Tuesday, June 9, 2026
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डॉ. कुमारी उर्वशी का लेख – ऋत्विक घटक : एक कलाकार का विस्फोट और विघटन

ऋत्विक घटक—एक ऐसा नाम जो केवल भारतीय सिनेमा के मानचित्र पर अंकित नहीं, बल्कि उससे आगे जाकर समाज की स्मृति और विवेक की भूमि पर अपने सृजन की जड़ें जमाता है। वे केवल एक फिल्मकार नहीं थे, बल्कि एक बेचैन समय के दस्तावेज़ लेखक, एक सांस्कृतिक दृष्टा, एक मर्मवेधी कलाकार, और एक ज्वालामुखी की तरह अनवरत फूटता हुआ असंतोष भी थे।
उनकी दृष्टि इतिहास के पृष्ठों में दर्ज केवल घटनाओं की नहीं थी, बल्कि उन अनसुनी, अनदेखी चीखों की थी जो विभाजन, विस्थापन, भुखमरी, सत्ता-संघर्ष और सामाजिक विसंगतियों के गर्भ से फूटी थीं। वे उस ‘बंगाल’ के आखिरी प्रतिनिधि थे, जिसे स्वतंत्रता के नाम पर छिन्न-भिन्न कर दिया गया था और जिसकी आत्मा पद्मा और गंगा के जल में बहते रक्त से लाल हो गई थी।
ऋत्विक घटक को समझना केवल एक फिल्मकार को समझना नहीं है—यह उस समय की धड़कनों को, उन तनावों और संघर्षों को समझना है, जिन्होंने भारत को नए सिरे से गढ़ा। उनके लिए कैमरा कोई यांत्रिक उपकरण नहीं था, वह एक जादुई शीशा था, जो समाज के चेहरे से नकाब उतारता था और उसकी अंतःवस्तु को उजागर करता था। उनके फ्रेम में केवल दृश्य नहीं होते थे, वहाँ चीखती हुई स्त्रियाँ, बिखरे हुए परिवार, टूटी नावें, जलती आँखें, और इतिहास के जले हुए पृष्ठ होते थे।
वे जब कैमरा उठाते थे, तो कोई दृश्य नहीं, बल्कि त्रासदियों की चीखें कैद करते थे। उनका सिनेमा आंसुओं का नहीं, संघर्षों का दस्तावेज़ था। उसमें केवल करुणा नहीं थी, क्रोध भी था। एक ऐसा क्रोध जो व्यवस्था के छल, हिंसा और विस्थापन के खिलाफ था। उनकी ‘मेघे ढाका तारा’ की नायिका नीता की ‘क्या मैं जी नहीं सकती?’ की पुकार, केवल एक पात्र की वेदना नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का रूदन था जिसे सुनने वाला कोई नहीं था।
और जब वे शब्दों में उतरते थे, तो वे इतिहास की उस गुमशुदा धड़कन को खोजते थे, जिसे सत्ता और समाज ने मिलकर दबा दिया था। उनके लेख, उनके नाटक, उनके कहानी-रूपक और यहां तक कि उनके आत्मकथात्मक फिल्म दृश्य—ये सभी उन खंडित सपनों की पुनर्रचना थे, जो 1943 के अकाल, 1947 के विभाजन और उसके बाद की राजनीतिक विडंबनाओं में चकनाचूर हो गए थे।
ऋत्विक का सिनेमा एक सांस्कृतिक प्रतिरोध था, एक ऐसा प्रतिरोध जो न किसी भाषा की सीमा में बँधता था, न शैली की। वह सौंदर्यशास्त्र का ताज नहीं पहनता, वह पीड़ा का कफन ओढ़ता था। उनके लिए कला ‘सुंदर’ नहीं, ‘सच्ची’ होनी चाहिए—यह उनका स्थायी उद्घोष था। वे ‘आधुनिकता’ की झूठी सजावट को तोड़ते हुए कहते हैं—”मुझे मनोरंजन नहीं चाहिए, मुझे बयान देना है।”
ऋत्विक घटक भारतीय सिनेमा के उस अंतःकरण की आवाज़ हैं जिसे बॉक्स ऑफिस की सफलता नहीं चाहिए थी, जिसे पुरस्कारों की चमक नहीं चाहिए थी, जिसे चाहिए था—एक गूंज, एक प्रतिध्वनि, एक प्रतिरोध।
