खुद को पिघलाकर सख्त होना पड़ा - संतोष श्रीवास्तव 3

वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव से शायरा रूपेन्द्र राज़ की बातचीत

सवाल – संतोष जी ,जैसा कि आप के बारे में पढ़ती आई हूं कि आप की पहली रचना 16 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुई। वह भी देश की नम्बर वन हिंदी साहित्य की पत्रिका धर्मयुग में। इतनी कम उम्र में सृजन की यह उपलब्धि!! कैसा लगा आपको?
संतोष – वह एहसास वह खुशी और एक तरह की लेखन के प्रति जिम्मेदारी भी देश की लोकप्रिय स्तरीय पत्रिका में छपना यानी यह जता देना कि अब तुम्हें इस से भी बेहतर लिखना है ।लगभग 9 वर्ष की रही होऊँगी मैं जब कलम को थामा था। तब यह एहसास नहीं था कि एक दिन यही कलम मेरे सुख-दुख की ,मेरे अकेलेपन की सबसे बड़ी संगिनी होगी।
सवाल – आपने पत्रकारिता के लिए जबलपुर से नौकरी छोड़कर मुंबई प्रस्थान किया। क्या जबलपुर में यह संभव नहीं था?
संतोष – क्यों नहीं मध्य प्रदेश हिंदी भाषी प्रदेश होने के नाते बहुत अधिक स्कोप था लेकिन मेरा स्वप्न कुछ और था ।मुझे एक नई जमीन की तलाश थी जहां मैं अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों को सामाजिक संदर्भ देकर सहयोग, साहचर्य और सहकारिता की वैकल्पिक नारी संस्कृति को लिख सकूं। नारी विषयक वैचारिक अवरोधों के खिलाफ हल्ला बोल सकूं। इसके लिए मुझे मुंबई से बेहतर जगह नजर नहीं आई। जिंदगी के इत्तेफाक भी ऐसे होते गए कि मुंबई की हवाओं ,समंदर ने मुझे बुला ही लिया। टाइम्स ऑफ इंडिया से उन दिनों धर्मयुग साप्ताहिक निकलता था जिसके संपादक डॉ धर्मवीर भारती ने मिलते ही मुझे कॉलम दे दिया। अंतरंग नाम से मेरा यह कॉलम 4 साल तक चला जो स्त्री और बच्चों के मनोवैज्ञानिक रोगों पर केंद्रित था। दैनिक अखबार नवभारत टाइम्स में मुझे संपादक विश्वनाथ सचदेव ने साप्ताहिक कॉलम दिया मानुषी। जो स्त्री विमर्श पर था। फिल्मी मासिक पत्रिका माधुरी के लिए अरविन्द जी ने मुझे नियमित लेखन का काम दिया। मैं कवर स्टोरी ,फिल्मी कलाकारों के साक्षात्कार आदि लेने लगी। हालाँकि इतना सब होने के बाद भी समाचार चैनल आज तक के निदेशक सुरेंद्र प्रताप सिंह और हम सब के SP जिनका यह स्लोगन उन दिनों बेहद पॉपुलर था “मिलते हैं कल देखते रहिए आज तक” ने कहा “पत्रकारिता की राहें बड़ी कठिन है संतोष, तुम्हें उस पर्वत तक पहुंचना है जहां पत्रकारिता का नूर बिखरा पड़ा है। आंखें मत चौंधिया लेना अपनी। उसे सहना।”
