मैं बाज़ार के लिए सांस्कृतिक धरोहर के साथ उपहास नहीं कर सकता - डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी 3
सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से चर्चित लेखिका मधु अरोड़ा की बातचीत

सवाल- आपको लगता है कि आज के युग में एक और चाणक्‍य की ज़रूरत है?

जवाब-  मैं यह मानता हूं कि हर युग में चाणक्‍य की ज़रूरत है। देश के सामने महान् चुनौतियां कल भी थी , आज भी हैं , मैं तो मानता हूं कि आज विश्‍व को गांधी की भी ज़रूरत है। ऐसा नहीं है कि आज देश में चाणक्‍य और गांधी जैसे लोग नहीं हैं, लोग हैं पर उनके पास वैसे संकल्‍प नहीं हैं। साथ ही यह भी सच है कि चाणक्‍य रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते।

सवाल- चाणक्‍य ही क्‍यों चाहिये? और कोई विकल्‍प क्‍यों नहीं?

जवाब-  प्राचीन सन्दर्भों में किसी बात को ग़लत रास्‍ते से सही रास्‍ते पर लाने की जो प्रक्रिया होती है, वह है- नीति। पहले राजा हुआ करते थे जिनका काम राज-काज देखना और नीति से कार्य करना था। लेकिन आज राजनीति का अर्थ बदल गया है। आज राजनीति याने छल-प्रपंच प्रमुख हो गया है। पहले के राजनेता और रानीतिज्ञ दृष्टिवेत्‍ता थे। मैं यह नहीं कहता कि आज वैसे राजनेता नहीं हैं। आज के युग में भी होते होंगे और हैं। अब देखिये, अरूणा राय- जिनके प्रयत्‍नों से Right Of Information आया और उस वजह से हम इस मुक़ाम तक पहुंचे कि चैनलों के माध्‍यम से जेसिका लाल के विषय में पूछ सकते हैं। आज के समय में भी ऐसे लोग होंगे लेकिन ज़रूरत है संकल्‍प लेने की और कार्य करने की।

सवाल- आपके पास मेडिकल डिग्री होने के बावज़ूद आप थियेटर, सिनेमा, साहित्‍य, अभिनय और सीरियल से जुड़े हैं। इस रुझान का कोई विशेष कारण?

जवाब-  यह कहना बड़ा मुश्किल है। हर व्‍यक्ति की एक रचनात्‍मक अभिव्‍यक्ति होती है। कोई कविता के माध्‍यम से, कोई कहानी के माध्‍यम से, कोई पेंटिंग के माध्‍यम से ख़ुद को अभिव्‍यक्‍त करता है। उदाहरण के तौर पर मोहन आगाशे, श्रीराम लागू, ज़ब्‍बार पटेल- ये लोग भी तो  डॉक्‍टर थे लेकिन अभिनय के क्षेत्र में आये। इन्‍होंने बहुत अच्‍छी फिल्‍में कीं, निर्देशन किया। जहां तक मेरी बात है तो मुझे जो कहना है, उसे चित्रों माध्‍यम से सोचता हूं। अब आप कह सकती हैं कि मैं फिल्‍में बनाता हूं, तो मेडिकल प्रेक्टिस कब करता हूं? तो मैं जब काम करता हूं तब मेरे पास 150 लोगों की टीम होती है और उनका मैं डॉक्‍टर होता हूं।

सवाल- आप किस विधा में ख़ुद को सहज महसूस करते हैं?

जवाब- मुझे लगता है कि मैं लिखने में स्‍वयं को सहज महसूस करता हूं। निर्देशन में आपको बहुत सारे लोगों के साथ इंटर एक्ट करना होता है। जब तक आप अपने गढे चरित्रों के साथ हैं आप सहज हैं। जैसे ही चरित्र का स्थान अभिनेता ले लेता है स्थितियां बदल जाती हैं और ज्यों ज्यों आपके शब्द और गढे हुए चरित्र परदे पर आकार लेने लगते हैं तो आप पाते हैं कि आपकी कल्पना या कला बोध और सौंदर्य बोध और आपके सामने रचे जा रहे यथार्थ में बहुत अंतर होता है शायद इसी लिए किसी ने कहा होगा जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि

सवाल- आपने वीर सावरकर फिल्‍म का निर्देशन क्‍यों नहीं किया, जबकि आपको कई बार ऑफर मिला था, इसका क्‍या कारण था?

