संपादकीय - विल स्मिथ के थप्पड़ की गूंज 1
फोटो साभार : Los Angeles Times

पुरवाई पत्रिका किसी भी प्रकार की हिंसा के विरुद्ध है। मगर हमारा मानना है कि जो काम क्रिस रॉक ने किया वो भी किसी हिंसा से कम नहीं है। कॉमेडी का पहला उसूल होता है कि कभी भी किसी पर निजी तंज़ नहीं कसा जाता। एक महिला किसी बीमारी से जूझ रही है और आप उसका एक करोड़ सत्तर लाख लोगों के सामने मज़ाक उड़ाएं यह भी उतनी ही बड़ी हिंसा है जितनी कि विल स्मिथ द्वारा लगाया गया थप्पड़।

सुभाष घई की फ़िल्म कर्मा में जब जेलर राणा विश्वप्रताप सिंह (दिलीप कुमार) जेल में डॉ. डैंग (अनुपम खेर) को थप्पड़ मारता है तो डॉक्टर डैंग ग़ुस्से में फुफकार उठता है, “राणा विश्वप्रताप सिंघ, डॉक्टर डैंग क्रिएट्स वॉर, डॉक्टर डैंग को आज पहली बार किसी ने थप्पड़ मारा है, फ़र्स्ट टाइम… इस थप्पड़ की गूंज सुनी तुम ने… अब जब तक तुम ज़िन्दा रहोगे इस गूंज की गूंज तुम्हें सुनाई देगी…”
कुछ ऐसी ही एक गूंज 27 मार्च को अमरीका में सुनाई दी थी जब ऑस्कर अवार्ड समारोह में एक बहुत बड़े स्टार विल स्मिथ ने कॉमेडियन क्रिस रॉक को एक थप्पड़ जड़ दिया था। ज़ाहिर है कि कोई भी इस हादसे के लिये तैयार नहीं था और पूरा सभागार सन्नाटे में रह गया था। 
इस घटना के बाद एक अजब सा अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो गया। भारत के भी कुछ तथाकथित फ़िल्मी एक्सपर्ट एक अजब सी बात ले उड़े कि विल स्मिथ का क्रिस रॉक को थप्पड़ मारना भी एक स्क्रिप्ट का हिस्सा था। इन दोनों कलाकारों ने इस सीन को करने की भारी रकम वसूल की होगी। क्योंकि ऑस्कर समारोहों में तो कोई भी काम लिखे हुए स्क्रिप्ट से हट कर हो ही नहीं सकता।
मगर यह सवाल पूछना तो बनता ही है कि आख़िर विल स्मिथ जैसे वरिष्ठ कलाकार ने ऐसी हरक़त भला की क्यों? 53 वर्षीय विल स्मिथ इस समय हॉलीवुड के सफलतम कलाकारों में से एक हैं। उन्हें अकादमी अवार्ड, बाफ़ता अवार्ड, गोल्डन ग्लोब अवार्ड, स्क्रीन एक्टर्स गिल्ड अवार्ड और ग्रैमी अवार्ड मिल चुके हैं।. 
‘मेन इन ब्लैक’ सीरीज़ की तीनों फ़िल्मों की सफलता में विल स्मिथ के काम का बड़ा योगदान है। वे एक लोकप्रिय रैप सिंगर भी रहे हैं। बॉक्सर मुहम्मद अली के जीवन पर आधारित फ़िल्म ‘अली’ के लिये उन्हें ऑस्कर सम्मान के लिये नामित किया गया था। 2021 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘किंग रिचर्ड’ के लिये विल स्मिथ को ऑस्कर सम्मान दिया गया और इसी सम्मान समारोह में यह हादसा हो गया। 
दरअसल विल स्मिथ की पत्नी जेडा पिंकेट स्मिथ को एलोपेशिया नामक बीमारी है जिससे सिर के बाल उड़ जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी से कई बार तो पूरे शरीर के बाल तक उड़ जाते हैं। इस बीमारी के चलते जेडा के सिर के बाल भी पूरी तरह से उड़ गये और वह गंजी हो गयी हैं। लोगों का मानना है कि एलोपेशिया बीमारी का कारण स्ट्रेस होता है। हालांकि इसके लिये कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं मिलते हैं। एलोपेशिया के इलाज के लिये डॉक्टर उसको कोर्टीज़ोन स्टीरॉयड जैसी दवा देते हैं जिससे पीड़ित के बाल वापस लाए जा सकें।
कार्यक्रम के दौरान क्रिस रॉक ने जेडा के गंजेपन का मज़ाक उड़ाया तो विल स्मिथ को ग़ुस्सा आ गया। वह अपने स्थान से उठा और उसने क्रिस रॉक को अपनी पत्नी का मज़ाक उड़ाने के लिये एक थप्पड़ जड़ दिया। 
बाद में विल स्मिथ ने अपने कृत्य के लिये माफ़ी भी मांगी। घटना के पांच दिन बाद 1 अप्रैल को विल स्मिथ ने अकादमी से इस्तीफ़ा दे दिया। इस तरह उन्होंने अकादमी को उन्हें निष्कासित करने के मौके से वंचित कर दिया। 