वह समय ही पत्रकारिता के लिए गोल्डन पीरियड था। बड़े-बड़े पत्रकारों के संग मुझे काम करने का अवसर मिला। लेकिन भविष्य अनिश्चित था। कभी-कभी तो टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के सामने खड़े ठेलों में से गन्ने का रस या मिसल पाव ही हमारा लंच होता था। लेकिन काम करने का फितूर ऐसा कि न भूख सताती न प्यास। अपने पत्रकारिता के कैरियर में ही मैंने पत्रकारों की स्थिति जानी। बाद में जेजेटी यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता के लेक्चर भी देने लगी। क्रिएटिव राइटिंग के। सचमुच रोमांचकारी समय था वह।
सवाल – जहाँ तक मैं जानती हूँ हिंदी साहित्य की कोई भी विधा आपसे अछूती नहीं रही होगी, कृपया आप संक्षेप से बताइए।
संतोष – लिखना मेरा जन्मजात यानी ईश्वर ने ही मानो कलम थमा के भेजा कि जितने दुख मैं तुम्हारे भाग्य में लिख रहा हूं उनका मुकाबला कलम से ही कर पाओगी। संपादकों का मुझ पर काफी दबाव रहा । उन्होंने कहानियां ,कविता और ललित निबंध लिखवाये। स्तंभ लिखवाए। उपन्यास मेरे लेखन की जरूरत और यात्रा संस्मरण मेरा पर्यटन का शौक गजलें लिखने का शौक मुझे आज से 5 साल पहले जन्म हुआ इसके लिए मैंने कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली बस ऐसे ही लिखती रही और मंचों में सुनाया तो दर्शकों का काफी…… तो अपने आप ही हर विधा में कलम चलती गई। 
सवाल – संतोष जी जीवन आप पर कुछ खासा मेहबान नहीं था, शुरूआती दौर में और अब भी आप जीवन में लगातार संघर्ष करती आईं हैं, आपके बारे में विस्तार से जानने की जिज्ञासा है।
संतोष – खासा क्या बिल्कुल भी मेहरबान नहीं रही किस्मत। निरंतर संघर्ष ने मुझे बहुत अधिक आत्मबल से भर दिया ।यही वजह है कि मैं अपने एकमात्र पुत्र हेमंत का वियोग सह गई। गीता की उपासक रही हूं। सुख-दुख समान भाव से लेने की मेरी शक्ति ने आज मुझे हेमंत के बिना जीना सिखाया है। मैंने उसकी याद में आँसू बहाने से बेहतर यह समझा कि मैं उसकी स्मृति को संजो कर रखूँ। उसकी स्मृति में मैंने हेमंत फाउंडेशन की स्थापना की और संभावनाशील युवा कवि को प्रतिवर्ष पुरस्कृत करने का उद्देश्य उसमें शामिल किया मैं किसी वाद को नहीं मानती लेकिन रुपेंद्र आपने हेमंत की कविताएँ पढ़ी हैं। अन्याय और शोषण के खिलाफ लिखी उस की कविताएँ उसे जनवादी कह रही हैं तो मुझे लगता है हमने भले साहित्य को खाँचों में बांट दिया है पर हैं तो सब अपने मन के अंदर के एहसास, उबाल ही।
सवाल – आपने अपने जीवन में स्थानांतरण भी बहुत झेला है।आपका काफी समय मुंबई में व्यतीत हुआ और अब हाल ही में आप भोपाल स्थानांतरित हुईं हैं। कैसे व्यवस्थित कर लेतीं हैं आप सब?