वे जब सिनेमा बनाते थे, तो उनके फ्रेमों में आदमी नहीं, आदमी के टूटे हुए सपने चलते थे। उनकी फिल्मों में किसी खास किरदार की कथा नहीं होती, वहाँ पूरी सभ्यता की विफलता का चित्रण होता था। वे कैमरे को पवित्र मानते थे—उसे मठ की घंटी, मस्जिद की अज़ान और मंदिर की आरती की तरह एक संस्कार मानते थे।
ऋत्विक घटक केवल एक फिल्मकार नहीं थे—वे भारत की आत्मा में धँसी हुई एक चुप चीख थे, जिसे आज भी सुना जा सकता है—अगर हम सिनेमा की सतह को थोड़ा और कुरेदेंगे तब उसके नीचे उस धड़कते हुए, कराहते हुए सच तक पहुँचेंगे जिसे ऋत्विक ने शब्दों और छवियों में अमर कर दिया।
घटक का जीवन पटना, मुंगेर, बांकीपुर और राजशाही जैसे शहरों से होकर गुजरा—ये केवल भौगोलिक स्थल नहीं थे, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संक्रमण के जीवित प्रतीक थे। इन नगरों की मिट्टी में इतिहास के असंख्य झोंके, सत्ता के उतार-चढ़ाव, और समाज के सांस्कृतिक द्वंद्व रचे-बसे थे। ऋत्विक घटक ने इस जीवन को केवल जिया नहीं, बल्कि उसे अपने भीतर चूसकर आत्मसात किया, उसकी हर परत को अपने भीतर गूंथा।
राजशाही, जो आज बांग्लादेश में है, उनके पितृगृह का केंद्र रहा—यह वही स्थान था जहाँ उनके पिता सुरेशचंद्र घटक केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवि और नाटककार भी थे। इसी धरातल पर ऋत्विक की आँखें खुलीं और उन्होंने देखा कि कैसे संस्कृति सत्ता की हदों को लांघती है, और सत्ता कभी-कभी संस्कृति को निगल भी जाती है।
बचपन में पद्मा नदी के किनारे खेलने वाला यह बालक, जब नावों की कतारें देखता, अजनबी भाषाओं में बोलते नाविकों को सुनता, तो उसके भीतर भाषा और पहचान की एक गहरी उलझन जन्म लेने लगती। वह ‘टूटी-फूटी हिंदी’, बंगला की स्थानीय बोलियों, और नाविकों की गुत्थम-गुत्था आवाजों को केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास के टुकड़ों, विस्थापन के निशानों और संस्कृति की दरारों के रूप में सुनता था।
यह वह समय था जब बंगाल दो विपरीत ध्रुवों में बाँट दिया गया था—एक तरफ उसकी बहुपरतीय, गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा थी, और दूसरी ओर राजनीतिक विघटन, भूख, अकाल, विस्थापन और सत्ता की अमानवीयता। यह विभाजन केवल भौगोलिक नहीं था, यह संवेदना और स्मृति का विभाजन भी था।
ऋत्विक की स्मृति में ये सभी दृश्य स्थायी रूप से अंकित हो गए थे—नदी किनारे लहराते सरकंडों के पीछे से आती हुई मातम की आवाज़ें, उन माताओं की निर्जीव देह जिनके पास भूखे बच्चे चुपचाप पड़े थे, गाड़ीवानों की फटी हुई आवाज़ें, सड़कों पर छटपटाती भूखी भीड़। इन दृश्यों ने उनके भीतर एक ऐसा सौंदर्यबोध विकसित किया, जो शोषण, अन्याय और त्रासदी की जमीन से उपजा था। उनका सौंदर्य कभी गुलाब के फूलों में नहीं था—वह मृत देह के पास पड़े बच्चे की आँखों में था, वह भूख से तड़पती स्त्री की चुप्पी में था, वह खंडित बंगाल की सांझ में था, जिसमें सूर्य अस्त नहीं होता, डूबता रहता है। इन्हीं दृश्यों ने उनके सिनेमा को दृष्टि दी—वह दृष्टि जो केवल कैमरे से नहीं, बल्कि जले हुए सपनों, अधूरी हसरतों और खामोश कराहों से बनी थी। वे जब किसी दृश्य की संरचना करते, तो उनकी स्मृति से ही वे बाल चित्र निकलते थे, जिन्हें उन्होंने कभी पेंसिल से नहीं खींचा था, लेकिन जिनकी रेखाएं उनके मन के कैनवस पर हमेशा के लिए खिंच गई थीं। इसलिए कहा जा सकता है कि ऋत्विक का सौंदर्यबोध प्राकृतिक नहीं, स्मृति-जनित था—एक ऐसी स्मृति जो न केवल उन्हें, बल्कि एक पूरे युग को, एक पूरे भूगोल को, एक बंटे हुए मानस को अपने साथ ढो रही थी।
