। देखते ही देखते चरखा घर-घर पहुँच गया। खादी गाँव-गाँव पहुँच गई। गाँव के निर्धन किसान, मजदूर हों या पढ़े-लिखे लोग, सबके तन पर खादी विराज गई। यह कोई साधारण सफलता नहीं थी, क्योंकि इसके प्रतीकार्थ गहरे थे। अपनी शक्ति से भीषण दमन-चक्र चलाने वाले अंग्रेजों ने जब देखा कि अरे, गांधी की फौज तो गाँव-गाँव, गली-गली पहुँच गई है, ऐसी जगहों पर भी जहाँ पुलिस या अंग्रेजी फौज का पहुँचना तक संभव नहीं, तो वे घबराए। उन्हें हर खादीधारी गांधी का सिपाही लगता था, हर घर में चरखे की घूँ-घूँ आजादी..आजादी की गूँज उठाती महसूस होती थी। गांधी जी के एकदम देशी तरीकों से आजादी की चिनगारी घर-घर पहुँच गई थी, और एक छोटा सा इशारा होते ही वह विप्लव में बदल सकती थी। यह क्या किसी करिश्मे से कम था? 
यह करिश्मा अहिंसा का तो था ही, पर साथ ही इस देश की विराट जनता के आत्मबल का भी था, जिसे गांधी जी ने पहली बार जगाया। और नतीजा सामने था। अंग्रेजी सत्ता ने कुछ भय, कुछ विस्मय के साथ अहिंसा की इस ताकत को महसूस किया, जिसने उसके हाथ-पैरों को मानो बाँध दिया था। माना कि बंदूक की गोली में ताकत होती है, पर अगर हजारों निहत्थे सत्याग्रही सीना खोलकर सामने आ जाएँ, तो बंदूक की ताकत को भी झुकना पड़ता है।
इसीलिए नमक आंदोलन में, सविनय अवज्ञा आंदोलन में और सबसे बढ़कर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भारतीय जनता का जो विराट प्रतिकार अंग्रेजी सत्ता को झेलना पड़ा, और शांतपूर्ण अहिंसा की जिस नैतिक ताकत को उन्होंने महसूस किया, उसकी कोई काट उनके पास नहीं थी। इसी से भारतीय जनता में निर्भीकता का गुण आया और सामने दर्जनों सिपाही बंदूकें लेकर खड़े हों तो भी निहत्थे वंदेमातरम् और भारत माता की जय कहते हुए उनसे टकराने का साहस भी।
अलबत्ता भारतीय स्वाधीनता संग्राम कई मायनों में अनूठा और अप्रतिम था, जिसकी तमाम व्याख्याएँ हुई हैं, आगे भी होंगी, पर अब तक तो शायद कोई पूर्ण नहीं है। यह शायद कोटि-कोटि जनता के भीतर छिपे विराट आत्मबल को कुछ घिसे हुए शब्दों और किताबों के सहारे समझना है, जो अकसर संभव नहीं होता।
इसी तरह भारत की आजादी की लड़ाई की बहुतेरी गुत्थियाँ और भी थीं, जिन्हें ऊपर-ऊपर देखने पर शायद कुछ खास न लगे, पर जब हम उसकी पूरी अर्थवत्ता को थाहने की कोशिश करते हैं तो बड़ी हैरानी होती है कि अच्छा ऐसा हुआ था, या कि ऐसा भी संभव है? जिस देश की अन्यायी सरकार हमारे देश में भीषण दमन चक्र चला रही थी, उसी देश के अनेक संवेदनशील और उदार लोगों द्वारा एक नैतिक आवेश के साथ भारतीयों के दुख-सुख से एकाकार होकर उसके लिए आवाज उठाना और अपने ही देश की सरकार के उत्पीड़न का पूरी ताकत के साथ विरोध करना भी एक ऐसा ही करिश्मा है, जिसे ठीक-ठीक समझना अभी बाकी है। शायद इसीलिए अंग्रेज मूल के ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय संस्कृति को समझने के साथ-साथ यहाँ की दीन-दुखी जनता की सेवा के लिए अर्पित कर दिया।
अगर ऐसे कुछ नामों पर विचार करें तो एनी बेसेंट, दीनबंधु एंड्र्यूज, भगिनी निवेदिता, सेवियर दंपति, नेल्ली सेनगुप्ता, मीरा बेन, कजिंस बहनें समेत बहुत से नाम सामने आते हैं, और बाद में तो ऐसे लोगों की झड़ी ही लग गई, जो भारत की जनता को उसकी पूरी तकलीफों के साथ समझने और उससे एकाकार होने की कोशिश कर रहे थे। यहाँ तक कि भारत ही उन्हें अपना घर लगने लगा था, जिसके दुख-सुख से वे विकल होते थे और भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के साथ आवाज उठाकर अपना विरोध दर्ज करते थे।
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जिन बड़ी शख्सियतों ने भारत और यहाँ की संस्कृति से प्रभावित होकर भारत को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और भारत के पुर्नजागरण तथा स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया, उनमें एनी बेसेंट का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वे भारत में आकर भारत की ही पुत्री बन गई थीं और भारतीय जनता के दुख-दर्द से इस कदर एकाकार हो गईं थीं कि न सिर्फ महात्मा गांधी उनसे बड़ा स्नेह करते थे, बल्कि भारत की जनता ने भी उन्हें सिर-आँखों पर बैठाया। यहाँ तक कि अंग्रेजी शासन को उन्हें गिरफ्तार भी करना पड़ा। तो भी एनी बेसेंट ने मानवता और सच्चाई के लिए संघर्ष की अपनी राह को नहीं छोड़ा।
एनी बेसेंट का जीवन भी एक सीधी लकीर में चलने वाला न था। 1 अक्तूबर 1847 को लंदन में जनमीं एनी बेसेंट शुरू से ही स्वाधीन प्रकृति की थीं। हर चीज के बारे में अपने ढंग से विचार करके काम करना उन्हें अच्छा लगता था। बचपन में उनका नाम वुड था। बड़े होने पर सन् 1867 में पादरी फ्रेंक बेसेंट से उनका विवाह हुआ। पति धार्मिक मामलों में कट्टर थे। एनी बेसेंट को यह बात अच्छी न लगती थी। अपनी बेटी की घोर बीमारी के कारण तो उनके हृदय में ऐसी उथल-पुथल मची कि वे नास्तिक बन गई। उधर पति अत्यंत कट्टर धार्मिक विचारों के थे। लिहाजा कुछ वर्ष बाद वे अलग रहने लगीं।
अब एनी बेसेंट ने लिखने का क्षेत्र अपनाया। वे विद्रोही स्वभाव की तो थी हीं। रूढ़ियों और अंधविश्वासों का विरोध करने वाले उनके लेखों ने पूरे समाज में हलचल मचा दी। बहुत-से लोग उनके विरोधी हो गए, पर एनी बेसेंट पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे निर्भीकता से अपने विचारों को प्रकट करतीं। यहाँ तक कि वहाँ रहते हुए उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया। 
एनी बेसेंट शायद जीवनभर नास्तिक ही बनी रहतीं, अगर थियोसोफिकल सोसायटी की संस्थापक मैडम ब्लैवेत्सकी से उनकी मुलाकात न होती। मैडम ब्लैवेत्सकी के कारण उनके विचार बदले और उन्हें कर्मकांड से अलग सच्ची आस्तिकता की राह मिल गई। सन् 1893 में एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसायटी का प्रचार करने के लिए भारत आईं तो इस महान देश की जनता और उसकी प्राचीन संस्कृति ने उन्हें इतना अधिक प्रभावित किया कि वे हृदय से भारत से प्रेम करने लगीं। धीरे-धीरे भारत ही उनका प्रिय कर्मक्षेत्र बन गया। भारत को प्राचीन गौरव को जगाने के काम में वे जुट गईं। उनका कहना था कि प्राचीन धर्म और संस्कृति के जरिए ही भारत अपनी पुरानी शान और खोए हुए गौरव को फिर से हासिल कर सकता है।
