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संपादकीय – गाय को लिपटाना भी एक इलाज है

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संपादकीय - गाय को लिपटाना भी एक इलाज है 5

यदि भारत में कहीं कोई गाय के बारे में बात करता है तो उस पर हिंदुत्व, संघी और न जाने कौन-कौन से  आरोप लगाए जा सकते हैं। मगर जो बात ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र हज़ारों साल पहले समझ गए थे, पश्चिमी सभ्यता को आज समझ में आ रही है। भारतीय सोच का पश्चिमी देशों में प्रचार प्रसार कर रही है एक संस्था ‘अहिंसा’।

कभी-कभी यह निर्णय करने में भी कठिनाई हो जाती है कि सप्ताह के संपादकीय का विषय क्या होना चाहिये। जब लखीम पुर खीरी मामले में पुलिस ने गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के पुत्र आशीष मिश्रा पर इरादतन हत्या करने की धारा लगा दी, तो लगा कि इस विषय पर लिखना आवश्यक है क्योंकि मामला बहुत ही संवेदनशील है और किसानों की हत्या से जुड़ा है। 
मगर इस बीच एक ऐसा मुद्दा सामने आया जो कि इन्सान और इन्सानियत से जुड़ा है। मेरे भीतर के संपादक ने मुझे चुनौती देते हुए कहा कि यह मुद्दा भारत के लिये विशेष तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है। पश्चिमी देशों में एक नई मगर रुचिपूर्ण  स्थिति देखने को मिल रही है। यहां लोगों को समझ आने लगा है कि गाय इन्सान के लिये कितनी महत्वपूर्ण है। Cow Cuddling (गाय को गले लगाना, आलिंगन करना) स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोप में ऐसे फ़ार्म हाउस बनाए गये हैं जहां आप जा कर गाय को लिपटा सकते हैं; उसे अपना प्यार महसूस करवा सकते हैं। 
यदि भारत में कहीं कोई गाय के बारे में बात करता है तो उस पर हिंदुत्व, संघी और न जाने कौन-कौन से  आरोप लगाए जा सकते हैं। मगर जो बात ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र हज़ारों साल पहले समझ गए थे, पश्चिमी सभ्यता को आज समझ में आ रही है। भारतीय सोच का पश्चिमी देशों में प्रचार प्रसार कर रही है एक संस्था ‘अहिंसा’। 
अमरीका के जेम्स ने अपना गाय फ़ार्म खोल रखा है जहां वे गाय के माध्यम से इलाज करवाने की पहले तो ट्रेनिंग देते हैं ताकि दुर्घटना से बचा जा सके। एक सेशन में प्रति व्यक्ति 57 पाउंड का ख़र्चा आता है। उनके फ़ार्म में जाकर आप गाय से लिपट सकते हैं, उसके शरीर पर हाथ फेर सकते हैं, और जान सकते हैं कि गाय कैसे प्रकृति एवं पर्यावरण को बचाने में सहायक सिद्ध हो सकती है। 
जेम्स ‘ कृष्णा गाय अभयारण्य’ का मालिक और मुख्य सेवक है… उसने अपना भारतीय नाम नारायण दास रखा हुआ है। पिछले 9 वर्षों से उसकी रुचि जैविक पर्माकल्चर तकनीकों में रही है और वह उनका अभ्यास  कर रहा है। पिछले 4 वर्षों से वह गहन रूप से गायों के साथ काम कर रहा है और उनके बारे में अध्ययन कर रहा है। उसके पास सभी उम्र और आकार की 63 गाय हैं। वह गऊशाला प्रबंधन के बारे में सलाह भी देता है। उसे गोबर और मूत्र से बागवानी करना और स्वस्थ और स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए अपनी उपज का उपयोग करना पसंद है! जेम्स् का कहना है, “मुझे गायों से प्यार है और वे मेरी जिंदगी हैं!”
ब्रिटेन में ‘अहिंसा’ संस्था ने पूरे तौर पर इस गतिविधि को लोगों तक पहुंचाने का बीड़ा उठा है। उनकी वेबसाइट https://www.ahimsamilk.org/ पर क्लिक करके आप सेशन बुक कर सकते हैं। गायों के साथ समय बिताने के लिये अलग-अलग  किस्म के सेशन बनाए गये हैं। आप अकेले वहां जा सकते हैं या फिर ग्रुप में भी। बुकिंग ऑनलाइन की जा सकती है। वहां आपको गाय का दूध दुहने का भी मौक़ा दिया जाता है। एक सेशन के 65 से 100 पाउंड तक की राशि का भुगतान करना पड़ता है। अहिंसा दरअसल हरे रामा हरे कृष्णा समूह की ही एक वेबसाइट है। उनका कहना है हमारे यहां गाय दूध के लिये है माँस के लिये नहीं।

