स्मृति-शेष : हमारे इस युग की विरासत को आनेवाली पीढ़ियां वरदान मानेंगी - कैलाश बुधवार 1
ब्रिटेन के हिन्दी जगत के वरिष्ठतम हस्ताक्षर श्री कैलाश बुधवार का 11 जुलाई की सुबह लंदन में निधन हो गया। कैलाश जी पिछले कुछ अर्से से Psoriasis of Skin की बीमारी से जूझ रहे थे। कैलाश जी हमारी संस्था कथा यू.के. के अध्यक्ष थे। कैलाश जी ने कभी भी बीमारी को अपनी ज़िन्दादिली पर हावी नहीं होने दिया। करीब दो सप्ताह पहले ही उन से फ़ोन पर लम्बी बात हुई तो उन्होंने दावत देते हुए कहा कि कभी भी आ जाओ… चाय पर बात करते हैं। कैलाश बुधवार का जन्म उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर में 1932 में हुआ। उन्होंने किशोरी रमण कॉलेज, मथुरा से बीए की डिग्री प्राप्त की। वहां उन्हें सर्वोत्तम छात्र की उपाधि से विभूषित किया गया। इलाहाबाद (प्रयाग राज) से उन्होंने एम.ए. (इतिहास) में की। वहां की नाट्य परिषद के कैलाश जी सचिव रहे। कैलाश जी ने फ़िल्म इंस्टीट्यूट पुणे, आकाशवाणी, फ़िल्म, रेडियो प्रसारण एवं निर्देशन की शिक्षा ग्रहण की। पापा जी पृथ्वीराज के ज़माने में कैलाश जी ने मुंबई में पृथ्वि थियेटर में भी काम किया। स्कूल के दिनों से ही कैलाश जी नाटकों में अभिनय करते रहे। कैलाश जी को कथा यूके परिवार एवं पूरे ब्रिटेन के हिन्दी संसार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। आज कैलाश बुधवार की स्मृति में प्रस्तुत है वरिष्ठ लेखिका मधु अरोड़ा से उनकी बातचीत : (संपादक – तेजेन्द्र शर्मा)
सवाल – आप भारत में बिताये बचपन और उससे जुड़ी अपनी यादें अपने पाठकों से शेअर करें।
कैलाश जी – कभी एक बार आप बीते हुए वक्‍त़ की ओर झांककर देखें जब अभी आप अपने कंधे पर अपना बस्‍ता झुलाते हुए अपने सहपाठियों को चुनौती देते थे कि किन सितारों से और आगे पहुंचने का आपका इरादा था। आज आप जहां भी हैं, क्‍या वे मंसूबे अब याद नहीं आते? कभी कभी मन में दबी ये हूक भी उठती है कि काश वो संभव हो पाते जो सपने मन में झिलमिलाते थे। मन के किसी कोने में दबे सपने, जिनका मलाल, मन की की गर्द में बिना जाने कहीं खो गया। 
ऐसे ही किसी एक मलाल की कसक मेरे मन में है। मेरे सहपाठी मुझसे पूछ सकते हैं कि जीवन में जो मिला, उसके बाद भी कुछ गिला है?  कॉलेज में सर्वोत्‍तम छात्र की उपाधि मिली मिली। विश्‍वविद्यालय में पाठ्य परिषद में सचिव का पद मिला, पृथ्‍वी थियेटर्स में सहनायक की भूमिका मिली। बीबीसी के प्रसारणों में पहुंचने के कुछ वर्षों में ही हिंदी तमिल अनुष्‍ठान के संचालन का जिम्‍मा मिला। 
मैं केवल बीबीसी में नियुक्‍ति की याद करूं तो मैंने जो पाया, उसकी कल्‍पना भी नहीं की थी। भारत सरकार के हाथों विश्‍व हिंदी सम्‍मान मिला। प्रिंस चार्ल्‍स के साथ भारत-नेपाल यात्रा की। प्रधानमंत्री जॉन मेजर के साथ गणतंत्र दिवस के समारोह में शामिल हुआ। अपने देश के साथ साथ दूसरे देश के राजनेताओं के साथ विचार विनिमय का मंच मिला। सभी महाद्वीपों की भूमि को स्‍पर्श करके, धरती के दूर दराज कोनों तक विचरण करने की सुविधा मिली। देश देश की विभिन्‍नता को अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला। अलग अलग बस्‍तियों में उनकी अपनी अपनी विविधता के दर्शन करने के मिले। सबसे आकर्षक अचरज मिला हर इकाई में कला कौशल की मौलिकता का। हर सृजन की अपनी अपनी विशेषता, अपना सौंदर्य और मंत्रमुग्‍ध कर देनेवाला जादू।  