धीरे-धीरे एनी बेसेंट भारत के स्वाधीनता संग्राम से भी जुड़ीं। भारतीय जनता पर अंग्रेजी शासकों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को देख, उनका हृदय रोता था और उन्होंने प्राण-पण से उसका विरोध करने का निश्चय कर लिया। उन्होंने कॉमनह्वीलतथा न्यू इंडियानाम से पत्र निकाले जिनमें उनके विद्रोही और क्रांतिकारी विचारों से भरे लेख छपते तो सारी जनता और नेताओं का ध्यान उधर जाता। यहाँ तक कि अंग्रेजी सत्ता भी चौकन्नी होकर एनी बेसेंट की गतिविधियों पर नजर गड़ाए हुए थी।
एनी बेसेंट का कहना था कि कि भारत को स्वतंत्रता को कोई भीख नहीं माँगनी चाहिए। बल्कि स्वतंत्रता को भारत और यहाँ की जनता का स्वाभाविक अधिकार है। यहाँ तक कि उन्होंने लोकमान्य तिलक की तरह ही स्वराज्य और होमरूल यानी स्वय अपना शासन करने की नीति को भरपूर समर्थन दिया। उनके इस प्रभावशाली व्यक्तित्व और तेजस्विता के कारण वे कांग्रेस की अध्यक्ष चुनीं गईं और पूरे देश में घूम-घूमकर उन्होंने स्वाधीनता का अलख जगाया। घबराकर अंग्रेज सरकार ने 15 जून 1917 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया, जिससे पूरे देश में क्रोध और उत्तेजना की लहर फैल गई। 
सीधी-सरल लेकिन बेलाग बात कहने वाली एनी बेसेंट ने अपना पूरा जीवन भारतीय जनता के उत्कर्ष और मानवता की सेवा में लगा दिया। इस कारण भारतीय जनता का भी बहुत प्रेम उन्हें मिला। एनी बेसेंट जैसे विदेशी नाम को पुकारना गाँव-देहात की निरक्षर जनता के लिए आसान नहीं था। पर प्रेम शब्दों का मुहताज तो नहीं। वह तो सीधे-सादे और अटपटे शब्दों में ही दिलों से दिलों तक पहुँच जाता है। इसीलिए भारतीय जनता से अथाह प्रेम करने वाली एनी बेसेंट हजारों-हजार भारतीयों के लिए बीबी वासंती बन गईं। ब्रिटेन से आने के बाद भारत को अपना देश मानने वाली एनी बेसेंट को लोग प्यार से बीबी वासंती कहकर पुकारते थे, और लाखों भारतीयों के हृदय की धड़कन बन चुकी एनी बेसंट भी इससे खुश होती थीं। 
इसी तरह भारत के स्वाधीनता संग्राम का पुरजोर समर्थन करने वाले एक और उदारहृदय अंग्रेज सी.एफ. एंड्रयूज का हृदय भी भारत की जनता के सुख-दुख से सराबोर था और भारत उन्हें अपना घर लगने लगा था। उन्होंने दीन-दुखी भारतीयों की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया। इसलिए महात्मा गांधी ने उन्हें दीनबंधुकी उपाधि ने नवाजा था। आज हम उन्हें दीनबंधु एंड्र्यूज के नाम से ही अधिक जानते हैं।
12 फरवरी 1871 को इंग्लैंड के न्यू कैसल नगर में जनमे सी.एफ. एंड्र्यूज के माता-पिता दोनों ही बहुत सीधे-सरल और धार्मिक विचारों के थे। इसका प्रभाव एंड्र्यूज पर भी पड़ा। खासकर माँ से उन्हें जो प्रेम मिला, उसी ने उनके जीवन में ऐसी करुणा भर दी कि एंड्र्यूज का पूरा जीवन ही बदल गया। वह एक ऐसी करुणा मूर्ति बन गए, जिनसे लोगों को बहुत प्रेरणा मिलती थी। एंड्रयूज अकसर बचपन की एक घटना को याद किया करते थे। वे अभी छोटे ही थे कि बुरी तरह बीमार पड़ गए। सभी का कहना था कि अब इस बालक के बच रहने की कोई उम्मीद नहीं। लेकिन उनकी माँ ने रात-दिन एक करके उनकी सेवा की। और यों ममतामयी माँ ने अपने प्यार और जीवट से उन्हें मौत के मुँह से खींच लिया। एंड्र्यूज इस बात को कभी नहीं भूल पाए। उनके मन में बस एक ही तड़प थी, “मैं सारी दुनिया को वैसा ही प्यार दे सकूँ, जैसा मुझे अपनी माँ से मिला है।
बचपन में ही एंड्र्यूज को भारत के बारे में एक किताब पढऩे को मिली। इस किताब का एंड्रयूज के मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वे मन ही मन भारत से प्रेम करने लगे। उनका मानो सपना ही यह था कि वह कभी भारत जाएँ। खुद अपनी आँखों से वहाँ के लोगों और स्थानों को देखे तथा अपना पूरा जीवन वहीं बिताएँ। रात-दिन मानो यही सोचा करते थे। एक दिन उन्होंने माँ से कहां, “माँ-माँ सुनो! कल से मुझे खाने के थोड़े चावल भी दिया करो।
माँ ने हैरान होकर पूछा, “क्यों बेटा? क्या तुझे चावल बहुत अच्छे लगते हैं?”
इस पर इंड्रयूज ने बड़े भोलेपन से कहा, “माँ, आपको तो पता ही है ना, मुझे बड़े होकर भारत जाना है और वहीं रहना है। मुझे पिता जी ने बताया है कि वहाँ सभी चावल खाते हैं। मैं अभी से इसका अभ्यास करूगा। तभी तो वहाँ ठीक से रह पाऊँगा।
और सचमुच एंड्र्यूज बड़े होकर न सिर्फ भारत आए, बल्कि भारत के स्वाधीनता संग्राम से गहराई तक जुड़े। महात्मा गांधी और गुरुदेव टैगोर से वे बहुत प्रभावित थे। अवसर आने पर वे अंग्रेजी सत्ता को इस तरह ललकारते थे कि लोग हैरान रह जाते थे। जब अंग्रेजी शासन की ओर से यह कहा गया कि भारत की आजादी के लिए प्रयत्न करने वाले तो सिर्फ कुछ सिरफिरे लोग ही हैं, तो एंड्र्यूज ने इसका बहुत करारा जवाब दिया था। इससे देश-विदेश में रहने वाले भारतीय उन्हें प्यार करने लगे थे। 
अंग्रेजी शासक एंड्र्यूज के इन विचारों को पसंद नहीं करते थे, पर वे लाचार थे। सी.एफ. एंड्र्यूज सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ाते हुए, अपना बाकी समय दीन-दुखियों की सेवा में लगाते थे। सन् 1907 में जब लाल लाजपत राय को कैद से रिहा किया गया तो सेंट स्टीफन कॉलेज के छात्र इस खुशी में कॉलेज में रोशनी करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए एंड्र्यूज से आज्ञा माँगी तो एंड्र्यूज का जवाब था, “ऐसी धूम से दीए जलाओ कि दीवाली लगने लगे। 
उसके बाद तो स्टीफन कॉलेज में जो फिजा दिखाई दी, उसकी कल्पना की जा सकती है।
दीनबंधु एंड्र्यूज का स्वभाव ऐसा था कि उनके पास जो कुछ भी होता, उसे वे किसी गरीब, जरूरतमंद आदमी को दे देते। किसी दीन-दुखी आदमी का दर्द वे नहीं देख सकते थे। इसलिए उनकी जेब हमेशा खाली की खाली रहती थी। कभी उनका कोट गायब हो जाता, कभी और कपड़े। कभी-कभी तो वह इतनी तंगी की हालत में होते कि चिट्ठी का जवाब देने के लिए पैसे भी उनके पास नहीं होते थे। पर एंड्र्यूज का मन विशाल था, इसीलिए सभी उनसे बहुत प्रेम करते थे। 
5 अप्रैल 1940 को इस महान भारतभक्त साधक का देहांत हुआ। एक ऐसा भारतभक्त जिसकी साँस-साँस में इस देश की जनता के लिए प्यार बसा हुआ था, और जो अंतिम समय तक भारत के स्वाधीनता संग्राम का पुरजोर समर्थन करता रहा। इसीलिए महात्मा गांधी हों या गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, सभी उनसे बहुत प्रेम करते थे।
