जब हम प्रवासी हिन्दी लेखन की बात करते हैं, तब भारत से बाहर रह कर अपनी भाषा में लिखने वाले रचनाकार हमारी दृष्टि में होते हैं। भूमंडलीकरण का यह समय साहित्य के क्षेत्र में भी सीमाओं से मुक्ति का समय है। हिन्दी अब केवल भारत की भाषा नहीं, विश्व के अनेक  देशों तक व्याप्त भाषा है। हिन्दी साहित्य की समृद्धि में प्रवासी लेखकों का योगदान अनवरत बढ़ता ही जा रहा है।

इस श्रृंखला की कड़ी के रूप में नई पीढ़ी की कथाकार अर्चना पैन्यूली का नाम लिया जा सकता है जो स्केंडिनेविया प्रायद्वीप में उत्तरी यूरोप  के डेनमार्क में रहकर, हिन्दी भाषा में अपना लेखन करती हैं। उल्लेखनीय है कि अधिकांशत: प्रवासी लेखन ब्रिटेन, अमेरिका, मॉरिशस जैसे देशों में हुआ और हो रहा है। सुदूर डेनमार्क से प्रवासी लेखन अर्चना पैन्यूली की देन है।

अर्चना पैन्यूली के तीन उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। ‘परिवर्तन, ‘वेयर डू आई बिलांग’ और ‘पॉल की तीर्थयात्रा’। पहला उपन्यास भारत में रहते हुए लिखा गया और बाद के दो उपन्यास प्रवास में रहते हुए लिखे गए।

 ‘वेयर डू आई बिलांग’ उपन्यास का अंग्रेजी रूपांतर भी प्रकाशित हुआ।  2017 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘हाइवे E47’  छप कर आया, जिसमें स्त्री सन्दर्भों की 12 कहानियां हैं। 2019 में दूसरा कथा संग्रह ‘कितनी मांएं हैं मेरी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। हिन्दी की विशिष्ट पत्र-पत्रिकाओं – हंस, कथादेश, वागर्थ आदि में उनकी कहानियां, विविध विषयों पर लेख और साक्षात्कार निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।

अर्चना पैन्यूली का अधिकाँश लेखन स्त्री केन्द्रित कहा जा सकता है। स्त्री और परिवार के माध्यम से समय और समाज को समझने की कोशिश उनके लेखन में दिखाई देती है। वे वैश्विक धरातल पर स्त्री की जीवन परिस्थिति, उसके स्वप्न, उसकी महत्वाकांक्षाओं और उसके अस्तित्व को समझने के प्रयास करती दिखाई देती हैं। उनकी कथा-कृतियों के स्त्री पात्र भारत और अन्य देशों में स्त्री पक्ष को सम्मुख रखते हैं। भारतीय और विशेषत: यूरोपीय देशों में स्त्री-प्रसंगों का तुलनात्मक रूप भी उनकी कृतियों में उभर कर सामने आता है।

अर्चना पैन्यूली का तीसरा उपन्यास ‘पॉल की तीर्थयात्रा’ प्रवासी साहित्य में अंकित स्त्री की छवि का साक्षात्कार करने का भरपूर अवसर देता है।

‘पॉल की तीर्थयात्रा’ उपन्यास कोपेनहेगेन की पृष्ठभूमि पर रचित है।भारतीय मूल की नीना और उसके स्कॉटिश/डेनिश पति पॉल के जीवन की यादें और साथ सहे सुख-दुःख उपन्यास का ताना-बाना बुनते हैं। उपन्यास में प्रेम, विवाह और दाम्पत्य की वास्तविकता परत-दर-परत खुली है। पति-पत्नी के रिश्तों के इन्द्रधनुषी रंगों के साथ-साथ यहाँ दुःख-दर्द-संदेह की कालिमा भी है।

नीना ‘सिंगल पेरेंट’(पैन्यूली, 2016, 38)  है, दो बेटियाँ के साथ कोपेनहेगेन, डेनमार्क में रहती है। बेटियों के साथ एडिनबर्ग यात्रा के दौरान एक पारंपरिक नर्तक और टूर गाइड पॉल से नीना का परिचय होता है, मित्रता होती है, पॉल नीना के माता-पिता से मिलने कोपेनहेगेन आता है और फिर नीना से विवाह की खातिर अपना जॉब, परिवार, देश छोड़कर, एडिनबर्ग में अपनी व्यवस्थित जिन्दगी को त्याग सागर पार नीना के पास आ बसता है, ‘एक टूटे हुए घर की जिम्मेदारी’(पैन्यूली, 2016, पृष्ठ 38)  लेने को।