बीबीसी रेडियो प्रसारणों में मुझे समाचारों के बीच अपने प्रदेश की, विशेषत: अपने देश की समस्‍याओं की सच्‍चाई को सामने लाने का मंच मिला। खबरों की जन्‍मकुंडली की मूल परिभाषा के ग्रह होते हैं…आशंका, उत्‍सुकता, जिज्ञासा और अनहोनी। सामान्‍य जीवन का सहज प्रवाह समाचारों को ध्‍यान नहीं खींचता। दुनियाभर के समाचारों की तरह अपने प्रदेश के समाचार भी स्‍वाभविक है कि खुशखबरी से भरे नहीं होते। एक विडंबना ये है कि अपना प्रदेश बाकी दुनिया की खबरों के बीच जगह बनाये रखता है। समाचारों की नियति में उसका विश्‍लेषण- उसकी पृष्‍ठभूमि की जानकारी, विवरण और भीतरी भेद का खुलासा, असलियत की पहचान। बीबीसी में हिंदी तमिल के संचालक की हैसियत से देश देश के रेडियो प्रसारणों  से मुझे अपने प्रदेश के समाचारों की विशद व्‍याख्‍या का, उन पर सही राय बनाने का सुयोग मिला। उस मंच से जुड़े होने की बदौलत रिटायर होने के बाद भी अपने यहां की समस्‍याओं से उभरते, उमड़ते समाचारों के बारे में विदेशियों की शंकाओं का समाधान, बाहर भीतरवालों की भ्रान्‍तियों के निवारण का बुलावा बदस्‍तूर मेरी तलाश में रहता है। 
बीबीसी के मंच पर जब भी स्‍वदेश गया, एक प्रश्‍न हर जगह दुहराया गया। हर कोई जानना चाहता है कि बीबीसी की खबरों पर सभीको भरोसा क्‍यों रहता है। और बीबीसी के पास असली जानकारी पता लगाने की कौन सी मशीन है। मुझे ये भेद मालूम है। बीबीसी की एक ही नीति रही है कि उसकी कोई नीति नहीं है। ये सभी जानते हैं कि सच्‍चाई कहीं भी छिपी नहीं रह सकती। जहां जो घटना घटती है, वहां चश्‍मदीद गवाह न भी हों, उनका असली भेद कभी न कभी खुलकर रहता है। खबरों पर विश्‍वास करने का मूल मंत्र यही है कि उन्‍हें तोड़-मरोड़कर किसीके प्रतिकूल या अनुकूल बनाने की कोशिश कारगर नहीं होती। असलियत को सौ पर्दों के भीतर भी छिपाये रखना मुश्‍किल है। यही बीबीसी की पहुंच का रहस्‍य है। यही उस पर विश्‍वास की आधारशिला है।        
और देशों की तरह अपने देश में भी बीबीसी के प्रसारण पर लोगों का अटूट विश्‍वास रहा है। हमारे हिंदी प्रसारण में भी समाचार और समाचारों की समीक्षा तो हर सभा में, दूर गांव में अपनी कुटिया में कान लगाये आदिवासी से लेकर दिल्‍ली के राजभवनों तक पहुंचती ही थी। साथ ही हर सभा में सामजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक जानकारी के साथ मनोरंजन की, खेलकूद की दुनिया की, साहित्‍य संगीत की दुनिया की ढलक भी घर बैठे अपनी भाषा में बिना किसी फीस के उपलब्‍ध थी। बीबीसी के शोध विभाग में यह प्रमाणित था कि हर सप्‍ताह हिंदी के नियमित श्रोताओं की