आज तक यही होता आया है कि अमरीका पूरे विश्व को लोकतन्त्र की नसीहतें देता रहा है। ईराक़, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान में सरकारें गिरा दी गयीं ताकि वहां लोकतन्त्र स्थापित किया जा सके। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी को भयानक बेइज़्ज़ती के साथ मौत दी गयी। मगर दो सदी से भी पुराने लोकतन्त्र के मंदिर पर जिस प्रकार डोनॉल्ड ट्रंप के समर्थकों ने हमला किया वो किसी प्रकार की आतंकवादी कार्यवाही से कम नहीं था।
बचपन से एक कहावत सुनते आए थे – ‘बन्दर के हाथ में उस्तरा’। यानि कि किसी मूर्ख के हाथ में सत्ता नहीं आनी चाहिये वरना वह ऐसा नुक़्सान करेगा जिसकी भरपाई हो पाना संभव नहीं होगा। डॉनल्ड ट्रंप के हाथ वो उस्तरा चार साल पहले लग गया और उसने अमरीका की ऐसी फ़जीहत कर डाली कि वहां के लोकतन्त्र पर सवालिया निशान लग गये।
कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि कैपिटल हिल यानि कि वाशिंगटन में सत्ता के केन्द्र पर जनता हथियार लेकर चढ़ाई कर सकती है। मगर ट्रंप ने यह कर दिखाया और दुनिया को बता दिया कि उसकी सोच किसी अतिवादी से कम नहीं है। उसका लोकतांत्रिक संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं में कोई विश्वास नहीं है। चुनावों के नतीजों को वो मानता नहीं है।
आज तक यही होता आया है कि अमरीका पूरे विश्व को लोकतन्त्र की नसीहतें देता रहा है। ईराक़, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान में सरकारें गिरा दी गयीं ताकि वहां लोकतन्त्र स्थापित किया जा सके। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी को भयानक बेइज़्ज़ती के साथ मौत दी गयी। मगर दो सदी से भी पुराने लोकतन्त्र के मंदिर पर जिस प्रकार डोनॉल्ड ट्रंप के समर्थकों ने हमला किया वो किसी प्रकार की आतंकवादी कार्यवाही से कम नहीं था।



सम्पादक पुरवई ,नमन
जिस घटना ने दुनिया को ध्यानाकर्षित किया उसपर सम्पादकीय
सारगर्भित है । भारत के विपक्षी दलों की टिप्पणियां चर्चा
योग्य नहीं इस यथार्थ को कहने हेतु साधुवाद ।
डॉ प्रभा मिश्रा
बहुत ही बेहतरीन लेख