खुद को पिघलाकर सख्त होना पड़ा – संतोष श्रीवास्तव
सवाल – संतोष जी ,जैसा कि आप के बारे में पढ़ती आई हूं कि आप की पहली रचना 16 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुई। वह भी देश की नम्बर वन हिंदी साहित्य की पत्रिका धर्मयुग में। इतनी कम उम्र में सृजन की यह उपलब्धि!! कैसा लगा आपको?
संतोष – क्यों नहीं मध्य प्रदेश हिंदी भाषी प्रदेश होने के नाते बहुत अधिक स्कोप था लेकिन मेरा स्वप्न कुछ और था ।मुझे एक नई जमीन की तलाश थी जहां मैं अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों को सामाजिक संदर्भ देकर सहयोग, साहचर्य और सहकारिता की वैकल्पिक नारी संस्कृति को लिख सकूं। नारी विषयक वैचारिक अवरोधों के खिलाफ हल्ला बोल सकूं। इसके लिए मुझे मुंबई से बेहतर जगह नजर नहीं आई। जिंदगी के इत्तेफाक भी ऐसे होते गए कि मुंबई की हवाओं ,समंदर ने मुझे बुला ही लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया से उन दिनों धर्मयुग साप्ताहिक निकलता था जिसके संपादक डॉ धर्मवीर भारती ने मिलते ही मुझे कॉलम दे दिया। अंतरंग नाम से मेरा यह कॉलम 4 साल तक चला जो स्त्री और बच्चों के मनोवैज्ञानिक रोगों पर केंद्रित था। दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में मुझे संपादक विश्वनाथ सचदेव ने साप्ताहिक कॉलम दिया मानुषी। जो स्त्री विमर्श पर था। फिल्मी मासिक पत्रिका माधुरी के लिए अरविन्द जी ने मुझे नियमित लेखन का काम दिया। मैं कवर स्टोरी ,फिल्मी कलाकारों के साक्षात्कार आदि लेने लगी। हालाँकि इतना सब होने के बाद भी समाचार चैनल आज तक के निदेशक सुरेंद्र प्रताप सिंह और हम सब के SP जिनका यह स्लोगन उन दिनों बेहद पॉपुलर था “मिलते हैं कल देखते रहिए आज तक” ने कहा “पत्रकारिता की राहें बड़ी कठिन है संतोष, तुम्हें उस पर्वत तक पहुंचना है जहां पत्रकारिता का नूर बिखरा पड़ा है। आंखें मत चौंधिया लेना अपनी। उसे सहना।”
संतोष – जाहिर सी बात है समाज बर्दाश्त कहां कर पाता है यह सब ।वह भी एक औरत से!!!! अकेली औरत के लिए मान लिया जाता है कि दीवार क्या गिरी मिरे खस्ता मकान की
संतोष – हां रुपेंद्र अब तक मैंने जो 18 पुस्तकें लिखी हैं उन पर मुझे 18 राष्ट्रीय और दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ताशकंद और बैंकॉक में मिले। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड के गवर्नरों द्वारा पुरस्कृत भी हुई और मेरी पुस्तकों पर पंजाब, आगरा, मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा एम फिल और समग्र साहित्य पर शाहजहांपुर से कहानियों पर राजस्थान विश्वविद्यालय और टैगोर विश्वविद्यालय से उपन्यासों पर पीएचडी भी हुई। यह सभी उपलब्धियां मेरे लिए एक चुनौती बन कर सामने आई कि मुझे इन से कहीं अधिक बेहतर लिखना है और मैं उस कोशिश में हमेशा रहती हूं ।
संतोष – जब मैं टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकार थी वहां से सारिका, धर्मयुग पत्रिका निकलती थी। अक्सर इन पत्रिकाओं में लघुकथा को फिलर के रूप में लिया जाता था। तब मैंने लघुकथा के विधान को समझा। मुझे लगा लघुकथा अपने आप में एक महत्वपूर्ण विधा है जिसका कलेवर छोटा है पर सोच व्यापक ।उन्हीं दिनों सारिका के संपादक कमलेश्वर जी ने लघुकथा अंक निकाला। जिसमें सहयोगी संपादक के रूप में मैंने सहयोग दिया। ढेरों लघुकथाएँ आईं पर अधिकतर व्यंग्य से जुड़ी ।व्यंग्य प्रधान लघुकथाएँ हरिशंकर परसाई जी ने भी लिखी। पर उन्हें छोटे-छोटे व्यंग्य कहना उचित है लघुकथा नहीं ।सारिका का लघुकथा अंक पाठकों के बीच विशेष जगह नहीं बना पाया। दशक आठवाँ था और लघुकथा अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत। अब वह यथार्थ की जमीन पर खड़ी थी।कथ्य की विविधता ने लघुकथा में शैली के स्तर पर व्यापक प्रयोग हुए। भाषा के गठन में बदलाव आया ।
संतोष – लघुकथा कभी भी उपेक्षित नहीं रही। यह बात दीगर है कि इस विधा की ओर लेखकों का ध्यान धीरे-धीरे गया ।पत्रिकाएँ भी लघुकथाओं को अपने कलेवर में स्थान देती रहीँ और पुस्तकें भी प्रकाशित होती रहीँ। मुझे ही लो, मेरा तो लघुकथा की ओर ऐसा रुझान हुआ कि आलम यह था कि जिस भी पत्रिका में मेरी लघुकथा छपती पाठकों का खूब प्रतिसाद मिलता। मुझे लघुकथा लिखने में आनन्द आने लगा ।
सवाल – साहित्यिक यात्राएँ आप बहुत करती हैं, लगभग वर्ष में दो बार आप साहित्यिक यात्रा करतीं हैं।इन यात्राओं का क्या महत्व है ,क्या यह साहित्यिक सृजन हेतु लाभदायक हैं?
सवाल – चलते चलते बस एक गुजारिश, आप का लिखा कोई एक शेर जो हम सब पाठकों के लिए संदेश बन जाए।
मुझ को ईनाम की चाहत नहीं दुआ दीजै
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चमत्कृत करता है आपका व्यक्तित्व ,चलते रहिए ईश्वर जो करवाना चाहता है ,हम कैसे समझ सकते है?
आपके व्यक्तित्व से तो वैसे ही प्रभावित थी मगर बहुत सी जानकारियों से अनभिज्ञ थी आपकी कलम को सलाम