संख्‍या तीन साढ़े तीन करोड़ से अधिक थी। अजीब विडंबना है कि अब बीबीसी की विश्‍व सेवा वहां की घरेलू सेवा का अंग बना दी गई है हैऔर प्रसारण की अनेक भाषाओं में छंटनी करके उन्‍हें घटा दिया गया है। इस काट-छांट से केवल विश्‍व सेवा की सर्वप्रिय सेवा में कटौती ही नहीं हुई, सबसे अनजानी कभी उन करोड़ों श्रोताओं के हिस्‍से में पहुंची जो हर रोज घर बैठे अपनी भाषा में संसारभर की जानकारी पा लेते थे। 
सवाल – जब आपने बीबीसी में पद-भार ग्रहण किया तो उस समय आपके साथ और कौन पत्रकार थे, पाठकों से शेअर करें। हम सभी उत्‍सुक हैं जानने को।
कैलाश जी – बीबीसी की विश्‍व सेवा में हिंदी में प्रसारण सन. 1940 को 11 मई  से शुरु हुआ था। पाकिस्‍तान बनने के बाद 1949 की अप्रैल से हिंदुस्‍तानी प्रसारण के दो टुकड़े हो गये और 80 के दशक से इन एकांशों को हिन्‍दी और उर्दू प्रसारण के नाम से जाना गया। कमाल ये है कि चाहे नाम अलग हो गये, शोध के आंकड़ों में यह साबित होता रहा कि सभी श्रोता, चाहे जहां के हों, लगातार दोनों भाषाओं के प्रसारण सुनते रहे। उन प्रसारणों के पहले संचालक थे….Shri Lienel Fielden जो भारत में ऑल इंडिया सर्विसंज के संयोजक थे और गांधीजी के भक्‍त थे। बीबीसी से हिंदी प्रसारण की स्‍वर्ण जयंती के अवसर पर 1990 में एक स्‍मारिका प्रकाशित हुई थी जिसमें पचास वर्षों के चित्र और संस्‍मरण भरे पड़े हैं। इनमें उन राजनेताओं के कलाकारों और साहित्‍यकारों के पत्रकारों के संस्‍मरण और चित्र हें, जिन्‍होने इन प्रसारणों को अपना योगदान दिया। बलराज साहनी और हरीश खन्‍ना जैसे प्रतिभावान सन. 40 के दशक में हिंदी अनुष्‍ठान के प्रसारके रूप में थे जिन्‍हें आगे चलकर अभिनेताओं व दूरदर्शन के डाइरेक्‍टर जनरल के पद पर ख्‍याति मिली। कभी आकाशवाणी के डाइरेक्‍टर जनरल डॉक्‍टर नारायण मेनन आरंभिक दौर में उस एकांश में काम करने आये थे। 
रेडियो प्रसारण का आरंभ सन् 1922 में हुआ था। शुरु से ही बीबीसी के प्रसारणों के बीच संचार साधनों का विस्‍तार वहां था। बीबीसी के संवाददाता संसारभर में में फैले हुए थे। समाचार कक्ष में चौबीसों घंटे समाचार बुलेटिन तैयार होते थे, विशेषज्ञ समीक्षाएं संजोते थे और विभिन्‍न प्रसंगों पर जानकारों से विभिन्‍न भेंटवार्ताएं प्रसारित होती थीं। विश्‍वसेवा के आरंभिक दौर में अन्‍य भाषाएं अ्रग्रेज़ी से अनुवाद पर निर्भर करती थीं। जैसे जैसे वैज्ञानिक आविष्‍कारों ने  संचार साधन सुलभ कराये, संसार से एक कोने से दूसरे कोने तक की जानकारी मूल रूप में संकलित होने लगी। विश्‍वसेवा में हर सेवा को सुविधा यह थी कि बीबीसी का हर साधन हर भाषा को उपलब्‍ध था। इसलिये अपने श्रोताओं की प्राथमिकता पहचानकर, भाषाओं को मौलिक प्रसारण का अवसर मिला।
सवाल – लंदन से पत्र पर आपकी जो पुस्‍तक है, इसके पीछे प्रेरणास्‍त्रोत कौन रहे।
