Saturday, May 18, 2024
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संपादकीय – आस्था, अंध-विश्वास और तर्क

सच्चाई तो यह है कि हर मज़हब में अंधविश्वास और चमत्कार मौजूद हैं। मगर समस्या यह है कि हर मज़हब के अनुयायी अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत इमोशनल हो जाते हैं। मज़हब की कमज़ोरियों पर बहस करने की कोई परम्परा नहीं बन पाई है। ऐसे में युवा पीढ़ी को रिचर्ड डॉकिन्स, क्रिस्टोफ़र हिचिन्स, और स्टीवन हॉकिन्स जैसे नास्तिकों पर अधिक विश्वास होने की संभावना है। समय आ गया है कि भारत की शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए। यह भी संभव है कि भारत में ही इस समस्या का हल मिल सके।

‘शनि को मनाएगा सदा सुख पाएगा…!’ यह आवाज़ बचपन में अक्सर शनिवार को अपने दिल्ली की रेलवे कालोनी के घर में सुना करते थे। बाहर साधु बाबा हाथ में कमंडल लिये यह गुहार लगाते और उनके पास से सरसों के तेल की महक दूर-दूर तक महसूस की जा सकती थी। मैं तब भी सोचता था कि शनि देवता के लिये सरसों का तेल ही क्यों?
पिछले दिनों जब बागेश्वर धाम के बाबा धीरेन्द्र शास्त्री को लेकर अचानक विवाद उठ खड़ा हुआ तो एक बार फिर इस विषय पर सोचने को मजबूर हो गया। धीरेन्द्र शास्त्री का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने दावा किया के उनकी रावण से फ़ोन पर बातचीत हुई। रावण उनसे बुंदेली भाषा में बोला, “विभीषण तो पागल था। सोचो अगर हम रामजी के पक्ष में जाते तो हमें राम जी की बग़ल में या पीछे खड़ा होना पड़ता; हम राम जी के विपक्ष में गये तो हमें राम जी के सामने खड़ा होने को मिला। विभीषण को जो रामजी के दर्शन का आनंद नहीं मिला, हमें वो दर्शन का आनंद मिला।”
इस तरह के वीडियो ज़ाहिर है कि सबके मन में सवाल पैदा करते हैं। धीरेन्द्र शास्त्री चमत्कारी बाबा हैं। उनका एक पूरा साम्राज्य है। उनके बहुत से कर्मचारी हैं और उन्हें मिलने के लिये तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है, अपने लिये पर्ची बनवानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उनके दर्शन होते हैं। 
दावा किया जाता है कि धीरेन्द्र शास्त्री बिना किसी भक्त को मिले या जाने उसके बारे में सब कुछ बता सकते हैं। वे किसी भी इन्सान के दिल की बातें जान सकते हैं।  
ऐसे में महाराष्ट्र के श्याम मानव ने बाबा धीरेन्द्र शास्त्री के बयानों को सीधा-सीधा अंधविश्वास कहा और उन्हें चुनौती दे डाली। हम पुरवाई के पाठकों को बताना चाहेंगे कि श्याम मानव महाराष्ट्र के एक चर्चित अंध-विश्वास विरोधी कार्यकर्ता हैं। वे पर्सनेलिटी डेवलपमेंट की क्लास चलाते हैं… सम्मोहन विशेषज्ञ हैं और विचारक के रूप में भी लोकप्रिय हैं। वे आत्म-सम्मोहन के माध्यम से पर्सनेलिटी डेवलपमेंट की कार्यशालाएं करते हैं और बहुत से लोगों को उन्होंने आत्म-सम्मोहन की कला भी सिखाई है।
यहां यह बताना उचित रहेगा कि महाराष्ट्र भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसमें अंधविश्वास और तांत्रिकों के जादू टोना के विरुद्ध एक कानून बनाया गया। जादू टोना विरोधी यह बिल 2004 में महाराष्ट्र विधानसभा में पेश किया गया था, लेकिन इसका काफ़ी विरोध भी हुआ था। विधान परिषद ने इसे मंजूरी नहीं दी थी। इसे 2011 में फिर से पेश किया गया था।
18 दिसंबर 2013 को ये विधेयक पारित हुआ और क़ानून बन गया। इसका नाम महाराष्ट्र मानव बलिदान और अन्य अमानवीय, अघोरी और अत्याचारी प्रथाएं और काला जादू अधिनियम, 2013 है।
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भी बाबा धीरेन्द्र शास्त्री के दावों पर सवाल उठाया है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि वे धीरेन्द्र शास्त्री की राहों में फूल बिछा देंगे यदि अपने चमत्कार से वे जोशी मठ के घरों में आ रही दरारों को पाट दें। 
उन्होंने आगे कहा, सारे देश की जनता चमत्कार चाहती है… कि कोई चमत्कार हो जाए। कहां हो रहा है चमत्कार? जो चमत्कार हो रहे हैं, अगर जनता की भलाई में उनका कोई विनियोग हो तो हम उनकी जय-जयकार करेंगे, नमस्कार करेंगे। नहीं तो ये चमत्कार छलावा है, इससे ज्यादा कुछ नहीं है।
