Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – मा-बदौलत ख़ुश हुए कामरा

यह पहली बार नहीं है कि किसी राजनीतिक नेता पर व्यंग्य कसा गया है। यहां कम से कम पैरोडी का इस्तेमाल हुआ है वर्ना चुनावी रैली में अरविंद केजरीवाल ने तो खुले रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘देशद्रोही’ कहा था। नेता लोग एक दूसरे के बारे में संसद के भीतर और बाहर कुछ भी अनाप-शनाप कह देते हैं। टीवी बहसों में तो किसी मर्यादा का ख़्याल नहीं रखा जाता। तो क्या एक ही शब्द जब अलग-अलग ज़बानों से निकलता है तो उसके अर्थ बदल जाते हैं।

कल औरंगज़ेब कुणाल कामरा से मिलने के लिये अपनी क़ब्र से विशेष रूप से बाहर निकल कर मुंबई पहुँचा। मुंबई पुलिस कुणाल कामरा को ढूंढ नहीं पाई थी, मगर 318 वर्ष पुरानी रूह के लिये यह काम मुश्किल नहीं था। 1707 के मार्च महीने में ही औरंगज़ेब की मृत्यु हुई थी। मगर उसकी रूह पर हमले 2025 में ही ज़ोरदार हुए। 
औरंगज़ेब की रूह की भी एक समस्या थी। वह सारी उम्र शराब या किसी भी अन्य प्रकार के नशे से दूर रहा मगर कुणाल कामरा के अड्डे पर जब औरंगज़ेब पहुँचा तो बंदा व्हिस्की में सोडा और बर्फ़ डाल कर बुलबुले गिन रहा था। औरंगज़ेब समझ नहीं पा रहा था कि कुणाल कामरा का धन्यवाद करे या फिर बिना बात किये वापिस चला जाए।  
इन्सान को मरने के बाद भी लोग चैन नहीं लेने देते। टीवी की बहस पर बैठने वाले पढ़े-लिखे जाहिल तो औरंगज़ेब की मौत को पाँच सौ साल पहले तक का दावा करते दिखाई देते हैं। एक हिन्दी की फ़िल्म बनती है और उसको देखकर आम आदमी और राजनीतिक दल अतिरिक्त रूप से सक्रिय हो जाते हैं। उनका बस चले तो वे औरंगज़ेब को ज़िन्दा करके दोबारा मारने के लिये भी तैयार हैं। 
ऐसे में कुणाल कामरा एक ऐसा चमत्कार कर देता है कि सबका ध्यान औरंगज़ेब से हटकर एकनाथ शिंदे, ग़द्दार, उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, देवेन्द्र फड़नवीस और हैबिटैट सेन्टर की तरफ़ मुड़ जाता है। औरंगज़ेब को कुछ समय के लिये राहत मिल जाती है। ऐसी महान हस्ती को शुक्रिया कहने में सबसे बड़ी बाधा है कुणाल कामरा के हाथ में व्हिस्की का गिलास। मुश्किल तो यह है कि 318 साल बाद भी औरंगज़ेब को यह समझ नहीं आया कि स्कॉच व्हिस्की का मज़ा क्या होता है। अच्छा तो यह होता कि कुणाल कामरा के साथ मिल कर एक पटियाला पेग औरंगज़ेब भी बना लेता और शाम को रंगीन बना लेता। 
मगर औरंगज़ेब तो ख़ुदा का बंदा था और कुणाल कामरा तो ना भगवान को माने, ना गॉड को और ना ही अल्लाह को। अब जोड़ी जमे तो कैसे जमे।… औरंगज़ेब ने दीवार की ओर देखा तो नाना पाटेकर कह रहा था – “कंट्रोल औरंगज़ेब, कंट्रोल!” और अनिल कपूर की तरह औरंगज़ेब भी समझ गया और अपने आप को कंट्रोल करने लगा। उसने कुणाल कामरा की ओर देखा और शाही अंदाज़ में बोला, “ऐ मेरी रियाआ में रहने वाले काफ़िर, मैं ख़ास तौर पर तुम्हें शुक्रिया अदा करने अपनी क़ब्र से बाहर निकल कर आया हूं। मैं तुम्हें दुनिया के शायर-ए-अव्वल का ख़िताब देता हूं। हमारे ज़माने में तो पैरोडी होती नहीं थी। तुम्हारी तो एक ही पैरोडी ने मेरी रूह के ऊपर से तमाम तनाव और दबाव हटा दिया। अल्लाह तुम्हें ज़िन्दगी के तमाम ऐशो आराम अता करें।”
कुणाल कामरा ने जीवन में ऐसे कोई काम कभी किये ही नहीं थे कि उसके साथ कोई इतने प्यार और ख़ुलूस के साथ बात करे। वो तो हमेशा विवादों में घिरा इन्सान रहा। पंगा लेना उसकी फ़ितरत है, और पंगा वह लेता रहता है। कई बार तो लगता है जैसे वह जर्मनी के ध्रुव-तारे से प्रकाश ग्रहण करता है। पिटते-पिटते बचा भी है… बचते-बचते पिटा भी है… मगर सुधरते-सुधरते सुधरा नहीं अब तक!
ज़ाहिर है कि पुरवाई के पाठक मुझसे यह सवाल अवश्य करेंगे कि संपादक महोदय, “ए तुसी कर की रहे हो जी? सीधे-सीधे हमे बताया जाए कि आख़िर हुआ क्या है!” तो मैं अब आपको बताने जा रहा हूं कि वास्तविक घटना क्या हुई। कुणाल कामरा एक तथाकथित स्टैंड-अप कॉमेडियन है। उसने फिल्म ‘दिल तो पागल है’ फ़िल्म के एक हिंदी गाने ‘भोली सी सूरत…’ की तर्ज़ पर एक पैरोडी गाई जिसमें महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर तंज़ कसा और उन्हें ‘गद्दार’ बताया।