कैलाश जी – मेरे समय तक आते आते अनुवाद का सहारा लेने की मज़बूरी कम होती गई। इसीके बल पर अपने अपने क्षेत्र के लिये विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने का द्वार खुला। इसी नाते मुझे ‘लंदन से पत्र’’ प्रसारित करने का सुयोग मिला। जब मैं हिंदी अनुष्‍ठान में नियुक्‍त हुआ था, उस समय संचालक मार्क टली थे।
मार्क टली को भारत भेजे जाने के बाद संचालक का कार्य ऐवन चार्ल्‍टन को सौंपा गया जो भारत में प्रख्‍यात दैनिक के दशकों तक संपादक रहे थे। उन्‍होंने अन्‍य कार्यक्रमों के साथ मुझे साप्‍ताहिक रूपक के प्रसारण का और हर सप्‍ताह ‘लंदन से पत्र’ का मंच सौंपा। हर पत्र में वह विवरण देता था, जो स्‍वयं देखता था, महसूस करता था और बेबाक बताता था। यह कार्यक्रम इतना लोकप्रिय हुआ कि हर सप्‍ताह वह दुबारा प्रसारित किया जाने लगा। दशकों के बाद श्रोताओं की मांग पर ये ‘लंदनसे पत्र’ पुस्‍तक रूप में दिल्‍ली से प्रकाशित हुआ और इंटरनेट पर सुलभ है।
सवाल – अपने समय की पत्रकारिता के अनुभव पाठकों से शेअर करें, बहुत अच्‍छा लगेगा सभीको।
कैलाश जी – औरों की ही तरह अपने बारे में अपनी बाबत बात करने में झिझक महसूस होती है। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ाई पूरी करके और इतिहास में एम ऐ की डिग्री लिये मैं बंबई पहुंचा। मन में एक ही लगन थी। बचपन से रंगमंच से जुड़ा था। अपने छात्र जीवन में, कॉलेज में विश्‍वविद्यालय में रंगमंच पर नाटकों में नायक की भूमिका मिलती थी। बंबई में पृथ्‍वी थियेटर्स में जगह मिली। पृथ्‍वीराज कपूरजी के साथ कलाकार की हैसियत से देश के विभिन्‍न राज्‍यों में रंगशालाओं में शो किये। उनके हर नाटक में भूमिका की और वर्षभर के भीतर ‘गद्दार’ जैसे प्रख्‍यात नाटक में सहनायक ‘सलीम’का रोल मिला। 
जब बंबई की फिल्‍मी दुनिया की चकाचौंध से घबराकर अपने भविष्‍य को तलाशने का होश आया तो एहसास हुआ कि फिल्‍मी आशा में अपना जीवन दांव पर लगाने के लिये मेरे पास दाधीचि जैसी हड्डियां नहीं हैं। बिना बताये बंबई से ऐसे वापिस भागा जैसे किशोर अपने घर से बंबई भागते हैं। निश्‍चय किया कि मेरे पूर्वजों में अध्‍यापन की परंपरा रही है। रांची के विकास विद्यालय में नियुक्‍ति मिली और मैं निश्‍चिंत हुआ कि पहाड़ियों के बीच  स्‍वरारिवा नदी के किनारे बसे पब्‍लिक स्‍कूल में जो पैर टिकाने की जगह मिली थी, बिना और भटके वहीं अपना जीवन यापन करूंगा। पर होनी को ये कैसे मंज़ूर होता।
बंबई छोड़ने के बाद एक विज्ञापन देखा था। यह एक दर्दनाक प्रसंग है। उस आकाशवाणी के जिस विज्ञापन पर मैंने आवेदन भेजा था, कई परीक्षाओं को पार करते हुए मुझे आकाशवाणी, दिल्‍ली में प्रसारक बनने का बुलावा मिला। पहुंचा और आकाशवाणी में नियुक्‍ति मिली पर जिस श्रेणी के लिये मेरा चयन हुआ था, उससे निचली श्रेणी के अनुबंध पर बने रहना मैं कैसे स्‍वीकार करता। तब इस आश्‍वासन पर दिल्‍ली की आकाशवाणी का लालच छोड़कर चला आया कि स्‍थान रिक्‍त होते ही मुझे उस श्रेणी के लिये बुलावा आयेगा, जिसके लिये मैं चुना गया था। मैंने उस उम्र हर दिन उस डाक का इंतज़ार किया।
सवाल – भारत में नौकरी को लेकर कोई कसक आपके मन में है? 