उनका सिनेमा, इन स्मृतियों का वह सजीव दस्तावेज़ है जो दर्शकों को यह समझाता है कि दृश्य केवल वह नहीं है जो आंखों से दिखता है, वह भी है जो इतिहास के दर्द में छिपा होता है, और जिसे केवल एक संवेदनशील आत्मा महसूस कर सकती है। ऋत्विक घटक ने अपने जीवन के इन क्षणों को न केवल कला में रूपांतरित किया, बल्कि उन्हें भारतीय सिनेमा की आत्मा का हिस्सा बना दिया। यही कारण है कि उनका सिनेमा केवल कला नहीं, एक जीवंत स्मृति-संस्कृति है—जो इतिहास से आँख मिलाकर पूछता है, “क्या तुमने हमें कभी सही से देखा?”
ऋत्विक ने कविता से शुरुआत की, पर बहुत जल्द उन्हें यह आभास हो गया कि कविता उनके अंतर्द्वंद्वों और सामाजिक असंतोष की तीव्रता को वह माध्यम नहीं दे सकती जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्होंने एक आत्मस्वीकृति के स्वर में कहा था—“मुझे एहसास हुआ कि यह मेरी चाय का प्याला नहीं है।” वे जानते थे कि उनकी बेचैन आत्मा को ऐसे माध्यम की ज़रूरत है जो न केवल कह सके, बल्कि झकझोर भी सके
कविता से आगे बढ़ते हुए उन्होंने कहानियाँ लिखीं—और वे कहानियाँ भी पारंपरिक नहीं, बल्कि असंतोष से भरी हुई, विरोध की तीखी टंकार वाली, और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध की उद्घोषणा जैसी थीं। लेकिन यहां भी उन्हें लगा कि शब्द, चाहे कितने भी धारदार क्यों न हों, समाज की आत्मा तक पहुँचने में कहीं सुस्त पड़ जाते हैं। फिर उन्होंने रंगमंच का रुख किया—जहाँ दृश्य, संवाद और देहभाषा तीनों मिलकर कह सकते थे वह सब कुछ, जो वे अपने भीतर सालों से संजोए हुए थे। लेकिन रंगमंच भी सीमित था—दस हजार दर्शक, सामूहिक प्रयास, तकनीकी बाधाएँ, और सबसे बढ़कर, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था की कसी हुई गिरफ़्त।और तब ऋत्विक घटक ने अपने लिए वह माध्यम चुना जो उनकी दृष्टि में सबसे सशक्त, सबसे व्याप्त और सबसे सच्चा था—सिनेमा।
यह सिनेमा उनके लिए केवल दृश्य माध्यम नहीं था—यह एक संघर्षशील आत्मा का घोषणापत्र था। उनके लिए सिनेमा वह ज़रिया था जिससे वे चीख सकते थे, जिससे वे आँसूओं को दृश्यों में ढाल सकते थे, और जिससे वे अपनी नफ़रत, करुणा, प्रेम, विक्षोभ और स्मृति को अमर कर सकते थे।
उन्होंने कहा—“मैं फिल्में अपने लिए नहीं, अपने लोगों के लिए बनाता हूँ।” यह वाक्य उनके सिनेमा-दर्शन की रीढ़ है। उनके लिए ‘लोग’ कोई सामान्य दर्शक नहीं थे, बल्कि वे थे जो भूख से मर रहे थे, जो पद्मा किनारे रो रहे थे, जो दो हिस्सों में कटे हुए भारत की पीड़ा को अपने खून में बहा रहे थे।