बाबा धीरेन्द्र शास्त्री प्रकरण एक सार्वभौमिक सवाल मन में उठाता है… आस्था और अंधविश्वास में कितना अंतर है?… क्या बिना अंधविश्वास के आस्था संभव है? क्या भगवान, गॉड, अल्लाह का अस्तित्व बिना अंधविश्वास के संभव है?
जब मदर टेरेसा को संत घोषित किया गया था, उस समय भी बहुत से सवाल उठे थे। कि क्या उन्होंने कोई चमत्कार किये थे? सवाल आदम और हव्वा के सिद्धान्त पर भी उठाए जाते हैं। विज्ञान आदम और हव्वा की थियोरी को नहीं मानता। यदि आदम और हव्वा की थियोरी को मान लिया जाए तो यह धरती केवल छब्बीस से तीस हज़ार साल पुरानी हो सकती है। क्योंकि आदम और हव्वा के बच्चों की पीढ़ियों की गिनती करने के बाद हम इसी आंकड़े पर पहुंचते हैं। 
ईसाई धर्म की आस्था “गॉड, दि सन एण्ड दि होली गोस्ट” में है। वे जीज़स क्राइस्ट को भगवान का पुत्र मानते हैं। और बाइबल के अनुसार सौरमण्डल के केन्द्र में धरती है और सूर्य उसके चारों ओर घूमता है। इसे आस्था कहा जाए या अंधविश्वास? 
सबसे पहले कोपरनीकस ने इस सिद्धान्त को ग़लत बताया था। उसे चर्च का कोपभाजन बनना पड़ा। यहां तक कि जब गैलिलियो ने टेलीस्कोप का आविष्कार करके साबित किया कि सूर्य धरती के इर्द-गिर्द नहीं घूमता बल्कि धरती सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती है तो उसे चर्च ने आजीवन कारावास का आदेश दे दिया। सन 1633 में जब गैलिलियो करीब सत्तर वर्ष के रहे होंगे, चर्च ने उन्हें सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने का आदेश दिया। उन पर ज़बरदस्ती की गयी के वे यह कहें कि धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध दिये गये उनके सिद्धान्त उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी जिसके लिये वे शर्मिंदा हैं। ऐसा न करने पर उन्हें मृत्युपरन्त कारावास में रखा गया। 
ग्रीस में सुकरात ने भी जब मज़हब के ख़िलाफ़ अपना मत सार्वजनिक किया तो उन्हें ज़हर का प्याला दे कर मौत के घाट उतार दिया गया। 
ठीक इसी तरह कुरान शरीफ़ में भी धरती के चपटा होने की बात की गयी है। हालांकि बहुत से इस्लामिक विद्वान इस बात को नकारते हैं। मगर इस्लाम में सवाल पूछने पर मनाही है। आप को कुरान में आस्था और विश्वास रखना इस्लाम की पहली शर्त है।
यू-ट्यूब पर आपको सैंकड़ों ऐसे वीडियो मिल जाएंगे जिनमें पादरी मौलवी सार्वजनिक रूप से मरीज़ों का इलाज मंच पर करते हैं और इन्सान के जिस्म से भूत-प्रेत निकाल बाहर करते हैं। उन सब में जनता की अगाध अंध-आस्था है। लगता है जैसे कि अंधविश्वास और आस्था मिलकर एक नई स्थिति पर पहुंच गये हैं जिसे अंध-आस्था कहा जा सकता है।    
विज्ञान तर्कों पर आधारित है और मज़हब अंध-आस्था पर। वैज्ञानिक का सच बदल सकता है क्योंकि जैसे-जैसे नये प्रयोग होते रहेंगे, वैसे-वैसे इन्सान की जानकारी में वृद्धि होती रहेगी। विज्ञान जड़ नहीं है, स्थिर नहीं है। विज्ञान गतिमान है, परिवर्तनशील है। एक नया वैज्ञानिक किसी पुराने सिद्धान्त के विरुद्ध एक नया सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकता है। मज़हब में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। यहां जो बात इक किताब में हज़ारों साल पहले लिख दी गई वो पत्थर की लकीर है। 
सच्चाई तो यह है कि हर मज़हब में अंधविश्वास और चमत्कार मौजूद हैं। मगर समस्या यह है कि हर मज़हब के अनुयायी अपने-अपने मज़हब को लेकर बहुत इमोशनल हो जाते हैं। मज़हब की कमज़ोरियों पर बहस करने की कोई परम्परा नहीं बन पाई है। ऐसे में युवा पीढ़ी को रिचर्ड डॉकिन्स, क्रिस्टोफ़र हिचिन्स, और स्टीवन हॉकिन्स जैसे नास्तिकों पर अधिक विश्वास होने की संभावना है।
समय आ गया है कि भारत की शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा को एक बार फिर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए। यह भी संभव है कि भारत में ही इस समस्या का हल मिल सके। मगर इस सबसे पहले हमें मानना होगा कि अंधविश्वास धर्म के लिये घातक है।   
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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33 टिप्पणी