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स्वामी विवेकानंद की विलक्षण शिष्या भगिनी निवेदिता का जीवन भी ऐसी ही विलक्षण भारतभक्ति और आत्मोत्सर्ग का उदाहरण है। युवावस्था में ही स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से वे भारत आईं और जीवन भर देश और देशवासियों की सेवा करते हुए, भारत की सच्ची बेटी बनकर रहीं। उनके जीवन का एक-एक पल इस देश और देशवासियों के लिए समर्पित था। और कोई आश्चर्य नहीं कि भगिनी निवेदिता एक झटके में पश्चिमी जीवन की समस्त सुख-सुविधाओं को छोड़कर भारत आईं, तो यहाँ की धर्मप्राण निर्धन जनता से जुड़ने में उन्हें जरा भी कठिनाई नहीं हुई। हँसते-हँसते उन्होंने यहाँ की कठिन परिस्थितियों, दुख, अभाव और कई तरह की मुश्किलों को झेला।
भगिनी निवेदिता न सिर्फ कोटि-कोटि देशवासियों के हृदय से जुड़ीं, बल्कि अंग्रेज सरकार द्वारा भारत के स्वाधीनता सेनानियों के दमन और उत्पीड़न से इस कदर व्यथित हुईं, कि उन्होंने आजादी के लिए लड़ने वाले वीर युवकों और देशभक्तों को अपना पूरा भावनात्मक समर्थन भी दिया। खुद अंग्रेज सरकार इस बात से हैरान-परेशान थी कि उनके देश से आई यह बहादुर और हिम्मती स्त्री किस कदर निर्भयता और समर्पित भाव से आंदोलित भारतवासियों के साथ खड़ी है और उसके मन में इस देश के स्वाधीनता सेनानियों के लिए अथाह प्रेम और सहानुभूति है। 
पर निवेदिता के लिए इसमें कुछ भी अटपटा नहीं था। जैसे हर देशवासी इस देश को आजाद देखना चाहता था, वैसे ही भगिनी निवेदिता भी। उनके लिए यह भारत और भारतवासियों के हृदय से जुड़ने की अत्यंत स्वाभाविक परिणति थी और वे इसके लिए कोई भी खतरा उठाने के लिए तैयार थीं। 
सबसे बड़ी बात तो यह कि उनके लिए धर्म और अध्यात्म की गूढ़ चिंताएँ और स्वतंत्रता सेनानियों को नैतिक समर्थन देना, ये दो अलग-अलग चीजें नहीं, वस्तुतः एक ही बात थी और यही सीख उन्हें अपने गुरु से मिली थी। स्वामी विवेकानंद ने बार-बार यह बात दोहराई कि जब देश और जनता संकट में हो तो अपनी एकांत साधना में लीन होना सच्चा धर्म नहीं है। बल्कि वे तो सच्चा संन्यासी भी उसी को मानते हैं जो दूसरों के दुख और कष्ट दूर करने के लिए हर पल व्याकुल रहे और आगे बढ़कर दीन-दुखियों के आँसू पोंछें।
निवेदिता तथाकथित सभ्य यूरोप की रुग्णताओं से अपरिचित न थीं, जिसमें दिखावटी मुसकराहट के मुलम्मे के नीचे बहुत सारा हाहाकार छिपा हुआ है। स्वामी विवेकानंद ने भी इस ओर भगिनी निवेदिता का ध्यान खींचा था। उन्होंने कहा था, पश्चिम में सामाजिक जीवन एक अट्टहास के समान है, पर उसके नीचे है करुण क्रंदन। अंत में रह जाती है केवल एक सिसकी। बाहर तफरीह, तमाशा है। वास्तव में भीतर करुण वेदना भरी है। यहाँ भारत में ऊपर दीखती है उदासी और दुख, पर नीचे छिपी है बेफिक्री और मौजमस्ती। 
विवेकानंद ने मानो चार पंक्तियों में ही पूर्व और पश्चिम के अंतर को निवेदिता की आँखों के आगे साकार कर दिया था।
इस बात को भगिनी निवेदिता ने भी अपने ढंग से महसूस किया था। इसीलिए वे स्वामी जी के अन्य शिष्यों की तरह पश्चिम से पूर्व में आईं नहीं, बल्कि भारत आकर उनका पुनर्जन्म हुआ। भारत आने के बाद न सिर्फ मार्गेट नोबेल का जीवन बदला, बल्कि उनके मन, सोचने-विचारने के ढंग, सामाजिक धारणाओं और कल्पनाओं में भी जैसे आमूलचूल बदलाव आ गया। पुरानी निवेदिता की काया में एक नई निवेदिता समाने आई। थोड़े ही समय में निवेदिता के भीतर आए इस बड़े बदलाव, उनके गहरे समर्पण और पूरी तरह भारतीय समाज से एकमेक हो जाने की खूबी का बयान करते हुए रोमाँ रोलाँ लिखते हैं—
वे अट्ठाईस वर्ष की थीं, जब उन्होंने अपने भाग्य को स्वामी जी के हाथों में सौंप देने का संकल्प किया। जनवरी, 1898 के अंत में वे हिंदू स्त्रियों की शिक्षा के कार्य के लिए भारत आ गईं। उन्होंने मारग्रेट को हिंदू बनने के लिए बाध्य किया, जिससे कि वे अपने विचारों, कल्पनाओं, संस्कारों में हिंदू बन सकें। यहाँ तक कि अपने अतीत की स्मृति भी भुला सकें। उसने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और वह पहली पाश्चात्य स्त्री थी जिससे भारतीय संन्यासी के रूप में दीक्षा मिली।…
12 नवंबर को दुर्गा पूजा के दिन निवेदिता का कन्या विद्यालय शुरू हुआ। उस दिन स्वामी विवेकानंद अस्वस्थ थे। इसलिए उन्होंने निवेदिता को अपना आशीर्वाद दिया। उन्हें प्रसन्नता थी कि निवेदिता को आखिर काम करने का सही रास्ता मिल गया है। 
स्वामी जी चाहते थे कि भगिनी निवेदिता अपना पश्चिमी रंग-ढंग और सोच-विचार छोड़कर पूरी तरह भारतीय स्त्री के रूप में स्वयं को ढाल लें, और इसके लिए बहुत सतर्क ढंग से वे कोशिश कर रहे थे। उन्होंने बेलूर मठ में उन्हें सबके लिए भोजन बनाने का जिम्मा दिया। उनके हाथ का बना खाना सब खाएँ, इस बात को लेकर वे सतर्क थे। वे चाहते थे कि निवेदिता पूरी तरह भारतीयता में खुद को ढाल लें और कोई उसे अपने से अलग न समझे। 
साथ ही निवेदिता की भी वे बहुत कड़ी परीक्षा ले रहे थे, ताकि पिछले संस्कार भूलकर वे पूरी तरह हिंदू धर्म के आचार-विचार ग्रहण कर लें। कई बार उन्हें उन पर बहुत क्रोध आता और वे तनिक रोष से उन्हें समझाते कि तर्क और अहंकार नहीं, उन्हें सरल प्रेम और आस्था का पथ ग्रहण करना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद के जाने के बाद भी अपने गुरु के प्रति निवेदिता की भकित और समर्पण में तनिक भी कमी नहीं आई। स्वामी जी के छोटे भाई भूपेन की क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जब अंग्रेजी पुलिस उनके पीछे पड़ी हुई थी तो निवेदिता ने उनकी हर संभव सहायता की। उन्हें न सिर्फ उन्होंने अज्ञातवास में मदद की बल्कि पुलिस की सतर्क निगाहों से बचकर चुपके से विदेश चले जाने में भी मदद की।
यही नहीं, भगिनी निवेदिता निर्भीकता से अंग्रेजी साम्राज्य के अत्याचारों के प्रति रोष प्रकट करते हुए, अपने ढंग से क्रांतिकारियों की मदद करती रहीं। इस तरह वे कर्मयोगी होने के साथ-साथ जाने-अनजाने भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी शामिल हो गईं। इस पर रामकृष्ण मिशन के अधिकारियों ने उन्हें मिशन छोड़ने के लिए कहा, तो भगिनी निवेदिता इस बात के लिए तैयार हो गईं। पर इस देश की जनता और दैन्य-दारिद्र्य की मार झेल रहे असंख्य लोगों के लिए जो-जो उन्हें उचित जान पड़ा, उससे पीछे कदम उठाना उन्होंने उचित नहीं समझा।