इसलिए उनकी सबसे महत्वपूर्ण फिल्में—‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गांधार’, ‘सुवर्णरेखा’—तीन नहीं, एक त्रयी हैं। ये विभाजन की त्रयी हैं, एक ऐसे ऐतिहासिक घाव की सिनेमाई अभिव्यक्ति, जिसे राजनीतिक इतिहास ने आंकड़ों और तिथियों में बाँधने की कोशिश की, पर ऋत्विक ने उसे इंसानी अनुभव, स्त्री की कराह, विस्थापित की तड़प, और एक टूटे हुए बंगाल के सांस्कृतिक संकट में दर्ज किया।‘मेघे ढाका तारा’ में नीता की कातर पुकार “क्या मैं जी नहीं सकती?” भारतीय सिनेमा का शायद सबसे करुण और ऐतिहासिक क्षण है। वह विभाजन का वह कोना है जिसे हम इतिहास की किताबों में नहीं, एक लड़की की आँखों में देखते हैं।‘कोमल गांधार’ प्रेम और कला के बीच फँसे समाज का गीत है—जहाँ विभाजन केवल भूगोल का नहीं, आत्मा का भी है।‘सुवर्णरेखा’ में जो दृश्य रचा गया है, वह केवल सिनेमा नहीं, एक सभ्यता के नैतिक पतन की कथा है, जो अपने ही बच्चों को खा रही है, और जहाँ शरणार्थी होना केवल सामाजिक नहीं, अस्तित्वगत अपराध है।
इन तीनों फिल्मों को समझना है तो केवल फिल्म-भाषा नहीं, इतिहास, संस्कृति और करुणा के रक्तस्नात दस्तावेज़ों में उतरना होगा। यह त्रयी हमें उस विभाजन की ओर लौटने को बाध्य करती है, जिसे हमने भूल जाना चाहा, लेकिन ऋत्विक ने कैमरे के ज़रिए हमारी स्मृति में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।ऋत्विक का सिनेमा मनोरंजन नहीं करता—वह अंतरात्मा को झिंझोड़ता है, विवेक को कुरेदता है, और यह पूछता है—“तुम्हारे इतिहास में यह लहू किसका है? और तुम आज भी उसे अनदेखा कैसे कर सकते हो?”
ऋत्विक घटक भारतीय सिनेमा के उस विलक्षण व्यक्तित्व का नाम है, जिसने कला को केवल सौंदर्य का नहीं, सत्य का एक अथक साधन माना। वे कम्युनिस्ट थे, लेकिन किसी भी विचारधारा के अंधानुयायी नहीं। उनके भीतर एक बेचैन विवेक था, जो धर्म, राजनीति और समाज की हर कट्टरता से टकराने का साहस रखता था। उन्होंने पार्टी को आत्मा से अपनाया, पर जब उसे आत्मा की जगह सत्ता का औजार बनते देखा, तो बिना भय, बिना संकोच के उससे अलग हो गए।
उनका नक्सल आंदोलन के प्रति दृष्टिकोण भी इसी नैतिक सूक्ष्मता का परिचायक है। वे उसके क्रांतिकारी मंतव्यों से सहमत थे—भूमि, श्रम, समानता की लड़ाई को उन्होंने अपने लोगों की लड़ाई माना, लेकिन जब यह लड़ाई हिंसा और अराजकता के रास्ते पर चली, तो वे उससे असहमत हो गए। वे जानते थे कि क्रांति केवल बंदूक से नहीं, चेतना से आती है।
उनकी कला-दृष्टि स्पष्ट थी। वे सौंदर्य के कवि नहीं थे, सत्य के जिज्ञासु थे। इसलिए उनकी फिल्में केवल कहानी नहीं कहतीं, वे एक बयानी सन्नाटा रचती हैं—एक ऐसा सन्नाटा जिसमें हर संवाद पत्थर की तरह गिरता है, और दर्शक की आत्मा पर चोट करता है।
ऋत्विक की हर फिल्म एक विस्थापित आत्मा की पुकार है। वे हमेशा उन लोगों के साथ खड़े दिखते हैं जिन्हें इतिहास ने हाशिए पर धकेल दिया, जिन्हें सभ्यता ने असभ्य कहा, और जिन्हें सत्ता ने अदृश्य बना दिया।
‘जुक्त तक्को आर गप्पो’ में उन्होंने स्वयं ‘नीलकंठ’ की भूमिका निभाई—यह केवल एक पात्र नहीं, स्वयं ऋत्विक का आत्मचित्र है। नीलकंठ का यह संवाद—”सब कुछ जल रहा है, दुनिया जल रही है, मैं जल रहा हूँ”—किसी स्क्रिप्ट का संवाद नहीं, एक समूची त्रस्त पीढ़ी का घोषणापत्र है, जो विभाजन, विस्थापन, उपेक्षा और टूटन से जल रही थी।
