Monday, July 22, 2024
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संपादकीय : श्रद्धा की हत्या और कानूनी पेचीदगी

मूलभूत सवाल यह है कि क्या आफ़ताब को भारत की किसी भी अदालत में सज़ा हो सकती है? हमारे हिसाब से अभी तक दिल्ली पुलिस को जो भी सुबूत मिले हैं उसके अनुसार तो केस को पहली सुनवाई में ही झटके से बाहर कर दिया जाएगा। हालांकि पूरा भारत चाहता है कि आफ़ताब पूनावाला को फांसी की सज़ा ही मिलनी चाहिये। मगर याद रहे कि अदालत में भावनाएं काम नहीं आतीं। वहां इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सच क्या है! वहां केवल एक ही बात का महत्व है – सुबूत!

इस समय पूरे भारत में एक ही मुद्दा सबकी ज़बान पर है – श्रद्धा हत्या काण्ड। जिस बेदर्दी से आफ़ताब अमीन पूनावाला ने श्रद्धा की हत्या करने के बाद उसके मृत शरीर के 35 टुकड़े करके एक रेफ़्रिजिरेटर में उन्हें रखा और फिर हर रोज़ उनमें से एक दो टुकड़ों को जंगल में फैंक आया… इससे साफ़ ज़ाहिर है कि वह एक ख़तरनाक अपराधी है जिसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिये।
जैसा कि आमतौर पर होता है, भारतीय मीडिया इस वहशी घटना के बाद भी आपस में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। कुछ चैनल इसे लव-जिहाद का एक हिस्सा मान रहे हैं तो कुछ चैनल आफ़ताब को ‘साइको किलर’ बना कर पेश कर रहे हैं। पूरा मामला हिन्दू मुसलमान होता जा रहा है। एन.डी.टी.वी., आजतक, ज़ी न्यूज़, टाइम्स नाऊ, एबीपी न्यूज़, न्यूज़24, न्यूज़18 जैसे तमाम चैनलों के अपने-अपने एजेन्डे हैं।
कुछ लोग सीधे लड़की यानी कि श्रद्धा पर आरोप लगा रहे हैं कि जो लड़कियां लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिये अपने परिवार वालों को छोड़ देती हैं, उनका हश्र ऐसा ही होता है। उनके लिये सारा कुसूर श्रद्धा का है… आफ़ताब उनके लिये पूरी तरह से बेकसूर है। 
हम पुरवाई के पाठकों को सबसे पहले इस हत्या से पहले की सारी जानकारी उपलब्ध करवाना चाहेंगे। श्रद्धा वालकर मुंबई के निकट वसई गाँव से है। वह महाराष्ट्र के कोली (मछुआरे) समुदाय से आती है। 1995 में जन्मी 5‘ 6” लंबी श्रद्धा की मुलाक़ात आफ़ताब पूनावाला से एक ‘डेटिंग एप – बम्बल’ पर 2018 में हुई। दोनों दोस्त बने और फिर उनका आपस में प्रेम हो गया। दोनों ने एक साथ रहने का निर्णय ले लिया। 
श्रद्धा के पिता विकास मदन वालकर एवं भाई श्रीजय वालकर को इस रिश्ते पर घोर आपत्ति थी। मार्च 2022 में श्रद्धा ने अपने पिता और भाई को साफ़ शब्दों में कह दिया कि वह अब बालिग है और अपने जीवन के फ़ैसले स्वयं कर सकती है। वह आफ़ताब के साथ दिल्ली में बसने के लिये चल दी। दोनों ने महरोली के निकट छतरपुर में एक फ़्लैट किराए पर ले लिया। 
श्रद्धा के एक मित्र रजत शुक्ला ने बताया कि दोनों के बीच लगातार झगड़े होते रहते थे। श्रद्धा ने अपने मित्रों को यह भी सूचना दी थी कि आफ़ताब उसे मारता भी है। मगर अब वह उससे अलग होने की स्थिति में नहीं है। शायद वह अपने पिता के सामने अपने निर्णय को ग़लत साबित होते नहीं देखना चाहती थी।
अचानक यह ख़बर उसे मिली कि श्रद्धा का ख़ून हो गया। वह नहीं रही। उसे विश्वास नहीं हुआ कि श्रद्धा के साथ ऐसा हादसा भी हो सकता है।