अपने देश में पहले विवाह की असफलता के बाद, इस दूसरे विवाह में पॉल नीना के साथ कुछ वर्ष साथ में और कुछ अलगाव में बिताता है कि अचानक उनका तेरह वर्ष का दाम्पत्य नीना के असाध्य रोग की भेंट चढ़ जाता है। नीना की पहली बरसी पर पॉल निर्णय लेता है – अपने घर से बरसी के आयोजन स्थल तक 108 किलोमीटर की पदयात्रा का। एक सौ आठ – भारतीय दृष्टि से एक पवित्र संख्या,  नीना को श्रद्धांजलि स्वरूप पॉल की यह तीर्थयात्रा  पुराने ढंग की नहीं, बल्कि आधुनिक यात्रा बन जाती है।

उपन्यास में हम तीन पीढ़ियों से मिलते हैं – नीना और पॉल के माता-पिता, पति-पत्नी के रूप में नीना और पॉल तथा अलग-अलग विवाहों से उन दोनों के बच्चे। इस सभी का  जीवन, उनकी सोच, उनकी जीवन-शैली और उनकी प्रतिक्रियाएं ही उपन्यास का कथ्य बनते हैं। उपन्यास छोटे-छोटे पच्चीस अध्यायों में बांधा गया है।

अर्चना अपने लेखन को  भारत और विदेश में हुए अनुभवों की दास्तानें कहती हैं। भारतीय सम्पृक्ति और यूरोपीय पृष्ठभूमि में यह उपन्यास स्त्री के विविध रूपों को सहज ही अनावृत्त करता है। उपन्यास का मुख्य पात्र पॉल है, किन्तु उसकी जिन्दगी में महत्वपूर्ण हैं वे स्त्रियाँ जिन्होंने उसके जीवन को संवारा, उजाड़ा और समृद्ध किया। पॉल की स्मृति में परिवार की स्त्रियाँ आकार लेती हैं – पहली पत्नी सौन्द्रा, दूसरी पत्नी नीना, भाई की पत्नी लॉरा, बहन जूलिया, जुड़वां बेटियाँ लूसी-ग्रेसी, बूढ़ी सक्रिय मां और नीना की बेटियाँ करीना-जोहाना। उपन्यास में इन सभी के व्यक्तित्व की सुनिश्चित रेखाएं उभरती हैं। इन सभी में पॉल की दूसरी पत्नी नीना उपन्यास की अहम पात्र है। उसके माध्यम से स्त्री-चेतना के विविध आयाम खुलते चले जाते हैं।

नीना ‘सलीकेदार महिला’ है, (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 31) जो कोपेनहेगेन में जन्मी अपने माता-पिता की अकेली संतान है, हमेशा मंहगे इन्टरनैशनल स्कूल में पढ़ी, भारतीय माता-पिता के नियम-अनुशासन से निकल कर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में आकर पूरी तरह स्वच्छंद हो गयी, अचानक  मिली आज़ादी को समझ नहीं पाई, सिगरेट-शराब पीने लगी और सात-आठ महीने की डेटिंग के उपरान्त अपने फाइनल ईयर के दौरान डेनिश बॉयफ्रेंड से गर्भवती हो गई। नीना के माता-पिता के दबाव डालने पर यह शादी हुई किन्तु जबरन शादी क्या टिकती ! दाम्पत्य शुरू होने से पहले ही दरक गया, पहली बच्ची एक साल की, दूसरी के गर्भ में आते ही नीना और ओलिवर सेपरेट हो गए (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 33)  नीना मात्र पच्चीस साल की उम्र में तलाकशुदा थी। नीना के पिता की स्वीकृति है : ‘नीना ने हमारी भारतीय लीक से बहुत कुछ अलग किया है।।।वह यूरोपियन है – हम उससे भारतीय तौर-तरीकों पर चलने की उम्मीद नहीं कर सकते।’ (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 36)

पॉल के साथ विवाह करने से पहले, क्रिसमस पर्व पर नीना पॉल के परिवार से ग्लासगो में मिली, जहां पॉल ‘नीना की सुंदर छवि सशक्त व्यक्तित्व’ से मंत्रमुग्ध हुआ, वहां पॉल की मां ने उसे ‘सुंदर शिष्ट विनम्र संस्कारशील’ पाया। (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 45) क्रमश: पॉल ने नीना के ‘स्वतंत्र, पक्के इरादों वाले महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व’ को सर्वाधिक पसंद किया और उसे व्यवहारकुशल ‘मजबूत इच्छाशक्तिवाली महिला’ के रूप में पहचाना। (पैन्यूली, पृष्ठ 47) पॉल से विवाह के बाद नीना ने सदैव ‘अच्छी पुत्रवधू बनने की कोशिश’ की। (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 58)

