पुस्तक – नदी थी वह लेखिका – डॉ. कला जोशीप्रकाशक – शिवना प्रकाशन

समीक्षक 
डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव
उपन्यास लेखन का निर्णय और इस अनुष्ठान को सफलतापूर्वक सम्पादित करना अवश्य ही चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। बड़े आकार और विस्तृत कालखंड में पात्रों, घटनाओं, उद्देश्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए पाठकों की रुचि और संवेदनाओं को कथा यात्रा का साथी बनाना एक साधना की तरह होता है।
साहित्य का उद्देश्य केवल दर्पण दिखाना या सूचनाएँ देना नहीं होता। या यूँ कहें कि कोई भी साहित्य तब तक उत्तम और महत्वपूर्ण नहीं हो सकता, जब तक वह मूलतः लोक कल्याण का प्रतिपादक न हो। समाज को मंगलमय पथ पर प्रेरित न करता हो, “शिवेतर क्षतये” में सहायक न हो। इस दृष्टि से यदि हम डा कला जोशी के उपन्यास नदी थी वह को देखें तो पुस्तक का समर्पण ही उसकी सार्थकता और महत्व को रेखांकित कर देता है- युगीन सत्य से जूझती,पथ के अवरोधों को हटाती, लक्ष्य की ओर अग्रसर, करुणा से भरी युवा पीढ़ी को समर्पित है यह उपन्यास। इस समर्पण में लेखिका का उद्देश्य ही मानो आकार ले रहा है। हमें संकेत मिल जाता है कि रचना में अनेक जीवनोपयोगी सन्देश और सुनीति के माध्यम से आज की युवा पीढ़ी को जीवन के बहुआयामी अनुभूत और सिद्ध मंत्र मिलेंगे और ऐसा ही होता भी है।
लेखिका का मानना है कि युवा पीढ़ी की जिजीविषा और संघर्ष की यह कथा युवा होती हर पीढ़ी की कथा है, मुझे भी उपन्यास पढ़ते हुए अनुभव हुआ कि इसमें गोपाल और विद्या के अलौकिक प्रेम और उदात्त चिंतन के माध्यम से नई पीढ़ी की करुणा, संवेदनशीलता, मानव मूल्य, अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प,कर्मनिष्ठा, जिजीविषा और संघर्ष से समाज को परिचित कराना लेखिका के बहुउद्देश्यों में से एक है। यह उपन्यास सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक आचार संहिता है। लोक के बीच में कैसे कार्य करना, कैसे उन्हें अपने परंपरागत रीति-रिवाजों और संस्कृति से बांध कर रखना उनकी भाषा सीख कर उनके बीच में घुल मिल जाना,आसन्न संकटों तथा कुचक्रों के प्रति सावधान करना और अपनी बातें उन्हें समझाना, उनका विश्वास प्राप्त करना, उनके कौशल को पहचान कर दक्षता का विकास करके आर्थिक रूप से उन्नत बनाना, विभिन्न नवाचारों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों पर विजय प्राप्त कर समाज के चिंतन को सकारात्मक दिशा देना यह उपन्यास सिखाता है।
उपन्यास की नायिका विद्या एक अति संवेदनशील और मानवीय गुणों का समुच्चय है। वह आदिवासियों के संघर्ष और दुख की अनुभूति कर उनसे गहराई से जुड़ जाती है और अपना जीवन उनके उत्थान के लिए समर्पित कर देती है ।अपनी व्यक्तिगत भावनाओं से समाज को ऊपर रखती है। मिशनरियों के द्वारा आदिवासियों का भावनात्मक शोषण, सुविधा पूर्ण जीवन का लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन कराना एवं संस्कृति का क्षरण देखकर विद्या उनके विरुद्ध संघर्ष छेड़ देती है। अपने साथियों के साथ मिलकर पाठशालाएं खोलती है। परंपरा और संस्कृति संरक्षण की योजनाबद्ध मुहिम चलाती है। साम – दाम का उपयोग करते हुए लोगों का मन जीती है। उन्हें रोजगार का मार्ग दिखाती है खेती में सहकारिता और नवाचार का प्रयोग सिखाती है और अत्यंत संघर्ष करके अपने लक्ष्य को पाने में सफल होती है। उपन्यास पढ़ते हुए मुझे निरंतर अनुभव हुआ कि लेखिका की अनुभव सम्पन्नता जैसे विद्या में जीवंत हो गई है। वही चातुरी, दृढ़ता और कर्मनिष्ठा परिपक्व रूप में साकार हो गई है।
