लेखिका- उमा झुनझुनवाला समीक्षक- तेजस पूनियां
पुस्तक- “मैं और मेरा मन” पता- 76, सुंदर नगर, मालवीय नगर
विधा- काव्य-संग्रह सेक्टर-5, जयपुर (राज०)
प्रकाशन- वाणी प्रकाशन, दिल्ली पिन- 302017
मूल्य- 425/-
उमा झुनझुनवाला समकालीन हिन्दी काव्य और रंगमंच की उन विरल रचनाकारों में हैं, जिनकी रचना-संवेदना केवल अनुभव की पुनरावृत्ति नहीं बल्कि अनुभव के दार्शनिक पुनर्सृजन का कार्य करती है। 20 अगस्त 1968 को कोलकाता में जन्मी उमा ने अपने सृजनधर्मी व्यक्तित्व से हिन्दी साहित्य में एम.ए. तथा की बी.एड की शिक्षा प्राप्त की और 1984 से रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय रहकर ‘लिटिल थेस्पियन’ जैसी संस्था की स्थापना की। निर्देशन, अभिनय, लेखन और अनुवाद इन सभी क्षेत्रों में उनका योगदान उल्लेखनीय है। ‘रेंगती परछाइयाँ’, ‘विसर्जन’, ‘भीगी औरतें और लम्हों की मुलाकात’, ‘हज़ारों ख्वाहिशें’ तथा ‘चौखट’ जैसे नाटकों से लेकर ‘एक औरत की डायरी से’ और ‘लाल फूल का एक जोड़ा’, ‘मैं अभी प्रतीक्षा में हूँ’ तथा ‘आधे चाँद की थकी पुतलियाँ’ जैसे काव्य-संग्रहों तक उनका रचनात्मक विस्तार एक सघन संवेदनात्मक भूगोल निर्मित करता है। अब वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित उनका काव्य-संग्रह “मैं और मेरा मन” में संकलित कविताएँ उनके काव्य-संसार को एक विशिष्ट वैचारिक ऊँचाई प्रदान करती हैं।
उमा झुनझुनवाला की कविता को यदि किसी एक बौद्धिक ढाँचे में समझना हो, तो वह एक साथ अस्तित्ववादी, स्त्रीवादी और प्रतीकवादी काव्य-दृष्टि का त्रिकोण निर्मित करती है। उनकी कविताओं में ‘मैं’ की उपस्थिति केवल एक व्यक्तिगत स्वर नहीं बल्कि अस्तित्व के प्रश्नों से जूझती हुई एक चेतना है। “मैं और मेरा मन” जैसी कविताएँ इस द्वंद्व को स्पष्ट करती हैं, जहाँ ‘मैं’ और ‘मन’ दो पृथक अस्तित्वों के रूप में संवादरत हैं। यह वही स्थिति है, जिसे अस्तित्ववाद में ‘स्व’ की विखंडित चेतना के रूप में देखा जाता है। यहाँ कवयित्री का ‘मैं’ अपने भीतर के रिक्तताओं, प्रश्नों और अस्थिरताओं से टकराता है।
“झील” कविता इस अस्तित्ववादी संवेदना का एक रूपक बनकर उभरती है-
“जज़्बातों से भरी एक झील
जहाँ सूरज की लाली है
चाँद की उजली शीतलता है…”
यहाँ ‘झील’ केवल भावनाओं का संग्रह नहीं बल्कि अस्तित्व की बहुस्तरीयता का प्रतीक है। अस्तित्ववाद के अनुसार मनुष्य एक स्थिर सत्ता नहीं बल्कि निरंतर बनने की प्रक्रिया है ठीक वैसे ही जैसे इस झील में ऋतुएँ, रंग और अवस्थाएँ बदलती रहती हैं। “कैसे-कैसे रंग हैं जाने इस झील में” यह पंक्ति आत्म के अनंत विस्तार की ओर संकेत करती है, जहाँ कोई अंतिम सत्य नहीं, केवल अनुभवों का प्रवाह है।
“हिज्र” कविता में यह अस्तित्ववादी अकेलापन और अधिक तीव्र हो जाता है-
“दरख्त पे टँगी
मेरी रूह को
हिज्र की आदत है”
यहाँ ‘रूह’ का ‘टँगा होना’ एक ऐसे अस्तित्व का संकेत है, जो न पूर्णतः जीवित है, न मृत बल्कि एक मध्यवर्ती स्थिति में है। यह ‘in-between existence’ अस्तित्ववादी दर्शन की मूल संवेदना है। ‘हिज्र की आदत’ इस पीड़ा को स्थायित्व देती है- जैसे अकेलापन अब नियति बन चुका हो। यह विरह केवल प्रेम-वियोग नहीं बल्कि आत्म से वियोग भी है।