संतोष – बहुत मुश्किल है बंजारा मिजाजी/ सलीका चाहिए आवारगी में। बंजारा मिजाजी तबीयत का हिस्सा थी। जब तक घर द्वार था पति और हेमंत थे। एक ठहराव सा लगता था। किंतु सब कुछ उजड़ते ही ठहराव कुलबुलाने लगा और जिंदगी बह चली राह में कांटो के बावजूद। हेमंत को 3 महीने का लेकर मुंबई गई थी। माँ होने का पूरा फर्ज निभाया। उसे लायकवर इंसान बनाया  इसीलिए पत्रकारिता में स्थाई जॉब नहीं लिया। फ्रीलांस करती रही ।जब हेमंत मेरे बगैर अपने कैरियर और उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहने लगा तब मैंने पत्रकारिता में कोई भविष्य न देख जमुनादास बजाज  सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल  शिप करनी शुरू की ।जॉब के साथ-साथ पीएचडी ।और फिर यूनिवर्सिटी में कोऑर्डिनेटर शोध प्रबंधक के पद पर कार्य करती रही। लेकिन हेमंत के बाद सब कुछ निरर्थक लगने लगा। मैं वीआरएस लेकर औरंगाबाद छोटी बहन प्रमिला के पास चली गई ।लेकिन कुछ ही समय बाद यह एहसास हुआ कि यहाँ न तो मेरा आसमान है और न उड़ान के लिए पंखों में जोश और ऐसी जिंदगी मुझे मंजूर नहीं ।उजड़ तो चुकी थी अब और क्या उजडुंगी इसीलिए नितांत अजनबी शहर भोपाल को चुना यह सोच कर कि व्यर्थ लगते हुए भी इस सबसे एक बार तो गुजरना होगा ।अगर इन रास्तों के जंगल में से कोई ऐसा रास्ता फूटता है जिसकी मुझे तलाश है तो यह ठीक है और अगर नहीं तो भटकने के लिए मैं पहले से ही जंगल में हूं ।भोपाल में कोई  सगा सम्बन्धी नहीं था। जाने कौन से मोह के धागे मुझे यहाँ खींच लाए। मुझे लोग आयरन लेडी कहते हैं पर वे नहीं जानते आयरन लेडी होने के लिए मुझे कितनी बार लोहार के गर्म हथौड़े से गुजरना पड़ा ।खुद को पिघलाकर सख्त होना पड़ा।
सवाल – संतोष जी इन बदलावों से, नितांत एकाकी जीवन से आपको हर वक्त समय से ,समाज से, लोगों की मानसिकता से गुजरना पड़ा होगा न?
संतोष – जाहिर सी बात है समाज बर्दाश्त कहां कर पाता है यह सब ।वह भी एक औरत से!!!! अकेली औरत के लिए मान लिया जाता है कि दीवार क्या गिरी मिरे खस्ता मकान की 
लोगों ने मेरे सेहन में रस्ते बना लिए 
शुरू में लोगों ने मुझे इमोशनल ब्लैकमेलिंग की गिरफ्त में लेना चाहा। ताज्जुब होता ,मुट्ठी भर का शरीर रह गया था रमेश का 5 साल की बीमारी में पर थी तब किसी की ऐसी मजाल?? और उनके जाते ही!!!! पर इंसान को हर दुख मजबूत करता है और मेरी मजबूती पर ऐसे लोगों की मानसिकता टिक नहीं पाई। मैंने अपने दम पर अपने को खड़ा किया ।अपने आसपास एक अभेद्य कवच रचकर जिसमें किसी का भी प्रवेश वर्जित था। नतीजा  आयरन लेडी का खिताब और यह मेरी उनकी मानसिकता पर विजय थी। इस बात से इंकार नहीं कि अकेलापन मुझे सालता है पर अब आदत हो गई है। न जाने क्या सोचकर ईश्वर ने अकेला किया। हाथ में पकड़ी हादसों से थरथराती कलम दृढ़ की।न जाने क्या लिखवाना चाहता है वह मुझसे। न जाने क्यों जिंदा रखे है वह मुझे। वही जाने……
सवाल – वैसे तो आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, आप की कहानी एसआरएम विश्वविद्यालय चेन्नई के बीए के कोर्स में भी लगी है और महाराष्ट्र बोर्ड के 11वीं के सिलेबस में आपकी लघुकथाएँ पढाई जा रही हैं। आपकी किताबों पर एमफिल और पीएचडी भी हुई है ।आपको इनमें से कौन सी उपलब्धि सबसे अधिक सुख देती है?