 उपन्यास के विसर्ग अंक से विद्या का चिंतन अभिव्यक्त करती और कुछ हद तक उपन्यास के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करती पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं –
“कभी-कभी वह मंजू भाभी के साथ ताप्ती के तट पर घंटों बैठे रहती है सोचती नदी होना जीवन का बहना है ताप्ती इतनी बड़ी और गहरी नहीं थी जितनी नर्मदा थी किंतु नदी तो थी, नदी के सभी गुणों को लेकर चलने वाली यह भी तो मांँ थी। नदी मांँ, जिसने उसके जीवन को दिशा दी स्व को पल-पल तोड़कर रेत करती नदी व्यक्ति के अहम को गला कर वयम् में बदलने का संदेश देती। उसने ही अपनी धारा को उसमें बहने दिया है तभी तो वह बहती रही है उसी की एक लहर बनकर।” (पृष्ठ २२८)
उपन्यास का नायक केवटिया का बेटा गोपाल भी एक आदर्श और विचारवान युवा है जो विद्या के प्रणय की प्रेरणा और मार्गदर्शन से डिप्टी कलेक्टर बनता है और कालान्तर में वह अपने पद प्रतिष्ठा के लोभ और मोह से ऊपर उठकर, अपने कौशल और अनुभवों से समृद्ध होकर अपनी प्रिया के कर्मयज्ञ का साथी बन जाता है और अपने अंतस्थ प्रणय -प्रकाश से समाज को उजास देता है। वह गोंडी सीखकर वहां के निवासियों का साथी बन जाता है नक्सली समस्या के प्रति समाज को सचेत करता है। बस्तर के आसपास के गांव को एकजुट करके दंडकारण्य में महिला पाठशाला, हस्तशिल्प प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करते हुए लोक कलाओं को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाता है। ‌ छोटी-छोटी बचत करके आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए सहकारी बैंक बनवाता है और अंत में दुष्ट नक्सलियों का शिकार बन जाता है।
उपन्यास में डा कला जोशी नर्मदा के घाटों और उसके निकट बसने वाली बस्तियों के जीवंत बिम्ब उपस्थित करके पाठकों का मन कथा के साथ बाँध लेती हैं। सुंदर प्रकृति, जैव विविधता, खेतों में लहराती फसलें, पक्षियों का मधुर कलरव, प्रकृति के कण कण में घुला संगीत सभी वातावरण को सजीव बना देते हैं। लेखिका ने अपने पात्रों की स्थिति का अंकन करने तथा समाज को संदेश देने के लिए भी प्रकृति चित्रों को साधन के रूप में प्रयुक्त किया है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए सबसे पहले जो चीज़ हमारा ध्यान खींचती है वह है उपन्यास की मुख्य नारी पात्र विद्या का परिस्थितियों की विपरीत धार को अपने अनुपम आत्मबल और विश्वास से काटते हुए निरंतर अपना मार्ग बनाते चलना। वह अपने प्रेम के प्रकाश से जीवन के अंधियारों को परास्त करती है। वह मानो उपन्यास के शीर्षक को सार्थक करते हुए हर कठिन परिस्थिति की शिलाओं को नदी की भाँति रेत बनाती हुई अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है।। ‘नदी थी वह’ में लेखिका ने दृश्य-बंध या दृश्य-निर्माण पर विशेष ध्यान दिया है। वैसे दृश्य-बंध एक नाट्य-तत्व है लेकिन उपन्यास में इसकी सारगर्भित संरचना पाठकीय रमणीयता की सृष्टि कर रही है। पाठकीय रमणीयता रचना की सबसे पहली और बड़ी शर्त है। मुझे लगा कि लेखिका प्रयोगधर्मी है। शैलीगत गत्यात्मकता , रचनात्मक वैविध्य, संवेदना की भावप्रवणता के साथ-साथ उपन्यास की कहानी में भी विविधता है। इसकी कहानी एक ही चौखटे में आबद्ध न होकर विविधरूपा है , जिनमें समसामयिक समस्याओं और तत्संबंधी निवारण के अनेक प्रस्थान बिंदु भी हैं।
उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है,जैसे क़ैमरा लोकजीवन की चहल-पहल को दिखाते हुए मानवीय परिवेश का दृश्य स्थापित कर रहा है। और फिर लांग शॉट से क्लोज अप पर आते-आते मुख्य नारी पात्र पर क़ैमरे का फ़ोकस केंद्रित हो जाता है।