अपने त्यागपत्र में स्मिथ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, “अकादमी की अनुशासनात्मक सुनवाई नोटिस का सीधे जवाब दे दिया है। मैं अपने आचरण के लिये किसी भी तरह के परिणामों को पूरी तरह से स्वीकार करूंगा। 94वें अकादमी पुरस्कार समारोह में मेरी हरकत चौंकाने वाली, दर्दनाक और अक्षम्य थीं।”
विल स्मिथ ने यह भी कहा कि, “मैंने अकादमी के विश्वास को धोखा दिया है। मेरे आचरण ने अन्य नामांकित व्यक्तियों और विजेताओं को उनके असाधारण काम के लिये जश्न मनाने के अवसर से वंचित कर दिया। मेरा अपना दिल भी टूट गया है।”
मोशन पिक्चर अकादमी ने इस हादसे का संज्ञान लेते हुए विल स्मिथ पर दस वर्षों तक अकादमी के किसी भी कार्यक्रम में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। और विल स्मिथ ने शालीनता से इस सज़ा को स्वीकार भी किया है। 
मगर बहुत से लोगों का मानना है कि विल स्मिथ को बहुत हल्की सज़ा दी गयी है। दरअसल उन पर इरादतन हमले का इल्ज़ाम लगाया जाना चाहिये था। अगर हम जैसे किसी आम इन्सान ने यह हरकत की होती तो हम जेल में बैठे होते और ज़मानत की प्रतीक्षा कर रहे होते। विल की हरकत के कम से कम एक करोड़ सत्तर लाख दर्शक गवाह हैं। 
क्रिस रॉक के भाई केनी का मानना है कि विल स्मिथ से ऑस्कर वापिस ले लेना चाहिये जबकि कुछ और लोगों का कहना है कि उन पर मुकद्दमा चलाया जाना चाहिये। मगर कॉमेडियन क्रिस रॉक ने कहा कि वह मामले को बढ़ाने के पक्ष में नहीं है।
एक तरह से देखा जाए तो यह सज़ा उम्र भर के प्रतिबन्ध की ही मानी जा सकती है। दस साल बाद अचानक विल स्मिथ अकादमी के कार्यक्रमों में वापसी कैसे कर पाएंगे।
इस हादसे से हमें अमरीकी लोगों की मानसिकता के बारे में भी कुछ जानने को मिलता है। उन्होंने विल स्मिथ द्वारा की गयी हिंसा की एक सुर में आलोचना की। वहीं कॉमेडियन क्रिस रॉक की प्रतिक्रिया की जम कर तारीफ़ की गयी। 
पुरवाई पत्रिका किसी भी प्रकार की हिंसा के विरुद्ध है। मगर हमारा मानना है कि जो काम क्रिस रॉक ने किया वो भी किसी हिंसा से कम नहीं है। कॉमेडी का पहला उसूल होता है कि कभी भी किसी पर निजी तंज़ नहीं कसा जाता। एक महिला किसी बीमारी से जूझ रही है और आप उसका एक करोड़ सत्तर लाख लोगों के सामने मज़ाक उड़ाएं यह भी उतनी ही बड़ी हिंसा है जितनी कि विल स्मिथ द्वारा लगाया गया थप्पड़।
भारत में तो हास्य कलाकारों ने कॉमडी के स्तर को बहुत निचले स्तर पर ला खड़ा किया था जब वे द्विअर्थी संवाद बोलने लगे थे… “मेरा पकड़ो न जी… हाथ!” वे दक्षिण भारतीय लोगों के बोलने के अंदाज़ का मज़ाक उड़ाते थे। आजकल भी बहुत से स्टैण्ड अप कॉमेडियन भारत में यही कर रहे हैं। इस बोलचाल की हिंसा से भी निपटना ज़रूरी है। आजकल कपिल शर्मा शो में तो निरंतर किसी के छोटे क़द और किसी के मोटे बदन पर भद्दी टिप्पणियां करके हास्य पैदा करने का प्रयास होता रहता है। 
यह तो अच्छा है कि क्रिस रॉक ने एक महिला की बीमारी पर मज़ाक अमरीका जैसे देश में किया। वरना दुनिया में कुछ ऐसे देश भी हैं जहां उस महिला के पति केवल थप्पड़ नहीं मारते, सीधे गोली मार देते। हमें याद रखना होगा कि द्रौपदी द्वारा धृतराष्ट्र के अंधेपन पर बोले गये एक हिंसक वाक्य ने दुर्योधन के मन में इतनी घृणा भर दी थी कि महाभारत का युद्ध तक हो गया था। 
जहां हमें विल स्मिथ के आचरण की निंदा करनी चाहिये वहीं क्रिस रॉक के व्यवहार की भी भर्त्सना करनी होगी। किसी भी कॉमेडियन को यह हक़ नहीं कि वह किसी भी महिला के रूप पर कोई भद्दी टिप्पणी करे। भारत में हर शक्ति का प्रतीक एक महिला है। आजकल नवरात्रे चल रहे हैं। ऐसे में किसी भी महिला के प्रति अशोभनीय टिप्पणी पर हर भारतीय को प्रतिक्रिया अवश्य देनी चाहिये। यदि अकादमी द्वारा क्रिस रॉक पर भी दस वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया जाए तो अनुचित नहीं होगा।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