ऐसा माना जा रहा है कि श्रद्धा ने दिल्ली में बसने के बाद आफ़ताब पर विवाह करने के लिये दबाव बनाना शुरू किया। इसी मुद्दे को लेकर दोनों में तनाव बढ़ने लगा और तकरार होने लगती। दोनों ने अपने बीच पैदा हुए झगड़े को दूर करने के विचार से हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों की ओर रुख़ किया। उन्हें लगा कि इस तरह रिश्ते को एक नई शुरूआत दी जा सकती है।
मगर वहां भी दोनों में कलह कम नहीं हो पाई। यह भी सोचा जा रहा है कि शायद वहीं कुछ ऐसा घटित हुआ जिसके फलस्वरूप आफ़ताब ने श्रद्धा की हत्या की योजना बनाई।
ऐसा कहा जा रहा है कि 18 मई 2022 को जब श्रद्धा ने आफ़ताब पर शादी करने के लिये दबाव डाला तो आफ़ताब ने गला दबा कर उसकी हत्या कर दी। जब उसे समझ नहीं आया कि वह लाश का क्या करे तो उसे एक अमरीकी वैब सीरीज़ ‘डेक्स्टर’ से प्रेरणा मिली की लाश को कैसे ठिकाने लगाया जाए। उसने माँस काटने के लिये एक आरी ख़रीदी और एक 300 लिटर का नया फ़्रिज भी लिया। आरी से उसने श्रद्धा के मृत शरीर के 35 टुकड़े किये और उन टुकड़ों को रेफ़रिजिरेटर में ठूंस दिया। 
घर में लाश की बू न फैले इसलिये वह कमरे में अगरबत्ती जला कर रखता था और रूम फ़्रेशनर का छिड़काव करता था। उसकी खलनायकी का आलम यह था कि जिस फ़्रिज में श्रद्धा के मृत शरीर के टुकड़े रखे थे उसी में अपनी आइस-क्रीम भी रखता था। इस सब के साथ उसी कमरे में अपनी नई प्रेमिकाओं के साथ रंगरलियां भी मना लेता था।
इस एक हत्या के साथ आफ़ताब ने अपनी मित्र, प्रेमिका, विश्वास, सामाजिक ढांचे… सब का ख़ून एक साथ कर डाला था। वह प्रेमी से हत्यारा और कसाई दोनों एक साथ बन गया था। उसकी हरकतें सुन कर कोई भी उससे नफ़रत करने लगेगा। शायद इसी लिये दिल्ली के वकीलों ने जुलूस निकाल कर आफ़ताब के लिये फांसी की मांग की। यह बहुत ही विरले देखने को मिलता है कि वकील ही किसी अपराधी के लिए जुलूस निकाल कर फांसी की मांग करें।
पुलिस की एक टीम गुरुग्राम में उस निजी फ़र्म के कार्यालय पहुंची जहां श्रद्धा वालकर की हत्या का आरोपी आफताब अमीन पूनावाला काम करता था। अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। पुलिस को तलाशी अभियान के बाद कार्यालय के आसपास झाड़ियों से बरामद चीजों से भरा एक प्लास्टिक बैग ले जाते देखा गया।
पूनावाला को अगले कुछ दिन में मामले की जांच के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश,  उत्तराखंड और अन्य स्थानों पर ले जाया जाएगा। मुंबई से आने के बाद वालकर और पूनावाला ने कई जगहों की यात्रा की थी। पुलिस पूनावाला के साथ इन जगहों पर जायेगी ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन यात्राओं के दौरान तो उनके बीच कुछ ऐसा घटित नहीं हुआ था जिसके बाद हत्या को अंजाम दिया गया हो।
श्रद्धा और उसकी मित्रों के बीच हुई व्हटस्एप चैट से पता चलता है कि नवंबर 2020 में ही आफ़ताब ने श्रद्धा के साथ मारपीट शुरू कर दी थी। उसकी फ़ोटो आजकल हर भारतीय चैनल पर दिखाई जा रही हैं जिनमें उसकी नाक, मुंह, गालों पर घाव के निशान हैं। वह अपने मित्रों को संदेश भेज रही है कि वह बहुत डरी हुई है मगर अभी आफ़ताब को छोड़ नहीं सकती। वह यह भी लिखती है कि आफ़ताब के माता-पिता को मिलने के बाद हालात बेहतर होने की उम्मीद है। वह आशा करती है कि आफ़ताब उसे छोड़ कर अलग हो जाएगा।