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यहां हर गाय को एक नाम भी दिया गया है… कोई फ़्लोरेंस है तो कोई कोको। पिछले ही वर्ष वहां एक बैल की मृत्यु हो गयी तो एक समाचार जारी किया गया – “बहुत दुःख के साथ सूचित किया जाता है हमारे चार साल के सुपर हीरो बैल का निधन हो गया। सुपर हीरो ‘जंबो’ की चार संतानें हैं – कोको, फ़्लोरेंस, जगन्नाथ और हनीसकल। वह शांत स्वभाव का था। इस मामले में वह अन्य बैलों से अलग था जो कि जोश और ताकत से भरे होते हैं।”
बी.बी.सी. की एक रिपोर्ट के अनुसार गाय को गले लगाने, उस पर हाथ फिराने या उस से लिपट कर खड़े होने से शांति, संतुष्टि और प्रसन्नता का अहसास होता है। इसका कारण यह है कि गाय के शरीर का तापमान हमसे अधिक होता है और हृदय गति धीमी। गाय को गले लगाने से सकारात्मकता बढ़ती है और तनाव कम होता है। इसका कारण बताया जाता है कि इससे इन्सान में ऑक्सीटोसिन की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। इन्सान को जैसा ध्यान लगाने या समाधि  में महसूस होता है कुछ वैसा ही  
नीदरलैण्ड में भी ‘Cow Cuddling’ प्रचलित है और उसे वहां ‘Koe Knuffelen’ कहा जाता है। सूज़न वलरस जो कि मूल रूप से नीदरलैण्ड वंशज है आजकल न्युयॉर्क  के निकट अपने फ़ार्म हाउस में  इस गतिविधि को चला रही है। लोग गाय से लिपटने के लिये पूरे अमरीका भर से रजिस्ट्रेशन करवा रहे हैं। इस कोरोना काल में लोग प्यार के भूखे महसूस कर रहे हैं। कोरोना काल में सुरक्षित दूरी बनाए रखने की मजबूरी ने पूरे समाज के मानसिक स्वास्थ्य पर असर किया है। गाय से लिपट कर उन्हें स्नेह और प्यार की अनुभूति होती है। 
43 वर्षीय रेनी स्वयं एक मनोवैज्ञानिक है। कोरोना विश्वमारी के चलते उसे भी अकेलेपन ने घेर रखा था। घर में बंद रहते हुए और लोगों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने के डर ने उसे अलगाव और एकांत का शिकार बना दिया था। उसने भी गाय को गले लगाने वाले इलाज को चुना। वह एक फ़ार्म में सैमी नाम की गाय के साथ 90 मिनट तक रही। रेनी का कहना है कि जब गाय उसकी गोद में सिर रख कर सो गयी तो रेनी की आँखों से आंसू बह निकले। अपनेपन का ऐसा अहसास उसे वर्षों से नहीं मिला था। वहां गाय के साथ एक घंटा बिताने के लिये लोग 75 डॉलर प्रति घंटा तक का भुगतान करते हैं। 
डेरी फ़ार्म की गायों में भी एक परिवर्तन महसूस किया जा रहा है। अब उन्हें भी गले लगाए जाना अच्छा लगने लगा है। वे भी प्रतीक्षा करती हैं कि दिन का वो समय कब आएगा जब कोई आकर उनके गले लगेगा, उन्हें पुचकारेगा। जैसा कि रेनी के साथ हुआ, वैसे ही गाय चुपके से लेट कर अपने स्नेही की गोद में सिर रख देती हैं और आँखें बंद कर लेती हैं। सच्चे प्यार को वे भी समझती हैं। 
कहना आसान नहीं कि गाय को गले लगाने की प्रक्रिया कोरोना काल के बाद जारी रहेगी या नहीं। लेकिन एक तरह से, जब इस भयानक काल की त्रस्त कर देने वाली यादें हमें डराएंगी, तब कुछ ऐसे मन प्रसन्न करने वाले पल हमें आत्मिक शांति भी देंगे। किसी अन्जान गाय को गले से लगाना, उसके भीतर की सरल भावनाओं को समझना हमें बेहतर इन्सान बनाएगा। मुश्किल समय में बेज़ुबान गाय हमें यह मार्ग दिखा रही है। 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

