12 दिसंबर, 2021 को प्रकाशित पुरवाई के संपादकीय

‘इच्छा मृत्यु कितनी सही कितनी ग़लत?’

पर निजी संदेशों के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

डॉक्टर गुरविंदर बंगा
तेजेन्द्र जी, संपादकीय पढ़ा। एक चिकित्सक होने के नाते मेरा हमेशा से यह मानना रहा है जिस बीमारी से मरीज़ ग्रस्त है उसके दो अलग डॉक्टर्स का ओपिनियन, एक साइकेट्रिस्ट का ओपिनियन, सबसे नजदीकी परिवार सदस्य का ओपिनियन तथा एक इंडिपेंडेंट लीगल ओपिनियन अगर यह कहता है कि इच्छामृत्यु दे दी जाए तो यह पूरी दुनिया में हर व्यक्ति को उपलब्ध होनी चाहिए। एक अच्छे विषय को संपादकीय में उठाने के लिए हार्दिक बधाई।
डॉक्टर आनंद सिंह, भोपाल
तेजेन्द्र भाई, संपादकीय अच्छा लगा। भारत में संलेखना पद्धति जैन आचार्यों में है। यहाँ भी इस बात को लेकर विवाद चलते हैं। एक प्रकार से वह इच्छा मृत्यु की धार्मिक या आध्यात्मिक प्रक्रिया है।इसमें जैनमुनि धीरे धीरे समस्त ऐंद्रिक विषयों का त्याग कर देते हैं। भोजन पानी भी क्रमशः बंद कर देते हैं। इसमें साक्षी होकर क्रमशः देह को उत्तीर्ण करने का अंतर्भाव संलेखना है।
विजय तख़तर, मुंबई
तेज जी नमस्ते।
मेरे विचार में जिस व्यक्ति की बचने की कोई उम्मीद नहीं हो और जो लाइफ स्पोर्ट पर जी रहा है उस व्यक्ति को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे देनी चाहिए।
अशोक रावत
तेजेन्द्र जी, सार्थक और शानदार संपादकीय।
मरना कोई नहीं चाहता लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के दुष्परिणाम के रूप में उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों ने मनुष्य जाति के एक बहुत बड़े वर्ग को इतना दयनीय बना दिया है कि अभावों और विषाद में जी रहे लोग अगर इच्छा मृत्यु की कामना करने लगें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
डॉ उमेश सिंह, वर्धा
सत्य विचार।पुरवाई के उत्तम और श्रेष्ठ संपादकीय के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। आज के दौर में व्यक्ति को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार अतिआवश्यक है।
मधु मेहता, मुंबई
तेजेन्द्र जी, इस बार का संपादकीय पढ़कर तो रोगटें ही खड़े हो रहें हैं…
आपके सभी विषय बहुत ही अद्भुत होतें है.. बहुत से लोग इस मनोदशा से जूझते रहते हैं लेकिन कहने की हिम्मत भी नहीं कर पाते.. आपने अपनी कहानी मुझे मार डाल बेटा में कितने साल पहलें यह प्रश्न उठाया..
कभी कभी इच्छा मृत्यु कई लोगों के लिए बहुत जरूरी भी लगती है और कुछ कई बार बहुत ही असहज महसूस होती है यह सब घटनाएं.. मुम्बई में केईएम अस्पताल में एक औरत के लिए बहुत दिनों तक यह इच्छा मृत्यु पर बहस चलतीं रही थी.. मानसिक रूप से प्रताड़ित लोगों के लिए यह सही है पर कुछ लोग उसमें भी फायदा देख लेते हैं..
अपराजिता
सराहनीय लेख सर। मशीनीकरण के दौर में अब मृत्यु भी मशीन पर ही निर्भर हो गयी है। दुःखद😔 क्या इच्छा मृत्यु जैसे कानून उपयोगितावादी संस्कृति को बढ़ावा नही दे रहे हैं? क्या आज संतानों के पास अपने परिवार के रोगी के लिए भी समय नहीं है कि इच्छा मृत्यु देने वाली मशीन की आवश्यकता पड़ रही है? अब मौत भी पैसों से खरीदी जाने लगी है!
मीरा गौतम
तेजेन्द्र जी संपादकीय पढ़ने के बाद ‘इच्छा मृत्यु’ का प्रश्न उद्वेलित कर रहा है. यह आत्महत्या का ही दूसरा रूप है. स्विट्जरलैंड अपने मतदान के सन्दर्भ में ‘प्रत्यक्ष प्रजातंत्र ‘ की शासनप्रणाली के लिए जाना जाता है.