  1. आपका संपादकीय बहुत सटीक सवाल उठाता है। मैं किसी ऐसी आस्था में विश्वास नहीं रखता फिर भी मुझे सनातन धर्म की शिक्षाएं और मार्गदर्शन अन्य मतों के समक्ष अधिक उदार और वैज्ञानिक लगता है। मेरे पास अधिकार है कि मैं इन तमाशों पर सवाल उठाऊं।
    इसके समक्ष इस्लाम में तो सवाल पूछने पर ही मनाही है। जबकि सबसे अधिक जादू टोने उनके यहां ही हैं। मदरसों में लोग आज भी चपटी धरती पर गिल्ली डंडा खेल रहे हैं।
    यशुआइट्स आज भी चंगाई शिविर लगा रहे हैं और इसके पीछे लोगों को चंगा करना नहीं, उनका धर्म परिवर्तन करना है।
    आज अगर हिंदू इन बाबाओं का बचाव करते नजर आते हैं तो यह यू ए ई जैसा ही प्रयोग है कि वे अपने देश में सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने देंगे, मगर दुनिया भर के कट्टरपंथियों की फंडिंग करेंगे।
    भारत का हिंदू भी अब खेला सीख गया है।
    सादर।

    • जीवन की व समाज की स्तिथि परिस्थितियों से अभय कराता हुआ सच सामने रखते हुए उस पर सोच विचार की अनुकूलता पर रोशिनी डालता हुआ चित्र पुरवाई
      के स्तर को उच्च कोटि से रखता है
      पहले सम्पादकीय पढ़ने की चाह बनी रहती है
      देवी नागरानी

  2. वास्तव में किसी मज़हब में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। सर! मैं आपके इस तर्क से शतप्रतिशत सहमत हूॅं कि अंधविश्वास धर्म के लिए घातक है।

  3. जो मान्यता वैज्ञानिक क्षेत्र से बाहर है वह या तो आस्था है या अंधविश्वास।
    मान लीजिए मैं कहता हूं ” मैं शिव की पूजा करता हूं। यह मेरी आस्था है।” यह मेरी आस्था हुई।
    पर ऐसा करने से वैसा होगा। ऐसी पूजा करने से मैं पास हो जाऊंगा या यह चमत्कार होगा तो यह अंधविश्वास होगा।

