संपादकीय - भला कोई इतना महान कैसे हो सकता है...! 1
साभार : The Culture Trip

7 मई को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्मदिन था। भारतीय उच्चायोग में उनके जन्मदिन का समारोह मनाया गया। वहां उनके साहित्य पर बोलने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी। मेरे लिये यह एक अद्भुत अवसर था। गुरूदेव के माध्यम से मुझे अपने आप को एक लेखक के तौर पर समझने का अवसर मिला। मन में बार बार एक ही सवाल उभर कर आ रहा था… “भला कोई इतना महान केसै हो सकता है?” उनका जीवन हर लेखक के लिये एक चुनौती है। गुरूदेव एक इन्सान, एक कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, नाटककार, अध्यापक, दार्शनिक, देश प्रेमी के रूप में इतने श्रेष्ठ हैं कि बाक़ी तमाम लेखक उनके सामने बौने दिखने लगते हैं। उनके जन्मदिन पर पुरवाई परिवार उन्हें याद करता है और उनके जीवन से कुछ न कुछ सीखने का वादा करता है – संपादक 

कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका नाम लेते ही श्रद्धा से सिर ख़ुद ही झुक जाता है। उन्हीं में से एक नाम है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर। साहित्य में कवि, गीतकार, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार जैसे अलग अलग विधाओं से जुड़े लोग होते हैं। मगर रवीन्द्रनाथ टैगोर ये सब थे। उन्होंने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक और लेख जैसी तमाम विधाओं में समान रूप से महारथ हासिल की।
युनेस्को ने वर्ष 2011 को रवीन्द्रनाथ टैगोर, पाबलो नेरूदा और फ़्रेंच कवि एमी सिज़ेयर का साल घोषित किया था। इन तीनों कवियों ने अपने-अपने तरीके से उच्च मानवतावादी मूल्यों को अपनी कविताओं में पिरोया। युनेस्को के अनुसार, “उन्होंने वर्चस्व और अधीनता पर आधारित संबंधों को चुनौती दी चाहे वे उपनिवेशवाद, फ़ासीवाद या नस्लवाद से जुड़े हों। उनके संदेश Universal Dimensions के आयाम प्राप्त करते हैं।” 
यदि गुरूदेव को गीतांजलि के लिये साहित्य का श्रेष्ठतम सम्मान नोबल प्राइज़ मिला तो उन्होंने हमें गोरा और चोकर बाली जैसे उपन्यास और काबुलीवाला जैसी श्रेष्ठ कहानी भी दी। टैगोर ने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उजागर हो के आता है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रकृति से अध्यात्मवाद तक के विभिन्न रसों को बखूबी उकेरा है।
रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861, कलकत्ता में  हुआ था। उनके पिता देबेंद्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज के नेता थे। टैगोर को गुरूदेव के नाम से भी जाना चाहता है। टैगोर के पिता ने उन को कानून की पढ़ाई के लिए लंदन में  दाखिला कराया था। परंतु उन का रुझान तो साहित्य की ओर होने के कारण वह 1880 में भारत लौट आए थे और अपना पूरा जीवन साहित्य को समर्पित कर दिया।
टैगोर केवल साहित्यकार ही नहीं थे… वे संगीतज्ञ, चित्रकार, अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, शिक्षक, देशभक्त और समाज सुधारक और न जाने क्या-क्या थे। 1901 में उन्होंने शांतिनिकेतन की स्थापना भी की। 
टैगोर के साहित्य की विविधता और प्रचुरता का उल्लेख करते हुए, बुद्धदेव बोस ने “An Acre of Green Grass” में घोषणा करते हुए कहा है कि, “बात यह नहीं है कि उनके लेखन में एक लाख पन्नों की छपाई शामिल है, जिसमें साहित्य के हर रूप और पहलू को शामिल किया गया है, हालांकि यह मायने रखता है: मगर मुख्य बात यह है कि वे एक स्रोत है, एक झरना है, जो सौ धाराओं में बहता है, एक सौ लय है।… लगातार।”
भारत के पहले प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा है, “टैगोर और गांधी निस्संदेह बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दो उत्कृष्ट और प्रभावशाली व्यक्ति रहे हैं। … [टैगोर का] भारत के दिमाग पर, और विशेष रूप से लगातार बढ़ती पीढ़ियों पर प्रभाव जबरदस्त रहा है। बंगाली ही नहीं, जिस भाषा में उन्होंने खुद लिखा, बल्कि भारत की सभी आधुनिक भाषाओं को उनके लेखन से आंशिक रूप से ढाला गया है। किसी भी अन्य भारतीय से अधिक, उन्होंने पूर्व और पश्चिम के आदर्शों में सामंजस्य बिठाने में मदद की है और भारतीय राष्ट्रवाद के आधार को व्यापक बनाया है।”
क्योंकि गुरूदेव स्वयं संगीत के ज्ञानी थे इसलिये वे अपनी कविताओं में शब्दों का चयन ध्वनियों के अनुसार करते थे। उनके गीत संग्रह गीताबिटन में करीब 2,265 गीत शामिल किये गये थे जिनकी धुन भी गुरुदेव ने स्वयं ही तैयार की थी। उन्होंने इन गीतों को ख़ुद ही गाया भी था। उन्होंने बांग्ला संगीत में एक नयी धारा की शुरूआत की जिसे रवीन्द्र संगीत के नाम से जाना जाता है। 
गुरूदेव की पहली गीतों की उल्लेखनीय पुस्तक, संध्या संगीत (१८८२; “शाम के गीत”), बंकिम चंद्र चटर्जी की प्रशंसा जीती। टैगोर ने बाद में अपनी यादों में लिखा, “शाम के गीतों में अभिव्यक्ति की मांग करने वाले दुख और दर्द की जड़ें मेरे अस्तित्व की गहराई में थीं।” पुस्तक के बाद प्रभात संगीत (१८८३; “सुबह के गीत”) थे, जिसमें उन्होंने अपने आस-पास की दुनिया की खोज पर अपनी खुशी का जश्न मनाया। नया मूड एक रहस्यमय अनुभव का परिणाम था जो उसने एक दिन सूर्योदय को देखते हुए किया था: “जैसा कि मैंने देखना जारी रखा, अचानक मेरी आंखों से एक आवरण गिर गया, और मैंने पाया कि दुनिया एक में नहाती है। अद्भुत चमक, हर तरफ सुंदरता और खुशी की लहरों के साथ। यह चमक एक पल में मेरे दिल में जमा हो गई उदासी और निराशा की तहों में घुस गई, और इस सार्वभौमिक प्रकाश से भर गई।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अपने समकालीन पश्चिमी देशों के कवियों एवं आलोचकों के साथ भी साहित्यिक मित्रता थी। William Butler Yeats, Ezra Pound, Stopford Brook, Andrew Bradley वगैरह उनकी गीतांजली के पहले पाठकों में से थे। उनके अंग्रेज़ी अनुवाद को लंदन में टाइप करवाने का काम उस समय के चित्रकार William Rothenstein ने किया था। नवंबर १९१२ में, इंडिया सोसाइटी ऑफ लंदन ने गीतांजलि की ७५० प्रतियों का एक सीमित संस्करण प्रकाशित किया, जिसमें येट्स द्वारा एक परिचय और लेखक के एक पेंसिल-स्केच को रोथेंस्टीन द्वारा फ्रंटपीस के रूप में प्रकाशित किया गया था।
गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर अकेले ऐसे कवि हैं जिन्होंने तीन-तीन देशों का राष्ट्रगीत लिखा है – भारत के लिये जन गण मन अधिनायक जय हे… बांग्लादेश के लिये आमार सोनार बांगला…आमि तोमाय भालबासि… और श्रीलंका के लिये नमो नमो माता… इन तीनों राष्ट्रगानों पर ध्यान देने पर हम पाएंगे कि गुरूदेव अपने इन गीतों में देशभक्ति की बात न करते हुए मातृभूमि की वंदना की बात करते हैं। 
हम आज इस महान हस्ती को याद करते हुए नमन करते हुए एक ही बात सोचते हैं – भला कोई इतना महान कैसे हो सकता है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