21 टिप्पणी

  1. बिलकुल सही कहा आपने । क्रिस रॉक को भी वही सजा मिलनी चाहिए । बहुत बड़ा अपराध है किसी की भावनाओं का मज़ाक़ उड़ाना ।
    अक्षम्य!
    कितना दर्द उठा होगा कि वह अपने आपे को खो बैठा । वैसे हमारे भी चहेते हैं विल स्मिथ।
    In pursuit of happiness’ is my favourite film . बहुत ही बेहतरीन अदाकारी । पढ़कर दुख हुआ ।

  2. Congratulations Tejendra ji for this objective analysis of the unexpected turn of events at the Oscar Ceremony.
    Rock’s joke was in bad taste even as Smith’s reaction was. So very rightly you have pointed out how insensitive jeering can cause deep hurt and also incite uncontrollable wrath.
    You have also given the analogy of Draupadi’s jeering barb leading to the great battle of Mahabharata. Indeed, jeering should never come close to truth.
    Regards

  3. ऑस्कर में हुई इस दुर्घटना के दोनों पक्षों को आपने सविस्तार बताया और पाठकों के लिए एक प्रश्न छोड़ दिया, अपने अनोखे अंदाज़ में.मुझे विल स्मिथ की कोई गलती नज़र नहीं आती, कोई भी ऐसी हिमाकत को आसानी से बर्दाश्त नहीं कर सकता. अमरीकी मानसिकता तो मेरे समझ से सदा ही परे रही है, ये लोग मनुष्य न रह कर बस professional रह गये हाँ, तर्क और हृदय कहीं पीछे छूट गया है । क्रिस रॉक को स्वयं आगे बढ़ कर अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए थी, अगर मानवता होती. किसी प्राकृतिक कारण से बीमार, अपंग या विरूप स्त्री हो या पुरुष, उसका मज़ाक उड़ना अमानवीय हृदय हीनता है। महिला को मैं किसी अलग खाँचे में रखने की पक्षधर नहीं हूँ, एक समान्य नियम पुरुष और महिला पर लागू होने चाहिये यदि समाज को संतुलित रखना है। विशेष परिस्थितियों में, जैसे गर्भावस्था, शिशु के साथ होना आदि, में कुछ वरीयता दी जानी चाहिए, अन्यथा जब तक हम स्त्री – पुरुष को दो अलग अलग स्केल से नापते तौलते रहेंगे, विषमता और शोषण होता रहेगा।

  4. तेजेन्द्र जी आपकी टिप्पणी बहुत संतुलित है। हिंसा का प्रत्युत्तर हिंसा में दिया जाना नि:संदेह समर्थन योग्य नहीं है। कामेडी अगर किसी का दिल दुखाने का काम करेगी तो वह कामेडी कहाॅं रह जाएगी ? भारत में कामेडी की स्तरहीनता को भी अपने ठीक ही रेखांकित किया है।
    – कमलेश भट्ट कमल