वे केवल नगरों के कलाकार नहीं थे, उन्होंने जंगलों, घाटियों, पहाड़ों और आदिवासी गंधों में भी अपनी फिल्म-दृष्टि को फैलाया। ‘द लाइफ ऑफ द आदीवासीज़’ केवल एक वृत्तचित्र नहीं, उस आवाज़ का पुनरुद्धार है, जो सदियों से उपेक्षित थी। उन्होंने इस देश की माटी में गूँजे उस लोक-संगीत को, उस परंपरा को, उस अस्तित्व को स्थान दिया, जिसे तथाकथित मुख्यधारा की फिल्मों ने कभी गंभीरता से नहीं देखा।
‘अजांत्रिक’ की शूटिंग रांची, नेतरहाट और रानीखटंगा जैसे स्थानों में करना एक सौंदर्यात्मक निर्णय नहीं था, वह संवेदना की खोज थी—जहाँ प्रकृति, आदिमता और आधुनिकता एक-दूसरे से मुठभेड़ कर रहे थे। ‘अजांत्रिक’ में सिर्फ एक बूढ़े ड्राइवर और उसकी पुरानी कार की कहानी नहीं है—वहाँ सभ्यता की कराह, परिवर्तन की त्रासदी, और यांत्रिकता में डूबती मनुष्यता की गाथा है।
ऋत्विक घटक की सिनेमा-यात्रा आत्मा की यात्रा थी। वे शब्दों से नहीं, त्रासदी की मौन छवियों से बात करते थे। उनकी दुनिया में नायक कोई एक व्यक्ति नहीं था—वहाँ हर शोषित, हर विस्थापित, हर चुप इतिहास नायक था।
वे अंत तक अपनी जड़ों से जुड़े रहे—और यही कारण है कि उनका सिनेमा केवल कला नहीं, एक सांस्कृतिक प्रतिरोध, एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ और एक नैतिक चुनौती है।
ऋत्विक घटक का जीवन और सृजन एक-दूसरे से इस तरह गुँथे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग खंडों में बाँटना किसी अन्याय से कम नहीं होगा। वे जितने बड़े फिल्मकार थे, उतने ही बड़े संवेदनात्मक शिक्षक, बौद्धिक संरक्षक और सिनेमा-दृष्टि के निर्माता भी थे। पुणे फिल्म संस्थान में उनका योगदान केवल शिक्षण भर नहीं था, वहाँ उन्होंने सिनेमा को देखने, समझने और जीने की एक नई संस्कृति का बीजारोपण किया।
उनके शिष्यों में मणि कौल, कुमार शहानी, सईद मिर्ज़ा, अदूर गोपालकृष्णन जैसे नाम शामिल हैं, जिनकी पहचान आज भारतीय समानांतर सिनेमा की बुनियादी आवाज़ों में होती है। ये सभी उन्हें “महागुरु” कहते थे, लेकिन यह संबोधन केवल श्रद्धा का नहीं था, एक अंतर्दृष्टिपूर्ण आदर का प्रतिफल था। ऋत्विक का पढ़ाना केवल टेक्निकल नहीं था—वह अपने विद्यार्थियों को दृश्य के भीतर छिपे सामाजिक तनाव, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आत्मा के कंपन तक ले जाते थे।
वहीं दूसरी ओर, जिस मुंबई फिल्म उद्योग से उन्हें उम्मीद नहीं थी, उसने भी उन्हें न अपनाया। वहाँ के सिनेमा बाजार की भाषा, मूल्य और प्राथमिकताएँ ऋत्विक की भाव-भाषा से बिल्कुल भिन्न थीं। उनके लिए सिनेमा पूँजी का खेल नहीं था, न ही वह दर्शक संख्याओं का गणित था। यही कारण है कि ऋत्विक की फिल्में अपनी पीढ़ी में ‘अस्वीकृत’ होकर भी, आने वाली पीढ़ियों की आत्मा में ‘स्थापित’ हो गईं।