    दोनो के बीच ग्रे एरिया का कथन है ” ऐसी पूजा से मेरा कल्याण होगा, या भला होगा।” अब कल्याण होने या भला होने की कोई परिभाषा तो है नहीं। आप कल्याण हुआ ऐसा कब मानेंगे?
    तो इसे आस्था में लिया जा सकता है।
    कहना न होगा, धीरेन्द्र शास्त्री के सभी चमत्कार अंधविश्वास हैं।

    -हरिहर झा

  4. भारत देश विविधता में एकता दर्शाता है। पर बात जब जात पात पर आती है तो यह एकता पल भर में बिखर जाती है। आस्था, विश्वास हो सही है, पर अंधविश्वास
    नही होना चाहिए। क्योंकी अंधविश्वास तो दिमक की तरह होता है लग जाये तो पूरी तरह से इंसान के दिमाग को
    खोकला कर देता है।रही बात ईश्वर की तो दुनियाँ मे हमें आस्तिक भी मिलेंगे और नास्तिक भी। हम किसी पर दबाव नही डाल सकते तुम ईश्वर को मानो और हम किसी के ईश्वर के प्रति आस्था पर कोई सवाल भी नही उठा सकते।धीरेंद्र शास्त्री जी के बारे में तो मुझे कुछ नही कहना है, आस्था, विश्वास को को परे रख कर, वो हिन्दू राष्ट्र की बात पर ज्यादा जोर देते है। गलत नही है पर भारत में जाती पर बवाल होते है तो फ़िर पुरानी यादें ताजा हो जाती है।इसी का तो फायदा उठाया था अंग्रेजों ने और भारत देश को खोकला करते गए। पर अब तो स्थिति विपरीत है,दुश्मन थे अंग्रेज पर आज भाई भाई लड़ रहे, कहा गया भाईचारा।
    रही बात चमत्कार तो मैं अपने अनुभव से यहाँ एक बात कहना चाहूँगी, चमत्कार का मतलब है कि, अपने विश्वास और आस्था की जीत होना।मतलब हम ने ईश्वर के प्रति जो श्रद्धा, विश्वास और आस्था रखी है, हमें पॉजिटिव बाते मिल जाना। मैं भी ईश्वर को मानती हूं, अपनी सारी व्यथा उन्ही से कहती हु और राहत महसूस करती हूं। अंध विश्वास नही करती, बल्कि यह मेरी आस्था और अटूट विश्वास है।
    धन्यवाद सर जी

  5. माननीय, अंधविश्वास सर्वव्यापी हैं. इसमें संदेह नहीं. किंतु भारतीय मनीषा ऐसी नहीं रही. ब्रह्म, आत्मा और माया; भगवान और भक्त आदि अवधारणाओं को लेकर भारत में जैसा चिंतन हुआ, वैसा विश्व में अन्यत्र नहीं दिखता. भारतीय षड्दर्शन के सदृश चिंतन अन्यत्र दुर्लभ है. शैव, वैष्णव, शाक्त; अनीश्वरवादी और आस्तिक; विशुद्ध सात्विक और घोर तामसिक – इन सबके प्रति जैसी सहिष्णुता भारत में रही वह दुनिया में कहीं नहीं मिलती. यदि हम मत वैभिन्न्य के कारण अपने दार्शनिकों और चिंतकों को विष पिलाते, सूली चढ़ाते, कारावास में डाल देते या पत्थर मारते तो भारत चिंतन मनन के क्षेत्र में इतना आगे न बढ़ पाता. न ही हम विश्व बंधुत्व की बात कर पाते.
    कोई हमारे मत को न माने, तो क्या उसे जीवित न छोड़ा जाए!
    ऐसा ओछापन जिस धर्म में हो वह धर्म कहलाने योग्य नहीं.