30 टिप्पणी

  1. गोवंश भारत के सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है. उसे हमने कामधेनु माना है. उसका संबंध हमारे हर युग के महापुरुषों और देवी देवताओं से रहा है. हमारे महादेव का वाहन है नंदी. हमारे बालकृष्ण के सहचर रहे हैं गोवंशी, मवेशी.
    किंतु कृषि के व्यापक यंत्रीकरण और आधुनिक सुख- संसाधनों ने गोवंश को हमारे लिए अनुत्पादक बना दिया. आज भारत की गौ-पट्टी में गोवंश की सर्वाधिक अवहेलना है.
    पता नहीं, गोवंश को गले लगाना भारत के लोगों को सुहाएगा या नहीं. आज की सच्चाई तो यह है कि लोग इन्हें गले पड़ा हुआ समझकर सड़क पर हांक देते हैं.
    बहरहाल, पश्चिम का यह गोवंश- प्रेम अनुकरणीय और स्तुत्य है.

  2. https://www.thepurvai.com/an-editorial-by-tejendra-sharma-on-cow-cudding/

    भारतीय संस्कृति में गाय को गले लगाना या उन पर हाथ फेरना प्रचलित रहा है। कहा जाता है चिकित्सकों द्वारा की इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। तेजेन्द्र शर्मा वरिष्ठ साहित्यकार हैं। भारत में पले-बढ़े और लन्दन में रहकर आजीविका कमाने के साथ-साथ लेखन में सक्रिय हैं। जब हर सप्ताह उनके सम्पादकीय उनके मार्गदर्शन में निकल रही अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में इस तरह के मुद्दों पर पढ़ने को मिलते हैं तो मालूम होता है कि सात समंदर पार रहकर भी वे अपने देश की खबरों से अछूते नहीं हैं। गायों पर लिखा एक बेहतरीन सम्पादकीय आप भी पढ़िए। औरों से भी साझा कीजिए।
    तेजस पूनियां
    लेखक , फ़िल्म समीक्षक
    सम्पर्क -9166373652
    tejaspoonia@gmail.com

  3. सम्पादकीय पढ़करलग रहा है कि यह तो गाय की आत्म-कथा पढ़ रहे हैं।भारत में गाय को गौमाता कहा गया है बच्चे को जन्म से यदि दूध पिलाने की आवश्यकता पड़े तो गाय का ही प्रथम स्मरण होगा ।यहाँ भी बाबा रामदेव गाय संस्कृति को बचाने के अथक प्रयास कर रहे हैं।गाय को पूजना और उससे प्रेम करना उतना ही भावना प्रधान कार्य है जितना पश्चिम में किया जा रहा है भले ही उस कार्य का व्यवसायिक दृष्टिकोण हो किंतु पशु वध तो
    रोका जा सकता है।
    Dr Prabha mishra

  4. यहाँ तो यह परंपरा है ही इसीलिए गाय को पशु नहीं गोमाता कहा जाता है । सच कितनी महान है सनातन संस्कृति और ज्ञान ! जितनी जल्दी समझ लें बेहतर ।

  5. बहुत ही सार्थक पहल। हम भारतीय अपनी संस्कृति के विषय में तब ध्यान देते हैं जब वो विदेशों से चलकर हम तक वापस आती है। गोवंश के महत्व पर भी हमने अब तक ध्यान नहीं दिया है। शायद अब इस ओर भारत में भी पहल हो। एक अच्छे सम्पादकीय हेतु साधुवाद।