इस उपन्यास में पात्रों का चरित्र-चित्रण ऐसी दक्षता से हुआ है कि वे इस तरह जीवंत – से लगते हैं, जैसे हम उनसे दैनिक जीवन में सम्बंधित रहे हों और प्रतीत होता हैं कि वे हमसे कह रहे हैं कि चरित्र का निर्धारण जन्म से नहीं होता है। चरित्र का निर्माण और विकास पुरुषार्थ, कर्मठता और तप से होता है।
उपन्यास की सजीवता और स्वाभाविकता के लिए वातावरण की सत्यता वांछनीय तत्व हैं। जिस परिवेश की घटनाएं उपन्यास में गुम्फित हैं , उनकी सम्भावनाओं को पूर्णत: ध्यान में रखना अपेक्षित होता है। वास्तविकता से विलग होकर, न तो उपन्यास की कथावस्तु का निर्माण हो सकता है और न चरित्रों का मार्मिक उद्घाटन। उपन्यास शब्द उप तथा न्यास शब्दों के मेल से बना है , जिसका अर्थ है निकट रखी हुई वस्तु। उपन्यास वह कृति है जिसे पढ़कर ऐसा लगे कि यह हमारी ही है। इसमें हमारे आसपास के जीवन का प्रतिबिंब हमारी ही भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
जीवन के अन्त: व बाह्य जगत की जितनी यथार्थ एवं सुन्दर अभिव्यक्ति उपन्यास में हो सकती है , उतनी किसी अन्य विधा में नहीं। इसमें युग विशेष के सामाजिक जीवन और जगत की झांकियां संजोई जाती हैं। उपन्यासकार अपने पात्रों का सृष्टा और जीवनीकार दोनों ही एक साथ होता है, कला जोशी जी में ये दोनों ही रूप पूर्ण विकसित दिखाई देते हैं।
उपन्यास की कथानक संवेदना जितनी सूक्ष्म है , उतनी ही तरल भी है। यह उपन्यास एक कलाकृति की तरह है और कलाकृति निरंतर अपनी सृजनात्मकता के लिए, अभिव्यक्ति के नए-नए उपकरणों की तलाश करती रहती है। उपन्यास की आंतरिक संरचना और बाह्य संरचना कथ्यगत विशिष्टताओं से ही पहचान में आती है तथा इसी से उपन्यास की मौलिकता का आकलन भी होता है। लेखिका ने जितने मनोयोग से समाज की अन्य समस्याओं पर लेखनी चलाई है , उतनी ही सूक्ष्म दृष्टि नारी की व्यथा पर भी केंद्रित की है। अनिल और सरमा के वार्तालाप में लेखिका ने कितना सुन्दर और सशक्त चित्र उपस्थित किया है – “उसने बर्मा के कंधो को झकझोर कर कहा , इससे वाहर निकलो। यह संसार हमारा है। प्रकृति हमारे साथ है। देखो ढलती किरने भी अपनी ऊर्जा लौटा कर वन प्रदेश को खुशी से भर देती हैं। देखो यह वृक्ष, हिलते हिलते पत्ते संदेश देते हैं जीवन का। जब तक हम हैं, जीवन है उसके बाद कुछ नहीं। जीवन को चलने चलाने में बहुत अवरोध आते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं हम थम जाएँ, रुक जाएँ।”
लेखिका आगे वर्णन करती हैं –
“चूल्हे में जलती लकड़ियां से निकलती आग अपना आभामंडल बना रही थी। इस आभामंडल में उसे अपना कल सुलगता दिखा जैसे ब्रह्मांड की समस्त आग उसे झुलसा रही हो, जैसे सामाजिक बंधनों ने जकड़ कर उसे आग में झोंक दिया हो जैसे समाज के आभामंडल में उसका प्रेम स्वाहा हो रहा हो। इससे अलग होकर अलग होकर अपना अस्तित्व ढूंढना कितना कठिन था। इस आग से तप कर कुंदन हो जाना भी तो नियति हो सकती है, सरना के उठो पर मुस्कान आ गई।”
विद्या के प्रेम के उदात्त रूप के दर्शन हम इन पंक्तियों में करते हैं- विद्या गोपाल से कहती हैं – “तुम्हारी मूर्ति साक्षात प्रेम का रूप लेकर मेरे अंतर्मन में पैठी है। ‌उसी ने मुझे प्रकृति से, धरती से, मनुज से प्रेम करना सिखाया। अब यही मेरा धर्म है। जहांँ – जहांँ तुम इस संवेदना को बहते पाओगे, वहांँ-वहांँ तुम्हारा प्रेम धारा बनकर साथ प्रवाहित होगा “
विद्या के हृदय ने उस प्रेम को प्राणीमात्र के कल्याण में प्रवाहित कर दिया। नदी सी बहती रही वह।