मुझे नहीं पता कि आपको वो पैरोडी ऑनलाइन मिले या ना मिले। इसलिये पैरोडी यहां उद्धृत कर रहा हूं – ठाणे की रिक्शाठाणे की रिक्शा, चेहरे पे दाढ़ी, आंखों में चश्मा हायठाणे की रिक्शा, चेहरे पे दाढ़ी, आंखों में चश्मा हायएक झलक दिखलाए कभी गुवाहाटी में छिप जाएमेरी नज़र से तुम देखो ग़द्दार नज़र वो आए। ठाणे की रिक्शा, चेहरे पे दाढ़ी, आंखों में चश्मा हाय। मंत्री नहीं वो दलबदलू है और कहा क्या जाएजिस थाली में खाए उसमें ही छेद कर जाएमंत्रालय से ज्यादा फडणवीस की गोदी में मिल जाएतीर कमान मिला है इसको बाप मेरा ये चाहेठाणे की रिक्शाठाणे की रिक्शा, चेहरे पे दाढ़ी, आंखों में चश्मा हाय
कुणाल कामरा ने मामले में चुटकी लेते हुए पहले कहा, “शिवसेना, बीजेपी से बाहर आ गई… फिर शिवसेना, शिवसेना से बाहर आ गई… फिर एनसीपी, एनसीपी से निकली… एक मतदाता को 9 बटन दिए गए… हर कोई भ्रमित था! पार्टी की शुरुआत एक व्यक्ति ने की थी… वे ठाणे से आते हैं, जो मुंबई का एक बहुत बड़ा जिला है। इसके बाद कुणाल ने पैरोडी गानी शुरू की। 
इसके बाद कुणाल कामरा ने कहा, “ये उनकी राजनीति है। वे पारिवारिक कलह को खत्म करना चाहते थे… उन्होंने किसी के पिता को चुरा लिया! इसका क्या जवाब होगा? क्या मैं कल तेंदुलकर के बेटे से मिलूं, भाई, चलो डिनर करते हैं।  मैं तेंदुलकर की प्रशंसा करता हूं और उनसे कहता हूं, “भाई, आज से वे मेरे पिता हैं।”
बस, इसके बाद तो हंगामा हो गया… शिवसेना समर्थकों ने हैबिटैट सेंटर के उस स्टूडियो पर हमला कर दिया जिसमें ये वीडियो तैयार किया गया था। वहां का फ़र्निचर तोड़ डाला। पूरा कमरा तहस-नहस कर डाला।  
शिवसेना का आरोप है कि कामरा की पैरोडी की शुरुआत में ही डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के चेहरे के बारे में बात की गयी है। फिर उनके शिवसेना से बगावत कर विधायकों के साथ गुवाहाटी जाने की बात कही गई है। इसके अलावा उनके रिक्शा (ऑटो रिक्शा) चलाने और ठाणे के होने का भी ज़िक्र है। शिंदे ठाणे के रहने वाले हैं और पहले ऑटो रिक्शा चलाते थे। वहीं, शिंदे को गद्दार, दलबदलू और फड़णवीस की गोद में बैठने वाला बताया गया है।
हैरानी की बात यह है कि एकनाथ शिंदे के बारे में यह सब तो अजित पवार, उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, शिवसेना के टीवी प्रवक्ता भी कहते रहे हैं। उनको लेकर हंगामा क्यों नहीं हुआ। क्या राजनीतिक नेताओं को कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता है? क्या कुणाल कामरा की  समस्या यही है कि वह अकेला और कमज़ोर है। 
यह पहली बार नहीं है कि किसी राजनीतिक नेता पर व्यंग्य कसा गया है। यहां कम से कम पैरोडी का इस्तेमाल हुआ है वर्ना चुनावी रैली में अरविंद केजरीवाल ने तो खुले रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘देशद्रोही’ कहा था। नेता लोग एक दूसरे के बारे में संसद के भीतर और बाहर कुछ भी अनाप-शनाप कह देते हैं। टीवी बहसों में तो किसी मर्यादा का ख़्याल नहीं रखा जाता। तो क्या एक ही शब्द जब अलग-अलग ज़बानों से निकलता है तो उसके अर्थ बदल जाते हैं। 
कुणाल कामरा का विवादों से पुराना रिश्ता है। इसीलिये शिव सेना का आरोप है कि वर्तमान विवाद सुपारी लेकर खड़ा किया गया है। वही ऊद्धव सेना जो कंगना रणावत को मुंबई से बाहर निकालने का अभियान चलाती है और बी.एम.सी. के ज़रिये उसके बंगले पर बुलडोज़र चलवा देती है, आज अचानक कुणाल कामरा की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लेक्चर देती है। मगर टीवी डिबेट में उनके प्रवक्ता किशोर तिवारी ने तो शराफ़त की तमाम हदें पार कर दीं जब उन्होंने कहा, “अगर कोई बाला साहब ठाकरे या उनके पुत्र के विरुद्ध कुछ भी बोलेगा उसे उखाड़ फेकेंगे। हम किसी कानून वानून की परवाह नहीं करते।”

