डॉ. मनोहर अगनानी से पीयूष द्विवेदी की बातचीत 5

डॉ. मनोहर अगनानी प्रशासनिक सेवा में लम्बे समय से कार्यरत हैं और फिलहाल स्वास्थ्य विभाग में संयुक्त सचिव हैं। पढ़ने और लिखने के शौक के कारण काम से वक़्त निकालकर साहित्य-सृजन भी करते हैं। अबतक तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में यश पब्लिकेशन्स से उनकी संस्मरणात्मक किताब ‘एकांत की आहट’ का प्रकाशन हुआ है। डॉ. अगनानी की भाषा में ऐसा बहाव है है कि वो उनकी सामान्य-सी बातों को भी एक विशेष आभा से युक्त कर प्रभावशाली बना देता है। आज साक्षात्कार श्रृंखला में इन्हीं डॉ अगनानी से युवा लेखक पीयूष द्विवेदी ने बातचीत की है।

सवाल अपने प्रारंभिक जीवन के विषय में कुछ बताइये।

डॉ. अगनानी हिंदी दिवस 14 सितम्बर, 1964 को जयपुर में अपने माँ-बाप की तीसरी और चौथी संतान के रूप में अपनी बहन के साथ जुड़वा जन्म लिया। खेलों में विशेष रुचि थी और टेबल टेनिस का एक बेहतरीन खिलाड़ी बनने के सपने को पिताजी के आग्रह के कारण दफ़न कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। कभी भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाऊंगा, ऐसा सोचा भी नहीं था। अब सिर्फ एक बेहतरीन चिकित्सक बनने का सपना था, लेकिन जीवन संघर्ष ने आई.ए.एस. बनने का जज्बा पैदा किया और नियति यहाँ ले आई।

डॉ. मनोहर अगनानी से पीयूष द्विवेदी की बातचीत 6

सवाल लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

डॉ. अगनानी एक उत्कृष्ट हिंदी माध्यम विद्यालय में पढ़ाई करने के कान भाषा पर पकड़ शुरुआत से ही हो गयी थी, जिसके कारण अपने प्रारंभिक जीवन के संघर्षों को डायरी में लिखकर खुद को सँवारने का जतन करता था। लेखन के रूप में अपनी विचारधारा और मूल्यों का मजबूती से निर्वहन करने का संतोष हासिल करता रहा और फिर लिंग परीक्षण आधारित कन्या भ्रूण हत्या की हकीकत को कलेक्टर के रूप में देखा। उसकी भयावहता से समाज को आगाह करने के लिए जीवन की पहली पुस्तक विषय की अनिवार्यता को देखते हुए अंग्रेजी में ‘Missing Girls’ के रूप में लिखी। मित्रों और शुभचिंतकों की सलाह और आग्रह पर हिंदी में ‘कहाँ खो गईं बेटियां?’ के रूप में अनुवाद किया। यह सब 2004-2006 के दरम्यान की बात है।

फिर 2010-11 के आसपास ज़हन में यह ख्याल आया कि क्या खुद को अनुभवों के अतीत में ले जाकर, अतीत के छोटे-मोटे तजुर्बों को शब्दों की माला में पिरोकर वस्तुपरक रूप से बिना किसी उपदेशात्मक लहजे के प्रस्तुत करने की कोशिश की जा सकती है? अंतर्मन से इस प्रश्न का जवाब तो हाँ में ही आता था, लेकिन उसके स्वरूप और विधा तय करने में कुछ वर्ष लग गए और 2017 में ‘अन्दर का स्कूल’ प्रकाशित हुई। इस किताब का प्रयोग कामयाब हुआ और पाठको को सकारात्मक प्रतिक्रिया ने मुझे मेरी लेखन शैली को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया और मेरे जीवन के कुछ और अनुभवों को मैंने ‘एकांत की आहट’ शीर्षक से साझा करने का प्रयास किया है।

सवाल आगे कुछ और लिख रहे हैं?

डॉ. अगनानी आजकल मैं दो अलग-अलग विषयों पर एक साथ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। उनमें से एक लैंगिक समानता की विचारधारा से प्रभावित है तो दूसरा ‘बुढ़ापे के यथार्थ’ पर आधारित है। लैंगिक समानता के विषय को समझना, उसे आत्मसात करना, उसे प्रैक्टिस करना और फिर उसे साझा करना एक निरंतर यात्रा है, जिसमें मैं खुद को हमेशा समझने, आत्मसात करने और प्रैक्टिस करने के तीन स्तरों पर एक ही समय पर पाता हूँ और अब उसे साझा भी करना चाहता हूँ, एक नए प्रयोग के रूप में।

इसी प्रकार ईश्वर के आशीर्वाद स्वरुप आजकल हमें परिवार में, मेरे और मेरी पत्नी के माता-पिता के साथ रहने का सौभाग्य भी प्राप्त है। पत्नी के माता-पिता तो लगभग 16-17 वर्ष से साथ हैं, लेकिन मेरे माता-पिता का इस उम्र में निरंतर साथ हाल ही का तजुर्बा है। वृद्धावस्था की उम्र के जज्बे को सहभागी अवलोकन के चश्मे से देखकर साझा करने की चुनौती भरी कोशिश भी करना चाह रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि ये कोशिशें भी कामयाब हो सकेंगी।

सवाल पढ़ने के लिए कितना समय निकाल पाते हैं?

डॉ. अगनानी पढ़ने के लिए ज्यादा समय नहीं निकाल पाता, लेकिन लिखने के लिए समय निकालने की जरूरत नहीं होती। किसी भी ख्याल के आने पर खुद को 15-20 मिनट के लिए एकांत में समेट लेता हूँ और इसीलिए बहुत कम शब्दों में उसे बयान कर पाता हूँ।

सवाल पुस्तक प्रकाशन को लेकर आपके क्या अनुभव रहे हैं?

डॉ. अगनानी पुस्तक प्रकाशन के अनुभव मिश्रित हैं। हिंदी साहित्य में मेरी कोई ख़ास पहचान न होने से प्रकाशक के लिए मुझे छापना एक जोखिम भरा फैसला ही है। लेकिन ‘एकांत की आहट’ को यश पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशन का अनुभव बहुत ही सुखद रहा है।

पीयूष हमसे बातचीत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

डॉ. अगनानी आपका भी धन्यवाद।

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