विभिन्न देशों के संविधान निर्माण में इसकी मानक भूमिका रही है. वहाँ ‘इच्छा मृत्यु’ की मशीन बन जाने की बात आपके संपादकीय में सामने आयी है.
आपने सही बात कही है कि क्या कहा जा सकता है कि कब मरीज़ ठीक हो जाए.भारत अंत तक आशावाद में विश्वास रखता है. डॉक्टर्स चमत्कार पर भी विश्वास रखते हैं. यह मानवीय प्रश्न है. मरने की इजाज़त नहीं ही दी जा सकती. साहित्य इस कारूणिक प्रश्न से सीधा सरोकार रखता है. एक शेर याद आ रहा है, “ऐसे बीमार का ख़ुदाहाफिज़, जिसकी हालत पे चारागर रोये ।” ‘इच्छा मृत्यु ‘ अमीर, ग़रीब और मरीज़ – यह सब बातें व्यथित कर रही हैं. संंपादकीय तसल्ली देने वाला है तेजेन्द्र जी. यह पोज़िटिव नज़रिया है.
राजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र भाई, अपने संपादकीय में इस विषय पर जितनी गहराई और सकारात्मकता के साथ अपनी बात कही है, सराहनीय है। शुभकामनाएँ भाई।
संजीव जायसवाल
भाई तेजेंद्र शर्मा जी,
इस बार आपने अपने संपादकीय में इच्छा मृत्यु जैसे गंभीर विषय को उठाया है और कई कोणों से उसकी पड़ताल भी की है। है
वास्तव में इच्छा मृत्यु उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकती है जो मृत्यु से भी बदतर कष्टकारी जिंदगी जीने के लिए मजबूर है। किंतु इच्छा मृत्यु का कानून उन्हीं देशों में सफल हो सकता है जहां कानून को सम्मान दिया जाता हो अन्यथा इसके दुरुपयोग होने की पूरी संभावना रहेगी। कानूनी कार्यों हेतु एफिडेविट और मेडिकल सर्टिफिकेट का महत्त्व बहुत होता है किंतु अपने देश में यह दोनों इतनी आसानी से और किस तरह बन जाते हैं यह एक ओपन सीक्रेट है।
कुछ वर्षों पूर्व एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आया था जिसमें डॉक्टर किसी भी मरीज के पागल होने का प्रमाण पत्र जारी कर देता था। अतः मुझे लगता है की इच्छा मृत्यु का कानून किसी भी इंसान को एक सम्मानजनक मृत्यु प्रदान कर सकता है किंतु भारत जैसे देश में इसका दुरुपयोग होने की की संभावना अत्यधिक रहेगी। पता है इसे लागू करने से पहले न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक मजबूत एवं पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है.
कल्पना मनोरमा
नमस्कार सर,
जीवन और मौत दोनों ही परवश मामला है लेकिन ईश्वर के बाद विज्ञान का नाम आना आज समझ आ रहा है। शर्मा जी सम्पादकीय पढ़ते हुए झुरझुरी सी महसूस होती रही क्योंकि मौत शब्द है ही इतना ठंडा। इस लेख को पढ़ें हुए सक्रिय और निष्क्रिय मौत और उसके लिए बनते बिगड़ते कानूनों के बारे में जानने को मिला। लेख पढ़ते हुए महसूस हुआ कि विज्ञान मानवीय जीवन में कितना भीतर तक अपनी पकड़ बनाता जा रहा है। आपको आभार नई और जरूरी जानकारी देने के लिए । टिप्पणी वहीं लिखना चाहती थी किंतु पोस्ट नहीं हुई।
राजेश कुमार
तेजेन्द्र भाई, इन्सान सबकुछ अपनी इच्छा से ही करना चाहता है l यहाँ तक की अपनी मृत्यु का ढंग और समय भी l प्रकृति.. या नियति.. या भगवान.. जो भी मानिये सर्वज्ञ है और उसके नियमों में छेड़छाड़ असम्भव है l इसका परिणाम भी भोगना पड़ता है l
हुकम रजायी चलणा, नानक लिखया नाल l
हानि-लाभ, जीवन -मरण, जस – अपजस विधि हाथ l
यतिन त्रिखा, फरीदाबाद
तेजेन्द्र जी, बहुत ही अच्छा लेख है।
किन्तु कुछ प्रश्न अभी भी हैं, जो बुद्धिजीवियों को असमंजस में बांधे हुए हैं।
सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न कि, आत्महत्या और इच्छा मृत्यु में सीमा रेखा क्या है? और इसे कौन और किन मानको से नियत करेगा?