    हमें गर्व है कि हम हिन्दू ऐसे नहीं हैं.
    इसलिए आज हमें पूरी दुनिया का आह्वान करना चाहिए कि आओ, हम तुम्हें अपना बंधु और कुटुंबी मानते हैं. मनुष्य ही नहीं, जीव मात्र होने के कारण तुम हमें स्वीकार्य हो. क्योंकि हमारा धर्म जीव मात्र से प्रेम करना सिखाता है. इसमें मत भिन्नता के लिए सहज स्वीकार भाव है.
    और चूंकि इसमें प्रश्न पूछने पर कोई रोक नहीं है, इसलिए यह धर्म दुनिया में विज्ञान, तर्क, निरंतर अनुसंधान व विकास की संभावना से संवलित है.

  6. भरतीय दर्शन म् अष्ट सिद्धि की बात बताई गई गई जिसके अनुसार सिद्ध व्यक्ति किसी के मन की बात जान सकता है यह आजकल माइंड रीडर भी कुछ कुछ कर रहे हैं । धीरेंद्र शास्त्री के बारे में बात करें तो तीन हिस्सों में देखना पड़ेगा जिसके कारण आज वह इतनी सुर्खियों में है। पहली बात मन की बात पढ़ कर पहले से लिख देना । यज न तो चमत्कार है न ही पाखंड बल्कि एक सिद्ध साधना है। दूसरी बात लोगों को उपचार करना यह बात वैज्ञानिक या किसी भी सनातन धार्मिक ग्रन्थों से सहमति नहीं मिलती यह केवल इस्लाम एवं ईसाइयत में है। तीसरी बात जिसके चलते सर्वाधिक प्रसार और लोक प्रियता उसे मिल रही है वह है बार बार उसका हिन्दू राष्ट्र का आह्वाहन जो हर हिन्दू को प्रभावित कर रहा है। धीरेंद्र शास्त्री को मीडिया ने रातों रात शीर्ष परला दिया है। एक आध्यात्मिक चिंतक होने के नाते मैं केवल इतना कहूंगा कि धीरेंद्र शज़तरी म् कुछ तो दैविक कृपा है कुछ बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया है समय ही इस का खुलासा करेगा।

  7. धर्म और अंधविश्वास पर वैज्ञानिक कथन है ।
    अंधविश्वास पर कानून पास होना ,नितांत आवश्यक है ,तभी धर्म की आड़ में पाखंड की दुकानें बंद हो सकती है।
    चमत्कार की उम्र लंबी नहीं होती पर जितनी होती है विनाशक है । ज्वलंत मुद्दा है ,फैसले की प्रतीक्षा है। साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  8. साधना से अलौकिक शक्तियाँ आती हैं। मैंने कई घटनाएं देखीं हैं। मेरे पड़ोस में एक नई दुल्हन आयी। एक दिन अचानक छटपटाने लगी। चार दिन अस्पताल में रहने के बाद भी कुछ सुधार नहीं हुआ। किसी ने एक बाबा से मिलने का सुझाव दिया। बाबा ने सिर्फ एक लौंग अभिमंत्रित कर दे दिया। घर आकर जैसे ही उस महिला को लौंग खिलाया गया वो यूँ ऊठ खड़ी हुई मानो कुछ हुआ ही नहीं था। मैं वहाँ मौजूद था। उस लौंग ने मुझे अंधविश्वासी बना दिया। ऐसी कई घटनाएं आँखो देखी हैं। तो कुछ तो है….

    • आपके अनुभव ही सोच को पुख़्ता करते हैं। शास्त्रार्थ रहस्यों का अनावरण करता है।

  9. बात सही लेकिन इसका कोई तोड़ नहीं है क्योंकि जो ईश्वर को मानते हैं उनके अपने कुछ विश्वास हैं उन्हे कोई अंधविश्वास कहे ये उन्हे पसंद नहीं था नहीं है और न ही होगा

  10. आज का आपका संपादकीय देश में चर्चा का विषय बने मुद्दे का सटीक विश्लेषण कर रहा है। दरअसल भक्ति,आस्था और विश्वास व्यक्ति के अंतर्निहित भाव हैं जबकि अंधश्रद्धा तथा अंधविश्वास उसकी बुराइयाँ। आस्था और विश्वास व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं जबकि अंधआस्था, अंधविश्वास उसके आत्मविश्वास को डिगाता है अतः हमें यथासंभव इनसे दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।
    आज व्यक्ति को किसी बात को मानने से पूर्ण उसका तार्किक विश्लेषण करना चाहिए, यही समय की मांग है और उचित भी है।