25 टिप्पणी

  1. संक्षिप्त परंतु सारगर्भित आलेख। कवि गुरु न केवल बंगाल के प्राण सूक्त हैं बल्कि भारतीय संस्कृति एवं अस्मिता की सशक्त पहचान हैं।यूँ तो भारतीय साहित्य का इतिहास ऋग्वेद से आरंभ है पर विश्वव्यापी मान्यता इसे कवि गुरु ने ही दिलाई। गीतांजलि के एक एक कविता स्वयं में एक एक ग्रंथ है। मुझे हर्ष है कि मैंने इसका छांदस अनुवाद किया।

    • भाई सुरेश जी आपका साहित्यिक अवदान अद्भुत है। आप पुरवाई के संपादकीय पढ़ने और टिप्पणी करने के लिए समय निकालते हैं, विशेष धन्यवाद।

  2. सारगर्भित जानकारी । महान साहित्यकार विलक्षण प्रतिभा के धनी गुरूदेव को शत शत नमन । आपकी लेखनी को नमन ।

    • धन्यवाद पद्मा जी। आपके साथ मिल कर पुरवाई परिवार भी गुरुदेव को शत शत नमन करता है।

  3. गुरुदेव को हृदयतल से नमन
    नमस्कार एवं अशेष अभिनंदन आपको।
    कोई इतना महान कैसे हो सकता है?प्रश्न के साथ उत्तर भी आपके लेख में निहित है।
    सुंदर संपादकीय के लिए आपका धन्यवाद

  4. गागर में सागर सा संपादकीय लिखकर जानकारी बढ़ाने के लिए आभार। वास्तव में रविंद्र नाथ ठाकुर गुरुदेव ही हैं। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा को हृदय से नमन।