आत्महत्या कई धर्मों में अपराध माना गया है, इस कारण से कई देश जो कि अधिक धार्मिक हैं उन में यह आपराधिक कृत्य माना जाता है।
चिकित्सा क्षेत्र में भी यह बहुत बड़ी नैतिक चुनोती रहती है कि किस व्यक्ति को इच्छा मृत्यु के योग्य माना जाए और किसे नही। एक भी गलत निर्णय को हत्या ही माना जाता है। ऐसी कई जटिल परिस्थियां रही हैं, जिन में व्यक्ति के ठीक होने की कोई आशा नही रहती पर उसे कृतिम तरीकों से जीवित भी रखा जा सकता है, और इच्छा मृत्यु के लिए वह अपनी स्वीकृति नही दे सकता, ऐसे में यह निर्णय कौन करेगा यह भी एक धर्म- संकट बन जाता है।
एक ओर इच्छा मृत्यु मानवता के लिए वरदान लगता है, दूसरी ओर इस कि स्वीकृति देना नैतिक और धार्मिक दोनो विषय मे चुनोती है।
धरती वसानी, लंदन
बहुत ही गहन विषय है ये तेजेंद्र जी और आपने बहुत ही अच्छा लिखा है। सबको सोचने पे मजबूर कर देने वाले आपके इस article ने मुझे भी झंझोड़ के रख दिया। मैं अपना विचार रख रही हूँ, please अगर आपको अच्छा ना लगे तो माफ़ कर दीजिएगा। 🙏🏻
मैं मानती हूँ कि मरना तो एक दिन सबको है ही पर कब ये पता नहीं। अगर कोई इंसान अपनी ज़िंदगी से तंग आ चुका हो या दूसरों पर totally dependant बन चुका हो उस इंसान के point of view से देखे तो इच्छा मृत्यु वो सही रास्ता है। हर इंसान को मरते दम तक अपना स्वाभिमान पसंद होता है लेकिन जब वो किसी और पे सारी बातों के लिए मौताज हो जाता है ना तो वो मरने की प्रार्थना ही करता है। सिर्फ़ वो ही नहीं उससे जुड़े हर कोई, जिसको भी उसकी सेवा करनी पड़ती है वो यही दुआ करते है। जब एक ही इंसान को हर तरफ़ से इतनी सारी negative energy मिलती है तो वो और क्या सोचेगा?
मोहन काँ. गौतम, नीदरलैंड
तेजेन्द्र जी, नीदरलैंड में मेरे तीन-चार मित्रों ने अपनी इच्छा से ही अपनी मृत्यु के लिए निवेदन किया था क्यों कि उनका शरीर काम ही नहीं करता था। सहायता करने वाला कोई नहीं था। इसे आत्म हत्या नहीं कहा जा सकता। अब तो नियम बन गए हैं कि किन स्थितियों में euthanasia जिसे हिंदी में ‘सुख मृत्यु’ भी कहते हैं दिया जा सकता है। वरना हम अमरीका की तरह abortion कब हो पर बाद विवाद करते रहेंगे। इसे भ्रूण हत्या नहीं स्त्री के बारे में भी सोचना होगा। समाज में पुरुष ही नहीं अपितु स्त्री का भी समान अधिकार है। इन्हें पुरुषों के बजाय ५१% प्रतिशत अधिकार देने चाहिए । जितना काम वह करती हैं पुरुष उनकी बराबरी नहीं कर सकता। उसे तो घर से बाहर दफ़्तर , मित्रों के साथ मनोरंजन और बना बनाया खाना मिलता रहता है। मैं भारत की स्थिति बता रहा हूँ। यूरोप में भी ऐसी ही स्थिति है। लोग पैतृक अधिकार ही मानते हैं जो आज की स्थिति में गलत है।
राम तक्षक, नीदरलैंड्स
तेजेन्द्र जी, नीदरलैंड्स में ईच्छा मृत्यु पर 2002 में ही कानून बन गया था। यह कानून तभी से लागू भी है।