  11. सामयिक संपादकीय ,निश्चय ही अंध श्रद्धा आस्था धर्म के लिए घातक है पर इसका निर्मूलन सिर्फ हिन्दू धर्म मे ही नहीं सभी धर्मों में होना चाहिए

  12. गहरी शोध और सभी धर्मों के बारे में बहुत संतुलित ढंग से लिखा है, बहुत-बहुत धन्यावाद। आस्था, विश्वास के बिना धर्म का कोई स्थान नहीं हो सकता है। विश्वास यदि तर्कों पर आधारित करने का प्रयत्न किया जाय तो, विश्वास असम्भव है। यदि गहरायी से देखा जाए तो तो हिन्दू धर्म सभी धर्मों की तुलना में सबसे अधिक उदार और परिवर्तनों के लिए खुला हुआ है। प्रश्न पूछना हमारे धर्म में परंपरा रही है, जैसा आपने कहा शास्त्रार्थ हमारी विशेषता रही है, और धर्म को युग के अनुसार बदलना चाहिये यह भी हमारे शास्त्र कहते हैं। रही बात आज के प्रसंग की तो, धीरेंद्र शास्त्री का चमत्कार ऐसा है कि सभी उस बारे में बात कर रहे हैं, तीन स्तरों के बाद एक व्यक्ति तक पहुंच रहे हैं। z security VIPs का जिसने रुतबा बनाया हुआ है, जो वास्तव में मिट्टी और ग़रीबी से उठा है, जिसके God Father नहीं थे उसे launch करने के लिए, यही बात चमत्कार से क्या कम है। रही बात नियम की और कानून की, यह नितान्त व्यक्तिगत बात है जिसे कोई बाहरी नियम नियंत्रित नहीं कर सकते। विज्ञान जिस दिन https://upanishads.org.in/questions, ऋषियों के मन में उठने वाले इन प्रश्नों का संतुष्टिदायक उत्तर दे लेंगे, सभी अंध विश्वास ख़तम हो जायेंगे। लेकिन दुःख है अभी विज्ञान न मनुष्य के प्रादुर्भाव का न धरती के प्रादुर्भाव का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका है। मनुष्य 8-10 %से अधिक मस्तिष्क का उपयोग नहीं कर सका है। जब भी कोई व्यक्ति इस प्रतिशत से रंच मात्र आगे बढ़ता है, विवादों में घिर जाता है…
    सभी अपने को अंधविश्वासी कहलाने में शर्म महसूस करते हैं, लेकिन जो अंधविश्वास कर सके उससे सुखी कोई नहीं। तार्किक मन बहुत दुःख देता है…

  13. आदरणीय तेजेंद्र जी ,
    आपने अंधविश्वास के प्रति उठने वाले विवाद का हल भारत में होने की संभावना कहकर ,अपनी उत्कृष्ट भारतीयता का प्रमाण दिया है , नमन एवं बधाइयां।
    मेरा मानना है कि मानव मस्तिष्क में पहले आस्था का जन्म हुआ और उस आस्था को दूसरों के सम्मुख प्रमाण देकर प्रस्तुत करने के लिए विज्ञान का जन्म हुआ ।यदि आस्था या विश्वास अपने विचारों पर ना होता तो विज्ञान का जन्म ही ना होता ,।
    अंधविश्वास जैसा शब्द मुझे तार्किक नहीं लगता। जहां तक धीरेंद्र शास्त्री के दूसरों के मन की बात जान लेने की बात है ,यह एक सिद्धि है जोकि किसी को भी प्राप्त हो सकती है !मनोवैज्ञानिक चिकित्सक सम्मोहन द्वारा दूसरों की बातें जानने का प्रयत्न करते हैं क्या वह सिद्धि नहीं है ?यदि वह वैज्ञानिक है तो धीरेंद्र शास्त्री द्वारा मन की बात जानना अवैज्ञानिक कैसे हुआ ?जो लोग धीरेंद्र शास्त्री से यह अपेक्षा करते हैं कि वह चमत्कार करके जोशीमठ की दरारों को ठीक कर दें,मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है क्योंकि यदि मानव मन और पर्वत पिंडों मैं उन्हें समानता दिखलाई पड़ती है तो उसका तो कोई इलाज नहीं हो सकता है