यदि इस काव्य-संसार को स्त्रीवादी दृष्टि से देखें, तो उमा झुनझुनवाला की कविताएँ स्त्री-अस्तित्व के विखंडन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गहराई से उद्घाटित करती हैं। “औरत” कविता में वे लिखती हैं-
“औरत ने जब कहा-
“निजत्व”
अनाओं में बिखर गयी
… प्रकृति
इनसान रह न पायी फिर
…औरत”
यहाँ ‘निजत्व’ की खोज स्त्री के लिए एक संकट बन जाती है। यह पंक्ति समकालीन स्त्रीवाद के उस प्रश्न को सामने लाती है, जहाँ स्त्री जब अपनी पहचान की माँग करती है, तो समाज उसे विखंडित कर देता है। यह कविता अनामिका, कात्यायनी, गार्गी मिश्र, अंकिता आनंद और अनुराधा सिंह जैसी समकालीन कवयित्रियों के स्त्री-विमर्श से संवाद करती हुई प्रतीत होती है किन्तु उमा झुनझुनवाला की विशेषता यह है कि वे इस विमर्श को अत्यधिक आक्रोश या प्रतिरोध के रूप में नहीं बल्कि एक आंतरिक संवेदना और प्रतीकात्मक भाषा के माध्यम से व्यक्त करती हैं।
अनामिका की कविता जहाँ बौद्धिक स्त्री-चेतना का विस्तार करती है, वहीं कात्यायनी में राजनीतिक प्रतिरोध का स्वर अधिक मुखर है। गार्गी मिश्र और अंकिता आनंद की कविताओं में शहरी स्त्री का अनुभव उभरता है, जबकि अनुराधा सिंह में संवेदना और स्मृति का गहन संयोजन है। इन सबके बीच उमा झुनझुनवाला एक ऐसी कवयित्री के रूप में स्थापित होती हैं, जो स्त्री-अनुभव को प्रतीकों और प्रकृति के माध्यम से रूपायित करती हैं, जिससे उनका काव्य अधिक सूक्ष्म और बहुस्तरीय बन जाता है।
“हर्फ़” कविता को यदि प्रतीकवादी दृष्टि से देखा जाए, तो यह सृजन-प्रक्रिया का एक अत्यंत सघन रूपक है-
“हर्फ़ों को जलने दो
फ़िक्र मत करो
ये ख़ाक नहीं होंगे
जितना जलेंगे
उतना चमकेंगे”
यहाँ ‘हर्फ़’ केवल अक्षर नहीं, बल्कि अनुभव की इकाइयाँ हैं। ‘जलना’ यहाँ पीड़ा, संघर्ष और आत्म-परिष्कार का प्रतीक है। प्रतीकवाद की परंपरा में वस्तुएँ अपने प्रत्यक्ष अर्थ से आगे बढ़कर एक गहरे, अप्रत्यक्ष अर्थ की ओर संकेत करती हैं ठीक वैसे ही जैसे यहाँ ‘हर्फ़’ सृजन की तपस्या का प्रतीक बन जाते हैं।
“सागर” कविता में यह प्रतीकवाद एक दार्शनिक ऊँचाई प्राप्त करता है-
“बड़ा मुश्किल है सागर की गहराई मापना”
“क्या ज़रूरत है उसे मापने की
सागर को सागर ही रहने दो ना”
यहाँ ‘सागर’ अनंतता, रहस्य और अज्ञेयता का प्रतीक है। यह कविता आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विरुद्ध एक काव्यात्मक प्रतिपक्ष निर्मित करती है, जहाँ हर चीज़ को मापने और परिभाषित करने की प्रवृत्ति है। कवयित्री इस प्रवृत्ति को अस्वीकार करती हैं और अनुभव की स्वतंत्रता की वकालत करती हैं। “मैं और मेरा मन” कविता में आत्म का यह द्वंद्व चरम पर पहुँचता है। यहाँ ‘मन’ एक दर्पण है, जो ‘मैं’ को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। यह संवाद कभी सौम्य है, कभी संघर्षपूर्ण जैसे कवयित्री स्वयं से ही प्रश्न कर रही हो: “मैं कौन हूँ?” यह प्रश्न ही अस्तित्ववाद का मूल प्रश्न है। उमा झुनझुनवाला की कविताओं में बिम्ब-विधान अत्यंत सशक्त है। “तितली” का बिम्ब- “और मैं थी… तितली संग” यहाँ तितली केवल सौंदर्य नहीं बल्कि रूपांतरण और मुक्ति का प्रतीक है। “गौरैया” का बिम्ब “और बिखेर जाती है फ़र्श पे चमक” यहाँ गौरैया जीवन की सहजता और अनायास सौंदर्य का प्रतीक है, जो अक्सर मनुष्य की व्यस्तता में अनदेखा रह जाता है।