मगर कानून ने एक काम अवश्य किया कि कुणाल कामरा के सारे बैंक अकाउंट खंगाल डाले और पता लगाने का लगभग सफल प्रयास किया कि उसके अकाउंट में कहां-कहां से पैसा आ रहा है। इंटरनेट पर ऐसी बहुत सी जानकारी उपलब्ध हो रही है जिसके अनुसार पैसा भारत से भी आ रहा है और विदेशों से भी। विदेशी मुद्रा में दान लेना क्या किसी कानून के तहत अपराध है या नहीं इस पर भी विचार किया जा रहा है। कुणाल कामरा पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
पुरवाई पत्रिका का मानना है कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने हैबिटैट सेंटर में जो हिंसा और तोड़फोड़ की उस पर कानूनी कार्यवाही ज़रूरी है। 12 लोगों को गिरफ़्तार करने का नाटक अवश्य हुआ। मगर शाम तक सबको ज़मानत भी मिल गई। उनके नेता राहुल ने बरखा दत्त के कार्यक्रम में आकर बेशरमी से अपने कृत्य को सही ठहराया। बी.एम.सी. को भी अचानक पता चला कि हैबिटेट सेंटर में अनधिकृत निर्माण हुआ है। शाम तक उसके कर्मचारी हथौड़े लेकर उस अवैध निर्माण को तोड़ने पहुंच गये। 
जब नागपुर दंगों के मास्टर-माइंड फ़हीम ख़ान के घर पर बुलडोज़र चलाया गया तो बहुत से लोगों के दिल को तसल्ली मिली कि उत्पात करने वालों को सबक मिला। क्या हैबिटैट सेंटर में तोड़-फोड़ करने वालों पर भी बुल-डोज़र चलेगा? क्या उनसे हैबिटैट सेंटर की मरम्मत का मुआवज़ा देने का दबाव बनाया जाएगा? जो सरकार हथौड़े लेकर ख़ुद हैबिटैट सेंटर तोड़ने पहुंच गई, उससे किसी भी प्रकार के न्याय की उम्मीद की जा सकती है क्या? सुना है कि कुणाल कामरा भी किसी औरंगज़ेब की प्रतीक्षा कर रहा है जो उसकी जीवित आत्मा को शांति प्रदान कर सके!
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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37 टिप्पणी