    • शैली जी आप अपनी टिप्पणी से पुरवाई संपादकीय का मान बढ़ाती हैं। धन्यवाद।

  5. ये बात सचमुच विस्मित करती है- के कोई ऐसा कैसे हो सकता है! शायद इस लिए ही कि वो लोगों को समाज को ये आश्वासन दिला सके के ऐसा भी हुआ जा सकता है!
    गुरुदेव पर एक डॉक्युमेंटरी बनाते हुए उनके बारे में जानकारी एकत्रित करते हुए यही विचार मेरे मन में आया था के कोई आदमी इतना सब कुछ कैसे हो सकता है!

    https://youtu.be/PPKKtni3uko

    • गुरुदेव के बार में जितना जानते जाएंगे उतना ही अपने भीतर के अहम से मुक्ति पा सकेंगे…

  6. गुरुदेव टैगोर के विषय में आपने कई अद्भुत जानकारी उपलब्ध कराई हैं। सच्चा लेखन वह है जो “क्यों” को प्रस्तुत करे तो उसका उत्तर भी दे। इस कसौटी पर आपका सम्पादकीय खरा उतरता है। कोई एकसाथ सब कुछ कैसे हो सकता है, इस प्रश्न का समाधान भी अपने बख़ूबी उपस्थित किया है।
    वस्तुत: गुरुदेव के व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषताएँ बारिश की अनगिनत बूँदों के समान हैं, जिसका आनन्द नैसर्गिक है और प्रभाव शाश्वत।
    आदरणीय तेजेन्द्र जी ! अनुपम सम्पादकीय के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें।

    • आदरणीय शशि मैम, जब आप जैसा गुणी एवं अनुभवी व्यक्ति ऐसी ख़ूबसूरत टिप्पणी करता है तो हौसला तो बढ़ता ही है। बहुत बहुत धन्यवाद।

  7. Thank you Tejendra Ji for remembering Tagore so reverently in your Editorial.
    He was a man of great genius n a literary figure of a very high order.
    One of his own kind.
    It is a matter of great pride for us that three countries use his songs as their National Anthems: India,Bangla Desh and Sri Lanka.
    I must admit I did not know about Bangladesh and Sri Lanka also using his songs.
    It is also heartening to learn that you were given this honour to speak about him in this celebratory event held on Tagore’s birthday.
    Please accept my congratulations and regards.
    Deepak Sharma

  8. सम्पादकीय पर टिप्पणी —
    समृद्ध विचारों की संवेदना भरी सम्पादकीय में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर पर समग्र पढ़कर अच्छा लगा ।गुरुदेव का बहुआयामी सृजन एक समुद्र है जिसकी थाह नहीं मिल सकती ।
    गीतांजलि की कविताओं का फलक
    बहुत विस्तृत है उनके बारे में लिखते हुए एक बंगला कविता का हिंदी अनुवाद याद आ रहा है
    “जाने के दिन यह बात
    मैं कहकर जाऊँ,यहाँ जो कुछ देखा
    -पाया उसकी तुलना नहीं।
    ज्योति के इस सिंधु में ,जो शतदल कमल शोभित हैं उसी का मधु पिता रहा इसलिए मैं धन्य हूँ ।
    गुरुदेव को बहुमुखी प्रतिभा से निर्मित कर मानो ईश्वर ने धरा पर भेजा हो इसलिए ऐसे महापुरुष
    प्रकृति के उपहार कहे जाते हैं ।
    आपने सही कहा “कोई कैसे इतना
    महान हो सकता है” ।
    इति
    डॉ प्रभा मिश्रा
    Dr prabha mishra

    • प्रभा जी आपको संपादकीय पढ़ने के बाद गुरूदेव की कविता याद हो आई… शायद यही इस संपादकीय की विशेषता है। उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद।

  9. सचमुच अद्भुत अप्रतिम अनोखा व्यक्तित्व था गुरुदेव का.. विलक्षण प्रतिभा के धनी ऐसे युगपुरुष को नमन

  10. गुरुदेव की महानता सचमुच चकित करती है। वे निसंदेह महान विभूति थे। उन्हें नमन!
    बहुत अच्छा आलेख। सहज- सरल एवं सारगर्भित।

  11. बहुत अद्भुत चमत्कारिक विलक्षण प्रतिभा के धनी थे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर । साहित्य के पितामह कहूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । इतनी विधाएं इतना अलौकिक लेखन , शब्द और स्वर का सम्मिश्रण… नमन है साहित्यिक विभूति को और आपकी कलम को भी , जो इतनी सहजता से समग्रता को दर्शा देती है । पुरवाई के हर अंक की तरह हर बार नया रंग मिलता है , देखने और पढ़ने को आपकी बेबाक टिप्प्णी के रुप में ।

    • विजय लक्ष्मी आपकी सार्थक टिप्पणी, पुरवाई परिवार के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आपको हमारे संपादकीय पसंद आते हैं, जान कर हौसला अफ़ज़ाई हुई।

  12. बहुत सधा हुआ तथा अद्भुत संपादकीय! इतने बड़े आकाश को अंजुरी में समेट पाना अपने आप में कमाल जैसा लगता है। मैं इस संपादकीय को अपने कलर नोट में सुरक्षित कर रहा हूं ताकि आगे इसका उपयोग किया जा सके।
    – कमलेश भट्ट कमल

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