श्रेष्ठ गुरु की इस श्रेष्ठ शिष्या की दार्जिलिंग में मृत्यु हुई। वहीं उनकी समाधि भी है। जीवन भर दीन-दुखियों की सेवा करते हुए, अंत में इसी भारत की मिट्टी में वे चुपचाप विलीन हो गईं।
स्वामी विवेकानंद के अंग्रेज मूल के शिष्यों में सेवियर दंपति भी इसी तरह भारत और यहाँ की संस्कति से अथाह प्रेम करने वाले समर्पित साधक थे, जिनका उत्तर जीवन भारत में ही बीता। एक बार स्वामी जी विदेशी शिष्यों के सामने अपने एक सुंदर सपने का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने कहा—
मेरा मन है कि हिमालय की उपत्यकाओं में एक ऐसा आश्रम हो, जहाँ भारतीयों के साथ-साथ विदेशी लोग भी रहें और वहाँ रहकर निरंतर साधना करते हुए भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को गहराई से जानें। पर इसके लिए धन कहाँ से आएगा, यह एक बड़ी समस्या है। 
कैप्टन सेवियर ने यह सुना तो कहा, आप चिंता न करें, धन की व्यवस्था हो जाएगी।
सेवियर दंपति ने तत्काल ब्रिटेन में अपनी संपत्ति बेचकर सारा धन विवेकानंद को सौंपा, जिससे हिमालय की उपत्यकाओं में प्रकृति की सुंदर दृश्यावलियों के बीच मायावती अद्वैत आश्रम की स्थापना हुई। सेवियर दंपति ने यहीं रहकर अध्यात्म साधना करते और सबको प्रेम बाँटते हुए, अपना जीवन बिताया, और यहीं आखिरी साँस ली। भारत उनका घर ही नहीं था, भारत उनका मुक्तिद्वार भी बन गया। 
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भारत आकर भारत को ही अपना घर मानने वाली अंग्रेज मूल की महिलाओं में एक महत्त्वपूर्ण नाम नेल्ली सेनगुप्ता का भी है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारत की आजादी और उसकी दुखी पीडि़त जनता की सेवा में लगा दिया। नेल्ली सेनगुप्ता अत्यंत मेधावी, सुरुचि-संपन्न तथा दृढ़ विचारों की महिला थीं। इसलिए खराब से खराब स्थितियों में भी तमाम मुश्किलों के बावजूद वे झुकी नहीं और आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेती रहीं।
12 जनवरी 1876 को कैंब्रिज में जनमी नेल्ली के व्यक्तित्व में एक ऐसी विनम्र दृढ़ता है, जिसका विरोधी भी सम्मान करते हैं। वे बचपन से ही बड़े उदार विचारों की थीं और वे सिर्फ जन्म या नस्ल के आधार पर किसी को छोटा मानने के खिलाफ थीं। आगे चलकर जब उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम की मूल प्रेरणा को समझा और दुखी भारतवासियों के दिलों का दर्द पास जाकर महसूस किया तो उनके ये विचार और दृढ़ हो गए तथा वे अपने पति जतिनमोहन सेनगुप्ता के साथ अन्यायी अंग्रेज सत्ता से लड़ने के लिए आगे आईं। 
शुरू में जब जतिनमोहन सेनगुप्ता से जब उनका विवाह हुआ, तो जतिन के परिवारजनों और बंगाल के लोगों ने इसे ज्यादा पसंद नहीं किया था। सोचा गया कि नेल्ली के लिए बंगाल की जीवन-शैली और परंपराओं में ढल पाना असंभव होगा। पर नेल्ली ने किसी भारतीय वधू की तरह इस तरह खुद को भारतीय रंग-ढंग में ढाला कि देखने वाले सचमुच चकित और चमत्कृत रह गए। फिर उनकी विनम्रता और सुरुचि का इतना प्रभाव पड़ता कि जो भी उनसे एक बार मिल लेता, वही उनका प्रशंसक बन जाता। धीरे-धीरे जिन लोगों ने इस विवाह को लेकर संदेह और पूर्वाग्रह पाल लिए थे, वे ही जतिनमोहन से कहने लगे, आपने सचमुच अपने लिए एक आदर्श पत्नी चुनी है!” 
और सच तो यह है कि जतिन सेनगुप्त जिन्हें भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास में देशभक्त सेनगुप्त कहकर भी याद किया जाता हैकी अपार लोकप्रियता के पीछे नेल्ली के इस उदारतापूर्ण व्यवहार का भी हाथ था, जिसके सभी कायल थे।
नेल्ली सरल और विनम्र होने के साथ-साथ अत्यंत निर्भय महिला भी थीं। पति जतिनमोहन को स्वाधीनता संग्राम में भाग लेते देख, वे पूरी तरह उनका साथ देने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर आगे आ गईं। सन् 1921 में उन्हें जेल जाना पड़ा। पर जेल के कष्टों ने उनके भीतर की प्रबल राष्ट्रीय भावनाओं को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया। वे और अधिक सक्रियता से स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़ीं। सन् 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उनके एक भाषण को आपत्तिजनक करार देकर अंग्रेज सत्ता ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पर नेल्ली जरा भी विचलित हुईं। उलटे उन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चेतावनी दी कि अन्याय और दमन से सच्चाई की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
नेल्ली सेनगुप्ता चार महीने जेल में रहीं, पर अंग्रेज सरकार उनके लौह इरादों को नहीं बदल सकी। जनता उन्हें जी-जान से चाहती थी और पति के साथ-साथ खुद उनकी लोकप्रियता दिनोदिन बढ़ती जा रही थी। सन् 1933 में नेल्ली के व्यापक योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया तो सभी ने इसकी खुले दिल से प्रशंसा की।
सचमुच नेल्ली इस बात की नजीर थीं कि कोई विदेशी महिला जब भारत आकर यहाँ के लोगों और जनता से प्रेम करने लगती है, तो उसका आदर्श व्यक्तित्त्व, जीवन और लड़ाइयाँ किस रूप में सामने आती हैं। स्वयं अंग्रेज होते हुए भी अंग्रेजी सत्ता का तीखा विरोध और प्रतिकार करते हुए उन्हें जरा भी झिझक न हुई। सारी दुनिया में उनके संघर्ष की गूँजें-अनगूँजें पहुँची और इससे भारत के स्वाधीनता संग्राम को एक नैतिक बल और देश-विदेश में प्रचार मिला।
देश-विभाजन के बाद नेल्ली अपने पति की जन्मभूमि चटगाँव चली गईं और जनता की सेवा में लग गईं। अपने अंतिम दिनों में वे बीमार पड़ गईं, तो उन्हें चिकित्सा के लिए भारत लाया गया। 23 अक्तूबर 1963 को इस विनम्र, लेकिन समर्पणशील वीर महिला का देहांत हुआ। पर भारत की मिट्टी से बेइंतिहा प्यार करने वाली इस बहादुर आंग्ल महिला ने यह दिखा दिया कि एक स्त्री भी चाहे तो अपने लौह इरादों से बड़े काम कर सकती हैं। सच ही भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में जतिनमोहन सेनगुप्ता के साथ-साथ नेल्ली सेनगुप्ता के नाम को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता।