अब मूलभूत सवाल यह है कि क्या आफ़ताब को भारत की किसी भी अदालत में सज़ा हो सकती है? हमारे हिसाब से अभी तक दिल्ली पुलिस को जो भी सुबूत मिले हैं उसके अनुसार तो केस को पहली सुनवाई में ही झटके से बाहर कर दिया जाएगा। हालांकि पूरा भारत चाहता है कि आफ़ताब पूनावाला को फांसी की सज़ा ही मिलनी चाहिये। मगर याद रहे कि अदालत में भावनाएं काम नहीं आतीं। वहां इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सच क्या है! वहां केवल एक ही बात का महत्व है – सुबूत!
पुलिस के सामने इकबालिया बयान का अदालत में कोई महत्व नहीं है। इस तरह के इकबालिया बयान को कोर्ट मान्यता नहीं देती। पुलिस के पास केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence)  ही मौजूद हैं। कोई ठोस सुबूत नहीं हैं पुलिस के पास। जो कुछ आफ़ताब पूनावाला ने बताया है पुलिस केवल उतना ही जानती है। पुलिस के लिये ख़ासी टेढ़ी खीर है चश्मदीद गवाह, मृत देह को काटने वाली आरी को खोजना, डी.एन.ए. साबित कर पाना, या कोई भी ऐसा सुबूत जो अकाट्य हो। 
हम यह भी जानते हैं कि आफ़ताब पूनावाला को कोई वकील आसानी से मिलने वाला नहीं है। क्योंकि दिल्ली के वकील तो पहले से ही उसके लिये फांसी की माँग करते हुए जुलूस निकाल रहे हैं। शायद अदालत को ही उसके लिये वकील मुहैया करवाना पड़ेगा। क्योंकि जो भी वकील स्वयं आफ़ताब का केस लेगा उसकी अपनी जान को ख़तरा होने की उम्मीद हो सकती है। मगर जो भी वकील होगा वो सबसे पहले पुलिस के सामने इकबालिया बयान को खारिज करवाएगा।
एक सवाल और भी उठ रहा है। क्या आफ़ताब पूनावाला द्वारा श्रद्धा के साथ दोस्ती, प्यार, लिव-इन और हत्या ‘लव-जिहाद’ के दायरे में आते हैं? मेरा मानना है नहीं। हम इसे अधिक से अधिक ‘लव-आतंकवाद’ कह सकते हैं। मगर केरल हाई कोर्ट एवं भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लव-जिहाद की सच्चाई को माना है और उस पर जजमेंट भी दी है। इसका एक ही मतलब है कि कानून की निगाह में लव-जिहाद एक सच्चाई है। यानी कि इस समस्या को गंभीरता से समझना होगा और उसके लिये हल भी ढूंढने होंगे। 
लव-जिहाद एक व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता। उसके लिये आवश्यक है कि कोई संगठन अपने सदस्यों से किसी एजेंडे के तहत दूसरे मज़हब की लड़कियों को धर्म परिवर्तन के लिये प्रोत्साहित करे।
पुरवाई के अनुसार यदि लव-जिहाद की कोई परिभाषा गढ़ने की आवश्यकता है तो उसे कुछ यूं कहा जा सकता है, “यदि किसी संगठन से जुड़ा कोई मुस्लिम युवा किसी भी अन्य धर्म की किसी लड़की से उस धर्म का झूठा नाम धारण कर प्रेम करे और विवाह के समय अपनी पहचान बता कर लड़की को इस्लाम धर्म कुबूल करने के लिये बाध्य करे – इसे लव-जिहाद कहा जा सकता है।”
(इस संपादकीय के लिखे जाने और प्रकाशित किये जाने के बीच हो सकता है कि श्रद्धा हत्याकांड की जांच में कुछ और प्रगति हो चुकी हो। – संपादक।)
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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50 टिप्पणी