यह एक बहुत ही पेचीदा विषय है। जिस पर विभिन्न स्तरों पर विमर्श आवश्यक है। इच्छा मृत्यु पर नीदरलैंड्स में अभी भी बहस जारी है।
शील निगम, मुम्बई
तेजेन्द्र जी आपका संपादकीय पढ़ा। बहुत कुछ याद आ गया…
जब परिवार में एक के बाद दूसरी आत्महत्या देखी तो मन बहुत विचलित हुआ। रिश्ते में वो माँ-बेटे थे पर मेरे बहुत करीबी थे। यह मेरा दुर्भाग्य था कि मैं उनसे मिल न पायी थी तो मन में यह व्यथा सदा समायी रहती थी कि किन परिस्थितियों में उन्होंने मृत्यु वरण का निर्णय लिया होगा हालांकि दोनों की मृत्यु में अंतराल था।
आज की दशा तो यह हो गई है कि सामूहिक आत्महत्या के साथ-साथ स्वैच्छिक मृत्यु-वरण के किस्से सामने आ रहे हैं।
मेरी जितनी भी जानकारी है, बस इतना कहना चाहूँगी कि जो जीवन इतना कठिन लगता है कि व्यक्ति मर जाना चाहता है तो मृत्यु के बाद, असामयिक मृत्यु का जो जीवन मृत्यु के बाद भोगना पड़ता है वह उससे भी कठिन होता है।
अरुण सभरवाल, लंदन
तेजेन्द्र जी, आपके संपादकीय ने बहुत से सवाल उठाये हैं। क्या सही है क्या ग़लत है कहना बहुत कठिन है। जब मैं ‘स्पेशल नीड्स ’ स्कूल में पढ़ाती थी, उन बच्चों की स्थिति और लाचारी को देख के मन में कई सवाल उठते थे, किंतु उसी पल उनकी एक मुस्कान से मुझे उत्तर मिल जाता था। फिर भी कहूंगी प्रत्येक की स्थिति को देखते हुए व्यक्ति को सम्मान से मरने का हक तो मिलना चाहिये । विचारणीय लेख के लिए हार्दिक बधाई हो।
स्मृति शुक्ला
तेजेन्द्र जी आपका नवीनतम संपादकीय पढ़ा… इच्छा-मृत्यु कितनी सही कितनी गलत ? इस प्रश्न का जवाब सही या गलत में नहीं हो सकता। परिस्थिति, देश, काल, और रोगी की मनोदशा क्या है… ये सारी बातें मायने रखती हैं।
मैंने कई ऐसे लोग देखे हैं जिनके जर्जर हो गए शरीर में असहनीय वेदना थी। अंगों ने काम करना बंद कर दिया था फिर भी वे जीना चाहते थे जबकि परिजन उनके मरने की प्रार्थना कर रहे थे। आपके इस लेख से मुझे कई नई जानकारियां मिली। इस हेतु धन्यवाद। आपने अमीर-ग़रीब का जो मुद्दा उठाया वह जायज़ है। एक ग़रीब को भी सम्मान पूर्वक कष्टरहित इच्छा मृत्यु पाने का हक होना चाहिए। निस्संदेह आप बहुत बढ़िया लिखते हैं।
सूर्यकान्त सुतार ‘सूर्या’, दार-ए-सलाम, तंजानिया
आदरणीय तेजेन्द्र जी,
कमाल का शोध कर आपने यह लेख लिखा हैं।
घुट-घुट कर बीमारी की हालत में रहकर घर वालों पर बोझ बने रहने से तो इच्छा मृत्यु कई गुना अच्छी ही हैं। परन्तु संभवतः यह कानून सभी देशों में लागू होना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। यह विषय जितना सरल है उससे कई ज्यादा गंभीर है परन्तु आपके लेख में सकारात्मकता अधिक मायने में दिख रही है जो कि शायद भविष्य में इसका कानून सर्वसम्मति से पारित हों जाए।आपकी मेहनत और लेख सराहनीय है। हार्दिक शुभकामनाएं आपको।