दस वर्ष का अंतर था नीना और पॉल की उम्र के बीच, पॉल के साथ अपने दाम्पत्य जीवन में नीना ने उद्दात्त प्रेम और गहरे विषाद दोनों का अनुभव किया।।। शायद विवाह का फैसला नीना ने एक जुनून में लिया, वह अपने अकेलेपन से घबरा गई थी, उसने पॉल से अथाह प्रेम किया, लेकिन फिर ‘तर्क-वितर्क, तनाव, दो खामोश समानान्तर जिंदगियां’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 66) और उनकी विवाहित जिन्दगी तबाही की ओर बढ़ने लगी’।(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 69) ‘मैं तुम्हें नहीं समझती, तुम मुझे नहीं समझते। लेट् अस सेपरेट!’ (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 70) यह नीना का निर्णय था।

केवल इतना नहीं, उपन्यास यह भी दर्शाता है कि यही ‘रौबीली औरत’ नीना अपनी युवा होती बेटी के क्रिया-कलापों के आगे पस्त हो जाती है।( पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 74) बेटियों और उनके सौतेले पिता के बीच बढ़ता तनाव नीना को यह कहने को बाध्य करता है – ‘अगर मुझे जोहाना और तुममें से एक को चुनना पड़े तो मैं जोहाना को चुनूँगी।’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 81) इन्हीं पलों में घर में सभी के सामने सिगरेट पीने वाली हताश-परेशान नीना, बिगड़ती हुई बेटी को सुधारने की आकांक्षा से रात्रि के एकांत में छुपकर सिगरेट पीती है, भाग कर प्रकृति की गोद में जाती है। पॉल के यह कहने पर कि ‘क्यों यह जहरीला धुंआ निगल कर अपनी उम्र कम कर रही हो ?’  नीना जवाब देती है – ‘ ज्यादा जी कर करना क्या ?’ (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 82)

दाम्पत्य जीवन में पॉल से ‘हाइकमांड’ का सम्बोधन और ‘वीटोपावर तो आपके पास ही है’ जैसे कथनों को सुनने वाली नीना अपने ही द्वारा आयोजित, पति के पचासवें जन्मदिन की दावत में सभी के सामने घोषणा करती है ‘मैं और पॉल अलग हो रहे हैं।।’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 105) नीना के इस आचरण  को पॉल की बूढ़ी मां ने यूं विश्लेषित किया ‘उसके पास धन-दौलत, शोहरत सब है। मगर उसकी बहुत सारी लालसाएं अधूरी हैं। बहुत सारी अधूरी इच्छाएं आमतौर पर व्यक्तियों को और विशेष रूप से औरतों को कड़वा बना देती हैं।’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 105)

जीवन की इस घनघोर उथल-पुथल के बीच पॉल ने जैसे जान लिया कि ‘पारदर्शी, स्पष्टवादी नीना जी-तोड़ संघर्ष करने वाली, नफ़ा-नुकसान देखने वाली महिला भी थी – रिश्तों में भी वह नफ़ा-नुकसान देखती थी। जब उसे लगा – पॉल उसके किसी काम का नहीं, उसने मुझे अपनी जिन्दगी से निकाल दिया।’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 109)

कैसी विडंबना है जब बेटी जोहाना अनुभव करती है ‘मेरी मां को पति थर्ड क्लास मिले।।’ तब नीना के पास यह सूचना है  कि ‘फर्स्ट क्लास रोग लग गया है मुझे’ (पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 121) कम उम्र में कैंसरग्रस्त नीना के जीवन की इस परिणति पर पॉल की नाज़ुक टिप्पणी थी – ‘क्या-क्या यातनाएं-वेदनाएं थीं उसकी किस्मत में, ।। एक सुन्दर, स्फूर्तिवान, आत्मविश्वासी महिला से एक निर्बल, भीरु, कुरूप महिला।।।।कैम्ब्रिज की पढ़ी-लिखी युवती अपने जीवन के अंतिम समय में दस्तावेजों पर अंगूठा लगा रही थी।’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 172)

यह दूर देश में एक पढ़ी-लिखी, संपन्न, आत्मनिर्भर युवती की जीवन-गाथा है – अपने निर्णय लेने में आज़ाद नीना, अपने निजी बिखराव को समेटने को तत्पर नीना, अपने घर-परिवार को टूटने से बचा लेने को आकुल नीना, घर-बाहर संभालती नीना ! नीना की यह कथा, किसी भी भारतीय या विश्व के किसी भी देश की स्त्री की जीवन कथा हो सकती है !  ‘बेचारी ! क्या नहीं सहा उसने जीवन में ? पारंपरिक माता-पिता का कड़ा अनुशासन, गैर जिम्मेदाराना पूर्व पति से संघर्ष, नकचढ़ी बेटियों की परवरिश, अपने से कम काबिल पति से सामंजस्य, बॉयफ्रेंड की खुदकुशी और महारोग।।।!’(पैन्यूली, 2016 पृष्ठ 174) आज की वैश्विक स्त्री की जीवन-यात्रा के विविध पड़ावों की उठा-पटक, उसके प्रयासों की निष्फलता, उसकी व्यथा-कथा का लेखाजोखा है यह उपन्यास।

