संपादकीय - हमारे समय के दो श्रेष्ठ राजनीतिक नेताओं का जाना 1

मेरा अरुण जेतली से कुछ निजी रिश्ता भी है… बहुत दूर का रिश्ता। इमरजेंसी के दिनों में जब अरुण जेतली दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष थे, तो उन्हीं दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी में कर रहा था।… अरुण उस समय हमारा प्रिय नेता था। फिर अरुण का जन्म भी 1952 में हुआ था जिस साल मैं इस धरती पर आया था।

अभी कुछ ही महीनों पहले की बात है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने वित्त मंत्री अरुण जेतली को अपना बेशकीमती हीरा कहा करते थे। विपक्षी उन्हें भाजपा का चाणक्य तो कुछ अन्य उन्हें नरेन्द्र मोदी का संकट का साथी कहा करते थे। 
जी.एस.टी. हो या कोई भी अन्य सरकारी योजना, जब कहीं किसी अंग्रेज़ी बोलने वाले प्रवक्ता की आवश्यकता महसूस की जाती थी तो सबकी निगाह अरुण जेतली पर ही जाती थी। एक ऐसा नाम जिसे विपक्ष भी उतनी ही इज्ज़त देता था जितनी कि सत्ता पक्ष। उनके नाम के साथ कभी कोई कंट्रोवर्सी नहीं जुड़ी और अगर किसी कीर्ति आज़ाद ने कुछ कहा भी तो अपने राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप कर लिया। 
मेरा अरुण जेतली से कुछ निजी रिश्ता भी है… बहुत दूर का रिश्ता। इमरजेंसी के दिनों में जब अरुण जेतली दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष थे, तो उन्हीं दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी में कर रहा था।… अरुण उस समय हमारा प्रिय नेता था। फिर अरुण का जन्म भी 1952 में हुआ था जिस साल मैं इस धरती पर आया था।
अरुण जेतली के बिना नरेन्द्र मोदी अपनी मंत्री-परिषद के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। मगर ख़राब सेहत के चलते अरुण जेतली ने चुनाव न लड़ने का फ़ैसला किया। तब तक सब यही सोच रहे थे कि चुनावों के बाद अरुण जेतली को मंत्री बना कर राज्य सभा में लाया जाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मंत्री परिषद के गठन से पहले प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं चल कर अरुण जेतली के घर गये और उन्हें मनाने का प्रयास किया। मगर अरुण जेतली अपने स्वास्थ्य को समझते थे इसलिये वे अपने निर्णय पर अडिग रहे।  उनका विभाग निर्मला सीतारमण को दे दिया गया।
अरुण जेतली की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों में भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, गृह मन्त्री से लेकर पूरा मंत्री मंडल व भूतपूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो कहा कि उन्होंने अपना प्रिय मित्र खो दिया है।
दूसरी महत्वपूर्ण नेता का नाम है सुषमा स्वराज। हर भारतीय की और राजनीतिज्ञ की चहेती। आजतक की भारत की सबसे लोकप्रिय विदेश मंत्री। पहली विदेश मंत्री जो लोगों की समस्याओं को ट्वीट पर समझ लिया करती थी और उनकी सहायता को तत्पर रहती थी। 
विश्व हिन्दी सम्मेलनों के मामले में हिन्दी साहित्यकारों की शिकायतों के अतिरिक्त कभी कुछ ऐसा नहीं हुआ जिस पर किसी ने सुषमा स्वराज के विरुद्ध कभी कुछ कहा हो। वे जब विपक्ष की नेता थीं तब भी और जब मंत्री थीं तब भी हमेशा साफ़गोह और साफ़ सुथरी राजनेता रहीं। हर कोई उनमें एक वात्सल्य की मूर्ति देख पाता था। विदेश में फंसे भारतीयों के लिये तो जैसे वे एक देवदूत ही थीं। 
उनके कार्यकाल में भारत के विदेशी सरकारों से बेहतरीन रिश्ते बने। हर राजनेता उन्हें बहन मानता था। वे भारत की सबसे कम उम्र की सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। 
सुषमा स्वराज के निधन पर राष्ट्र्पपति, उपराष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मंत्री परिषद के तमाम सदस्य, विपक्षी दलों के सभी कदावर नेताओं ने स्वयं पहुंच कर श्रद्धांजलि अर्पित की। कल तक जिन के बिना सरकार चल नहीं सकती थी। सरकार के सभी महत्वपूर्ण निर्णय जिनकी मर्ज़ी से लिये जाते थे, आज अचानक वे दोनों विभूतियां दृश्य से कहीं बाहर हैं। कहा जाता है कि जीवन चलने का नाम है।
देश कभी रुकता नहीं है। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गान्धी, अटल बिहारी वाजपेयी के बिना भी चलता रहा है और चलता रहेगा। मगर कुछ नाम, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सभी के दिलों में अपनी जगह बना लेते हैं।… अरुण जेतली और सुषमा स्वराज ऐसे ही दो नाम हैं।
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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