  1. बहुत अच्छा लेख सर और हो सकता है इस लेख को पढ़ने के बाद लोगों का नजरिया लव जिहाद के संदर्भ में बदल जाये और आशा है कि बहुत जल्द दोषी को सख्त सजा भी मिले।

  2. शानदार लेख की बधाई के साथ कहना चाहूँगी कि ये इमर्जेंसी काल है।कारण कि भारत की लडकियो का जो हश्र किया जा रहा है वो ना केवल अति विचारणीय है बल्कि सख्त कार्रवाई और नियम कायदे की मांग कर रहा है

  3. सचमुच यह लव आतंकवाद है। पुलिस सबूत एकत्र कर सके तो सज़ा हो जाए, यही सब मना रहे हैं।
    गंभीर विषय पर स्पष्टता से लिखने के किए बधाई!

  4. अगर साइको साबित हो गया तो फांसी नहीं होगी , ये एक अकेले का काम नहीं है , पुलिस सबूत जुटा लेगी , लेकिन फांसी होना मुश्किल है , उसके लोग बचाएंगे उसे ,क्योंकि सात कत्ल के लिए फांसी पा चुकी शबनम के लिये फिलहाल फांसी होने के आसार नहीं है

  5. आपके संपादकीय से पूरे संदर्भ को समझने में सुविधा हुई। आपने अब तक के तथ्यों के साथ अपनी बात रखी है।

    हमें प्रथमतया यह तो मानना पड़ता है कि प्रेम की कोई जाति या धर्म नहीं होता है। युवा-जोश इस भाव में ही कदम बढ़ाते हैं। ऐसे संबंधों या विवाह में मात्र दो-चार प्रतिशत लोग ही पूर्णतया सफल हो पाते हैं। आज के आधुनिक कहे जानेवाले शहरी समाज में भी ऐसे युगल सुख से नहीं जीते। आधुनिक गाँव भी हुए हैं, वहाँ भी अब ऐसे संबंध कभी-कभी दीख जाते हैं, किंतु ऐसे जोड़े मार भी दिए जाते हैं, क्योंकि गाँव में माता-पिता या संबधी सीधे-सीधे सामाजिक अपमान का सामना करते हैं। इस तरह के जोड़े बनने में दहेज भी एक मुद्दा होता है। विशेषकर युवतियों को लगता है कि इस तरह विवाह कर लेने से मेरे माता-पिता को आर्थिक बोझ का सहन नहीं करना पड़ेगा।

    कहानीकार आचार्य निशांतकेतु ने एक कहानी में लिखा है कि एक युवती अपने प्रेमी को छोड़कर चली जाती है। युवक का मित्र उसे कहता है कि उसे अपनी प्रेमिका को मना कर फिर से साथ रहने की पहल करनी चाहिए। अपने मित्र को उत्तर देते हुए वह युवक कहता है कि उसे मुझसे पूर्ण प्रेम होता तो वह छोड़कर नहीं जाती, उसके प्रेम में कहीं कमी थी, पूर्ण समर्पण नहीं था, इसलिए अब उसे क्या मनाना! अब मुझे उसे भूल ही जाना चाहिए।