  1. इस बार का संपादकीय कमाल है।

    अभिव्यक्ति की आजादी चिल्लाने वाले अब habitat centre के लिए लिखें और कामरा को कम से कम सांत्वना तो दें।

  2. संपादक और संपादकीय की यही खासियत होती है कि ज्वलंत मुद्दे या मुद्दों पर अवश्य लिखें।
    यहां भी इस बार के संपादकीय में ऐसा ही है।
    जो तथ्यात्मक ,व्यंग्यात्मक और सूचनात्मक है।
    आज की राजनीति का कुछ हाल भी ऐसा ही है।
    जनोन्मुखी मुद्दे भी कोई मुद्दे हैं,,मुद्दे तो वो हैं,,जो एक से दूसरे को भिड़वा दें और आम पब्लिक इन मुद्दों में ध्रुवीकरण का फ्लेवर भी ले।
    संपादकीय में वर्णित मुद्दा भी वैसा ही है।राजनीतिज्ञों पर तो व्यंग्य बाणों की बौछार होती ही आई है।यही तो फ्रीडम ऑफ स्पीच और लोकतंत्र का अहम घटक है जो जुगुनू की तरह हँसी और स्वस्थ मानसिकता का बैरोमीटर है।

    इस दशक से पहले तो ऐसा खूब होता था पर कोई इतना नहीं ख़ीज़ा कि फ़िज़ां को खिजां में बदल के रख दे और होता ख़लक तो देखती फलक की कहावत चरितार्थ हो रही है।
    यूं भी,बड़ी माफी के साथ,पत्रकारिता और पत्रकारों व्यंग्यकारों की पीढ़ी अब विदा हो चुकी है जो वर्तमान संपादकीय सरीखे संपादकीय को बेखौफ और कलात्मक अंदाज़ रोज़ ब रोज़,,,बा अदब बा मुलाहिज़ा लिखा करती थी।
    अल्लामा इकबाल साहब की रचना की पंक्तियां याद आ रही है
    न वो हुस्न में रही शोखियां
    न वो इश्क में रही गर्मियां
    न वो गजनवी की तड़प रही
    न वो खम है ज़ुल्फ ए अयाज़ में।
    जियो पुरवाई और ज़िंदा दिली से जियो।

    • भाई सूर्यकान्त जी आपको संपादकीय की व्यंग्यात्मक टोन पसंद आई – हार्दिक धन्यवाद। आपकी टिप्पणी ख़ासी क्रियेटिव है।

  3. बहुत सार्थक विश्लेषण । जिस तरह प्रस्तुति हुई, मेरे जैसे राजनीति से उदासीन और ये उदासीनता भी नेताओं की बेलगाम जबान के कारण ही आई है।

  4. राजनैतिक लोगों स्वतंत्र हैं अपने ही मौसेरे भाईयों पर बेबाक मुंह फट्ट टिप्पणी करने के लिए।