ऐसी ही एक और दृढ़ महिला थीं, मीरा बहन। गांधी जी से सादगी का पाठ सीखकर भारत और भारतवासियों की सेवा में जीवन समर्पित करने वाली मेंडेलीन, जो बाद में मीरा बहन बन गईं—ने भी भारत के स्वाधीनता आंदोलन में पूरे समर्पण और प्राणपण से हिस्सा लिया। हालाँकि उन्होंने अपने लिए एक बिल्कुल अलग भूमिका चुनी। उन्होंने महात्मा गांधी जी की सेवा और प्रतिदिन के कामों में सहायता का निश्चय लिया, ताकि वे अधिक निश्चिंत भाव से अपना काम कर सकें। निष्कंप भाव से इस भारत के महानायक की सेवा करके उन्होंने परोक्ष रूप से देश और मानवता की ही सेवा की, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
22 नवंबर 1892 को एक सुसंस्कृत आंग्ल परिवार में जनमीं मीरा बहन का वास्तविक नाम था, मेंडेलीन स्लेड। उन्होंने महात्मा गांधी को देखा तो उन्हें तत्क्षण लगा कि उनका ध्येय सत्य और अहिंसा के इस पुजारी की सेवा करना है, ताकि उनके कामों का प्रकाश लोगों तक अधिक से अधिक पहुँच सके। शुरू में लोगों को विश्वास नहीं था कि वे भारतीय रंग-ढंग में ढल सकेंगी। पर मीरा बहन का समर्पण सच्चा था और उनके भीतर एक बच्चे जैसी निर्मल और निर्भीक आत्मा थी। लिहाजा जब उन्होंने महात्मा गांधी की सेवा का व्रत लिया, उसी समय से वे खुद-ब-खुद भारतीय पद्धति में ढलती चली गईं। वे अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करती थीं। खादी पहनती थीं तथा सूत कातने में भी खासी निपुण हो गईं थीं।
बचपन से ही मीरा बहन के हृदय में प्रकृति तथा मनुष्य-मात्र के लिए प्रेम था। वे अत्यंत कल्पनाशील और भावप्रवण थीं तथा संगीत में उनकी खासी रुचि थी। रोम्या रोलाँ की पुस्तक ज्याँ क्रिस्तोफर पढ़कर वे इतनी प्रभावित हुईं कि खुद उनसे मिलने जा पहुचीं। रोम्याँ रोलाँ ने उनसे बातें करके उनके सच्चे प्रेमल हृदय को जान लिया। उन्होंने उनसे महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की चर्चा की और कहा कि उनसे मिलकर उन्हें काफी अच्छा लगेगा। मीरा बहन ने रोम्याँ रोलाँ द्वारा लिखी गई महात्मा गांधी की पुस्तक पढ़ी और गांधी जी से मिलने के लिए खासी उत्सुक हो उठीं। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और आदर्शों को जानने के बाद उन्होंने सादगी का व्रत लिया। वे पूरी तरह शाकाहारी बन गईं। सादा कपड़े पहनने तथा फर्श पर सोने लगीं। 
21 अक्तूबर 1925 को एक जहाज पर सवार होकर वे मुंबई आ पहुचीं। गांधी जी ने सरदार पटेल समेत कई लोगों को उनके स्वागत के लिए तथा उन्हें लेने भेजा।
जब वे महात्मा गांधी से मिलने जा रहीं थीं तो उनकी छवि और विचारों की कल्पना में वे इस कदर खो-सी गईं कि उन्हे अपनी देह तक का बोध न रहा। गांधी जी ने साबरमती आश्रम में एक कमरा उनके लिए तैयार करा रखा था। वहाँ मीरा बहन आश्रम के कठोर नियमों का पालन करती हुई औरों की तरह फर्श पर सोने लगीं। जल्दी ही उन्होंने धुनाई और कताई सीख ली और बहुत अच्छी हिंदी बोलने तथा पढ़ने-लिखने लगीं।
इसके बाद मीरा बहन ने समर्पित होकर गांधी जी के हर काम में हाथ बँटाना शुरू कर दिया। वे उनकी बेटी बनकर रहने लगीं और गांधी जी की छोटी-बड़ी हर असुविधा का ख्याल रखती। सन् 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में वे महात्मा गांधी के साथ लंदन गईं। 1937 में उड़ीसा में गांधी जी की हरिजन-यात्रा में भी वे उनके साथ थीं।
1942 में भारत छोड़ोआंदोलन में महात्मा गांधी जी की गिरफ्तारी के समय भी मीरा बहन उनके साथ थीं। आगा खाँ महल में नजरबंदी के समय उन्होंने एक कमरे में बाल कृष्ण का मंदिर बना लिया था। उसे वे सुंदर फूलों से सजाती थीं। महात्मा गांधी को भी उसे देखकर अच्छा लगता था। नजरबंदी से रिहा होने के बाद मीरा बहन ने रुड़की और हरिद्वार के बीच एक स्थान पर किसान आश्रम की स्थापना की।
पर आजादी के बाद मीरा बहन को लगा कि गांधी जी के आदर्श कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं। जो लोग गांधी जी का नाम लेकर सरकार चला रहे हैं, उनकी सच्ची आस्था गांधी जी में नहीं है। वे इस बात से बहुत दुखी और निराश थीं। आखिर सन् 1958 में भारत की तत्कालीन हालत से दुखी होकर मीरा बहन देश छोड़कर चली गईं और आस्ट्रिया के एक गाँव में जाकर बस गईं। पर वहाँ भी वे एकदम भारतीय वेशभूषा में रहती थीं। उन्होंने संन्यासियों जैसे गेरुए वस्त्र पहनने शुरू कर दिए थे तथा भारतीय ढंग का भोजन करने लगीं थीं। वहाँ सभी उन्हें भारतीय महिला के रूप में ही जानते थे और इसी नाम से पुकारते थे।
मीरा बहन ने युगनायक महात्मा गांधी के निकट रहकर तथा पल-प्रतिपल उनकी सेवा करते हुए, अपने सामने इतिहास को बनते और नई-नई शक्लें लेते देखा। उन्होंने अनेक अवसरों पर महात्मा गांधी और अंग्रेजी सरकार के बीच मध्यस्थता का काम भी किया और कई ऐतिहासिक क्षणों की वे साक्षी बनीं, पर इसे लेकर उनके मन में कहीं कोई घमंड न था। वे अत्यंत सरल और भावनाशील महिला थीं, जिनके लिए अपना काम पूरे समर्पण के साथ करना ही जीवन का सबसे बड़ा सुख था। इस लिहाज से मीरा बहन ने एक सार्थक और सक्रिय जीवन जिया जिसे भुलाया नहीं जा सकता है।
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इन संवेदनशील और उदारहृदय महिलाओं में एक नाम वैल्दी फिशर का भी है, जिन्होंने भारत को अपना देश समझा और अपना पूरा जीवन भारत की दीन-दरिद्र जनता की सेवा में लगा दिया। वे आराम और सुख-सुविधाओं की जिदगी छोड़कर गरीब जनता की सेवा और उसे ज्ञान का प्रकाश देने में इस कदर जुट गईं कि साधारण और गरीब लोग उन्हें ज्ञान की देवीमानने लगे। अपने अकेले दम से उन्होंने भारत में एक शिक्षा आंदोलन चलाकर दिखा दिया।
18 सितबर 1868 को न्यूयार्क में जनमीं वैल्दी फिशर यों तो बचपन से ही सरल, उदार और करुणामयी थीं और किसी का दुख, संताप उन्हें बहुत जल्दी छू जाता था। पर सन् 1946 में पति के निधन के बाद जब वे विश्व-यात्रा पर निकलीं तो उनका हृदय पूरी तरह करुणा से आप्लावित था। उन्हें ईश्वर और मनुष्य ही नहीं, पेड़-पौधों और घाटियों सभी से प्रेम था। सभी में उन्हें ईश्वर की ही झलक दिखाई देती थी। 
