कल ही अश्वत्थामा से बात हुई अधर्म का साथ देने वाले योद्धा से यूं कहो के मुंह जोर सी मुलाकात हुई । मस्तक मणि के स्थान पर नासूर से रिसते मवाद को पोंछ कर एक ओर फेंकते वह दर्प से बोला कहो अब क्या बात हुई?! मैंने पूछा क्या तुम सच में अमर हो?! विद्रूपता से मुस्कुराता बोला वो पुरोधा आज के विश्व में शकुनि द्रोण दुर्योधन जयद्रथ औ धृतराष्ट की प्रच्छन्न छाया को देख तुम्हें अभी भी समझ नहीं आया। *सियासत हूँ मैं।* कई कई रूप में रूपांतरित हूँ मैं। तुम्हारे आस पड़ोस में और तो और तुम्हारे दिल में बसता भी हूँ औ बरसता भी हूँ। पहले भी था मुखरित अब भी हूँ। और रहूँगा भी पर अब बस शकुनि द्रोण और जयद्रथ सा। युद्ध आतंक शोषण भुखमरी में, अहम अहंकार में ज़ुल्म ओ सितम में बसता हूँ मैं। इसीलिए के कृष्ण से शापित अश्वत्थामा हूँ मैं। अब कोई कृष्ण नहीं जो स्व को बिसारे और जग को निखारे। यहां -वहां ,इधर- उधर, आतंक ऑ आतताई आयामों में, नहीं है मेरा कोई सानी। बस इसी तरह व्यूह बना कर रोज़ ब रोज़ मानवता और मासूमियत को डसता हूँ मैं। देख नहीं रहे आज के ऑ भविष्य के कत्ल ओ गारत में अट्टहास करता स्वच्छंद विचरता अश्वत्थामा हूँ मैं। 2 – समय और मृत्यु समय और मृत्यु समय और मृत्यु कितने निर्द्वंद्व हैं, इनका कितना सुंदर अनुबंध है। दोनों के दोनों के संबंध कितने आबंध हैं। तिस पर भी, ये दोनों भी कब किसी के संग हैं, ये तो स्वयं अपने अपने निबंध हैं। नियति और नियंता भी इनके अंग संग हैं। जो इनका मर्म जाने और इन्हें तत्वबोध स्वरूप में समझे वही तो सच्चिदानंद का अंश है।
सूर्यकांत शर्मा मौलिक एवं स्वरचित द्वारका नई दिल्ली।