    मुझे लगता है, ऐसे संबंधों में युवक-युवती दोनों को ऐसा मत रखना चाहिए। जब युवक-युवती ने घर-परिवार छोड़कर साथ रहने का वादा किया हो और उनमें भविष्य में सामंजस्य न बने तो ऐसे संबंधों को त्याग देने में भी देर नहीं करनी चाहिए। अन्यथा सामाजिक बंधनों से स्वतंत्र ऐसे लोग आफ़ताब की तरह ही घटना को अंजाम दिया करेंगे। वास्तव में प्रेम के मूल में आकर्षण भी काम करता है, धीरे-धीरे वह कम होता जाता है तो जो विकृत मानसिकता के पुरुष होते हैं, वे ऐसे ही अमानवीय कृत्य करते हैं। तब इसी निर्णय पर पहुँचना पड़ता है कि उनका संबंध मात्र एक यौन-आकर्षण था।

    मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जातिगत उच्चता-नीचता की जड़-सोच के साथ ऐसे जोड़े विवाह के बाद भी आजीवन अपने-अपने परिवारों से अलग रहने को विवश किए जाते हैं और उन्हें पारिवारिक सम्मान-स्नेह नहीं दिया जाता है। यदि कन्या तथाकथित ‘उच्च’ जाति की है तो ऐसा 90 प्रतिशत देखा जाता है कि प्रेमविवाह से बने उस दामाद को स्वीकार नहीं किया जाता है। किसी पारिवारिक-सामाजिक आयोजनों में आमंत्रित नहीं किया जाता है।

    इसलिए ऐसे संबंधों को सुखद स्थायित्व प्रदान करने में एक खुली सोच और मानवीय भाव का होना बहुत आवश्यक है। इसके लिए युवक-युवती दोनों को एक-दूसरे को अच्छी तरह परख लेना चाहिए। जब एक बार साथ रहने का निश्चय करें तो सुख-दुःख दोनों ही स्थितियों में एक बने रहें। एक-दूसरे के पारंपरिक-सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान करें। एक-दूसरे की पारिवारिक भावनाओं में साथ दें। अन्यथा धर्म और जातियों के विवाद इसी तरह क्रूर रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित होते रहेंगे।

  6. ऐसे सामयिक विषय पर संपादकीय के लिए बधाई.
    श्रद्धा दोषी है और आफ़ताब निर्दोष, ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति मानता हो. श्रद्धा की ग़लती तो डस इतनी है कि उसने एक ग़लत आदमी पर ऐतबार किया. और अपने पिता व भाई जैसे हितैषियों की भी न सुनी. भारतीय समाज आज भी स्त्री पुरुष के मध्य दोस्ती या प्रेम की परिणति विवाह में देखता है. बहुत खेद का विषय है कि हमारे न्यायालय भी अब सहजीवन को न्यायसंगत मानते हैं. न्यायालय के अपने तर्क व दृष्टि हो सकती है, किंतु सहजीवन को जायज ठहराने के कारण श्रद्धा- आफ़ताब जैसी घटनाओं का बढ़ना स्वाभाविक है.
    वही न्यायालय इस खून के लिए सबूत माँगेगा.
    हमारा सवाल है कि यदि आफ़ताब सहजीवन की बात को ही सिरे से नकार दे तो? सहजीवन का कोई पंजीकरण तो हुआ नहीं. न्यायालय सहजीवन को स्वीकृति दे तो उसके लिए सहजीवन पंजीयन कार्यालय की व्यवस्था भी दे. भारत में औरत की स्थिति वैसे भी दोयम है. पुरुष उसके शरीर को भोगकर आगे निकल जाता है. या वह करता है जैसा बकौल मीडिया आफ़ताब ने किया.
    आफ़ताब का बरी होना तय है. न्यायालय में न इकबालिया बयान का कोई महत्व है न नार्को टेस्ट का.
    शुक्र है कि उसके पिता और मित्र उसकी खोज खबर रख रहे थे. वरना हमारे समाज में तो माता पिता ऐसी लड़कियों से साफ कह देते हैं- आज से तू हमारे लिए मर गयी.
    अब सारा दारोमदार कोर्ट पर है. उसने सहजीवन को मान्यता दी. वह ऐसी अनहोनियों को रोकने का भी इंतज़ाम करे.