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी के कामों से वैल्दी फिशर को बड़ी प्रेरणा मिली, जो अपनी पूरी शक्ति से इस पराधीन देश की आत्मा में लौ और उजाला पैदा कर रहे थे। उन्होंने बड़ी गहराई से गुरुदेव टैगौर तथा महात्मा गांधी के कामों का अध्ययन किया और खुद भी कुछ ठोस काम करने के लिए उत्सुक हो उठीं। भारत देश और यहाँ की जनता के लिए उनके मन में सच्ची करुणा पैदा हो चुकी थी। उन्हें लगा यहाँ के लोग भोले और सरल है और अशिक्षा तथा साधनहीनता के कारण संताप झेल रहे हैं। अगर इन्हें सही राह मिले, तो ये देश का इतिहास बदल सकते हैं। 
सन् 1946 में वैल्दी फिशर महात्मा गांधी से मिलीं और उन्हें अपने निश्चय के बारे में बताया। सुनकर महात्मा गांधी ने कहा, “अगर तुम्हें भारत की जनता की सेवा करनी है तो गाँवों में जाओ। भारत गाँवों में निवास करता है।” 
वैल्दी फिशर जब गाँव-गाँव जाकर मिलीं, तो वे इस देश की इस करुण सच्चाई को और भी करीब से जान पाईं कि भूख, गरीबी, अशिक्षा और दैन्य ने किस तरह भारत को ग्रस रखा है। आखिर लखनऊ में उन्होंने निरक्षरता को दूर करने के लिए लिटरेसी हाउस की नींव डाली। शुरू में गांधी जी की सर्व-धर्म की पाँच प्रार्थनाओं से प्रारंभ किया गया और फिर लोगों को शिक्षित करने की आसान और सरल राहें खोज निकाली गईं। वे चाहतीं थीं कि लोगों को सिखाने का तरीका सरल तो हो ही, वह आनंदपूर्ण भी हो। सभी आनंद से सीखें और सिखाएँ तथा शिक्षा के साथ-साथ नृत्य नाटक और दूसरी कलाओं का भी विकास हो। वे स्वयं इन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती और दूसरों को भी खूब प्रोत्साहित करती थीं, ताकि उनका संकोच खत्म हो, और ज्ञान की एक उज्जवल धारा बहे। सबके दिलों में एक नया उजाला पैदा हो।
वैल्दी फिशर गांधी जी की सच्ची शिष्या थीं। उनके हृदय में भारत और यहाँ की जनता के लिए सच्चा प्रेम था। इसीलिए जो संकल्प उन्होंने किया था, उसे आखिरी साँस तक प्राण-पण से निभाया। वे बार-बार कहा करती थीं, “अँधेरे को कोसते रहने की बजाए एक मोमबत्ती जलाना कहीं अच्छा है।” 
और सचमुच अपने लिटरेसी मिशन के जरिए वे सदियों से अंधकार में पड़े भारत की आत्मा में उजाले की कुछ किरणें भरने में कामयाब हुईं। वैल्दी फिशर का यह मिशन एक गहरे सकल्प और समर्पण की ही मिसाल है।
यों तो उदारहृदय विदेशियों की यह शृंखला बहुत बड़ी है, जिन्होंने भारत की मिट्टी में अपने सपने बोए और लोगों की खुशहाली के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। पर इनमें ब्रिटेन के आयरलैंडवासी कजिंस दंपति को तो भुलाया ही नहीं जा सकता। जिस समय एनी बेसेंट भारत आईं तो उनके साथ सहायक के रूप में मार्गरेट कजिंस और उके पति जेम्स कजिंस भी थे। एनी बेसेंट के साथ कजिंस दंपति ने भी भारत को ही अपना देश मान लिया और उनका पूरा जीवन भारतीय जनता की सेवा में ही बीता। जेम्स कजिंस ने तो अपना नाम भी बदलकर जयराम कजिंस रख लिया था।
मार्गरेट कजिंस ने पूरे भारत की परिक्रमा करने और यहाँ की सीधी-सादी जनता से मिलकर यहाँ के रीति-रिवाज और भारतीय संस्कृति को जाना। साथ ही उन्होंने महसूस किया कि अंग्रेजी शासन द्वारा दी गई शिक्षा-दीक्षा ठीक नहीं है। भारत के लोगों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप शिक्षा दी जानी चाहिए। इसी तरह लड़कों के साथ-साथ लड़कियों को पढ़ाने के लिए एक मुहिम छेड़ने की जरूरत है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि भारत में ही शिक्षा की नींव रखने के लिए पहले तो अंग्रेजों द्वारा दी जा रही गलत शिक्षा को भुलाए जाने की जरूरत है। उसके बाद ही भारतीय संस्कृति के अनुरूप सही शिक्षा दी जा सकेगी। आखिर चित्तूर में एक नगर मदनपल्ली में उन्होंने आदर्श विद्यालय की स्थापना की, जिसे एक और शांतिनिकेतन कहकर लोग आदर से याद करते थे। 
मार्गरेट कजिंस और उनके पति जयराम कजिंस ने भारतीय जनता की सेवा का एक सही माध्यम चुना और फिर जीवन इसी में निछावर कर दिया। सबको प्रेम बाँटने वाली देवी के रूप में मार्गरेट कजिंस और एक आदर्श शिक्षाशास्त्री के रूप में जयराम कजिंस को भला कौन भूल सकता है, जो ब्रिटेन से आकर भारत के ही हो गए और जिनका एक ही सपना था कि भारत की जनता अपनी संस्कृति को और भी गहराई से जाने और उससे प्रेम करना सीखे, क्योंकि उसमें विश्व को प्रकाशित करने वाली निर्धूम लौ और उजाला है।
भारत की संस्कृति और यहाँ की जनता से बेशुमार प्रेम करने वाले अंग्रेज मूल के लोगों की परंपरा यहीं खत्म नहीं हुई। बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे लोगों की ऐसी समर्पित पीढ़ी नजर आती है, जिसे भौतिकवाद के अँधेरे बियावान में भटकाव के बाद, भारत में रोशनी की किरण और भविष्य का उजाला नजर आता है। यहाँ तक कि विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले अंग्रेजों को भी भारत एक दुर्दमनीय आकर्षण के साथ खींचता दिखाई देता है। 5 नवंबर, 1918 को आक्सफोर्ड में पैदा हुए जे.बी.एस. हाल्डेन ऐसे ही वैज्ञानिक थे, जिन्हें इस प्राचीन देश की धरती का आकर्षण यहाँ खींच लाया। भारत में आकर न वे सिर्फ पूरी तरह भारतीय सभ्यता में रच-बस गए, बल्कि साथ ही भारत की वैज्ञानिक प्रगति और अनुसंधान में उन्होंने खासा योगदान दिया।
प्रोफेसर हाल्डेन का पूरा नाम थाजोन बर्डन शेंडरसन हाल्डेन। उनके पिता जोन स्पोट हाल्डेन प्रसिद्ध शरीर-क्रिया विज्ञानी थे। छोटी उम्र से ही हाल्डेन की विज्ञान में इतनी गहरी रुचि हो गई कि वे पिता के अनेक प्रयोगों में हाथ बँटाने लगे। पिता उनकी प्रतिभा के साथ-साथ खतरों से खेलने के उनके साहस को देखकर भी चकित थे। हाल्डेन की अधिक रुचि जीव-जंतुओं और किस्म-किस्म के पौधों में थी। उन्होंने विधिवत विज्ञान की शिक्षा नहीं ली थी। पर अपनी गहन अंत:दृष्टि के कारण अकसर वे चीजों की तह तक पहुँच जाते और अपने एकदम मौलिक के किस्म के निष्कर्षों से सभी को चकित कर देते थे। जैनेटिक्स में उनकी खोजों की इस मौलिकता की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान गया। 1932 में वे रायल सोसाइटी के फैलो बने। हाल्डेन की पत्नी डॉक्टर हैलेन स्पर्वे भी प्रसिद्ध वैज्ञानिक थीं।