  6. बहुत सुंदर लगा। हालांकि सच कहें तो पहली नजर में जहां पढ़ने के बाद हर्ष की अनुभूति हुई, वहीं इस बात पर दुःख भी हुआ कि जिन बिंदुओं पर पाश्चत्य संस्कृति गहराई से सोचने लगी है उन्हीं बिंदुओं को हमारे भारतवासी पिछड़ापन समझकर (अब चाहे कारण अज्ञानता हो या राजनीतिक) नजरअंदाज कर रहे हैं। चार-पांच दशक पहले जहां गाय के बिना किसी गांव की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, आज वहां किसी गांव के घर अनुभूति हुई, वहीं इस बात पर दुःख भी हुआ कि जिन बिंदुओं पर पाश्चत्य संस्कृति गहराई से सोचने लगी है उन्हीं बिंदुओं को हमारे भारतवासी पिछड़ापन समझकर (अब चाहे कारण अज्ञानता हो या राजनीतिक) नजरअंदाज कर रहे हैं। चार-पांच दशक पहले जहां गाय के बिना किसी गांव की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, आज वहां गाय का किसी घर में मिल जाना भी एक आश्चर्य बन जाता है।
    निःसन्देह आपका यह संपादकीय ज्ञानवर्धक और संदेश देने योग्य बना है और एक उद्धाहरण है हम भारतीयों के लिये जो आधुनिक सभ्यता की आड़ में अपनी संस्कृति की गौरव गाय माता को भुलाते जा रहे हैं। सुंदर संपादकीय के लिए हार्दिक साधुवाद सर।
    सादर।

  7. आदरणीय तेजेन्द्र भाई
    गाय को लिपटाना भी एक इलाज है। एक अति रोचक ज्ञानवर्धक जानकारी, आपके प्रयास सदैव सराहनीय रहे।
    क्योंकि इस समय देश मे गाय पर बड़ी चर्चा है। गले लगाना एक आत्मीय सम्बन्ध और विशेष प्यार व स्नेह और अपना पन दर्शाता है, किसी भी जीव या मानव को गले लगाने से एक ऐसी अनिभूति होती है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं। विस्वभ्रमण किया जाए तो इस तरह के अनेक अनोखे विषयों की दर्शन होंगे, U-tube पर ऐसे अनेक जानकारियाँ उपलब्ध हैं जिनमे मानव अनेक खूँखार जानवरों जैसे सिंह, बाघ, तेंदुआ आदि से लिपटता है, सर्प और अजगर के साथ सोता है ! अब इन आँखों देखी वास्तविक घटनाओं का अनेक भाषाओं में जितना बड़ा सहित्यकार होगा उतने अच्छे ढंग से उसके प्रस्तुतिकरण किया जा सकता है, उसे कही भी human sentiments से जोड़ कर आशचर्य जनक बना देते हैं। जैसे मदारी अपने साधारण से उत्पाद को प्रस्तुतिकरण की निपुणता से बेच देता है। इसका तातपर्य ये नहीं कि इनमें सच्चाई नहीं, किन्तु जब तक उसकी सत्यता वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध न हो जाये कलयुग के बुद्धिजीवी उसे सहजता से स्वीकार नहीं करते ।अतः निष्कर्ष ये की यदि ऐसी रोचकता का वैज्ञानिक रूप से सार्थक लाभ का सम्बन्ध दर्शाया जाय तो और अधिक सराहनीय होगा।

    • भाई कैलाश, कोरोना काल में एक ऐसी भावनात्मक रिक्तता पैदा हो गई है जिसे गाय के संग समय बिताने से भरने का प्रयास पश्चिमी देशों में किया जा रहा है।

  8. Your Editorial awakes us to the fact that the notion of reverence given to our cows is gathering momentum in the West too.
    Though primarily in Europe.
    It is a matter of great interest that these European cow- lovers also believe like us that physical proximity with the cow promotes well-being and that they now have farms offering cows for this specific purpose.
    Please accept my deep appreciation for your choice of this unusual subject and due research on the cow gaining great popularity during these recent years.
    Warm regards and best wishes
    Deepak Sharma

  9. प्रसन्नता की बात है कि भारतीय संस्कृति के किसी बिंदु को बिना आलोचना के उठाया गया, अन्यथा भारतीय स्वयं अपनी संस्कृति की आलोचना कर के अक्सर ‘progressive’ होने का दंभ पालते हैं। ‘रघुवंशम्’ का आरम्भ “दिलीपस्य गौ सेवा” से होता है, राजा दिलीप के कोई सन्तान नहीं थी, इस समस्या का समाधान ऋषि वसिष्ठ ने यह बताया था कि, वह नंदिनी गाय की (जो कामधेनु की सन्तान थी) सेवा करें, सेवा भी ऐसी की पति – पत्नी दोनों दिन रात परछाईं की तरह नन्दिनी के साथ रहें, उसको किसी बात का कष्ट न हो, उसी का दूध पीकर जीवन धारण करें।दिलीप की गौ सेवा के फलस्वरुप उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई, यही पुत्र ‘रघु’ हैं, जिनके से प्रसिद्ध रघुकुल का आरम्भ हुआ। गाय के साथ 24 घंटे रहने में, cow cuddling भी जरूर होगी ।इतना पुराना इतिहास होते हुए, हम आज पश्चिम से सीख रहे हैं??? भारतीयों के गुलाम बने रहने का राज़ इसी किस्म की सोच में छिपा है