    • डॉक्टर साहब आपने संपादकीय पर विस्तृत और गहरी टिप्पणी की है। समय निकाल कर सार्थक कमेंट के लिए धन्यवाद।

  7. पहला लव जिहाद का मामला इंग्लैंड में हुआ था और इंसमे संगठन नहीं प्रवृति की बात की थी इस पर एक विस्तार से लेख भी लिखा था जी मिल नहीं रहा। इस केस की जितनी गहराई से रिपोर्टिंग अपने की है लगता है इंवेस्टिगेटिंग अफसर आप ही हैं। यह बात ही आपकी अन्य सभी संपादकों से श्रेष्ठ बनाती है। अभी एक इसी प्रकार के म7कदम में हाई कोर्ट ने जिन 8 व्यक्तियों को फांसी दी थी उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
    लव जिहाद के 200 मामले एक साथ गौहाटी में सामने आए हैं पूरी उत्तर पूर्व मेखलबली मची है पर अभी में मीडिया का ध्यान आफताब पर अटका हुआ है। कृपया उस पर भी लिखें ।

  8. गंभीर विषय,नृशंस हत्या और सबसे अधिक दिल दहला देने वाली विडंबना कि वह कातिल छूट जाएगा ।

    कुछ समय पहले हैदराबाद मे एक बलात्कार केस हुआ था और पुलिस ने अपराधियों का एनकाउंटर कर उस केस की परिणति कर दी थी ।
    शायद एक बार फिर कुछ चमत्कार हो जाए ।
    बहुत दिल दहला देने वाला संपादकीय
    हार्दिक बधाई

  9. दर्दनाक, हृदयविदारक घटना का सटीक विश्लेषण।
    शब्द ही नहीं हैं कुछ कहने के लिए।

  10. बहुत दर्दनाक है श्रद्धा की कहानी , या कहानी बहुत से नवयुवको को नव युवतियों को जरूर समझना चाहिए… और अगर ऐसी परिस्थिति आती है उनके रिश्ते में तो समय से अलग हो जाना ही उनके लिए सुरक्षित है… मैं चाहूंगी श्रद्धा को न्याय मिले

  11. बहुत दर्दनाक है श्रद्धा की कहानी , या कहानी बहुत से नवयुवको को नव युवतियों को जरूर समझना चाहिए… और अगर ऐसी परिस्थिति आती है उनके रिश्ते में तो समय से अलग हो जाना ही उनके लिए सुरक्षित है… मैं चाहूंगी श्रद्धा को न्याय मिले

  12. बहुत दुःखद और विचारणीय विषय है।
    और इस मामले में लड़कियों को एक ही सीख और सबक मिलती है कि भले ही आप कितनी ही आधुनिक हो गयी हो, ऐसे सम्बंध खेल नहीं है , किसी पर भी विश्वास करने से पहले बहुत सोचना समझना चाहिए। श्रद्धा ने अपने माँ – बाप का तिरस्कार कर खुद को जिस तरह एक कसाई के हाथों सौप दिया वह अपने पीछे सिर्फ गहरा पश्चाताप और अंतहीन सवाल छोड़ता है।
    इस मुद्दे को उठाने के लिए बहुत आभार!