जवाब- मैंने वीर सावरकर फिल्‍म बनाना स्‍वीकार किया था। परन्‍तु इस फिल्‍म को लेकर बाबूजी (सुधीर फडके) के कुछ विशेष आग्रह थे। बाबूजी की निष्‍ठा पर कोई भी व्‍यक्ति प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगा सकता, लेकिन वे मूलत: संगीत के आदमी थे। मेरा दुर्भाग्‍य कि मैं उनको अपनी बात समझा नहीं पाया। मैं बाबूजी के प्रखर हिंदुत्व का समर्थक नहीं थान ही मैं एक निर्देशक के तौर पर सावरकर के हिंदू राष्ट्र वाद को फिल्म के माध्यम से रखना चाहता था मैंने इन्‍हीं असहमतियों की वज़ह से वीर सावरकर फिल्‍म छोड़ दी। बाबूजी और फिल्म से जुड़े दूसरे महानुभावों के कहने पर फिर दोबारा मैंने फिल्म करना स्वीकार किया पर समय के साथ कई बातों को ले मत भेद बढ़ता गया और मैंने फिर फिल्म छोड़ दी मैं आपको बता दूं कि सावरकर फिल्‍म बनाने से पहले मैं पेरिस और मार्सेलिस गया और वास्‍तव में उस जगह को देखा जहां से सावरकर समुद्र में कूदे थे।  पेरिस में मैंने नॅशनल बेबिलोथिक  लायब्रेरी देखने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की1 पेरिस में हमारे होस्ट हैरान थे कि यह पहला डाइरेक्‍टर है जो लायब्रेरी देखना चाहता है, अन्‍यथा लोग तो सिर्फ़ सैर-सपाटे की जगहों के बारे में पूछते हैं। कई महीनों की मेरी मेहनत फिर एक बार बेकार गयी

सवाल- आपने सीरियल बनाने में सिर्फ़ इतिहास का ही दामन क्‍यों पकड़ा है?

जवाब- इसका एक तो यह कारण है कि इतिहास के इलाके में बहुत सारे लोग काम नहीं कर रहे हैं। ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के सीरियलों के लिये आपको उस कालखंड के, उस परिवेश के, उस रहन-सहन के, उन लोगों के विषय में शोध करना होता है, जांच-पड़ताल करनी होती है। यह ण्‍क चुनौतीभरा काम होता है। आज वर्तमान में जिस तरह के सीरियल बन रहे हैं, उनमें चुनौती जैसी बात न तो लगती है और न दिखती है। सारे पात्र, सारी गलियां जानी-पहचानी लगती हैं। मैंने सामाजिक फिल्‍म भी बनाई है। पिंज़र सामाजिक फिल्‍म थी और सफल भी हुई थी। मुझे प्रेमकथा में कोई रुचि नहीं है। सम्राट अशोक हो, चंद्रगुप्‍त हो, चाणक्‍य हो, मुझे इन फिल्‍मों/सीरियलों को करने में मज़ा आता है। वहां चुनौती जो है।

सवाल- चाणक्‍य सीरियल के अतिरिक्‍त आपने जो भी सीरियल प्रारंभ किये, वे अंत तक नहीं पहुंच पाये, इसका क्‍या कारण है?

जवाब- चाणक्‍य सीरियल भी पूरा नहीं हुआ था। मुझे याद आता है कि जब मृत्‍युजंय सीरियल बन्‍द हुआ तो एक दर्शक का मेरे पास पत्र आया था। उसने लिखा था कि ग़लती चंद्रप्रकाश की नहीं है, ग़लती बाज़ार की है और उसका यह वाक्‍य मुझे आज तक याद है।

सवाल- आप अपनी हठधर्मिता के लिये जाने जाते हैं, उससे आपका कितना नुक़सान हुआ है?