“मेरे अक्षर” कविता में
“ढुलक रहे हैं नैनों से अक्षर”
यहाँ अक्षर आँसू बन जाते हैं, और आँसू सृजन में परिवर्तित हो जाते हैं। यह बिम्ब कविता और जीवन के बीच के उस संबंध को उद्घाटित करता है, जहाँ पीड़ा ही सृजन का स्रोत बनती है। भाषा के स्तर पर उमा झुनझुनवाला की कविता एक विशिष्ट संतुलन प्रस्तुत करती है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों की गरिमा और उर्दू शब्दों की कोमलता मिलकर एक ऐसी काव्य-भाषा का निर्माण करती है, जो न तो अत्यधिक दुरूह है और न ही अत्यधिक सरल। यह भाषा भाव और विचार दोनों को समान रूप से वहन करने में सक्षम है।
वरिष्ठ लेखक, नाटककार प्रताप सहगल इस संग्रह की भूमिका में लिखते हैं- उमा झुनझुनवाला एक कर्मठ, निष्ठावान और रंगकर्म के लिए एक प्रतिबद्ध रंगकर्मी हैं। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें अभिनय, निर्देशन और लेखन एक साथ समाहित हैं। पिछले तीस वर्षों से भी अधिक समय से वे रंगकर्म से सक्रिय रूप से जुड़ी हई हैं। ‘मैं और मेरा मन’ उनका दूसरा कविता-संग्रह है। ‘मैं और मेरा मन’ की कविताओं में संवेदना का तत्त्व सर्वाधिक प्रबल है। जैसे ही विचार को संवेदना का संस्पर्श मिलता है, शब्द कविता में ढलते चले आते हैं। उमा की कविताएँ यही काम करती हैं। उमा की यह कविताएँ आत्मगत कविताएँ हैं जो अन्तर्मन की यात्रा करते हुए बहुत बार बहिर्जगत में विस्तार पाती हैं। दृश्यात्मकता इन कविताओं का मूल तत्त्व है। संवेदना को दृश्य में बदलना अपेक्षाकृत कठिन कविता-कर्म है, लेकिन उमा के रंगधर्मी अनुभव इन कविताओं में यथोचित प्रतीकों और बिम्बों का इस्तेमाल कविता के स्व को पाठक का स्व बना देती हैं।
समग्रतः उमा झुनझुनवाला की कविताएँ एक ऐसे काव्य-संसार का निर्माण करती हैं, जहाँ अस्तित्व का प्रश्न, स्त्री की पहचान और प्रतीकों की बहुलता एक साथ उपस्थित होते हैं। उनकी कविता पाठक को केवल संवेदनात्मक स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय करती है। यह कविता एक अनुभव नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है एक ऐसी प्रक्रिया, जिसमें पाठक स्वयं को खोजता है, खोता है और पुनः पाता है। समकालीन हिन्दी कविता के परिदृश्य में उमा झुनझुनवाला की उपस्थिति एक विशिष्ट और आवश्यक हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है। वे उन कवयित्रियों में हैं, जो न केवल अपने समय को अभिव्यक्त करती हैं बल्कि उसे एक नई काव्यात्मक दृष्टि भी प्रदान करती हैं जहाँ झील, हिज्र, हर्फ़ और सागर केवल शब्द नहीं बल्कि अस्तित्व के गहरे रूपक बन जाते हैं और “मैं और मेरा मन” उस समूचे काव्य-संसार का केंद्र बन जाता है।