  5. इस बार का संपादकीय – ‘मा-बदौलत़ खुश हुए कामरा’ में संपादकीय अलग ही रंग में दिखा। संपादकीय में भी व्यंग्य रचा जा सकता है, है न आश्चर्य की बात। व्यंग्य जहां-तहां हो ऐसा भी नहीं है। शुरुआत से लेकर अंत की कुछ दूरी से पहले तक झडा़झड़ व्यंग्य। व्यंग्य भी कितनी खूबसूरती के साथ कहा गया है ‌। शायद इस विषय को कहने के लिए यही तरीका ठीक भी है।
    अगर इसे व्यंग्य के माध्यम से न कहा गया होता तो संपादकीय कैसा होता? बिलकुल भोंदू। काहे कि उसमें सरकार की लानत-मलामत होती और कामरा साहब के कसीदे कढे़ होते। लेकिन नहीं, आपने ऐसे पछीटकर मारा है कि दर्द में भी अहा निकल जाती है।
    क्या है कि हमारे यहां लोगों को चूंटियां लेकर रुलाने की बड़ी भारी आदत है। इतने पर भी न कोई रोए तो थोड़े देर पहले घटी घटना का जिक्र बार-बार करते हैं जिससे रोना आ जाए।
    आपने सच कहा है कि नेता आपस में कुछ भी कहते रहें वे बुरा नहीं मानते हैं। भाई उनके मुंह की तो नापतोल थोड़े है, पता नहीं वे आग उगलें या पानी। कामेडियन ने सच उगल दिया तो रिसा गए। ऐसा क्यों भाई? हमारे नेताओं को सच्चाई स्वीकार करनी आनी चाहिए। खैर, जो हो रहा है वो हो ही रहा है। कहते हैं न कि समासई के मरे को कहां तक रोएं।
    मैं और कुछ नहीं कह रहा हूं। मैं तो ये कह रहा हूं कि नई विधा का नया संपादकीय। बधाई आपको सर।

    • प्रिय भाई लखनलाल पाल जी, एक कहानीकार-संपादक को यह सुविधा रहती है कि वह अपने संपादकीय के साथ भी प्रयोग कर सकता है। मुझे लगता है कि यह ज़रूरी भी है। आपकी सारगर्भित टिप्पणी के लिये दिली शुक्रिया।

  6. तेजेन्द्र जी!

    अबकी बार का पूरा संपादकीय व्यंग्य शैली में है। हमने तो पढ़ा ही था कि आप व्यंग्यकार भी हैं। थोड़ा बहुत यदा-कदा पढ़ा भी, पर आज पढ़कर महसूस हुआ कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। वह कहावत है ना- ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ टाइप,
    और फिर ऐसा ही लग रहा था कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं-“ए तुसी कर की रहे हो जी?”
    लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़े तो वास्तविकता पता चली।
    बहरहाल अमर्यादित राजनीति के विद्रुप स्वरूप का एक छोटा सा ट्रेलर ही है यह और जनता की मजबूरी है इन्हें झेलना।जिन्हें जनता स्वयं चयन करती वे कितने अधिक अमानवीय और जाहिल हो जाते हैं।
    दरअसल बाद बिरादरी की है। नेता लोगों की अपनी एक बिरादरी है। एक दूसरे को चाहे कुछ भी कह सकते हैं, कहीं भी कह सकते हैं।आज एक कह रहा है कल दूसरा कहेगा। पर बिरादरी से अलग कोई कहे तो यह तो गलत है न! कैसे सहन हो सकता है?
    कहते हैं कि “स्वामी से सेवक अधिक कठोर होता है” यहाँ इसीलिए तो चमचे ही बजा देते हैं।
    इस समय कुणाल कामरा तो अभिमन्यु की तरह कौरवों के दिग्गजों के बीच में घिरा हुआ सा महसूस हो रहा है। बेचारे का न जाने क्या होगा! खुदा खैर करे।
    बिल्कुल अलग किंतु महत्वपूर्ण घटना की ओर संकेत करता संपादकीय है आपका। सत्य तो फिर सत्य है।
    इस अनोखे शैली से लिखे संपादकीय के लिए आपको बधाई देना तो बनता है।
    पुरवाई का आभार।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपको हमारा प्रयास पसंद आया, हमारे लिये ख़ुशी का बायस है। कहानीकार जब संपादक बनता है, प्रयोग करता ही रहता है। हार्दिक धन्यवाद।