  10. वाह पता ही नहीं था कि यहाँ ऐसा कुछ हो रहा है। ज्ञानवर्धक संपादकीय हेतु साधुवाद।

  11. बेहतरीन अभिव्यक्ति आदरणीय । ज्ञान वर्धक जानकारी। गाय हमारी माता है। बचपन में हमने अपने ननिहाल में गाय के स्पर्श को महसूस किया था।

  12. हमारे देश में गाय हमेशा पूज्यनीय रही है मान्यता है कि उनमें देवी देवताओं का वास होता है।मेरे मायके में भी गायें पाली जाती है। किन्तु मैंने ऐसा अनुभव कभी नहीं किया कि मैं उनका आलिंगन करूं।आपके लेख ने मुझे इस प्रेम का एहसास कराया ।अब जब मैं अपने घर जाऊंगी तो जरूर उन्हें गले लगाऊंगी।आपका आभार।

  13. हमारे देश में गाय हमेशा से ही पूज्यनीय रही है मान्यता है कि उनमें देवी देवताओं का वास होता है। मेरे मायके में भी गायें पाली जाती है किन्तु मैंने कभी भी उनका आलिंगन नहीं किया। आपके लेख के माध्यम से मुझे इस प्रेम का एहसास हुआ। अब जब भी मैं अपने घर जाऊंगी तो जरूर उन्हें अपने गले से लगाऊंगी।आपका यह दिल से शुक्रिया।

  14. आप ऋषि, मुनियों के बारे जानकारी भी रखते है..बहुत बड़ी बात है। क्या आप अभी भी भारतीय धार्मिक कार्यक्रम को देखा करते है? वैसे गौ माता के प्रति विदेशों में जो सेवा भाव है वह दाँतों तले उंगली दबाने के समान है। आप ब्रिटेन और भारतीय शिक्षा व्यवस्था के तुलनात्मकता पर भी लेख या संपादकीय लिखिए।

  15. भारत में गाय की बात करना, पिछड़ेपन की बात है। कितनी अजीब बात है कि हमारी जो हजारों साल पुरानी परम्पराएं हैं, उसकी उपयोगिता, वैज्ञानिकता आधुनिक काल में पाश्चात्य जगत न केवल सत्यापित कर रहा है, बल्कि हुलस कर शिरोधार्य भी कर रहा है। आपका यह संपादकीय अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  16. गाय जैसे महत्वपूर्ण प्राणी पर संपादकीय लिखना भारतीय संस्कृति और सभ्यता के महत्व को प्रतिपादित करना है। आपके संपादकीय से यह स्पष्ट हो रहा है कि देर से ही सही लेकिन विदेशों में भी गाय के महत्व को समझा जा रहा है उस के माध्यम से मानव स्वास्थ्य चिकित्सा पद्धति का नवीन अन्वेषण कार्य प्रारंभ हो चुका है यह गतिविधियां भारत के लिए गौरवपूर्ण हैं और विदेशियों के लिए प्रशंसनीय।

  17. भारतीय गौ माता अब विदेशों की भी ़धरोहर बन रही है, यह मानव सभ्यता के लिए शुभ संकेत है। प्राचीन वैदिक काल से ही गोधन की महत्ता का गुणगान भारतीय मनीषा करती रही है। हमारी आर्ष परम्परा ने सदा गाय को माता की तरह पूजा है।
    इस महनीय विषय पर हमारे तेजेन्द्र जी की खोजी दृष्टि ही जा सकती है। समस्त सृष्टि में गाय ही एकमात्र ऐसी शुद्ध-विशुद्ध प्राणी है, जिसका मल-मूत्र भी सर्वथा पवित्र माना जाता है। हम भारतीयों को अपनी संस्कृति का मोल ही नहीं पता है। न हम उसके अध्यात्मिक लाभ समझते हैं, न वैज्ञानिक।
    कोई आश्चर्य नहीं कि यह गौ थैरेपी कोरोना से बचाव का भी सबसे बड़ा साधन सिद्ध हो जाये।
    चलो जब जागें, तभी सवेरा है।

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