लेखिका ने उपन्यास रचना निश्चित उद्देश्य को सामने रखकर की है। क़ेवल मनोरंजन या कल्पनालोक का निर्माण करना उपन्यासकार का दायित्व भी नहीं है। उसका लक्ष्य सत्य का अन्वेषण करना , मूल्य निर्माण और दिशा निर्देशन का रहा है। अपने अनुभवों और चिंतन को पाठकों तक पहुंचाना तथा सामाजिक परिवर्तन का आह्वान उसका उद्देश्य है। वे संदेश देना चाहती हैं कि आज समाज और राष्ट्र को विद्या और गोपाल जैसे युवाओं की आवश्यकता है जो अशिक्षा और कुरीतियों के कुचक्र से समाज को मुक्ति दिला सकें। दैहिक प्रेम से परे सात्विक प्रेम की शक्ति से समाज विरोधी नकारात्मक ताकतों से सामना करने का साहस रखते हों, अपने ऊपर समाज और राष्ट्र का हित मानते हों।
 ‘नदी थी वह’ के पात्र हमारे अत्यन्त निकट प्रतीत होते हैं। उनमें वास्तविकता और जीवन के प्रति सच्चाई है। संघर्ष के प्रति ईमानद़ारी है और सबसे बड़ी बात यथार्थता है। यह संवेदना की ही सामर्थ्य है कि लेखिका उपन्यास की नायिका विद्या.के मन के तीव्र भाव-संघर्ष का , उसके मानसिक तनाव का उपन्यास ” नदी थी वह” में इतना सफल और मार्मिक अंकन कर पाई हैं।
आज के ज़माने में लिखा और कहा तो बहुत जा रहा है पर अधिकतर में उतना असर दिखता नहीं है। कारण मन , वचन और कर्म को एकाकार कर लिखने वाले गिनते के हैं। शायद इसलिए वह लेखन शाम ढलते ही किसी कोने में दुबक जाता है। लेखन में मारक क्षमता तभी आती है , जब आपने उस लिखे को जिया हो या महसूस किया हो। अपनी बात को कैसे द़स्तावेज़ बनाकर तथ्य और तर्क के साथ संप्रेषणीय अंद़ाज़ से , प्रमाणित तरीक़े से कहा जाता है ; यह कला ही कला के उपन्यास को विशिष्ट बनाती है। डा कला जोशी ने इस उपन्यास में आंचलिकता को एक साधन के रूप में प्रयुक्त करके सार्वभौमिक सत्य को प्रस्तुत किया है।
यह उपन्यास कहता है कि मनुष्य की क्षमताओं की सीमा असीम होती हैं और उन क्षमताओं को वह स्वयं किसी भी सीमा तक विकसित कर सकता है। उसका सकारात्मक दृष्टिकोण ही शक्ति बनता है। विद्या और गोपाल का संघर्ष आज युवाओं में पनप रही आत्महंता प्रवृत्ति के विरुद्ध एक बुलंद आह्वान है।
पीड़ा जितनी गहरी होगी लेखन उतना ही धारदार होगा यह सही है। लेखिका के मन में समाज और देश में व्याप्त विषमताओं के प्रति गहरी पीड़ा है और समस्याओं के प्रति अपना मौलिक चिंतन भी है, समाधान भी है – जिसके बिंब हमें उपन्यास में सर्वत्र दिखाई देते हैं।
उपन्यास के समापन का मार्मिक दृश्य देखिए – “अनिल ने विद्या बुआ के दोनों हाथों को अपने हाथ में ले लिया उनके प्रेम की शक्ति का उसके हाथों में अंतरण होने लगा यह वही शक्ति थी जिससे वह अपने को सतत प्रवाहित करती रही यही उसकी तृप्ति का साधन था तुम आ गए शब्द विद्या के होठों से निकले मंजू ने उसके गाल थपथपाए
आंखें खोलो विद्या दीदी। विद्या ने आंखें खोली‌ आंखों में उसके अंदर की स्त्री उतर आई थी। दोनों पुतलियों से प्रेम का संगीत निकल रहा था। संगीत में एक ध्वनि थी, जैसे कह रही हो, यह प्रेम शाश्वत है‌। इसके अंदर बसी श्वास को वह ढूंढती रहेगी। जब तक नर्मदा बहती रहेगी ये श्वासें किसी जीवन बांसुरी में भरकर फिर बज उठेंगी”।
 मुझे लगता है कि इस उपन्यास पर अच्छी फिल्म भी बन सकती है। डॉ कला जोशी जी ने इस उपन्यास की रचना करके अपना फार्म पा लिया है। अब उन्हें दूसरे क्षेत्र में प्रवेश की आवश्यकता नहीं है। मैंने इससे पहले कभी किसी उपन्यास को, पुस्तक को इतनी तेजी से नहीं पढ़ा है। जिज्ञासा जगती गई और इस उपन्यास से मैं नहीं, मेरा भीतर जुड़ता गया, जो-जो भी मैं महसूस करती रही उसे अपनी कलम से अपने शब्दों में आपके समक्ष प्रस्तुत किया है।

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