कैलाश जी – भरोसा छोड़े बिना दो वर्ष प्रतीक्षा में रहने के बाद मुझे फिर से एक नये सेलेक्‍शन के लिये आवेदन पत्र भरने का बुलावा मिला। भाग्‍य का करिश्‍मा, इस बार फिर चुने गये तमाम प्रत्‍याशियों की सूची में सबसे पहले नंबर पर मेरा नाम था। लेकिन बुलावा आया नई विविध भारती में सबसे निचली सीढ़ी पर शुरुआत करने का। इस वादे पर कि अबकी बार स्‍थान रिक्‍त होते ही उस विशेष श्रेणी के पर मुझे नियुक्‍ति मिलेगी जिस पर मेरा दूसरी बार चयन हुआ था। मैंने अनुबंध स्‍वीकार करके लखनऊ केन्‍द्र पर प्रसारक की जगह मांगी, जो मुझे फौरन मिली। पर फिर वही वादा, स्‍थान रिक्‍त न होने की दलील, फिर वही प्रतीक्षा करने का भुलावा।
मैं आकाशवाणी में काम कर रहा था: दो दो बार आकाशवाणी के अखिल भारतीय चयन पर चोटी पर मेरा नाम था, पर मुझमें एक खासी कमी थी कि उस महल में मेरी कोई पहुंच नहीं थी। मेरी पीठ पर कोई अभिभावक या God Father नहीं था। मेरे पास कोई ऐसा रियतेदार नहीं था जिसकी कहीं धाक होती। इसलिये कुल कथा ये है कि दो दो बार चुने जाने पर भी मुझे आकाशवाणी में पैर टिकाने की जगह नहीं मिल पाई। 
यह कसक आज भी मेरे मन में है। कसक इस मलाल की नहीं है कि मुझे आकाशवाणी का माइक्रोफोन नहीं मिल पाया, ग्‍लानि ये है कि दशकों से जो प्रसारण बीबीसी एन एन के, आई टी वी के अलजजीरा और अनेक देशों के श्रोताओं को सहज रूप से मिलता रहा है, वह आवाज़ आकाशवाणी के श्रोताओं तक पहुंचने में असफल रही और वो भी अपनी भाषा में। 
सवाल – आप अपने पाठकों व उदीयमान पत्रकारों से कुछ कहना चाहेंगे?
कैलाश जी – हमें, आपको या हमारी पीढ़ी के किसी भी व्‍यक्‍ति को कोई शिकायत नहीं हो सकती। हमें आज जो सुलभ है, अब से कुल दो-तीन सदी पहले कोई राजपरिवार भी उसकी कल्‍पना नहीं कर सकता था। एक बार सोचकर देखें, महारानी विक्‍टोरिया जब उस राजसिंहासन पर बैठीं, जिस साम्राज्‍य में कभी सूर्यास्‍त नहीं होता था तो रेडियो, इंटरनेट की कल्‍पना तो दूर, बिजली की रोशनी भी महलों को नसीब नहीं थी। 
हमारे युग का सबसे अनोखा चमत्‍कार है कि पूरी दुनिया एक गांव में सिमट गई है। देशों की ही नहीं, महाद्वीपों के बीच अब दूरी नहीं रही। हमारी दुनिया अब हम सबकी है। सबकी जानकारी सबको सुलभ है। जहां धरती के किसी भी कोने से बात की जा सकती है। जहां एक दूसरे के बारे में जानने के हज़ारों विकल्‍प खुल जायें, जहां केवल रेडियो और टेलिवजन ही नहीं, इंटरनेट, डिजिटल फोन, कंप्‍यूटर हर घड़ी हर जगह की जानकारी के लिये हर समय हाज़िर हैं। जानकारी पर किसी का दावा और एकाधिकार नहीं है। ये नई दुनिया है। इसमें समाचार साधनों के, पत्रकारिता के प्रसार के नय मयार होंगे। जानकारी के नये माध्‍यम खुलेंगे और जनमत की नई मर्यादाएं बनेंगी।
इसलिये पिछला कोई गिला नहीं, अपनी नई दुनिया होगी, नई आशाएं होंगी, नये सपने फलीभूत होंगे। यह शिकवों की नहीं, उत्‍साह और उछाह की घड़ी है। हमारे इस युग की विरासत को आनेवाली पीढ़ियां वरदान मानेंगीं। 

2 टिप्पणी

  1. स्वर्गीय बुधवारा जी को इस तरह स्मरण किया जाना ,उनके जीवन की सफलताओं और विफलताओं से वर्तमान पीढ़ी
    को परिचित कराना ही सच्ची श्रद्धांजलि है ।

  2. आदरणीय कैलाश जी को सादर श्रद्धांजलि और नमन। साक्षात्कार एक पूरे युग का इतिहास और धरोहर है।

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