जवाब- यह तो लोगों का Perception  है मेरे प्रति। मेरे लिये संकल्‍प महत्‍वपूर्ण है। जो लोग मेरे क़रीब हैं, वे इस बात को जानते हैं। हाल ही में मैंने महाभारत पर बन रहा सीरियल छोड़ा। हालांकि उस पर मैंने दो वर्ष काम कियामैं बाज़ार के लिए सांस्कृतिक धरोहर और एक महाकाव्य के साथ उपहास नहीं कर सकता थामैं जानता था कि धारावाहिक बनने के बाद मुझसे शायद कोई सवाल भी न करे पर भारत के गौरव , अतीत के गौरव और इतिहास की बाज़ार की शर्तों पर मैं हत्या करने के लिए तैयार न हुआ एक बात स्‍पष्‍ट है कि जिस चीज़ को मैं मन से स्‍वीकार नहीं कर सकता, उसे करता ही नहीं।यदि मैं अपने क्षेत्र में श्रेष्‍ठ नहीं हूं तो निकृष्ट भी नहीं हूँ और यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ।

सवाल- अनेक वर्षों से गौतम बुद्ध पर फिल्‍म बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं, आपने कभी इस फिल्‍म को बनाने के बारे में सोचा है?

जवाब- गौतम बुद्ध पर जो लोग यानी बी के मोदी फिल्‍म बनाने की सोच रहे थे, मैं भी कभी उसका हिस्‍सा रहा हूं। देखिये, यह बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। सिर्फ़ पैसा ही उस फिल्‍म को बनायेगा, ऐसा मैं नहीं मानता। आशुतोष गोवारिकर, मीरा नायर आदि इस फिल्‍म को बनाना चाहते थे, पर इस बाबत क्‍या हुआ, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है।

सवाल- यदि आपको किसी चॅनल का हेड बनने का प्रस्‍ताव आये तो आप किस चॅनल का हेड बनना चाहेंगे और क्‍यों?

जवाब- मैं किसी भी चॅनल का हेड नहीं बनूंगा और यह प्रस्‍ताव आयेगा भी नहीं। सच बात तो यह है कि चॅनलवाले मुझ पर भरोसा नहीं करेंगे। वे ख़ुद भी जानते हैं कि मैं जो काम कर रहा हूं, उस पर  उस पर भीड़ को विश्‍वास नहीं है।

सवाल- हाल में आपने प्रसिद्ध उपन्‍यासकार काशीनाथ की पुस्‍तक ”काशी का अस्‍सी” जैसी कृति पर ”मोहल्‍ला अस्‍सी का” नामक फिल्‍म बनाई है, यह प्रेरणा आपको कहां से मिली?

जवाब- मैंने जहाज़ में यात्रा कर रहा थावहां  इंडिया टुडे नमक पत्रिका मेरे हाथ लगीउसमे एक चित्र ने मेरा ध्यान आकर्षित कियापढने लगा तो पता चला कि वह उषा गांगुली द्वारा निर्देशित काशीनामा का चित्र है और नाटक की उसमे समीक्षा लिखी गयी हैकाशीनामा काशीनाथ सिंह के काशी का अस्सी पर आधारित थानाटक का विषय बाज़ार के बढ़ाते प्रभाव का था समाज के हो रहे बाजारीकरण और वैश्वीकरण का था उन दिनों मैं उपनिषदों पर कार्य कर रहा था। सो अपना वह काम पूरा करने के बाद काशीनाथ सिंह से मिला। उनसे बातचीत की और सब तय हो गया। इस उपन्‍यास पर अठ्ठारह महीने लेखन किया, स्क्रिप्‍ट के चौदह ड्राफ्ट तैयार किये और बयालीस दिनों में शूटिंग पूरी की।

सवाल- चूंकि आप साहित्‍य से भी जुड़े हैं तो साहित्यिक अश्‍लीलता पर क्‍या कहना चाहेंगे?