  14. अंधविश्वास ही किसी धर्म को स्थायी आधार प्रदान करता है और आज की तारीख में इस्लाम की नींव भी इसी पर टिकी है। इस्लाम में मौलवी इसी का फायदा उठाते हैं, उन्हें स्वयं पर अंधा विश्वास करने वाले इस्लाम के अनुयायियों को अपना अनुगमन कराने का फायदा मिलता है । हिन्दू धर्म में अंधविश्वास तो हैं किन्तु बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम अंधविश्वास मानते आए तो हैं पर वे आज प्रयोग और तर्क पर सच साबित हो रही हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि सनातन धर्म में हम जिस बात को पाखंड और स्वार्थपूर्ण समझते हैं, उसे एक सिरे से खारिज कर देते हैं और कोई भी हिन्दू धर्माधिकारी हमें इसके लिए दण्डित नहीं करता है। हिन्दू धर्म में ही आत्मनिरीक्षण का स्कोप है। क्या ऐसा इस्लाम या अन्य धर्म में है?

    बहरहाल, मैं इस्लाम को धर्म नहीं मानता हूं। यह एक क्रूर विचारधारा है जिसका पालन करते हुए आज इस विचारधारा को मानने वाले 56 देश है। 57 वाँ देश भारत हो सकता है जिसके लिए पढ़े-लिखे या अनपढ़ सभी मुसलमान कृतसंकल्प हैं। हम कोई फायदा पाने के लिए भले ही इस्लाम को शांतिप्रिय धर्म कहें लेकिन सच्चाई यही है कि इस्लाम में अमानवीयता कूट कूट कर भरी हुई है ।

  15. विज्ञान तर्कों पर आधारित है और मज़हब अंध-आस्था पर। वैज्ञानिक का सच बदल सकता है क्योंकि जैसे-जैसे नये प्रयोग होते रहेंगे, वैसे-वैसे इन्सान की जानकारी में वृद्धि होती रहेगी।

  16.  आदरणीय, आपका यह संपादकीय निश्चित रूप से अंधविश्‍वास की गहरी पैठी जड़ों पर कुठाराघात करता है, जो श्लाघनीय है. आस्था हमें जीवन का सकारात्मक , तो अंधविश्वास नकारात्मक स्वरूप को दर्शाती है। कहीं ना कहीं प्रत्येक धर्म से जुड़ी गहरी आस्था और उससे जुड़े मिथक ही आगे चलकर अंधविश्वास को जन्म देते हैं, परंतु
    इन दोनों के मध्य के बारीक अंतर को समझना ही जनता की परम आवश्यकता है, किंतु मेरी समझ से इन दोनों के मध्य विश्वास का कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है, कुछ ऐसे उदाहरण व तथ्य भी हैं, जो विश्वास के आधार पर मनुष्य को आस्था की ओर उन्मुख करते हैं और साथ ही तब श्रद्धा और भक्ति का भाव भी उपजता है, ऐसे कुछ प्रमाण तो मैंने स्वयं भी अनुभव किए हैं। हां किन्तु, जैसे किसी भी वस्तु की अति भली नहीं होती, इसकी अधिकता भी यदि अंधविश्वास में परिणत हो जाती है,तो फिर ये हानिकारक ही सिद्ध होगी।
    सदा की भांति अत्यंत संवेदनशील गंभीर विषय पर जागरूक करती, तुलनात्मक, ज्ञानवर्धक और सटीक संपादकीय।
    डॉ. ऋतु माथुर
    प्रयागराज।

  17. आपने बहुत सधे हुए ढंग से तार्किक बात कही, जो सदैव से आप कहते आए हैं परंतु यहां पर मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है जिसका उत्तर आपके ही संपादकीय में है, आपने कहा सभी धर्मों में अंधविश्वास होता है किंतु केवल चर्चा हिंदू धर्म की ही की जाती है ऐसा क्यों? ऐसा नहीं लगता कि हिंदू धर्म धर्म चारा बनकर रह गया है

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