हाल्डेन अकसर भारत आया करते थे। यह प्राचीन देश अपनी विविधता, जीव-जतुओं और वनस्पति संपदा के कारण लगातार उन्हें आकर्षित करता था। भारतीयता और भारत के अंहिसा दर्शन से भी हाल्डेन प्रभावित थे। लिहाजा वे इंग्लैंड छोड़कर पत्नी डॉ. हैलेन स्पर्वे के साथ भारत आ गए और यहीं की नागरिकता ग्रहण कर ली। वे इस कदर भारतीय हो गए कि उन्होंने यही की वेशभूषा अपना ली। धोती-कुरता पहनना उन्हें अच्छा लगता था और हाल्डेन अपनी इस भारतीय पोशाक में फबते भी खूब थे।
हाल्डेन ने कलकत्ता के सांख्यिकी संस्थान में खासा काम किया। बाद में उड़ीसा सरकार के आग्रह पर वे भुवनेश्वर आ गए। उन्हें जैनेटिक्स एंड बायोमीटरी प्रयोगशाला का निदेशक बनाया गया। जीवनभर वे यहीं अनुसंधान में जुटे रहे। अंत में 1 दिसंबर 1964 को कैंसर से उनकी मृत्यु हुई। इससे पहले उन्होंने कैंसर पर एक अद्भुत कविता कैंसर इस ए फनीथिगलिखी थी। उन्हें पता था कि कैंसर के कारण उन्हें जल्दी ही चले जाना है, पर इससे भयभीत होने के बजाय वे और अधिक धुन के साथ अपने काम में जुट गए। 
हाल्डेन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी डॉ. हैलेन स्पर्वे हैदराबाद चली गईं, जहाँ 1978 में उनकी मृत्यु हुई। उड़ीसा यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चर एंड टैक्नालाजी में बनाया गया हाल्डेन हॉल आज भी हमें इस दिलखुश धुनी वैज्ञानिक की याद दिलाता है, जो भारत में जनमा भले ना हो, पर जिसका पोर-पोर भारतीय संस्कृति में रचा-बसा था।
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इन सच्चे और उदार लोगों की जीवनगाथाएँ आज हमें किसी भावुक कहानी सरीखी लगती हैं और समझना मुश्किल हो जाता है कि जब अंग्रेजी सत्ता भारत में अपना क्रूर और अन्यायी दमन-चक्र चला रही थी, भारतीय जनता को भीषण उत्पीड़न से गुजरना पड़ रहा था, भारतीयों को असभ्य कहकर हिकारत से देखने वाले अंग्रेजों की कोई कमी न थी, तो ऐसे उदारहृदय और संवेदनशील अंग्रेज कहाँ से आ गए, जिन्हें भारत और यहाँ की संस्कृति उम्मीदों की एक रोशन मीनार सरीखी लगती थी और दुखी दुर्बल भारतीय जनता की सेवा में असीमित आनंद मिलता था। संभवतः वे अंग्रेजी सत्ता के दमन-चक्र के पाप का एक नैतिक प्रक्षालन कर रहे हों। 
यह भी भारत और भारतीय संस्कृति के एक विराट आत्मबल की विजय थी, जिसे विवेकानंद ने समझा था और गांधी जी ने जिसे अपनी राजनीतिक लड़ाई के अमोघ अस्त्र में बदल दिया। 
एक आश्चर्य की बात यह है कि गांधी जी की और खुद जनता के हृदय में छिपी इस आत्मशक्ति को गाँव-देहात के अनपढ़ स्त्री-पुरुषों और गान्ही बाबा की जय कहने वाले इस देश के दीन और निर्बल लोगों ने सबसे पहले समझा था, पढ़े-लिखे किताबी लोगों ने बहुत देर में, जिन्हें गांधी जी के तौर-तरीके ही नहीं, उनकी नैतिक भाषा को समझने में दिक्कत आती थी, जिसमें वे सत्य के प्रयोगों वाली शब्दावली में, या फिर सविनय अवज्ञा सरीखे पदों से राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने की बात करते थे, और अंततः कामयाब भी हो जाते थे।…पर हाँ, मीलों दूर बैठे बहुतेरे विदेशियों को गांधी जी की पुकार को सुनने में कोई मुश्किल नहीं आई और वे इस देश में जन-जन की सेवा के लिए दौड़े चले आए। 
ठीक वैसे ही, जैसे गांधी जी से पहले विवेकानंद ने दुनिया को भारतीय संस्कृति की महानता का अहसास कराया था, और भगिनी निवेदिता और सेवियर दंपति समेत बहुत से अंग्रेजी मूल के लोग न सिर्फ भारत आए, बल्कि भारत को ही उन्होंने अपना घर मान लिया और पूरा जीवन भारतीय जनता की सेवा में ही गुजार दिया। 
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327,
ईमेल – [email protected]
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5 टिप्पणी

  1. प्रकाश मनु जी का यह है आलेख एक काव्यात्मक निबंध सा लगता है जिसमें यह सही शब्दों में जिसकी आत्मा गांधी गांधीवाद अहिंसा और उसकी शक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है।
    वर्ग विशेष पंथ विशेष या किसी समय के युवाओं में यह आक्रोश था कि नरम दल और गरम दल किसके अधिक प्रयासों से आजादी मिली?! जिसमें बहुधा गरम दल के नेताओं को नरम दल के नेताओं के तुलनात्मक रूप से ज्यादा आंका जाता था। यह शायद इसलिए भी था कि लोग शौर्य और बहादुरी के भक्त होते हैं। परंतु व्यवहारिकता में हर व्यक्ति उतना वीर या साहसी नहीं हो सकता है। आम जन या जन बहुल लिए अहिंसा ,प्रतिकार ,सत्याग्रह ही एक ऐसा रास्ता था। जिस पर चलकर आजादी की मुहिम को न केवल जारी रखा जा सकता था वरन उसमें सफलता भी प्राप्त की जा सकती थी। और ऐसा ही हुआ हमारे प्यारे बापू राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अटूट विश्वास पर।
    प्रकाश मनु जी ने अनेकोनेक विभूतियों का भी सारगर्भित और सटीक वर्णन अपने इस विस्तृत परन्तु रोचक लेख में किया है। यह आज के युवा भारत के लिए सूचनार्थ तो है ही वरन आज की पीढ़ी को स्पंदित भी करेगा।आलेख में ऐसे दिव्य नाम यथा एनी बेसेंट, दीनबंधु एंड्र्यूज, भगिनी निवेदिता, सेवियर दंपति, नेल्ली सेनगुप्ता, मीरा बेन, कजिंस बहनें
    प्रोफेसर हाल्डेन पूरा नाम जोन बर्डन शेंडरसन हाल्डेन का वर्णन मुझे विज्ञान प्रसार ,DST,जो अब बंद हो गया है इसी विभाग ने इस विभूति द्वारा पॉपुलर साइंस पर लिखे गए लेखों को एक पुस्तक रूप में संकलित किया था जिसके अंग्रेजी भाषा में शीर्षक था Science in Every Day Life उसी का हिंदी अनुवाद करने का सौभाग्य मुझे मिला था।खैर यह तो सुखद स्मृति रही।
    प्रकाश मनु साहब ने एंड्रयू साहब का भी सरस वर्णन किया है और इसी माह बारह फरवरी को उनका जन्म दिन भी है।ऐसे महान साधक को प्रणाम।
    मीरा बहन , वैल्दी फिशर और भी अनेकों नाम अपने योगदान सहित इस लेख में शामिल हैं।
    पुरवाई पत्रिका परिवार को हृदय से बधाई कि अपने आदरणीय प्रकाश मनु सरीखे विद्वान को पुरवाई पत्रिका में लिखने को आमंत्रित किया है।

  2. आ. प्रकाश मनु जी के लेख को जो एक बार पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही चली गई। बहुत सारी जानकारियां सबको पहले से ही हैं किंतु इस लेख की तारतम्यता, सभी बातों व नामों का एक चैतन्य शोधार्थी की भाँति सुंदर प्रभावित करने वाली शैली ने जैसे आँखों को शब्दों के भीतर उतरने के लिए बाध्य कर दिया। कितनी सारी बातें, घटनाएं, नाम जाने-पहचाने थे किंतु इसको पढ़ना एक सुखद अनुभूति दे गया। आदरणीय प्रकाश मनु जी को सादर साधुवाद व प्रणाम।