उनका जीवन, उनके सिनेमा की ही तरह—विरोधाभासों और अंतर्विरोधों से भरा हुआ था। व्यक्तिगत जीवन में वे अकेले पड़ते गए। पत्नी सरुमा से अलगाव, बच्चों से कटाव, लगातार बढ़ती मदिरा की लत—यह सब उनके भीतर के उस ज्वालामुखी का संकेत था, जो बाहर से विस्फोटक था और भीतर से धधकता हुआ दुख। यह दुख न केवल व्यक्तिगत था, यह उस टूटे हुए राष्ट्र, बिखरे हुए समाज और जर्जर होते मनुष्यत्व का सामूहिक दर्द था, जिसे वे अपने भीतर लेकर जी रहे थे।
उनकी अंतिम फिल्में—‘तितास एक टी नदीर नाम’ और ‘जुक्त तक्को आर गप्पो’—वास्तव में आत्मकथात्मक आख्यान हैं। इन फिल्मों में ऋत्विक ने स्वयं को, अपने समय को, और अपने युग के आर्तनाद को पर्दे पर उतार दिया। ‘जुक्त तक्को…’ में ‘नीलकंठ’ केवल एक पात्र नहीं, एक प्रतीक है उस सभ्य, संवेदनशील और बौद्धिक मनुष्य का, जो इस जलते हुए समाज में अपनी चेतना को लेकर जीवित रहना चाहता है, पर अंततः राख हो जाता है।
ऋत्विक ने अंततः एक सरकारी अस्पताल में, गुमनामी, अकेलेपन और नशे में आकंठ डूबे हुए अंतिम साँस ली। यह अंत, जितना व्यक्तिगत था, उतना ही भारतीय कलात्मक आत्मा का एक करुण ट्रैजिक फिनाले भी था। वे इस दुनिया से चले गए, पर उनके बनाए हुए फ्रेम आज भी हमारे विवेक में काँपते हैं।
सत्यजीत रे जैसे सर्जक ने भी उनकी मृत्यु पर कहा था—”ऋत्विक मुझसे कहीं अधिक बंगाली थे। यही उनकी सबसे मूल्यवान विशेषता है।”यह कथन केवल क्षेत्रीयता का संकेत नहीं, एक सांस्कृतिक गहराई और लोक-संवेदना की पराकाष्ठा की स्वीकृति है।
ऋत्विक घटक आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे हर उस संवेदनशील दर्शक के भीतर जीवित हैं, जो सिनेमा को केवल देखता नहीं, महसूस करता है, और सवाल करता है। वे हमारे समय की नैतिक चेतना की एक शाश्वत आवाज़ बन चुके हैं—जो सन्नाटे में भी गूंजती है।
आज का समय दृश्यात्मकता का है—चमक, चकाचौंध, और क्षणिक प्रभावों का। सिनेमा अब एक उद्योग है, एक कंटेंट प्रोडक्शन मशीन—जहाँ कैमरा यथार्थ से नहीं, उसकी छाया से भी डरने लगा है। जब हर फ्रेम पर सौंदर्य का कृत्रिम मुखौटा चिपका दिया जाता है, जब संवेदना की जगह विज़ुअल इफेक्ट्स और सीजीआई बैठा दिए जाते हैं—ऐसे समय में ऋत्विक घटक की उपस्थिति एक प्रतिरोध की तरह है, एक जीवित चुनौती की तरह।
ऋत्विक की फिल्में हमें आज भी संवेदना का आह्वान करती हैं। वे कहती हैं—”आओ, सच्चाई के धुएँ में जलती आँखों से देखो, कि दुनिया कितनी अधूरी है।” वे हमें उस पर्दे के पार ले जाती हैं जहाँ सच्चाई की किरचें चुभती हैं, और जहाँ सौंदर्य का कोई नाटक नहीं, बल्कि पीड़ा की सीधी टकराहट होती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि सिनेमा महज़ दृश्य-श्रव्य माध्यम नहीं, एक नैतिक जिम्मेदारी है—एक ऐतिहासिक कर्तव्य है, और एक सामाजिक संवाद भी।
आज जब दर्शक मनोरंजन की आदतों में कैद है, और सिनेमा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स की गति और एल्गोरिदम के हाथों संचालित हो रहा है, तब भी ऋत्विक की फिल्में असमय की आवाज़ बनकर लौटती हैं। वे समय को काटते हुए हमारे भीतर प्रवेश करती हैं और हमें यह सोचने को विवश करती हैं कि— क्या सिनेमा केवल मनोरंजन है?क्या वह इतिहास की स्मृति नहीं हो सकता?क्या वह विरोध का एक सौंदर्यपूर्ण दस्तावेज़ नहीं बन सकता?