Sampat Singh Kothari, London
Dear Tejinderji
Your interpretation of the matter of Euthanasia has been so logical and thoughtful It’s Upto the Medico , Psychologist and the legal experts to give a shape
Thanks
शन्नो अग्रवाल, लंदन
आज आपने अपने संपादकीय में एक ऐसे गंभीर मुद्दे पर सवाल उठाया है तेजेन्द्र जी, जो हृदयग्राही होने पर भी इस विषय पर गंभीरता से सोचने को विवश करता है।
साधारणतया जब कोई अपनी जिंदगी से ऊब जाता है या शारीरिक तौर पर जिन्दगी से हताश हो जाता है तो अकसर ही हम लोग कहते हैं कि ‘हे ईश्वर, अब मुझे इस शरीर से छुटकारा दे दीजिये तो अच्छा हो’। इस पर परिजन कहते हैं ‘च्च, च्च, ऐसा अशुभ नहीं बोलना चाहिये’।
कौन चाहता है किसी अपने की मौत? किसी परिजन के बारे में ‘इच्छा मृत्यु’ का विचार ही विचलित कर देता है।
ऐसा निश्चय लेने से पहले इंसान के मन की कशमकश को हम समझ सकते है। लोग बहुत ही हिम्मत और सोच-विचार करने के बाद ही इस तरह का फैसला करते होंगे। सोचकर ही मन विदीर्ण होने लगता है और काँप उठता है।
लेकिन जब जीवन मृत्यु के बीच कोई झूल रहा हो, उसकी जिंदगी पूरी तरह से बोझ बन चुकी हो, उसकी तकलीफ अपनों से न देखी जा रही हो, उसके नॉर्मल होने की कभी कोई उम्मीद न बची हो, बस सांसें ही चल रही हों, इंसान जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा हो….तो एक प्रश्न उठता है कि क्या डॉक्टरों की सहायता से उसकी साँसों को रोक देना उचित रहेगा?
आजकल ‘इच्छा मृत्यु’ के केस कई देशों में होने लगे हैं। जैसे कि, नीदरलैंड, स्पेन, बेल्जियम, लग्जमबर्ग, कनाडा, आस्ट्रेलिया और कोलंबिया में इसकी कानूनी इजाजत दे दी गई है। न्यूजीलैंड में भी 8 नबम्बर 2021 को 65 फीसदी जनमत की सहमति से इसे कानूनी तौर से स्वीकार कर लिया गया है।
अब कई देशों में तमाम लोग किसी की दया पर न जीकर सम्मान से मरना ठीक समझते हैं। यू. के. और भारत में इसे लेकर अभी भी कशमकश है।
‘जब देह-दिमाग दगा दे जाये
जीना एक बंधन हो जाये
मौत के इंतज़ार में तब क्या
फिर भी जीना ठीक है?’
डॉ. रमा सिंह, ग़ाज़ियाबाद
तेजेन्द्र जी,
इच्छा मृत्यु का प्रश्न बहुत गंभीर है… निर्णय करना भी मुश्किल है। कानून बनाने के बाद इसका दुरुपयोग भी हो सकता है। मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना वाली स्थिति है।
पवन चौहान
सर बहुत जानकारीप्रद आलेख…
सच में इच्छा मृत्यु कई सवाल खड़े करती है… लेकिन जो व्यक्ति उन न झेल सकने वाली परेशानियों से गुजर रहा हो… उसकी पीड़ा जरूर उसे उस सम्मानजनक मृत्यु का ही रास्ता सुझाती होगी… पढ़कर कई जानकारियां मिलीं…
अनिल गांधी, फ़रीदाबाद (हरियाणा)
तेजेन्द्र भाई,
इच्छा-मृत्यु मनुष्य का मौलिक अधिकार होना चाहिए। आदमी दूसरों की मर्जी से संसार में आता है, अपनी मर्जी से जाने में भी दूसरों की मर्जी क्यों?
