Wednesday, March 25, 2026
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सौम्या पाण्डेय “पूर्ति” की कलम से – अनुभव का प्रवाह है “दीप जला रखना तुम”

पुस्तक- “दीप जला रखना तुम” (काव्य संग्रह)
रचनाकार- सन्तोष खन्ना
प्रकाशक- हेमाद्रि प्रकाशन, 1/955, गली न. 22-ए, ईस्ट रामनगर, नज़दीक दुर्गा मंदिर, शाहदरा, दिल्ली – 110032
आई.एस. बी.एन – 978-81-969597-7-7
प्रकाशन वर्ष- 2025
मूल्य- 400/- रुपए
“ज्ञान का एकमात्र स्रोत अनुभव है” – यह उद्गार महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के हैं, जिन्होंने अनुभव को ज्ञान का श्रोत बताया है। यह सत्य है कि ज्ञान अनुभव से ही आता है, जैसे एक बालक एक-एक कक्षा पास करते हुए, प्रत्येक कक्षा में प्राप्त निज अनुभव से अपना आगे का मार्ग प्रशस्त करता जाता है, जिन्हें पंख देने का कार्य बालक के माता-पिता, गुरु, वरिष्ठ जन इत्यादि करते हैं जो अपने अनुभवों के आधार पर बालक को आगे के जीवन के लिए हर प्रकार की शिक्षा प्रदान करते हैं जो कि उन्होंने स्वयं के अनुभव के आधार पर ज्ञात की है, इस प्रकार अनुभव जब किसी रचना या कृति के साथ जुड़ता है तो वह अदृतिय सृजन का साक्षी बनता है, ऐसे ही सुंदर सृजन के रूप में आदरणीय संतोष खन्ना मैम का शानदार काव्य संग्रह उनकी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है जो कि उनके वर्षों के संचित अनुभवों का खजाना है, जिनमें अनेकों सुंदर काव्यात्मक रचनाएँ संकलित हैं।
सर्वप्रथम कविता लिखने का उद्देश्य उन्हीं की एक रचना- “सत्यवती हो कविता” के माध्यम से देखें-
लिखनी हो कविता
वह हो सत्यवती आचरण में, सोंच में
भाव में  विभाव में  भाषा के लोच में
जीवन के जोश में लिखो तो लिखो होश में
तभी तो चमकेगी सविता
सत्यवती हो कविता
उपरोक्त कविता में लेखिका ने काव्य सृजन में भाषा के सौंदर्य को चरित्र व आचरण से सम्बद्ध किया है, जैसे एक मनुष्य के लिए उत्तम चरित्र उसके जीवन का उजाला है, वैसे ही काव्य की सुंदरता उसके भाषाई सौंदर्य में है जो तभी सूर्य सदृश चमकेगी जब वह निष्कलुष हो। सृजन का ऐसा विलक्षण भाव समझने के लिए पुस्तक में लेखिका का प्राक्कथन पढ़ना आवश्यक है, जिसमें पिछले तीन-चार दशकों से लेखकों की चारित्रिक शुद्धता को लेकर चल रही बहस है, जिसका प्रतिउत्तर रचनाकार ने कविता इस रचना के माध्यम से दिया है, जिसे पूरा पढ़कर रचना के मर्म को समझा जा सकता है।
काव्य सृजन में गहराई व मर्म की आहट होती है, जो सीधे पाठकों के हृदय में प्रस्फुटित होती है। ऐसी ही एक गंभीर रचना “सागर” में धरती को भी स्वयं में विलीन करने की क्षमता रखने वाले जलधि की भी पीड़ा वर्णन है-
सागर कितना हो विशाल
वह बह नहीं सकता
कितना भी दर्द हो उसका
वह कह नहीं सकता
समो लेता है वह हर नदी
खुद अपने सीने में
कोई भी मर्यादा हो भंग
वह सह नहीं सकता।।
इस सूक्ष्म कविता में सागर के अस्तित्व की गंभीरता का वर्णन किया गया है। इस अभिव्यक्ति को हम पिता से संबद्ध कर सकते हैं क्योंकि पिता का व्यक्तित्व प्रायः सागर के समान ही माना जाता है। सागर की विशालता ऐसी है कि वह सभी छोटी बड़ी नदियों को स्वयं में समाहित कर लेता है, ठीक उसी प्रकार से पिता भी अपनी संतानों को अपनी भार्या को अंक में समेटे रहता है, उनकी हर पीड़ा को अपने स्नेह से दूर करता है किंतु निज व्यथा को कभी भी व्यक्त नहीं करता है क्योंकि सहन करने की शक्ति सभी में नहीं होती है, सागर मर्यादित होता है अतः मर्यादा का उल्लंघन उसके लिए निषिद्ध है। यह रचना जीवन में मर्यादा के महत्व व समुद्र के अस्तित्व की विशालता को दर्शाती है, सीमित शब्दों में अनेकों मनोभावों से युक्त यह कविता अपने शब्दों में अनेकों अर्थ समेटे हुए है।