ऋत्विक घटक अब एक नाम नहीं, एक आंदोलन हैं—एक ऐसी ध्वनि जो आज भी कैमरे के पीछे से कह रही है:
“सिनेमा मनोरंजन नहीं, बयान है। और मैं अब भी बयान दे रहा हूँ।”यह “बयान” आज भी गूंजता है हर उस आंख में जो पर्दे पर मनुष्य को देखना चाहती है, हर उस हृदय में जो सिनेमा को मूल्य और विवेक की कसौटी पर परखना चाहता है। ऋत्विक हमें आज भी झकझोरते हैं—उनकी अनुपस्थिति में भी उनकी उपस्थिति हर सच्चे दर्शक की आत्मा में धड़कती है। वे सिनेमा की आत्मा के अंतिम आदिवासी हैं, जिन्हें तकनीक नहीं, मनुष्य की पीड़ा पर भरोसा था।
डॉ कुमारी उर्वशी
सहायक प्राध्यापिका, हिंदी विभाग
रांची विमेंस कॉलेज, रांची
मोबाइल नंबर 9955354365
ईमेल आईडी : [email protected]
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2 टिप्पणी

  1. डॉ कुमारी उर्वशी का ऋत्विक घटक पर लिखा गया आलेख ‌न सिर्फ़ भाषा की दृष्टि से अपितु कंटेंट की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है । समानांतर सिनेमा को समझने की दृष्टि से यह आलेख बहुत जरूरी है। भाषा का सौंदर्य तो इतना है कि पाठक उससे बंधा हुआ विस्मित- विभोर होता हुआ अंत तक पहुंचता है। आज भी बहुत से लोग सिनेमा को मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं किंतु यह विशाल जनमानस को संबोधित माध्यम है इसलिए इसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं है। तभी तो लोगों की दृष्टि बदलना ‌‌भी सिनेमा ‌‌का उद्देश्य है, इस तथ्य को स्थापित करने में वह अत्यंत सफल रही हैं कुमारी उर्वशी को ब‌हुत शुभकामनाएं।

    • आपकी इस आत्मीय प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभार।
      ऋत्विक घटक जैसे विशिष्ट निर्देशक और उनके सिनेमा की गहन सामाजिक, सांस्कृतिक परतों को समझने की कोशिश में मैंने जो कुछ लिखा, वह पाठकों तक इस तरह पहुँचेगा—यह आपके शब्दों से ही प्रमाणित हो गया।
      आपने जिस तरह भाषा, कंटेंट और विचार की समृद्धि को रेखांकित किया है, वह मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।
      वास्तव में सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को जाग्रत करने वाला, दृष्टिकोण को नया आयाम देने वाला माध्यम है।
      ऋत्विक घटक ने इसे अपनी फिल्मों में जिस तरह आत्मसात किया, वही मैंने अपने आलेख में संप्रेषित करने की कोशिश की थी।
      आपकी शुभकामनाएं इस यात्रा में मेरी सहचर हैं।
      बहुत-बहुत धन्यवाद!

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