संतोष – हां रुपेंद्र अब तक मैंने जो 18 पुस्तकें लिखी हैं उन पर मुझे 18 राष्ट्रीय और दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ताशकंद और बैंकॉक में मिले। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तराखंड के गवर्नरों द्वारा पुरस्कृत भी हुई और मेरी पुस्तकों पर पंजाब, आगरा, मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा एम फिल और समग्र साहित्य पर शाहजहांपुर से कहानियों पर राजस्थान विश्वविद्यालय और टैगोर विश्वविद्यालय से उपन्यासों पर पीएचडी भी हुई। यह सभी उपलब्धियां मेरे लिए एक चुनौती बन कर सामने आई कि मुझे इन से कहीं अधिक बेहतर लिखना है और मैं उस कोशिश में हमेशा रहती हूं ।
मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है मेरे पाठकों की मेरे लेखन के प्रति प्रतिक्रियाएं, मेरे पाठक ही मेरे समीक्षक हैं ।प्रतिलिपि, गाथा, मातृभारती और सेतु में प्रकाशित मेरी रचनाओं को अभी तक 2,50,000 पाठक मिले हैं जिन्होंने उतनी ही टिप्पणियां इन रचनाओं के लिए लिखी हैं।  मेरे पास मेरी प्रकाशित रचना की पत्रिका बाद में आती है उसके पहले मेरे पाठकों के फोन और मैसेजेस आने शुरू हो जाते हैं और एक लेखक को क्या चाहिए।
सवाल – पिछले कुछ वर्षों में लघुकथा लेखन में भी आपका नाम प्रमुखता से लिया जाता है।हम जानना चाहते हैं कि लघुकथा की ओर आपका रूझान कब से हुआ?
संतोष – जब मैं टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकार थी वहां से सारिका, धर्मयुग पत्रिका निकलती थी। अक्सर इन पत्रिकाओं में लघुकथा को फिलर के रूप में लिया जाता था। तब मैंने लघुकथा के विधान को समझा। मुझे लगा लघुकथा अपने आप में एक महत्वपूर्ण विधा है जिसका कलेवर छोटा है पर सोच व्यापक ।उन्हीं दिनों सारिका के संपादक कमलेश्वर जी ने लघुकथा अंक निकाला। जिसमें सहयोगी संपादक के रूप में मैंने सहयोग दिया। ढेरों लघुकथाएँ आईं पर अधिकतर व्यंग्य से जुड़ी ।व्यंग्य प्रधान लघुकथाएँ हरिशंकर परसाई जी ने भी लिखी। पर उन्हें छोटे-छोटे व्यंग्य कहना उचित है लघुकथा नहीं ।सारिका का लघुकथा अंक पाठकों के बीच विशेष जगह नहीं बना पाया। दशक आठवाँ था और लघुकथा अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत। अब वह यथार्थ की जमीन पर खड़ी थी।कथ्य की विविधता ने लघुकथा में शैली के स्तर पर व्यापक प्रयोग हुए। भाषा के गठन में बदलाव आया ।
सारिका ने फिर जोखिम उठाया और श्रेष्ठ लघुकथाएं और समांतर लघुकथाओं के अंक निकाले ।इन विशेषांकों ने लघुकथा को चरमोत्कर्ष के ठिकाने दिखाए। पाठक भी बटोरे। मेरी सारिका में छपी पहली लघुकथा “गलत पता” पर दूरदर्शन के लघु फिल्म निर्माता रवि मिश्रा की नजर पड़ी और उस पर फिल्म बनी जो मेट्रो चैनल पर प्रसारित हुई। इस फिल्म ने लघुकथा की ओर मेरा रुझान पैदा किया और तब से  सिलसिला जारी है।
सवाल – लघुकथा को लेकर आपके क्या अनुभव रहे? क्या लघुकथा की पर्याप्त पत्रिकाएं निकल रही हैं? क्या लघुकथाओं को  पाठकों का पर्याप्त प्रतिसाद मिल रहा है?