  13. एक ख़ास बात, जिस पर शायद ध्यान देने की ज़रूरत है, वह है, श्रद्धा के परिवार की बेरुखी और नाराज़गी जब वह ज़िंदा थी l शायद अब वह किसी भी हालात में रहने को विवश थी… कि अब उसे कोई सहारा नहीं देगा… उसका आत्मविश्वास भी कमज़ोर हो गया होगा… भविष्य में ऐसी घटनाएं ना घटे, इसे भी समझने की ज़रूरत है l परिवार का साथ इंसान को मजबूती देता है… अगर श्रद्धा के साथ भी यह होता तो शायद वह वापस जाने का तुरंत निर्णय ले सकती थी… ख़ैर, अब तो सब कुछ ही शायद ही है… बहुत ही ख़ास तरीके से विश्लेषित किया गया सम्पादकीय है l शुक्रिया तेजेंद्रजी

  14. तेजेंद्र शर्मा सर आपका आभार मेरे एक बार के आग्रह पर आपने यह संपादकीय लिखा। यकीनन बहुत से और लोगों के संदेश भी आपको मिले होंगे इस पर लिखने के लिए। बहुत सुन्दर और विचार गर्भित संपादकीय हमेशा की तरह। बस इस बार खबरों का जिक्र थोड़ा ज्यादा कर दिया वह कुछ कम किया जा सकता था। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है जिसपर हर किसी की अपनी विचाराभिव्यक्ति है और होगी। यकीनन इसे धर्म से परे रखकर देखना चाहिए। न्याय व्यवस्था में तभी विश्वास बनेगा जब ऐसे अपराधियों को सजा मिलेगी और दिल्ली पुलिस भी अपने ऊपर पीछे कुछ सालों में लगे दाग को धो पाएगी। वैसे तो हद है केजरीवाल कुछ नहीं बोल रहे जबकि वे कहते आए दिल्ली पुलिस हमारे कब्जे में हो। इस मामले को जल्द ही राजनीतिक दलों द्वारा अपने अपने हिसाब से भुनाया जाएगा।
    श्रद्धा को श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि

    • तेजस पुरवाई के पाठकों के लिए पूरे केस को छानबीन के बाद रखा है। इस संपादकीय के चार भाग हैं –

      १. पहले भाग में टीवी चैनलों का एजेंडा।
      २. दूसरे भाग घटना का विवरण।
      ३. तीसरे भाग में यह बताना कि यह घटना लव जिहाद नहीं लव आतंकवाद है।
      ४. चौथे भाग में लव जिहाद की परिभाषा।

      मेरा प्रयास रहता है कि संपादकीय पर पूरी मेहनत करूं। आप सब की टिप्पणियों से ही पता चलता है कि सफल हो पाया या नहीं।

  15. यह केवल श्रद्धा की हत्या नहीं है, यह भरोसे और भलाई की हत्या है। सवाल यह है कि युवाओं की पसंद, नैतिकता और धैर्य के स्तर में क्या गलत हो रहा है और क्यों?

  16. नमस्कार
    कल मैंने नेटफ्लेक्स पर एक movi देखी “धोखा ‘
    कहानी अच्छी बुनी गई थी ।समाज में हो रही धटनाओं के पीछे भी कई कहानियां हैं सत्य तक पुलिस भी कहाँ पहुँच पाती है ।लेकिन ह्रदयविदारक है ये सब ।
    सम्पादकीय में लव जिहाद पर अच्छी परिभाषा है।
    Dr Prabha mishra

  17. घटना की तह तक जाकर आपने तथ्यों का सटीक विश्लेषण किया है।इस घटना के कई पहलू आपके सम्पादकीय के माध्यम से सामने आए।
    इस सब कांड से युवक युवतियों को सबक लेना चाहिए साथ ही माता पिता को भी इस संबंध में नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है।

