नरेन्द्र मोदी के आगमन से राजनीति में मूलभूत परिवर्तन आना शुरू हो गया। सबसे पहले उन्हें लाशों का सौदागर कहा गया। उसके बाद तो जैसे सभी ने शालीनता को त्याग दिया और भारतीय राजनीति में निजी हमले शुरू हो गये। कांग्रेस के पतन में मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और चिदम्बरम के इन जुमलों का बड़ा हाथ है, रही सही कसर शशि थरूर और  अधीर रंजन चौधरी ने पूरी कर रखी है। 

भारतीय प्रजातंत्र की एक परम्परा रही है। सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों में चाहे कितने भी मतभेद रहें मगर हर सरकारी कार्यक्रम में विपक्षी दलों के नेताओं को सम्मान-पूर्वक ढंग से आमंत्रित किया जाता रहा है और विपक्षी दलों के नेता भी हर कार्यक्रम में शामिल होते रहे हैं। 
गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर तो हर नेता की चाह होती है कि वह राजपथ और लाल किले पर इन राष्ट्रीय कार्यक्रमों का हिस्सा बने। भारत के पहले प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू तो इस बात का ख़ास ख़्याल रखा करते थे कि जो नेता संसद में उनकी प्रखर आलोचना करते हैं, उन्हें कभी यह अहसास न होने दिया जाए कि उस आलोचना के कारण हम शत्रु बन गये हैं।
नेहरू जी के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि यदि कोई बड़ा नेता चुनाव हार भी जाता था तो उसे कोशिश करके राज्यसभा में लाने का पूरा प्रयास किया जाता था। यह स्वस्थ परम्परा एक लम्बे अर्से तक चलती रही। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के हितों की पैरवी के लिये विपक्ष के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा। और वाजपेयी जी ने भी अपना किरदार बख़ूबी निभाया। 
चुनावों में चर्चा मुद्दों की होती थी मगर निजी आरोप नहीं लगाए जाते थे। सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों के रिश्तों में कड़वाहट की शुरूआत 1975 में इमरजेंसी से हुई जब सभी बड़े विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और महत्वपूर्ण व्यक्तियों को जेल में डाल दिया गया। जयप्रकाश नारायण के तो गुर्दे तक जेल में ख़राब हो गये। 
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। मगर उसमें भी पुराने कॉंग्रेसियों का बोलबाला था। यानि कि मूल कल्चर कांग्रेस का ही था। मोरारजी देसाई, इंदर कुमार गुजराल, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, चरण सिंह सभी कभी न कभी कांग्रेसी ही थे। 
सही मायने में पहली बार ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी जब अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधान मंत्री बने। नरेन्द्र मोदी के आगमन से राजनीति में मूलभूत परिवर्तन आना शुरू हो गया। सबसे पहले उन्हें लाशों का सौदागर कहा गया। उसके बाद तो जैसे सभी ने शालीनता को त्याग दिया और भारतीय राजनीति में निजी हमले शुरू हो गये। काँग्रेस के पतन में मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और चिदम्बरम के इन जुमलों का बड़ा हाथ है। रही सही कसर शशि थरूर और  अधीर रंजन चौधरी ने पूरी कर रखी है। 
उधर भाजपा के कुछ मंत्री और राज्य स्तर के नेताओं ने भी घटिया बातें कहने का ठेका उठा रखा है। समय समय पर अपनी बेहूदा बातों से राष्ट्रीय नेताओं का अपमान करवाते रहते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तो प्रधानमंत्री को थप्पड़ मारने को कहती हैं और उन्हें प्रधानमन्त्री मानने से इन्कार करती हैं। 
मगर सबसे अधिक अखरने वाली घटना तो 15 अगस्त 2019 को स्वतंत्रता दिवस समारोह पर लालकिले पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी का न दिखाई देना था। यदि उन्होंने इस समारोह का बहिष्कार किया है तो भी इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया।
और हाँ अगर बात केवल ईगो की है और वे इसलिये नहीं आए कि उन्हें बैठने के लिये उचित स्थान का इन्तज़ाम नहीं किया गया या उन्हें निमंत्रण पत्र ही नहीं भेजा गया, तो इस बात पर भी सरकार को सोचना होगा कि कैसे विपक्ष के दिल में विश्वास जगाया जाए। लोकतंत्र के पहिये हैं सत्ता पक्ष और विपक्ष। दोनों को मिल कर ही राष्ट्र की गाड़ी को खींचना है। 
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

1 टिप्पणी

  1. अतिसुन्दर : लोकतंत्र के पहिये हैं सत्ता पक्ष और विपक्ष। दोनों को मिल कर ही राष्ट्र की गाड़ी को खींचना है।

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