      • जी तेजेन्द्र जी, मैं आपके संपादकीयों पर विशेष ध्यान रखता हूं। मेरी रुचि का विषय होने पर अवश्य पढ़ता हूं। जिस समग्रता के साथ आप अपने विषयों पर लिखते हैं, उसे पढ़कर अलग ही आनंद मिलता है और कुछ नई जानकारियां भी।

  5. क्या क्रिस रॉक ने अपना स्क्रिप्ट ख़ुद लिखा था ? अगर लिखा भी था तो इवेंट मैनेजमेंट टीम ने रिव्यु अवश्य किया होगा और उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं दिखा। विल स्मिथ के माफ़ी मांगने के बाद भी १० बर्षो की सज़ा का मतलब उन्हें लाइफ टाइम बैन करना ही है।

    अगर क्रिस रॉक ने किसी टीम का लिखा स्क्रिप्ट पढ़ा तो इसमें उसकी गलती नहीं। उसने बस डिलीवर किया। फिर तो तमाचा क्रिस रॉक को नहीं स्क्रिप्ट राइटर्स को पड़ा है।

    वो तो अच्छा हुआ कि दोनों ब्लैक थे। सोचिये क्रिस रॉक की जगह कोई श्वेत किरदार होता तो क्या होता ? क्या विल स्मिथ यही करते ?

    दुःख की बात है कि आजकल कॉमेडी का अर्थ एक व्यक्ति का मज़ाक उड़ाकर पूरी ऑडियंस को हँसाना हो गया है।

  6. मैं आपके सटीक विश्लेषण से सहमत हूॅं , आपका बेबाक़़ लेखन -ही आपका परिचय है, साधुवाद

  7. आशुतोष आपने बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है। संपादकीय की रूह को आपने समझ लिया है। धन्यवाद।

  8. आपने सही कहा कि क्रिस राॅक को भी दस वर्षों की सज़ा मिलनी चाहिए। शब्दों के तीर ऐसा घाव हृदय पर करते हैं जिसकी कोई भरपाई नहीं है। स्क्रिप्ट राइटर को भी पकड़ा जाना चाहिए। विल स्मिथ की प्रतिक्रिया सर्वथा स्वाभाविक थी।
    आदरणीय तेजेन्द्र जी ! आपने भारतीय हास्य कलाकारों की अभद्रता पर भी सही टिप्पणी की है। आपकी पैनी दृष्टि से कोई छूट नहीं सकता। हार्दिक साधुवाद स्वीकारें।

    • आदरणीय प्रो. तिवारी जी आपकी सार्थक टिप्पणी ने हमारा हौसला बढ़ाया। धन्यवाद आपका।

  9. मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है कि क्रिस राॅक की किसी ने आलोचना नहीं की स्मिथ ने तो बाद में थप्पड़ जड़ा पहली गलती तो राॅक ने की। किसी की जिंदगी में आप निजी तंज कसा कर रहे हैं इस स्तर पर आकर स्क्रिप्ट पढ़ते समय इसका भान हो जाना चाहिए था।

  10. विषय पर आपकी पकड़ कमाल की होती है सब कुछ कह देना और फिर भी मर्यादा बनाये रखना आपके संपादकीयों की विशेषता है ।

  11. आपकी बेबाक टिप्पणी पढ़ी। पढ़कर अच्छा लगा , यह कोई स्क्रिप्ट हो ऐसा नहीं लगता और यदि है तो बोलने और लिखने वाले को भी वही सजा मिलनी चाहिए । ये थप्पड़ बरसों तक गूंजता रहेगा यह भी एक सत्य है । क्रिस को किसी की पत्नि पर अथवा व्यक्तिगत तौर पर इस प्रकार का भद्दा मज़ाक….. सच कहूं तो ये मज़ाक नहीं बल्कि नीचा दिखाने की ओर इंगित करता हुआ प्रतीत हुआ। सच कहूं तो मुझे न्याय प्रक्रिया एकतरफा दिखाई दे रही है । सजा दोनों को मिलनी चाहिए थी आपने सही कहा मर्यादा तो होनी ही चाहिए । एक बात पर विशेष कि ये दोनों ही ब्लैक कम्युनिटी से हैं अन्यथा नस्लभेद का मुद्दा भी बन सकता था । घटना पर आपकी पकड़ और संपादकीय में लिखना जागरूक कलमकार होने को इंगित करता है । स्पष्ट टिप्प्णी के लिए बहुत बहुत बधाई।
    सच तो यह है कि भारत में हास्य बहुत निचले स्तर या स्तरहीनता पर खडा हुआ दिखाई देता है।

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