हां… शर्तें लगाई जा सकती हैं…
डा. तारा सिंह, गोरखपुर*
तेजेंद्र शर्मा जी ,
पुरवाई का संपादकीय ” इच्छा मृत्यु कितनी सही कितनी गलत?” पढ़ लिया।
इस बार संपादकीय लेख में आप द्वारा उठाया गया मुद्दा मानव जीवन इच्छा से उसके मृत्यु वरण करने से जुड़ी अति संवेदनशील, समसामयिक मुद्दा, हम सभी के लिए विचारणीय विषय है।
असाध्य रोगों से पीड़ित , मृत्यु के जबड़े में पहुंचा , रोगी के घोर कष्टमय जीवन के प्रतिफल स्वरू , रोगी की स्वयं की मृत्यु प्राप्त करने की इच्छा…
इच्छा मृत्यु यानी आसान सम्मानजनक मौत की उसकी आकांक्षा है । व्यक्ति की घोर कष्टों से मुक्ति पाने की इच्छा ( आकांक्षा ) को यानी इच्छा मृत्यु का कानूनी प्रावधान होना चाहिए ।
यूं अगर जीवन में चैन नहीं घोर असहनीय पीड़ा है इंसान को… तो उसे चैन से मौत तो मिले
आप द्वारा संपादकीय आलेख में उल्लेख किया गया है कि, स्विटज़रलैंड और कुछ अन्य देशों के नागरिकों को (जो मर्मान्तक दर्द में हैं… जिन्हें एक % भी जीवन शेष बचने की आशा न हो) इच्छा-मृत्यु मशीन पर बहुत ही आसान, सम्मानजनक मृत्यु प्राप्त करने हेतु कानूनी मंजूरी प्राप्त हो चुकी है।
भारत सहित दुनियां के बहुत से देशों में भी ऐसा कुछ नहीं है। और ब्रिटेन के 73 वर्षीय डेविड पेस (2019) जैसे कई व्यक्ति है जो ब्रिटेन से स्विट्जरलैंड में आसानी से मृत्यु प्राप्त कर चुके हैं ।
वैसे ही अब सुलभता पूर्वक… किसी भी अन्य देश का ऐसा व्यक्ति स्विट्जरलैंड में इच्छा मृत्यु पर्यटन पर जाकर अपनी इच्छा मृत्यु प्राप्त कर पाना आसान हो गया है। यह असाध्य रोगों से पीड़ित असहनीय दर्द से गुजरते हुए लोगों के लिए अच्छी ख़बर है। पर इसका लाभ तो अमीर वर्ग ही उठा सकता है।
गरीबों को तो वैसे भी , ऐसी असहनीय पीड़ा में भी, धनाभाव के कारण, उसकी नियति में घिसट-घिसट कर मृत्यु को प्राप्त होना लिखा हुआ… उसका दुर्भाग्य ही है।
गौरतलब है , इस आलेख के अंतिम पैरा में उल्लेख है कि कनाडा, बेल्जियम , नीदरलैंड आदि सहित अमेरिका के कई राज्यों में इच्छा मृत्यु के लिए कानूनी प्रावधान है।
अतः इसको संज्ञान में लेते हु , भारत को या अन्य देशों को भी इस गंभीर मुद्दे पर मानवीय कल्याण व दृष्टिकोण स , गहराई से विचार कर इच्छा मृत्यु पर कानूनी मंजूरी हो।
1981 में एक फिल्म आई थी “Whose Life is it Anyway” फिल्म इच्छा मृत्यु के (Euthanasia) मुद्दे पर बनायी गयी थी… इसके तथ्यात्मक पहलुओं को दर्शाया गया था।
आपका संपादकीय सारगर्भित, सार्थक, तथ्यात्मक आलेख इस मुद्दे पर अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह लेख बुद्धिजीवी वर्ग को मंथन करने के लिए प्रेरित करने में सक्षम है।
बहुत उम्दा आलेख… बहुत-बहुत बधाई आपको।
विरेन्द्र वीर मेहता
तेजेन्द्र जी, आपके संपादकीय में उठाया गया यह प्रश्न सहज ही विचारणीय है कि इच्छा मृत्यु कितनी सही, कितनी ग़लत है? हालांकि यह एक स्वाभाविक सी बात है कि जब भी मनुष्य किसी लाइलाज बीमारी में अथवा किसी अन्य असाध्य स्थिति में पहुंच जाता है तो वह जीने की अपेक्षा मृत्यु को वरण करना चाहता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि किसी भी स्थिति में इसे एक कानूनी निणर्य के तहत सर्व सुलभ क्यों बनाया जाए? भले ही यह एक निश्चित सी बात है कि असाध्य बीमारी की हालत में बरसों से डॉक्टर्स द्वारा हाथ खड़े करने पर ‘मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स’ हटाने की प्रक्रिया चली आ रही है।
बहरहाल इस विषय पर आपका संपादकीय न केवल सटीक वस्तुस्थिति सामने रखता है बल्कि कई सवालों पर सोचने के लिए विवश भी करता है। साधुवाद।
उर्मिला माधव
नमस्कार तेजेन्द्र जी
आप क्या सोचते हैं इच्छा मृत्यु को लेकर, मुझे तो भयावह लगता है।अब सही हो या ग़लत ये दीगर बात है पर कष्ट दायक तो है ही। ये एक बहुत मुश्किल सब्जेक्ट है क्या इस पर कहा जाए, समझ नहीं आता। क्या आप इसको सही मानते हैं ?