संतोष – लघुकथा कभी भी उपेक्षित नहीं रही। यह बात दीगर है कि इस विधा की ओर लेखकों का ध्यान धीरे-धीरे गया ।पत्रिकाएँ भी लघुकथाओं को अपने कलेवर में स्थान देती रहीँ और पुस्तकें भी प्रकाशित होती रहीँ। मुझे ही लो, मेरा तो लघुकथा की ओर ऐसा रुझान हुआ कि आलम यह था कि जिस भी पत्रिका में मेरी लघुकथा छपती पाठकों का खूब प्रतिसाद मिलता। मुझे लघुकथा लिखने में आनन्द आने लगा ।
तभी पटना से लघुकथा पुरोधा डॉ सतीशराज पुष्करणा का एक पोस्टकार्ड प्राप्त हुआ ।”आपका चयन लघुकथा सारस्वत सम्मान के लिए किया गया है ,कृपया स्वीकृति दें।” 
मेरे लिए यह अचानक मिला बेहतरीन तोहफा था ।यह आयोजन अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन में अखिल भारतीय लघु कथा प्रचार प्रतिष्ठान के द्वारा किया जा रहा था। पटना में मेरी मुलाकात बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, डॉ मिथिलेश मिश्र, अनीता राकेश ,पुष्पा जमुआर आदि लघुकथाकारों से हुई ।उस वर्ष दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में मधु दीप जी से भी मिलना हुआ और सहयोग कुछ ऐसा कि अगले वर्ष का लघुकथा सम्मान भी मेरी झोली में ।
पटना से ही अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच पटना द्वारा आयोजित लघुकथा सृजन श्री सम्मान के लिए मेरा चयन किया गया।  लघुकथा की पत्रिकाओं आरोह अवरोह,संचेतना आदि में भी मेरे लघु कथा पर आधारित लेख और लघु कथाएं डॉ सतीश राज पुष्करणा और कमल चोपड़ा जी ने लगातार छापीं। मेरे सामने एक बड़ी चुनौती आ गई कि लेखन को पूरा लघुकथा की ओर ही मोड़ना पड़ेगा ??यह चुनौती सिर्फ लघुकथा को लेकर ही नहीं आई अन्य विधाओं पर मेरे लेखन को भी पाठकों का इसी तरह  प्रतिसाद मिलता गया। पंजाबी की लघुकथा की पत्रिका मिन्नी में भी मेरी लघुकथाएं श्याम सुंदर अग्रवाल द्वारा अनुवाद करके प्रकाशित की गई ।श्याम सुंदर अग्रवाल जी ने मुझे अंबाला में होने वाले लघु कथा सम्मेलन में आमंत्रित भी किया पर मैं जा नहीं पाई।
सवाल – आपकी रचनाओं के भारत की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए हैं और इस तरह आपके पाठकों का दायरा भी बढ़ा है ।क्या रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होना लाभकारी है?
संतोष – मेरे उपन्यास और कहानियों का अंग्रेजी, गुजराती, उर्दू ,बंगाली, मराठी ,पंजाबी, तमिल, तेलुगू ,मलयालम ,ओड़िया ,बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी आदि भारतीय भाषाओं में अनुवाद तो हुआ ही साथ ही विदेशी भाषाओं नेपाली फ्रेंच और रशियन भाषाओं में भी अनुवाद हुआ। मेरी लघुकथाएं बाजार ,शहीद की विधवा, फैसला ,बुखार आदि पंजाबी ,मराठी और गुजराती भाषाओं में अनूदित हुई ।अनुवाद का फायदा यह हुआ कि मेरे पाठकों का दायरा तो बढ़ा ही साथ ही  विभिन्न राज्यों में भी मेरी रचनाओं ने पहचान बनाई ।यह बहुत आवश्यक है कि हमारी रचनाओं का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो ताकि अन्य भाषी लोग भी हमें पढ़ सकें। लेकिन अनुवाद  की एक शर्त यह होनी बहुत जरूरी है कि अनुवाद साहित्यिक हो और उसमें अनुवादक अपनी बात शामिल न करें।
सवाल – साहित्यिक यात्राएँ आप बहुत करती हैं, लगभग वर्ष में दो बार आप साहित्यिक यात्रा करतीं हैं।इन यात्राओं का क्या महत्व है ,क्या यह साहित्यिक सृजन हेतु लाभदायक हैं?