ऐसा ही एक अन्य विलक्षण मुक्तक है-
बह रहा है समय नदी की तरह
कह रहा है जीवन सदी की तरह
ज्यों बदलती सदी मिट जाता तन
सक्रिय है आत्मा घड़ी की तरह
यह पंक्तियां आध्यात्म की ओर ले जाती हैं, जिसमें आत्मा को नश्वर एवं सतत सक्रिय बताया गया है। जैसे काल की गति कभी रुकती नहीं वैसे ही आत्मा भी घड़ी की मानिंद गतिमान रहती है। मानव शरीर तो समय के साथ अपनी गति को प्राप्त करता है किंतु आत्मा अपने हर जन्म का हिसाब रखती है क्योंकि वह निर्बाध रूप से गतिशील रहती है। इस कविता के माध्यम से कवियत्री मनुष्यों को सचेत करना चाहती हैं कि आवरण की तरह बदलते रहने वाले तन के स्थान पर आत्मा जो कि अजर, अमर है उसको शुद्ध रखना चाहिये, अंततः कर्म का फल आत्मा के द्वारा ही शरीर को भुगतना पड़ता है।
वर्तमान कालखंड युद्ध का है, विश्व के अनेकों देश अपनेआप को युद्ध में झोंके हुए हैं। इस विनाशकारी माहौल पर भला एक कवियत्री की कलम कैसे न चले, अतः देवों के देव “महादेव” जो कि स्वयं समस्त अनिष्ट के संहारक हैं उनका आह्वाहन करते हुए संतोष खन्ना जी लिखती हैं-
ओ शिव, सक्रिय हो जाओ
हटा लो प्रलय के सब बादलों को
अपनी करुणा की बयार चलाओ
शांत हो जाए युद्धों की ज्वालाएँ
मनसा वाचा कर्मणा हर स्तर पर
धरा पर सब को निरोग बनाओ
ओ हितकारी शिव
फिर से सक्रिय हो जाओ
रचनाकार की परिपक्वता ही है कि वह वैचारिक रचनाओं के साथ – साथ दम-सामयिक मुद्दों पर भी पूरी दृष्टि रखे हुई हैं व उन्हें भी लिपिबद्ध कर रही हैं।
एक हाइकू देखें-
अक्षर शिव
अर्थ शक्ति माँ गौरी
मानव लोरी।।
शिव सृष्टि के आधार हैं, अक्षर को ब्रह्म भी कहा जाता है अतः परम् ब्रह्म शिव व उनकी अर्धांगिनी माँ गौरी जो कि शक्ति स्वरूपा हैं व उनके होने का अर्थ भी गौरी ही हैं क्योंकि संसार की लय तो वे ही हैं जिनकी उपस्थिति से ही सृजन सम्भव है व मानव उनकी संतान हैं, जगत के स्पंदन को सुव्यक्त करती यह रचना सम्पूर्ण जगत का सार हैं, संसार के होने का आधार है, यही इस काव्य सृजन की सफलता भी है कि कुछ शब्द ही पूरा अर्थ प्रकट कर देते हैं व पाठक किंकर्तव्यविमूढ़ रह जाता है।
एक रचनाकार का हृदय कोमल होता है तो वहीं देशभक्ति से ओतप्रोत भी, भारत में जन्मा प्रत्येक व्यक्ति उसका यशगान करना चाहता है, उन्हीं के विचारों को मूर्त रूप देते हुए रचनाकार लिखती हैं-
असंख्य भुजा ताल से
मातृभूमि के भाल पर
शौर्य के चंदन रोली से
कर तिलक गौरव का
धरा गगन गुंजा रहा
जय हिंद, जय भारत
अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम “शब्द” को समर्पित एक अन्य रचना “समर्पण” के माध्यम से शब्दों के महत्व को सरलता दर्शाया गया है-
अगर नहीं होते शब्द
बोलो कहाँ होते हम
न कह पाते दर्द
न सह पाते गम
संवेदना के साथ
आँखे न होती नम।।
कहा जाता है कि मौन की भी एक भाषा होती है किंतु उस भाषा के सम्प्रेषण के लिए शब्द ही माध्यम बनते हैं, वे ही संवेदनाओ को व्यक्त करने का साधन हैं, अतः शब्द अनमोल हैं।
रचनाकार ने स्त्रियों को केंद्र में रखकर भी विभिन्न रचनाएँ लिखी हैं। उनमें प्रमुख है “गांधारी”, जिसमें उन्होंने गांधारी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है-
ओ गांधारी!