वैवाहिक जीवन में ‘कई मसलों व मुद्दों पर हमें खामोशी ओढ़ लेनी पड़ती है।।।। नहीं तो जीवन।।युद्ध का अखाड़ा हो जाएगा, विवाह में सभी प्रकार की संभावनाएं हैं – आजीवन निभाने से बीच में तोड़ देने तक की, इंसान की खुशियाँ बड़ी-बड़ी बातों में नहीं छोटी-छोटी बातों में निहित होती हैं, अभंग परिवार बाजी जीत लेने जैसा होता है,’  – इन तमाम निष्कर्षों पर नीना का दाम्पत्य खरा नहीं उतरा – क्या इसलिए कि उसने सभी मुद्दों पर  खामोशी नहीं ओढ़ी ? क्योंकि वह भी मुंह में जबान रखती थी ! निश्चित ही जीवन उसके लिए युद्ध का अखाड़ा बना, जहां अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना उसकी विवशता थी। विवाह की सभी संभावनाओं को उसने अपने तईं टटोला, निबाह वह भी चाहती रही, तोड़ना वह भी नहीं चाहती थी और छोटी-छोटी बातों में खुशियों की तलाश उसने हमेशा की। वह बाजी नहीं जीत पाई, परिवार कई-कई बार टूटा और अंतत: वह हार गई – उसकी जिन्दगी के सभी कार्य बड़ी जल्दी-जल्दी घटित हुए – पढाई, कैरियर, शादी, मां बनना, सास बनना और फिर मृत्यु के आगोश में लीन हो जाना ।।।!

ऐसा नहीं है कि भारतीय संस्कारों में पली-बढ़ी प्रबुद्ध नीना अपने बीते हुए जीवन का पुनरावलोकन और अपनी कमियों पर गौर नहीं करती। जीवन में अच्छे-बुरे सभी पहलुओं को याद कर, उनका विश्लेषण करते हुए प्रिय प्रसंगों को संजो लेने के लिए वह अपने दाम्पत्य को जब एक अवसर और देना चाहती है, तब एक बार फिर उसे ही मुंह की खानी पड़ती है। पॉल के साथ बिखरते रिश्तों को सुधारने के लिए, वह बहुत मन से थाईलैंड घूमने का कार्यक्रम बनाती है, प्रवास में वह पति के साथ पूर्ण एकांत चाहती है – मोबाइल, ईमेल,इन्टरनेट, ट्विटर, फेसबुक  से दूर रहकर ।। कि इस बीच अनहोनी घट जाती है। स्कॉटलैंड में पॉल के पिता का निधन हो जाता है और उन्हें यह यह समाचार देर से मिलता है। बौखलाया पॉल सबके बीच होटल में कठोर अपशब्दों से नीना को अपमानित करता है, अपमान का घूँट पीकर भी नीना अपने दायित्वों का निर्वाह करती है, वर्तमान बुकिंग कैंसिल, नई बुकिंग और स्कॉटलैंड यात्रा। फिर भी संबंधों की जर्जरता नहीं संभल पाती।

आधुनिका नीना के जीवन में अनवरत समस्याएँ रही, संघर्ष रहे। पहले पति ने मातृत्व में व्यस्त नीना को धोखे में रख कर एक नया सम्बन्ध जोड़ कर नाता तोड़ लिया, दूसरे पति को कई स्तरों पर वही स्वीकार नहीं कर पाई, तीसरी मैत्री में वह फिर छली गई – जब कैंसरग्रस्त हुई  – तब बॉयफ्रेंड पीटर फांसी के फंदे पर झूल गया। उपन्यास में फ्लैशबैक पद्धति से ये कहानियां चलती रहती है, पाठक वर्तमान से अतीत में लौटते रहते हैं,  पॉल और नीना के जीवन की विविध झलकियाँ आती रहती हैं – मधुर सम्बन्ध की, मान-मनुहार-अपमान-तिरस्कार-क्षोभ-विषाद की। इस तरह यह स्त्री केन्द्रित कथा टूटते विश्वासों और मानवीय संबंधों की उलझनों-समाधानों की दुर्लभ वैश्विक गाथा बन जाती है।

नीना अपने स्व की तलाश में, अपने आकाश की खोज में भटकती है, और जब तक सांस है, अपने अनुभवों का संसार रचती और जीती है। वह आद्यंत आत्मनिर्भर मुखर स्त्री रही, जिसने जो देखा वह कहा, जो मिला सो सहा। वर्तमान समय में नीना जैसी स्त्री सार्वभौम है, डेनमार्क में,भारत में, विश्व में कहीं भी।

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