संतोष – पैरों में चक्र तो जन्मजात है यानी सफर तय है जिंदगी के…….  सन 2000 में दिल्ली में महिला पत्रकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। जिसमें नवभारत टाइम्स की ओर से महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व मैंने किया ।इस कार्यक्रम की सर्वे सर्वा वरिष्ठ कथा लेखिका मृदुला सिन्हा थीं जो अब गोवा की राज्यपाल हैं। उन दिनों केंद्र सरकार की संस्था अंतरराष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ  तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने लॉन्च की थी।इस संस्था का मृदुला सिन्हा जी ने मुझे 10 वर्ष का मनोनीत सदस्य बनाया ।जिसके तहत 10 वर्ष के दौरान मैंने 22 देशों में भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए काम किया ।इन देशों में मैंने देखा कि हिंदी तो वहां पहले से मौजूद है। हिंदी पत्रिकाएं ,पुरस्कार ,कवि सम्मेलन, गोष्ठियां ,रेडियो में हिंदी की वार्ता, कविता, कहानी का प्रसारण ,वहाँ के पुस्तकालयों में हिंदी के लेखकों की पुस्तकें, हमारे धर्म ग्रंथ आदि पहले से मौजूद हैं। बल्कि एक छोटा भारत हर देश में देखा। इन सभी देशों के संस्मरणों कि मेरी पुस्तक “नीले पानियों की शायराना हरारत “प्रकाशित हुई जिस पर मुझे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में मध्यप्रदेश के गवर्नर के हाथों श्रेष्ठ नारी लेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कहना न होगा कि यात्राओं का अनुभव ,संस्कार एक विशाल केनवस  रचता है। जिसमें सभी देशों की हर तरह की जानकारी के रंग चहल-कदमी करते हैं।  जब देखोगे तभी तो जानोगे दुनिया कैसी है और किताबी ज्ञान से बढ़कर प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत मायने रखता है।
सवाल – साहित्यक क्षेत्र में आपके अनगिनत योगदान हैं।महिला साहित्यकारों को आपने विशेष मंच प्रदान किया है।उस मंच की गतिविधियों के विषय में कृपया विस्तार से बताएँ।
संतोष – रुपेंद्र, अंतरराष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ से मेरी सदस्यता 2011 में समाप्त हो गई लेकिन तब तक पर्यटन की लत पड़ चुकी थी क्योंकि इन यात्राओं ने मेरे जीने का अंदाज बदल दिया था और ज्ञान का अकूत खजाना मुझे दिया था। तभी हमने महिलाओं के लिए विश्व मैत्री मंच की स्थापना की ।इस संस्था के उद्देश्य थोड़े अलग हटकर हैं ।यानी पर्यटन के द्वारा राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जगह-जगह जाकर ऐसी प्रतिभाओं को खोजना जिनमें योग्यता होते हुए उन्हें उसे साबित करने का मौका नहीं मिला। विश्व मैत्री मंच ऐसी प्रतिभाओं को चित्रकला, नाट्य कला और लेखन में यह अवसर प्रदान करती है। अब तक उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश में इसकी शाखाएं खुल चुकी है और विधिवत कार्य हो रहा है। संस्था द्वारा तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं और राष्ट्रीय सम्मेलन में पांडुलिपि पुरस्कार, हेमंत स्मृति विशिष्ट हिंदी सेवी सम्मान और साहित्य गरिमा सम्मान दिए जाते हैं, जिसके अंतर्गत मानधन,प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह प्रदान किए जाते हैं। हमारा उद्देश्य है इस संस्था को विश्व स्तर पर ले जाना और संस्था के सभी सदस्य इस कार्य में सहयोग दे रहे हैं।
सवाल – चलते चलते बस एक गुजारिश, आप का लिखा कोई एक शेर जो हम सब पाठकों के लिए संदेश बन जाए।
संतोष – ओह रुपेंद्र, क्या हसीन पेश-ए-सवाल है। पर हम वो शै हैं जो खुश रखते हैं तुम को –
मुझ को ईनाम की चाहत नहीं दुआ दीजै
दुआएँ उम्र भर का साथ निभा देती हैं।
आमीन

2 टिप्पणी

  1. चमत्कृत करता है आपका व्यक्तित्व ,चलते रहिए ईश्वर जो करवाना चाहता है ,हम कैसे समझ सकते है?

  2. आपके व्यक्तित्व से तो वैसे ही प्रभावित थी मगर बहुत सी जानकारियों से अनभिज्ञ थी आपकी कलम को सलाम

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