तुमने क्यों चुना अंधकार।
हम नहीं करना चाहते 
प्रताड़ित धृतराष्ट्र को
वह बेचारा था किस्मत का मारा,
तुम तो बन सकती थीं,
अंधे धृतराष्ट्र का सहारा।
क्यों बंद कर ली तुमने
अपनी खुली आँखे
क्यों कतर डाली स्वतः ही
तुमने अपने ही मन की पाँखें, 
यह कैसा पति धर्म निभाया
दिव्यांग का सहारा न बन
तुमने खुद को पंगु बनाया
आँखों पर पट्टी बांधने का चयन
कहीं से भी नहीं था उचित
ना धर्म न आस्था का प्रश्न
आँखे रहते अंधा बनने का कदम
बन गया बुनियाद महाभारत का
रक्त रंजित इतिहास का वरण।
एक जज के रूप में वर्षों तक लोगों को न्याय दिलाने वाला उनका हृदय कौरवों के प्रति अन्याय को कैसे सहता। यदि गांधारी ने अपनी आँखों पर पट्टी न बांधी होती तो सम्भवतः महाभारत का युद्ध ही न होता, क्योंकि वह अपने पुत्रों को संस्कारित करने के साथ ही उनकी परवरिश पर दृष्टि रख सकती थीं, यह एक अनोखा दृष्टिकोण है जो इस कविता के माध्यम से चर्चा का कारण बन सकता है।
विभिन्न विषयों को निर्भीकता से अभिव्यक्त करने के साथ ही रचनाकार अपने अनुभवों के आधार पर बढ़ती उम्र से भी स्वयं को विचलित न करते हुए जीवन के अंतिम सत्य को भी बड़ी बेबाकी से कलमबद्ध करती हैं-
सब से बड़ी सच्चाई
किसी भी क्षण थम सकता है
साँसों का सिलसिला
फिर भी हर सोच और कर्म
चलता रहता जैसे हम हों स्थायी।
यह भी एक सच्ची सच्चाई
कभी नहीं व्यापेगी
हमें मृत्यु
हम देह नहीं
आत्मा हैं
अजर, अमर, अनश्वर
जिसे कभी मृत्यु नहीं आई
उस ईश्वर की हम हैं
एक चमचम करती
रौशनाई।।
वस्तुतः यह पंक्तियां सभी प्राणिमात्र के लिए प्रेरणा हैं, क्योंकि साँसों का चलना जीवन का प्रतीक है किंतु किसके लिए नियंता ने कितनी सांसें रखी हैं, कब तक रखी हैं यह कोई नहीं जानता, जीवन की अनिश्चितता को दर्शाती यह कविता मृत्यु का उत्सव मनाती प्रतीत होती है क्योंकि हर प्राणी की आत्मा तो अनश्वर है व ईश्वर की ज्योति से रौशन है अतः जीवन का हर  क्षण अनमोल है, जिसे ईश्वर का वरदान मानकर प्रसन्न व गतिशील रहना चाहिए, हम सब उसी परम् तत्व की संतान हैं, हम कभी नष्ट न होंगें, बल्कि अनंत ऊर्जा के स्रोत ईश्वर की कृपा से प्रकाशमान रहेंगें।
ऐसी रचना गहन अध्धयन, अनुभव, परिपक्वता व गंभीरता की परिचायक है जो सतत साहित्य साधना से ही सम्भव है। आदरणीय सन्तोष खन्ना जी का अध्धयन एवं कार्यक्षेत्र व्यापक है, उनका साहित्य की विविध विधाओं में दखल है। हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार होने के कारण आपने दोनों भाषाओं में काव्य सृजन किया है, व अनुवाद के लिए भी सार्थक कार्य किये हैं। कहानी, उपन्यास, आलेख, नाटक, बाल साहित्य के  साथ ही विधि भारती परिषद की त्रैमासिक पत्रिका का 32 वर्षों से बेहद स्तरीय व सफल संपादन करते हुए एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका पाठकों के लिए उपलब्ध कराई है, जिसमें विधि सम्मत आलेख व सूचनाएं संग्रहित हैं। उनके जीवन के विविध अनुभवों की झलक उनकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होती है, यह संग्रह भी विषय की विविधता से भरपूर है। इसमें छोटी बड़ी 95 कविताओं को संकलित किया गया है। कुल 128 पेज की यह पुस्तक आकर्षक आवरण व बेहद स्तरीय पेपर क्वालिटी के हार्ड बाउंड में प्रकाशित हुई है। पुस्तक का प्रकाशन “हेमाद्रि प्रकाशन” ने किया है। यह एक बड़ा ही वैचारिक व पठनीय काव्य संग्रह है जिसमें पाठकों को गंभीर व सामायिक रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगीं। 
समीक्षक- सौम्या पाण्डेय “पूर्ति”
ग्रेटर नोएडा
मो.- 7838979966
ईमेल- [email protected]
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