आपने बात तो ज़रूर रखी है लेकिन अपने ख़्याल नहीं कहे, आपको कितना ठीक लगता है ? और आम पब्लिक क्या कहती है?
शशि पाधा, अमरीका
तेजेंद्र जी, संपादकीय पढ़ा।
असली बात तो यह है कि कौन तय करेगा कि अब इस मरीज़ को मर जाना चाहिए ? डाक्टर , मरीज़ या परिवार ? कई असहाय या कमज़ोर लोग शायद अवसाद में आकर यह निर्णय के लें । मृत्यु प्राकृतिक ही हो क्यूँकि यही विधि का विधान है।
डॉ. ऋतु माथुर, प्रयागराज
आदरणीय आप के संपादकीय वैश्विक समाज के विभिन्न पहलुओं पर अपना दृष्टिकोण तो प्रस्तुत करते ही हैं, साथ ही तद्विषयक पाठकीय परिप्रेक्ष्य के माध्यम से वैचारिक आंदोलन को जागृत कर संबंधित समस्या का हल तथा पाठकों की सहमति और असहमति को भी व्यक्त करते हैं। इच्छा मृत्यु शब्द स्वयं में व्यापक अर्थ का संवहन करता है, जीवन रक्षक प्रणाली पर असहाय निरुद्देश्य समझा जाने वाला जीवन किसी भावनात्मक वह ईश्वर की महिमा पर विश्वास रखने वाले उसके किसी प्रियजन के लिए सोद्देश्य व अमूल्य भी हो सकता है, किंतु आज के अति व्यस्ततम,स्वार्थ व अर्थ प्रधान जीवन में जब लोगों के पास अपनों के लिए समय ही नहीं है, ऐसी स्थिति में वे इच्छा मृत्यु की व्यवस्था को वैध करार दे सकते हैं, किंतु जिस प्रकार प्रत्येक विषय के दो पहलू होते हैं सकारात्मक व नकारात्मक, तो जैसा की सर्वविदित है अपने स्वभावानुकूल, मानव अपने स्वभावानुकूल इसका दूसरा पक्ष ही अति शीघ्र अपनाएगा। फिर तो मृत्युवरण के विभिन्न रूप प्रचलन में आ जाएंगे, जिसमें आत्महत्या व हत्या को भी इच्छा मृत्यु का रूप प्राप्त हो जाएगा, किंतु यदि फिर भी यदि यह अत्यावश्यक हो, जैसे किसी का जीवन असहनीय रोग से ग्रस्त हो और इच्छा मृत्यु का विधान आवश्यक हो ,तो कड़े कानूनी नियमों का गठन व प्रावधान आवश्यक है,जिससे जीवन रूपी रण में इच्छा मृत्यु वह हथियार ना साबित हो, जिस का दुरुपयोग समाज में रही-सही संवेदना, संभावना का भी विनाश कर दे। इच्छा मृत्यु जैसे गंभीर विषय पर सार्थक संपादकीय के लिए साधुवाद।
इंद्रजीत, मुंबई
तेजेन्द्र जी इस बार का संपादकीय महत्वपूर्ण मुद्दा ले कर आया है। मगर क्या इसे प्रकृति के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए कि इंसान की पैदाइश भी उसके हाथ में हो और मौत भी। माना कि घिसट कर अथवा कष्टमय जीवन जीने से अच्छा है कि अपनी इच्छा से मौत का वरण कर लिया जाए।
बावजूद इसके ईश्वर की जो अवधारणा हमारे मन में  हजारों सालों से बनी है उसके अस्तित्व को लेकर भी सवाल पैदा हो सकता है। भारतीय धर्मशास्त्र के अनुसार पाप और पुण्य के फल को इंसान को इसी जीवन में भोगना होता है। तब तो जो पाप कर पूरे जीवन ऐश से बिताया हो और जब बीमारी या बुढ़ापे का कष्ट हो तो आराम से इच्छा मृत्यु के इस अधिकार से बिना कष्ट के ही इस दुनिया से रुखसत हो जाए। फिर तो ईश्वर की अवधारणा पर भी सवाल उठ जाएगा कि जो जैसा करेगा वैसा भोगेगा। उसे तो भोगने का मौका ही नहीं मिलेगा।

 

 

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