जवाब- इस विषय पर मुझे लगता है कि लोग प्रयोग कर रहे हैं। भारत की यही विशेषता है कि वह हर व्‍यक्ति को प्रयोग करने का अवसर दे रहा है। सच कहूं तो इन प्रयोगों को रोकना नहीं चाहिये।

सवाल- अल्‍टीमेटली साहित्‍य की क्‍या उपादेयता है?

जवाब- साहित्‍य की उपादेयता आप भलीभांति देख रही हैं। हर व्‍यक्ति कविता लिख रहा है, हर व्‍यक्ति कहानी लिख रहा है, लेकिन पाठक कहां है साहित्‍य का? समाचारपत्रों का भी हाल आप देख ही रही हैं। आज स्थिति यह है कि लेख़क ख़ुद अपनी पुस्‍तक छपवा रहा है। उसकी पुस्‍तक के ख़रीददार नहीं हैं। दूसरे, आज अभिव्‍यक्ति के कई माध्‍यम हैं। ट्विटर, फेसबुक, ई-मेल, एमएसएन मैसेंजर, याहू मैसेंजर, जी मेल चैट आदि आदि। हर वक्‍त़ आदमी कुछ न कुछ बोल रहा है, कुछ न कुछ कर रहा है, और कुछ नहीं तो एस एम एस ही कर रहा है। मैं आपको बताउं कि मैं ई-मेल आई डी पर इन विजि़बल रहता हूं। आप काम कर रहे होते हैं और लोग अचानक ही बीच में कूद पड़ते हैं, ” क्‍या कर रहे हो?” आप यह न समझें कि मैं इन साधनों को अड़चन मानता हूं। हो सकता है कि अभिव्‍यक्ति के इन माध्‍यमों में से भी कोई साहित्‍य निकले।

सवाल- फिल्‍मों में शब्‍दों के चुनाव पर आपका क्‍या दृष्टिकोण है?

जवाब- मुझे लगता है कि वह दौर गया जब शब्‍दों का चयन होता था। आज फिल्‍मों में शब्‍दों की स्थिति अति साधारण है। अगंर गिन लें तो फिल्‍मों में प्रयोग किये जानेवाले शब्‍द 300- 400 से ज्‍य़ादा नहीं हैं। शब्‍द की संपत्ति न बढ़ने का कारण जहां तक मैं समझ पाया हूं वह यह है कि सब चीज़ों का साधारणीकरण कर दिया गया है और उनसे काम चल रहा है। हम ”मैं तुमसे नफ़रत करता हूं, मैं तुमसे प्‍यार करता हूं” से आगे जा ही नहीं रहे।

सवाल- बात चल ही रही है तो आप लिव-इन-रिलेशनशिप के बारे में क्‍या सोचते हैं?

जवाब- मैं इस व्‍यवस्‍था को बुरा नहीं मानता। बिना जाने- पहचाने पुरुष/ महिला से विवाह करना और फिर उसे भुगतना बहुत कठिन कार्य है। मुझे लगता है कि विवाह करने की प्रक्रिया कठिन और अलग होने की प्रक्रिया आसान कर देनी चाहिये। हमने इसे उल्‍टा कर दिया है। अपने देश में विवाह करना आसान और अलग होने की प्रक्रिया कठिन है।

सवाल – आपकी पत्‍नी मंदिराजी भी निर्देशन क्षेत्र में हैं, फिल्‍मों को लेकर कभी उनसे विवाद हुआ है?

जवाब – तनाव बहुत होता है। अब हम दोनों तय कर रहे हैं कि दोनों साथ काम न करें। उस तनाव का असर घर पर भी पड़ता है। इसीलिये काशी का अस्‍सी के समय वे प्रोडक्‍शन सेक्‍शन में थीं। वे प्रोडक्‍शन सेक्‍शन में न भी हों तो भी प्रोडक्‍शन में उनका हमेशा हस्‍तक्षेप रहता है। उनके हस्‍तक्षेप के बावज़ूद मैं कह सकता हूं कि वे मुझसे ज्‍य़ादा बेहतर काम करती हैं।

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