  3. भारत के स्वतंत्रता संग्राम की लडाई महात्मा गांधी को याद किये बिना पूरी नहीं हो सकती। जहां सामना एक पूर्णत: शक्ति संपन्न साम्राज्य से हो वहां अस्त्र शस्त्र के बिना केवल असहयोग, अहिंसा और मानवीयता के बल पर देश को.आजादी का प्रशस्त मार्ग दिखा देना एक अविश्वसनीय, चुनौतीपूर्ण कार्य था,और गांधी जी ने वह कर दिखाया।आपके महत्वपूर्ण और विशिष्ट आलेख ने स्वतंत्रता के मूलमंत्र को एक बार फिर दोहराया है। पूरा आलेख तत्कालीन परिस्थितियों पर एक विहंगम दृष्टि डालता.है।गांधी जी की.सम्यक दृष्टि, आचरण और सम्यक विचारधारा ने देश वासियों को मंत्रमुग्ध कर लिया था।लोग उनके पीछे चल पडे इस तरह मानो भावनाओ के बंधे हों मन से.मन और आत्मा की गहराई से।आपने लिखा है-“इस विलक्षण स्वाधीनता संग्राम के पीछे शक्ति-स्रोत के रूप में, भारतीय जनता की जिस असाधारण दृढ़ता और आत्मशक्ति का पता चलता है, उससे समझ में आता है कि आज भी कोरी किताबों से इस महान ऐतिहासिक प्रयोग की उपादेयता भी सिद्ध होती है।
    जब दिनकर अपनी लेखनी में उन्हे संजोते हैं*चल पडे जिधर दो डग मग में
    चल पडे कोटि पग उसी ओर,
    पड गई जिधर भी एक दृष्टि
    गड गये कोटि दृग उसी ओर।
    यह गांघी जी की सोच,विनयशील और संवेदनात्मक आचरण का ही परिणाम था।आपकी सशक्त लेखनी ने आजादी के उस.सत्य का भी उद्घाटन किया है जब क्षुद्र राजनीतिक चालों में उलझकर हमारी आजादी का स्वप्न धूमिल होने लगा था ,तब गांधी के.स्वराज्य की कल्पना और खादी तथा चरखे को.लेकर इस महासंग्राम में कूद पडना किसी चमत्कार से कम नहीं था। आपने लिखा है–यह करिश्मा अहिंसा का तो था ही, पर साथ ही इस देश की विराट जनता के आत्मबल का भी था, जिसे गांधी जी ने पहली बार जगाया।
    रवींद्र नाथ जैसे लेखकों चिंतको को यह एक अजूबा लगा पर यह.जादू सबके सिर चढ़कर बोला।देश ने आजादी पायी।और यही कारण है कि गांधी जी की देशभक्ति, निष्ठा आज भी ,हर.युग हर.काल में प्रासंगिक रही है।आदरणीय, आपने एक देशभक्त कर्तव्यनिष्ठ, विदेशी महिला आदरणीय एनी बेसमेंट बेसेंट को याद किया है जो थियोसोफिकल सोसायटी का प्रचार करने भारत आयीं और भारत में आकर यहां की आत्मा में रच बस गई और भारतीय मौलिक सांस्कृतिक मूल्यों को न केवल अपनाया बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी आवाज भी उठाई। वह रुढियों और कट्टर परंपरा ओं में बंधना पसंद नहीं करती थीं इसलिए कट्टर धर्मान्धता के विरोध में नास्तिक भी हो गई। भारत के नैतिक, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को अपनाकर यहीं की होकर रह गई। जनता उन्हें वसंती नाम से जानने पहचानने लगी थी।यह भारत देश की नैतिक मान्यतायें ही फीट जो.विदेशी भी यहां के आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाये। सी एफ एंड्रज का उल्लेख करते.हुए डा प्रकाश मनु ने उन्हें सशक्त मानवता वादी और गांधी जी की विचारधारा का प्रबल पक्षधर बताया है।भारत की भाषा,यहां के लोग ,संस्कृति से प्यार करने वाले एंड्रज भारतीय जनमानस में उनके साथ इस तरह घुल मिल गए कि उनका व्यक्तित्व भी उसी रुप में ढलता गया।वे विदेशी रहकर भी सच्ची देशभक्ति की अद्भुत मिसाल बन गए थे। उस समय महर्षि विवेकानंद का प्रभाव साहित्य, समाज और जनमानस की प्रेरणा बन गया था।विशेष रुप से नारी उत्थान और धार्मिक मानसिक उत्कर्ष में विवेकानंद ने अहम भूमिका निभाई थी।स्वतंत्रता आंदोलन में विवेकानंद भी एक सशक्त नेतृत्व देने में सफल हुए थे।
    आपका आलेख बहुत ही उत्कृष्ट, सारगर्भित और प्रासंगिक है।विचारों का सुंदर समायोजन पाठक के मन को बांधे रखने में सफल रहा है।भारतीय आत्मा, संस्कृति, तत्कालीन परिस्थितियों का सुंदर विवेचन प्रस्तुत करता है आपका आलेख।आपकी सशक्त लेखनी को नमन करते हुए सप्रणाम सादर बधाई और शुभ कामनाए निवेदित करती हूं।
    आभार इस सुंदर आलेख के लिए।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  4. बिटिया, हैरान हूं। कितनी गहराई से लेख पढ़ा आपने, और उसके मर्म को थाह लिया। भारत का आजादी का महासंग्राम अद्भुत था। सारी दुनिया के लिए एक मिसाल भी। गांधी जी ने चरखा, खादी, स्वदेशी और अहिंसा के मंत्र के साथ उसे जो नैतिक ऊंचाई दी, उसने केवल भारतीयों को ही नहीं, बड़ी संख्या में विदेशियों को भी प्रभावित किया। इनमें बहुत सारे अंग्रेज भी थे, जो गांधी जी के प्रभामंडल से खिंचे चले आए। वे पूरी हिम्मत से अंग्रेजी सरकार के खिलाफ तनकर खड़े हो गए।‌

    इससे पूरी दुनिया का ध्यान भारत के स्वाधीनता संग्राम की ओर गया। विदेश में बैठे लाखों लोगों का समर्थन और सहानुभूति तो मिली ही।

    बिटिया, आपने लेख को समूचा पढ़ा, और उसकी पूरी भावना को समझा। उन सभी महान हस्तियों का जिक्र अपनी इस आत्मीय टिप्पणी में किया है, जिनकी चर्चा इस लेख में हुई थी। देखकर चकित हूं। बहुत कृतज्ञ भी।

    लेख कोई डेढ़-दो महीने में पूरे मन और तन्मयता से लिखा था। पर लगता था, कौन पढ़ेगा, कौन इसकी भावना को समझेगा? पर आपने तो जैसे हरफ-हरफ पढ़ा। बहुत शुक्रगुजार हूं बेटी।

    प्रिय सूर्यकांत शर्मा और प्रणव भारती जी ने भी बहुत मन से पढ़ा, और बड़ी सहृदयता से अपनी विस्तृत टिप्पणियां लिखीं। उनका भी बहुत आभार!

    भाई तेजेंद्र जी ने ‘पुरवाई’ के जरिए इतने सहृदय लेखकों और पाठकों तक पहुंचाया। उनका भी बेहद शुक्रिया!

    अंत में आपकी सुंदर, भावनात्मक टिप्पणी के लिए एक बार फिर से आपका आभार!

    स्नेह,
    प्रकाश मनु

  5. आप की लेखन को नमन आदरणीय प्रकाश मनु जी, आपने एक एक चरित्र को इतने अच्छे से लिखा है कि हम सभी से बहुत अच्छे से जानने लगे हैं। इतना प्रासंगिक और विस्तार से किसी को लिखना और उनके चरित्रों को बखान करना सचमुच अपने आप में महनीयता है। अभी सिर्फ एक ही बार में इस गुढ़ रचना को समझ पाना और याद रखना आसान नहीं, मैं फिर से और बार बार पढूँगी, इतनी सारी जानकारियां साझा करने हेतु आप को नमन।

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