  7. क्या बात है!
    इस व्यंग्य शैली में झाँकता एक गंभीर व्यंग्यकार नज़र
    आ रहा है! समसामयिक मुद्दे पर खुलकर कहना आपका स्वभाव है, उसमें भी कोई छुपम छुपाई नहीं!
    जो जिसको समझना हो समझे, हम तो स्पष्ट कहेंगे। अब शैली में तो समयानुसार परिवर्तित होना है।
    इतनी सुरुचि पूर्ण शैली में संपादकीय!!
    स्नेहिल बधाई व अभिनंदन
    जय माता की

    • बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर व्यंग्य शैली में लिखते हुए सच को सामने लाने के लिए आपको धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ। वास्तविकता का कोई अन्य रूप तो नहीं होता.. राजनीति में किंतु वास्तविकता के कई रूप दिखाई देते हैं। इस संपादकीय को पढ़ते हुए हँस रही थी.. और हँसते हुए विचार भी कर रही थी कि शांति क्यों नहीं स्थापित हो पाती है?
      साधुवाद

  8. वाह जी वाह, बहुत अच्छे-
    मुगरी से पीट-पीट कर कर दी धुलाई,
    पिटने वाले की मगर आवाज भी न आयी,
    मालूम नहीं पिटने से बस आएगी रुलाई
    या फिर इससे होगी थोड़ी बहुत सफाई?

  9. औरंगजेब के जमाने में क्रिकेट नहीं हुआ करता था. लेकिन आपकी संपादकीय पढ़ने के बाद औरंगजेब भी कब्र से निकलकर यही कहता आपने तो छक्का मार दिया.. मैं जिंदा होता तो आगरा आपके नाम कर देता.

  10. जी हर कोई चाहता है कि बाकी सब सुधर जाएं, वह अपनी जगह एकदम लोकतांत्रिक है और लोकतंत्र का भरपूर मजा और इस्तेमाल करके रहेगा।
    और अगर वह नेता है तो उसकी हर चीज़ अपनी तरह से पार्टी बदलते हुए सबको बदलते हुए बताने की भी छूट है, वह एक तरफ रहकर दूसरी तरफ वालों को गाली भी दे सकता है और लोकतांत्रिक भी रह सकता है।

  11. क्या खूब संपादकीय लिखा है! यों तो आप हमेशा अद्यतन विषयों पर लिखते हैं किंतु इस बार जिस मारक शैली का प्रयोग किया है, उससे लेख में एक अलग तरह की धार पैदा हो गई है। सुपारी लेकर हत्या करने की बात तो सुनी थी, सुपारी लेकर विवाद खड़े किए जाने वाली बात दमदार है। प्रस्तुत संपादकीय में आपका साहित्यकार पत्रकार पर हावी हो गया है। आपने खुद भी स्वीकार किया है ‘कहानीकार जब संपादक बनता है, प्रयोग करता ही रहता है।’ बहुत शुभकामनाएं! इसी प्रकार प्रयोग करते रहें, पाठक आपके लेखन से समृद्ध होते रहें।
    हार्दिक शुभकामनाएं

  12. जितेन्द्र भाई: आपके इस बार के तथ्यों और सूचनाओं से भरे व्यँगात्मक , सम्पादकीय ने तो मुँह का ज़ायका ही बदल किया। कैसे वही एक शव्द जब अलग अलग ज़ुबानों से निकलता है और कैसे उस के मायने बदल जाते हैं उसे आपने कितने बढ़िया अन्दाज़ से पेश किया है और इस नई सम्पादकीय खीर खिलाने के लिये आपको बहुत बहुत साधुवाद।

    • विजय भाई जब एक कहानीकार किसी पत्रिका का संपादक बन जाता है,वह अपने साहित्यकार रूप का इस्तेमाल करता ही है…

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