  18. क्या कहें?
    धर्म से परे रह कर सोचने की बात मान ली।
    अब समाज न्याय से परे और न्यायालय समाज से परे होने की बात मान रहा है।
    प्राइमरी घटना से भी इसके सेकेंडरी प्रभाव अधिक भयावह हैं।
    स्तब्ध हूं।

  19. सहजीवन हो या वैवाहिक जीवन, बेटियों के साथ होने वाली हिंसा और अत्याचार के लिए मां बाप चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे जकड़े हुए हैं सामाजिक मान्यताओं और मर्यादाओं की बेड़ियों में । इसलिए बेटियों की हत्याएं होती हैं या वे आत्महत्या कर लेती हैं,।
    आत्मनिर्भर लड़कियां पितृसत्ता को नकारती हैं तो अपनी बद्तर जिंदगी के लिए वही दोषी करार दी जाती है।
    कन्या भ्रूण हो या नवजन्मी बच्ची , श्रद्धा के ३५ टुकड़े हों या दहेज की आग में जलमरी बहू, हत्यारे बदलते रहते हैं पर समाज नहीं , बेहद सख्त और त्वरित दंड काफी नहीं दकियानूसी मान्यताओं पर भी प्रहार होना आवश्यक

  20. जब जब भी कोई ऐसी घटना होती है, पूरे वातावरण में एक घबराहट पसर जाती है और ये घटनाएं रूप बदलकर हर दूसरे दिन दिल दहलाती रहतीं हैं।
    ज़िंदगी में इतनी अप्रत्याशित घटनाओं का चक्र चलता ही रहता है कि आम आदमी संभल ही नहीं पाता।
    अगर इतनी स्वतंत्रता दी गई है तो उसके संरक्षण के लिए भी कोई समाधान निकालने होंगे।
    एक तरफ़ आज़ादी, दूसरी तरफ़ परिवार की नाराज़गी। नाम कुछ भी दें क्या फ़र्क पड़ता है? जिसका ऐसा हश्र हुआ, वह तो वापिस आएगा नहीं, कम से कम इससे युवा वर्ग चौकन्ना हो सके।
    बहुत कष्टप्रद है,नृशंसता के बारे में सोचकर भी झुरझुरी होती है।कुछ दिनों तक लगातार देखते, सुनते रहने से दिमाग़ की नसें सुन्न पड़ जाती हैं।
    आप संपादकीय पर बहुत श्रम करते हैं। इतनी नाज़ुक घटना के तथ्यों की आपने बहुत विस्तृत जानकारी दी है।
    आपको साधुवाद।

  21. आपने आफताब के लिए लव आतंकवाद एकदम सही शब्द गढ़ा है पर इस आतंक को प्रश्रय दे रहे लोग आफताब से कहीं ज्यादा आतंकी हैं ,वे इस समाज के सबसे बड़े दोषी हैं,

  22. rinku chatterjee
    चिंता का विषय ये है कि बड़ी तेज़ी से ऐसी भयावह घटनाएं हो रही है। एक कारण जो मुझे समझ में आता है वो ये है कि अपराधियों को ऐसे मामलों में लगने वाले कानून और उनकी धाराओं की अच्छी जानकारी होती है और वो लूपहोल्स जानते हैं इसलिए आसानी से बरी हो जाते हैं। होशोहवास में ही इन हत्याओं को अंजाम देते हैं और कानून को ठेंगा दिखा कर फिर कोई टारगेट को ढूंढते हैं।

  23. कुछ हुआ
    जानकार लोगों को जानकारी मिली
    जानकारी सार्वजनिक हुई
    फिर बहस हुई
    जो हुआ
    वो हुआ या हुई
    इस बहस में
    तल्लीन होकर
    तय नहीं कर पाये
    कि जो हुआ ठीक हुआ
    या ठीक नहीं हुआ
    लोग पूछने लगे
    क्या हुआ
    हम बताने लगे
    और लोग
    या बतियाने लगे

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